11/11/2025
हिमाचल प्रदेश में स्थित चंबा का एक समृद्ध और प्राचीन इतिहास है, जो 6वीं शताब्दी में शुरू हुआ था। इसे अक्सर अपने असंख्य प्राचीन मंदिरों और धार्मिक स्थलों के कारण "देवभूमि" कहा जाता है।
स्थापना और नामकरण
मूल राजधानी: चंबा राज्य की मूल राजधानी ब्रह्मपुरा (वर्तमान भरमौर) थी।
स्थापना (920 ईस्वी): 920 ईस्वी में, राजा साहिल वर्मन ने अपनी राजधानी को भरमौर से रावी नदी के दाहिने किनारे पर स्थित एक नए स्थान पर स्थानांतरित कर दिया।
नाम: राजा साहिल वर्मन ने इस नए शहर का नाम अपनी धर्मपरायण बेटी चंपावती (जिन्हें चमेली माता भी कहा जाता है) के नाम पर रखा। एक अन्य मान्यता के अनुसार, इस क्षेत्र में 'चंपा' (चंपक) के पेड़ों की बहुतायत के कारण इसका नाम चंबा पड़ा।
रानी सुनयना का बलिदान: शहर में जल संकट को दूर करने के लिए राजा की पत्नी रानी सुनयना ने स्वयं को जीवित दफन कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप एक जलधारा प्रवाहित हुई। उनकी याद में सुही मेला आयोजित किया जाता है।
ऐतिहासिक घटनाक्रम
राजवंश: चंबा पर मुख्य रूप से मारू वंश के राजाओं ने शासन किया, जिन्होंने 6वीं शताब्दी में राज्य की स्थापना की थी।
मुगल और सिख प्रभाव: अपने इतिहास के दौरान, चंबा रियासत ने कश्मीर, मुगल और सिख शासनों के अधीन भी काम किया।
ब्रिटिश शासन: यह क्षेत्र 1846 में ब्रिटिश भारत का हिस्सा बन गया।
हिमाचल में विलय: आजादी के बाद, 8 मार्च 1948 को चंबा का हिमाचल प्रदेश में विलय हो गया। हिमाचल प्रदेश के निर्माण में चंबा की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
सांस्कृतिक विरासत
चंबा अपनी अनूठी सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है:
प्राचीन मंदिर: यहां 10वीं शताब्दी में राजा साहिल वर्मन द्वारा बनवाया गया प्रसिद्ध लक्ष्मी नारायण मंदिर समूह है, जो शिखर शैली की वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
हस्तशिल्प: चंबा अपने पारंपरिक हस्तशिल्प, विशेष रूप से प्रसिद्ध चंबा रुमाल और पहाड़ी लघु चित्रों के लिए जाना जाता है।