04/12/2024
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि जिन्दगी तरी जुल्फ़ों की नर्म छांव में
गुजरने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तेरगी जो मेरी जीस्त का मुकद्दर है
तेरी नजर की शुआओं में खो भी सकती थी
अजब न था के मैं बेगाना अलम होकर
तेरे जमाल की रैनाइयों में खो रहता
तेरा गदाज बदन तेरी नीम-बाज आंखें
इन्हीं हसीन फसानों में महव हो रहता है
पुकारती मुझे जब तल्खियां जमाने की
तेरे लबों से हलावत के घूंट पी लेता
हयात चीखती फिरती बिरहिना सर और में
घनेरी जुल्फ़ों के साय में छुप के जी लेता है
मगर ये हो ना सका और अब ये अलम है
कि तु नहीं तेरा गम तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुजर रही है कुछ इस तरह जिंदगी जैसे
उसे किसी के सहारे की आरजू भी नहीं
जमाने भर के दुःखों को लगा चुका हूं गले
गुजर रहा हूं कुछ अन्जानी राहगुजारों से
अजीब साए मेरी सित्म बढ़ते आते हैं
हयात मौत के पुरहोल खारजारों से
न कोई जादा, न कोई मंजिल, न रोशनी का चिराग
भटक रही है खालाओं में जिन्दगी मेरी
इन्हीं खालाओं में रह जाउंगा कभी खोकर
मैं जानता हूं मेरी नफस मगर यों ही
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है