28/05/2026
“गोमिया की राजनीति में बदल रहा सामाजिक समीकरण: छत्रुराम-माधवलाल युग के बाद समर्थकों की विरासत साधने की जंग”
37 वर्षों तक दो ध्रुवों में बंटी रही गोमिया की राजनीति, अब 'लंबोदर' और 'योगेंद्र' अपने-अपने तरीके से पुराने जनाधार को साधने में जुटे
गोमिया विधानसभा क्षेत्र की राजनीति वर्ष 1977 से 2014 तक मुख्य रूप से दो बड़े राजनीतिक चेहरों-छत्रुराम महतो और माधवलाल सिंह के इर्द-गिर्द घूमती रही।करीब 37 वर्षों तक यही दोनों नेता गोमिया की राजनीतिक धुरी बने रहे और क्षेत्र की सामाजिक-राजनीतिक दिशा तय करते रहे। लेकिन वर्ष 2014 का विधानसभा चुनाव गोमिया की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत लेकर आया, जब योगेंद्र प्रसाद महतो ने माधवलाल सिंह को पराजित कर उस लंबे राजनीतिक किले को ढहा दिया, जो दशकों से कायम था। इसके बाद 2019 में लंबोदर महतो ने गोमिया की सत्ता पर कब्जा जमाया, जबकि 2024 में योगेंद्र महतो ने पुनः वापसी करते हुए क्षेत्र की राजनीति को फिर नई दिशा दे दी।
दो नेताओं के निधन के बाद बदली राजनीतिक सक्रियता : सहानुभूति और संवेदना की राजनीति के जरिए समर्थकों को साधने की कोशिश:
गोमिया की राजनीति में एक दिलचस्प समानता उस समय देखने को मिली, जब दोनों पुराने दिग्गज नेताओं के निधन के बाद नए नेताओं ने उनके समर्थकों के बीच अपनी सक्रियता बढ़ाई। छत्रुराम महतो के निधन के बाद लंबोदर महतो लगातार उनके परिवार, समर्थकों और सामाजिक आधार के बीच सक्रिय दिखे। उन्होंने सहानुभूति, संवेदना और सामाजिक जुड़ाव के जरिए उस राजनीतिक विरासत को साधने की कोशिश की, जिसे कभी छत्रुराम महतो प्रतिनिधित्व करते थे।
वहीं दूसरी ओर माधवलाल सिंह के निधन के बाद योगेंद्र महतो भी लगातार उनके समर्थकों, पुराने कार्यकर्ताओं और सामाजिक समूहों के बीच सक्रिय दिखाई दिए। राजनीतिक जानकार इसे गोमिया की पुरानी राजनीतिक विरासत को अपने पक्ष में करने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं।
गोमिया में सामाजिक समीकरणों की नई लड़ाई : कुड़मि बनाम बहु-सामाजिक समर्थन की पुरानी धुरी अब नए रूप में सामने
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, छत्रुराम महतो का मुख्य जनाधार कुड़मि समुदाय और भाजपा समर्थक वर्ग माना जाता था। वहीं माधवलाल सिंह की पकड़ उच्च वर्गों के साथ-साथ आदिवासी, पिछड़ा, दलित और अन्य कई समुदायों में भी मजबूत मानी जाती थी। अब यही सामाजिक समीकरण नई राजनीतिक रणनीतियों का आधार बनता दिखाई दे रहा है।
लंबोदर महतो की रणनीति :
लंबोदर महतो वर्तमान में एनडीए और आजसू के साथ मिलकर कुड़मि समुदाय तथा पारंपरिक भाजपा समर्थकों को गोलबंद करने में जुटे दिखाई दे रहे हैं।
वे छत्रुराम महतो की सामाजिक-राजनीतिक विरासत को अपने पक्ष में मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं।
योगेंद्र महतो की नई सामाजिक राजनीति :
दूसरी ओर योगेंद्र प्रसाद महतो अब केवल पारंपरिक कुड़मि समर्थन तक सीमित नहीं रहना चाहते। राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए वे आदिवासी, मुस्लिम, दलित, पिछड़ा वर्ग और उच्च वर्ग के मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने में लगे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आजसू की बढ़ती सक्रियता और जयराम महतो की राजनीतिक एंट्री ने कुड़मि वोट बैंक में नया विभाजन पैदा किया है, जिसका असर झामुमो पर भी पड़ा है
इसी कड़ी में JLKM से चुनाव मैदान में उतरी पूजा महतो ने भी पिछले विधानसभा चुनाव में उल्लेखनीय प्रदर्शन कर राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दिया। उन्होंने केवल कुड़मि समाज ही नहीं, बल्कि अन्य समाज के युवाओं के बीच भी अच्छी पकड़ बनाई। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, युवा मतदाताओं में बढ़ती स्वीकार्यता का ही परिणाम था कि पूजा महतो चुनाव में तत्कालीन निर्वतमान विधायक लंबोदर महतो को पीछे छोड़ दूसरे स्थान पर रहीं, जबकि आजसू पार्टी के लंबोदर महतो तीसरे पायदान पर खिसक गए।
विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव परिणाम ने यह संकेत दिया कि गोमिया की राजनीति अब केवल पारंपरिक जातीय और दलगत समीकरणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि युवा नेतृत्व, क्षेत्रीय पहचान और नए राजनीतिक विकल्पों की ओर भी मतदाताओं का झुकाव बढ़ रहा है। इसी वजह से अब योगेंद्र महतो बहु-सामाजिक समर्थन की राजनीति पर ज्यादा जोर देते दिखाई दे रहे हैं, जबकि दूसरी ओर लंबोदर महतो अपने पारंपरिक संगठनात्मक और सामाजिक आधार को पुनः मजबूत करने में जुटे हैं।
उच्च वर्ग और वैश्य समाज अब भी चुनौती :
हालांकि गोमिया समेत झारखंड के कई इलाकों में झामुमो की ओर उच्च वर्ग और वैश्य समाज का झुकाव परंपरागत रूप से सीमित माना जाता रहा है। फिर भी बदलते राजनीतिक समीकरणों और स्थानीय नेतृत्व की सक्रियता के कारण भविष्य में क्या नया सामाजिक गठजोड़ बनता है, इस पर राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं।
आगे की राजनीति पर सबकी नजर :
गोमिया विधानसभा क्षेत्र में अब लड़ाई केवल दलों की नहीं, बल्कि सामाजिक विरासत, पुराने जनाधार और नए समीकरणों की भी बन चुकी है।
एक ओर लंबोदर महतो छत्रुराम महतो की राजनीतिक विरासत को मजबूत करने की कोशिश में हैं, तो दूसरी ओर योगेंद्र महतो माधवलाल सिंह के बहु-सामाजिक समर्थन आधार को अपने पक्ष में जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
वहीं JLKM और नए युवा नेतृत्व की सक्रियता ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि गोमिया की राजनीति अब त्रिकोणीय सामाजिक और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ चुकी है। अब आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि गोमिया की जनता किस सामाजिक और राजनीतिक धुरी पर अपना भरोसा जताती है।