02/01/2026
राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जीवन, संघर्ष और समाज–महिला उत्थान की प्रेरक गाथा। लेखक वीरेंद्र मौर्य
भारत के सामाजिक पुनर्जागरण के इतिहास में राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे भारत की प्रथम शिक्षिका, महान समाज सुधारिका, कवयित्री और नारी शिक्षा की अग्रदूत थीं। ऐसे समय में जब स्त्रियों और शोषित वंचित समाज को शिक्षा से दूर रखा जाता था, राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का सबसे सशक्त माध्यम बनाया।
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव गाँव में हुआ। उनका विवाह कम उम्र में महामना ज्योतिराव फुले से हुआ। उस समय समाज में बाल विवाह, स्त्री अशिक्षा और जातिगत भेदभाव व्याप्त था। विवाह के बाद महामना फुले ने सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सिखाया। यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई और वे शिक्षा व समाज सुधार के पथ पर अग्रसर हुईं।
सावित्रीबाई फुले का जीवन संघर्षों से भरा रहा। जब उन्होंने लड़कियों और पिछड़ों को पढ़ाने का संकल्प लिया, तब समाज के विषमतावादी/रूढ़िवादी वर्गों ने उनका घोर विरोध किया। स्कूल जाते समय उन पर कीचड़, गोबर और पत्थर फेंके जाते थे, गालियाँ दी जाती थीं, अपमानित किया जाता था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे अपने साथ अतिरिक्त साड़ी रखती थीं ताकि अपमान के बाद कपड़े बदलकर फिर बच्चों को पढ़ा सकें। यह साहस और समर्पण उनके व्यक्तित्व को अद्वितीय बनाता है।
1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में सावित्रीबाई फुले और महामना ज्योतिराव फुले ने भारत का पहला बालिका विद्यालय स्थापित किया। सावित्रीबाई वहाँ की पहली शिक्षिका बनीं। इसके बाद उन्होंने कई विद्यालय खोले, जहाँ लड़कियों के साथ-साथ शोषित, वंचित, पिछड़े, अति पिछड़े समाज के बच्चों को भी शिक्षा दी गई। उनका मानना था कि शिक्षा ही सामाजिक समानता और आत्मसम्मान की कुंजी है।
महिला उत्थान के लिए सावित्रीबाई फुले ने असाधारण कार्य किए। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया, बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का विरोध किया। विधवाओं और शोषित महिलाओं के लिए उन्होंने आश्रय स्थल खोले। अवैध गर्भ और सामाजिक भय से पीड़ित महिलाओं की सहायता के लिए उन्होंने ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की, जहाँ नवजात शिशुओं और माताओं की रक्षा की जाती थी। यह कदम उस समय अत्यंत क्रांतिकारी था।
सावित्रीबाई फुले एक सशक्त कवयित्री भी थीं। उनकी रचनाएँ सामाजिक चेतना, समानता और मानवता का संदेश देती हैं। उनकी कविताओं में शोषण के विरुद्ध आवाज़ और शिक्षा के माध्यम से मुक्ति का आह्वान मिलता है। वे केवल शिक्षिका ही नहीं, बल्कि विचारों की क्रांतिकारी थीं। 1897 में पुणे में प्लेग की महामारी फैली। सावित्रीबाई फुले ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना रोगियों की सेवा की। एक पीड़ित बच्चे को अस्पताल पहुँचाते समय वे स्वयं प्लेग से संक्रमित हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। उनका यह बलिदान मानव सेवा की सर्वोच्च मिसाल है।
शिक्षा की वास्तविक देवी, राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले जी ने यदि महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार नहीं खोले होते तो इन्दिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री, प्रतिभा पाटिल जी देश की राष्ट्रपति नहीं बनती, और करोड़ों महिलाएं आज इस मुकाम पर नहीं पहुंचती, बल्कि चूल्हा चौका कर रही होती। इसलिए भारत की सभी माताओं, बहनों, बेटियों को राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके बताए मार्ग पर चलकर अपने और राष्ट्र के विकास में सहयोग करना चाहिए।
निष्कर्षतः राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले का जीवन संघर्ष, साहस और करुणा का प्रतीक है। उन्होंने नारी और शोषित समाज को शिक्षा, सम्मान और आत्मविश्वास का मार्ग दिखाया। आज जब हम महिला शिक्षा और सामाजिक समानता की बात करते हैं, तो सावित्रीबाई फुले का योगदान एक दीपस्तंभ की तरह हमारा मार्गदर्शन करता है। उनका जीवन आज भी हमें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और समाज को मानवतावादी दिशा देने की प्रेरणा देता है।