04/12/2025
आज के टाइम पर जहां भी धरना प्रदर्शन आंदोलन सभा में RLP सबसे आगे रहती है । कांग्रेस बीजेपी के बड़े से बड़े नेता करोड़ों रुपए खर्च करके भी भीड़ इक्कठी नहीं कर सकते वही नागौर सांसद RLP सुप्रीमो Hanuman Beniwal की एक आवाज में भीड़ एकत्रित हो जाती है का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि उसके पास भीड़ तो अपार है, भावनाएँ जोश से भरी हैं, जमीन पर गुस्सा और उम्मीद दोनों मौजूद हैं—लेकिन यह सब मिलकर भी सत्ता तक पहुँचने का रास्ता पूरा नहीं कर पाते। हर रैली में उमड़ती सैकड़ों-हज़ारों लोगों की भीड़ एक ऐसी ताकत है, जिससे कोई भी पार्टी गर्व कर सके, पर असली सवाल यह है कि यह ताकत वोटों में क्यों नहीं बदल पाती। मंच से उठती तालियाँ, नारों का शोर और जनता का भावनात्मक जुड़ाव कुछ घंटों तक माहौल बना तो देते हैं, लेकिन रैली खत्म होते ही यह ऊर्जा धीरे-धीरे बिखर जाती है। भीड़ लौट जाती है, मुद्दे वहीं रह जाते हैं, और संगठन उस लहर को पकड़ने में बार-बार चूक जाता है।
राजनीति में केवल जोश काफी नहीं, संगठन ज़रूरी है; केवल भीड़ काफी नहीं, बूथ ज़रूरी है; केवल भावनाएँ काफी नहीं, डेटा और रणनीति ज़रूरी है। RLP जनता का भरोसा जीत चुकी है, लेकिन उस भरोसे को जीत में बदलने की तकनीक अब भी अधूरी है। भीड़ दिखाती है कि जनता RLP को चाहती है, पर चुनाव परिणाम बताते हैं कि जनता को कैसे जोड़ा जाए, यह कौशल अभी विकसित होना बाकी है। समर्थकों का जुनून सवाल पूछ रहा है—क्या हमारा संघर्ष सिर्फ रैलियों की भीड़ तक सीमित रह जाएगा, या इसे सत्ता तक ले जाने की ईमानदार और योजना-बद्ध कोशिश शुरू होगी?
यह समय है कि RLP खुद को आईने में देखे—लाखों लोगों का जनसमर्थन एक अनमोल पूंजी है, पर यदि इसे संगठित शक्ति में नहीं बदला गया तो यह भीड़ हर चुनाव में तालियाँ तो बजाती रहेगी, लेकिन सरकार किसी और की बनेगी। RLP के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अब यह तय करना होगा कि वे इतिहास में भीड़ वाली पार्टी कहलाना चाहते हैं या सत्ता बदलने वाली पार्टी। आज का यह विरोधाभास ही कल की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है—बशर्ते भीड़ से लेकर बूथ तक एक सुनियोजित, अनुशासित और आधुनिक राजनीतिक यात्रा शुरू की जाए।
Vinod Kumar Meena