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14/03/2026

पंजाब के मोगा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रैली को सिर्फ एक सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे राज्य में BJP Punjab की बदलती रणनीति के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में लगभग 19 प्रतिशत वोट हासिल करने के बाद भाजपा अब राज्य में अपने संगठन को मजबूत करने और स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। मोगा की यह रैली खास तौर पर मालवा क्षेत्र पर फोकस को दर्शाती है, क्योंकि पंजाब की राजनीति में मालवा क्षेत्र को निर्णायक माना जाता है।

इस रैली के जरिए भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी अब सिर्फ शहरी इलाकों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि ग्रामीण पंजाब और सिख समाज के बीच भी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। लंबे समय तक पंजाब में भाजपा की राजनीति शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन पर आधारित रही, लेकिन गठबंधन टूटने के बाद पार्टी अब अपने दम पर राजनीतिक आधार बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। यही वजह है कि पार्टी बड़े जनसम्पर्क कार्यक्रमों और रैलियों के माध्यम से राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रही है।

राजनीतिक दृष्टि से मोगा रैली का एक संदेश विपक्षी दलों के लिए भी माना जा रहा है। पंजाब में इस समय सत्ता में Aam Aadmi Party - Punjab है, जबकि Indian National Congress - Punjab और Shiromani Akali Dal भी अपने-अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने की कोशिश में लगे हैं। ऐसे माहौल में भाजपा की यह रैली यह संकेत देती है कि पार्टी आने वाले समय में पंजाब की राजनीति में अपनी भूमिका को और अधिक सक्रिय बनाना चाहती है।

कुल मिलाकर मोगा की यह रैली सिर्फ एक राजनीतिक सभा नहीं, बल्कि पंजाब में भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसमें पार्टी अपने वोट प्रतिशत को बढ़ाने, नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने और आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश कर रही है।
Amarinder Singh Raja Warring Sunil Jakhar Ashwani Sharma Sukhbir Singh Badal Bhagwant Mann

10/03/2026

लुधियाना की राजनीति में नई हलचल: अमित गोसाईं के अकाली दल में आने के मायने

लुधियाना की शहरी राजनीति में हाल ही में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला, जब पूर्व मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता स्वर्गीय सतपाल गोसाईं के पोते अमित गोसाईं ने भाजपा प्रवक्ता पद से इस्तीफा देकर शिरोमणि अकाली दल का दामन थाम लिया। यह सिर्फ एक साधारण दल परिवर्तन नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे लुधियाना की बदलती राजनीतिक रणनीतियों और शहरी वोट बैंक की नई जंग के रूप में देखा जा रहा है। गोसाईं परिवार लंबे समय से लुधियाना की राजनीति में प्रभावशाली रहा है, विशेषकर व्यापारी और शहरी हिंदू समाज में उनकी मजबूत पकड़ रही है। ऐसे में अमित गोसाईं का अकाली दल में शामिल होना पार्टी के लिए शहर की राजनीति में एक महत्वपूर्ण जोड़ माना जा रहा है।

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो Shiromani Akali Dal पिछले कुछ समय से पंजाब के शहरी इलाकों में अपनी पकड़ को फिर से मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक आधार रखने वाली यह पार्टी अब शहरों में नए चेहरों और सामाजिक प्रभाव रखने वाले नेताओं को आगे लाकर अपनी राजनीतिक जमीन को व्यापक बनाने की कोशिश कर रही है। इसी रणनीति के तहत अमित गोसाईं को लुधियाना मध्य विधानसभा क्षेत्र का क्षेत्र प्रभारी नियुक्त किया जाना भी एक सोचा-समझा कदम माना जा रहा है, क्योंकि यह सीट लुधियाना शहर की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक सीटों में से एक मानी जाती है।

लुधियाना मध्य सीट का चुनावी गणित हमेशा से शहरी, व्यापारी और हिंदू वोटरों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। ऐसे में गोसाईं परिवार की पहचान और नेटवर्क अकाली दल के लिए इस क्षेत्र में संगठन को मजबूत करने का माध्यम बन सकता है। इसके साथ ही यह कदम भाजपा और अकाली दल के बीच शहरी वोट बैंक को लेकर चल रही प्रतिस्पर्धा की ओर भी संकेत करता है। यदि अमित गोसाईं अपने पारिवारिक प्रभाव और समर्थकों को संगठित करने में सफल रहते हैं, तो इसका प्रभाव आने वाले चुनावों में लुधियाना शहर की अन्य सीटों पर भी दिखाई दे सकता है।

कुल मिलाकर, यह राजनीतिक घटनाक्रम सिर्फ एक नेता के दल परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे पंजाब की शहरी राजनीति में नए समीकरण बनने की शुरुआत के रूप में भी देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि अमित गोसाईं की सक्रियता और संगठनात्मक भूमिका अकाली दल को लुधियाना की राजनीति में कितनी नई ताकत दे पाती है।

08/03/2026

पंजाब की राजनीति में इन दिनों Sukhbir Singh Badal द्वारा प्रस्तावित लगभग 40 राजनीतिक रैलियां काफी चर्चा में हैं। Shiromani Akali Dal इन रैलियों के माध्यम से पूरे राज्य में अपना राजनीतिक आधार फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है। 2022 विधानसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक सिख और ग्रामीण वोट बैंक को दोबारा सक्रिय करना है। ऐसे में यह रैलियां सिर्फ जनसभाएं नहीं बल्कि संगठन को दोबारा खड़ा करने और कार्यकर्ताओं में नया उत्साह पैदा करने की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं।

इन रैलियों के जरिए अकाली दल राज्य की मौजूदा Aam Aadmi Party - Punjab सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करेगा। कानून-व्यवस्था, आर्थिक स्थिति, किसानों के मुद्दे और धार्मिक मामलों को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाकर पार्टी जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। अगर इन रैलियों में अच्छी भीड़ जुटती है और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी तरीके से उठाया जाता है, तो इससे अकाली दल को विपक्ष की राजनीति में फिर से केंद्रीय भूमिका मिल सकती है।

इन रैलियों का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू यह भी है कि अकाली दल अपने पारंपरिक वोट बैंक को Indian National Congress - Punjab से वापस हासिल करने की कोशिश करेगा। पंजाब के कई ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस और अकाली दल के बीच सीधा मुकाबला रहा है, इसलिए इन रैलियों के माध्यम से पार्टी मालवा, माझा और दोआबा क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का प्रयास करेगी। खासकर मालवा क्षेत्र, जहां राज्य की अधिकांश विधानसभा सीटें आती हैं, वहां अकाली दल की सक्रियता भविष्य की राजनीति के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।

इसके अलावा इन रैलियों को राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है, क्योंकि पंजाब में BJP Punjab भी अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में अगर अकाली दल की रैलियों में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं, तो यह संदेश जाएगा कि पार्टी का जनाधार अभी भी मजबूत है और आने वाले समय में किसी भी संभावित राजनीतिक गठबंधन में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो सुखबीर बादल की 40 रैलियां पंजाब की राजनीति में एक बड़े राजनीतिक अभियान की तरह हैं। अगर यह अभियान जनता के बीच प्रभाव पैदा करता है, तो अकाली दल के लिए यह राजनीतिक पुनरुत्थान की शुरुआत साबित हो सकता है और आने वाले चुनावों में राज्य की राजनीति को फिर से त्रिकोणीय मुकाबले की ओर ले जा सकता है।

04/03/2026

पंजाब की मौजूदा राजनीति को अगर गहराई से देखा जाए तो यह साफ दिखाई देता है कि राज्य की सियासत अब सीधे मुकाबले से ज्यादा रणनीतिक टारगेट पॉलिटिक्स में बदल चुकी है। हर पार्टी अपने हिसाब से राजनीतिक प्रतिद्वंदी तय करके आगे बढ़ रही है। यही वजह है कि आने वाले समय में पंजाब की राजनीति कई दिशाओं में खिंचती हुई नजर आ सकती है।

सबसे पहले अगर आम आदमी पार्टी की बात करें तो सत्ता में होने के कारण उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी सरकार की पकड़ बनाए रखना है। इसलिए आम आदमी पार्टी की राजनीति दो मोर्चों पर चलती दिखाई देती है। एक तरफ वह कांग्रेस को कमजोर करने की कोशिश करती है ताकि पंजाब की राजनीति को AAP बनाम बाकी दल के रूप में पेश किया जा सके। वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी लगातार शिरोमणि अकाली दल को भी निशाने पर रखती है, क्योंकि अकाली दल की पंथक और ग्रामीण राजनीति अभी भी कई क्षेत्रों में प्रभाव रखती है। आप यह संदेश देना चाहती है कि अकाली दल का दौर खत्म हो चुका है।

दूसरी तरफ शिरोमणि अकाली दल की राजनीति का सबसे बड़ा निशाना आम आदमी पार्टी बन चुकी है। 2022 के चुनाव में जिस तरह आप ने अकाली दल के पारंपरिक गढ़ों में सेंध लगाई, उसके बाद अकाली दल के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती आप सरकार ही बन गई है। इसलिए अकाली दल की रैलियों, बयानों और राजनीतिक अभियानों में आप सरकार को घेरना ही मुख्य रणनीति दिखाई देती है।

अब अगर भाजपा की राजनीति को समझा जाए तो उसकी रणनीति पंजाब में थोड़ी अलग और ज्यादा लंबी दिखाई देती है। भाजपा एक तरफ कांग्रेस को घेरने की कोशिश कर रही है, क्योंकि उसे लगता है कि पंजाब में कांग्रेस का शहरी और पारंपरिक वोट बैंक उसके लिए अवसर बन सकता है। लेकिन इसके साथ-साथ भाजपा अकाली दल को भी अंदर से कमजोर करने की रणनीति पर काम करती दिखाई देती है। भाजपा जानती है कि पंजाब में पंथक राजनीति और ग्रामीण प्रभाव के कारण अकाली दल लंबे समय तक एक मजबूत ताकत रहा है। इसलिए कई जगह अकाली दल के असंतुष्ट नेताओं को अपने साथ जोड़ना और उसके संगठन को कमजोर करना भी भाजपा की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

अगर इन सभी राजनीतिक चालों को एक साथ देखा जाए तो पंजाब की राजनीति में एक दिलचस्प समीकरण बनता दिखाई देता है—
आम आदमी पार्टी और भाजपा दोनों कांग्रेस को घेरने की कोशिश कर रही हैं, अकाली दल का मुख्य निशाना आम आदमी पार्टी है, और आम आदमी पार्टी लगातार अकाली दल को कमजोर दिखाने में लगी हुई है। वहीं भाजपा कांग्रेस के साथ-साथ अकाली दल को भी अंदर से कमजोर करने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है।

यानी पंजाब की राजनीति इस समय एक तरह के बहुस्तरीय राजनीतिक संघर्ष में बदलती जा रही है। यहां हर पार्टी केवल चुनाव जीतने की लड़ाई नहीं लड़ रही, बल्कि अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी की राजनीतिक जमीन कमजोर करने की कोशिश भी कर रही है। यही वजह है कि आने वाले समय में पंजाब की राजनीति और भी ज्यादा तेज, जटिल और रणनीतिक होती नजर आ सकती है।
Shiromani Akali Dal Aam Aadmi Party - Punjab Indian National Congress - Punjab BJP Punjab

18/02/2026

पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले रैलियों की यह श्रृंखला केवल राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि चार अलग-अलग रणनीतियों का टकराव है। हर पार्टी अपनी मौजूदा स्थिति, सामाजिक आधार और भविष्य की संभावना के हिसाब से मैदान सजा रही है।

सबसे पहले आम आदमी पार्टी की बात करें तो किली चाहलां (मोगा) की “एंटी-ड्रग” रैली यह साफ संकेत देती है कि आप अब सरकार की उपलब्धियों को चुनावी नैरेटिव में बदलना चाहती है। नशे के मुद्दे को उठाकर पार्टी एक साथ दो संदेश दे रही है—एक तरफ शासन की नैतिकता और दूसरी तरफ पिछली सरकारों पर परोक्ष हमला। यह रैली बताती है कि आप 2027 में भावनात्मक या जातीय राजनीति से ज्यादा गवर्नेंस और लॉ-एंड-ऑर्डर को केंद्र में रखेगी।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की रणनीति इससे अलग दिखती है। इंडो-यूएस ट्रेड डील, मनरेगा और किसान-आर्थिक मुद्दों पर रैलियाँ यह संकेत देती हैं कि कांग्रेस खुद को विपक्ष की राष्ट्रीय आवाज़ के रूप में स्थापित करना चाहती है। संभावित रूप से राहुल गांधी की मौजूदगी यह दर्शाती है कि पार्टी पंजाब को केवल राज्य इकाई नहीं, बल्कि केंद्र बनाम राज्यों की राजनीति के बड़े मंच के रूप में देख रही है। कांग्रेस का फोकस साफ है—महंगाई, रोजगार और किसान, यानी वे मुद्दे जिन पर वह पारंपरिक रूप से आप, अकाली दल और बीजेपी तीनों को घेर सकती है।

शिरोमणि अकाली दल की 40 से ज्यादा रैलियों की योजना को अगर गहराई से देखें तो यह कैडर-रिकवरी अभियान ज्यादा लगता है, न कि केवल चुनाव प्रचार। अकाली दल लंबे समय से संगठनात्मक कमजोरी और वोट बैंक के बिखराव से जूझ रहा है। कादियां से शुरू हो रही रैली सीरीज यह दिखाती है कि पार्टी पहले अपने पुराने समर्थक आधार—ग्रामीण पंजाब, धार्मिक-पारंपरिक मतदाता—को फिर से जोड़ना चाहती है, उसके बाद ही बड़े राजनीतिक दावे करेगी।

वहीं भारतीय जनता पार्टी की मोगा में प्रस्तावित बड़ी रैली, जिसमें अमित शाह की भूमिका अहम मानी जा रही है, एक अलग संकेत देती है। बीजेपी अभी सीधे सत्ता की दावेदार कम और राजनीतिक संतुलन बिगाड़ने वाली ताकत ज्यादा दिख रही है। यह रैली यह बताती है कि पार्टी पंजाब में धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र पहचान मजबूत करना चाहती है, खासकर शहरी, गैर-पारंपरिक और नाराज़ मतदाता वर्ग में।

कुल मिलाकर, इन चारों पार्टियों की रैलियाँ एक-दूसरे से टकराती हुई रणनीतियाँ दिखाती हैं—आप गवर्नेंस पर, कांग्रेस राष्ट्रीय-आर्थिक मुद्दों पर, अकाली दल संगठनात्मक पुनर्जीवन पर और बीजेपी दीर्घकालिक विस्तार पर काम कर रही है। यही वजह है कि ये रैलियाँ सिर्फ भीड़ जुटाने का माध्यम नहीं, बल्कि 2027 की सियासी दिशा तय करने वाले शुरुआती संकेत भी हैं।
Indian National Congress Shiromani Akali Dal Aam Aadmi Party - Punjab BJP Punjab
Sukhbir Singh Badal Amarinder Singh Raja Warring Aman Arora Sunil Jakhar

15/02/2026

अरविंद खन्ना का अकाली दल में जाना: रणनीति, दोस्ती या बीजेपी की चूक?

भाजपा के उपाध्यक्ष अरविंद खन्ना का शिरोमणि अकाली दल में शामिल होना सिर्फ एक दल-बदल नहीं, बल्कि पंजाब की बदलती राजनीति में कई सवाल खड़े करने वाली घटना है। क्या यह कदम किसी सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, क्या सुखबीर सिंह बादल के साथ पुरानी दोस्ती ने भूमिका निभाई, या फिर इसे पंजाब में भारतीय जनता पार्टी की संगठनात्मक और राजनीतिक असफलता के रूप में देखा जाना चाहिए?

अरविंद खन्ना का राजनीतिक सफर

अरविंद खन्ना का राजनीतिक करियर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अकाली दल से की और लंबे समय तक पार्टी के भरोसेमंद चेहरों में गिने गए। उद्योगपति पृष्ठभूमि से आने वाले खन्ना को हमेशा “फंडिंग + संगठन” के मजबूत स्तंभ के रूप में देखा गया। बाद के वर्षों में उन्होंने भाजपा का दामन थामा और पंजाब बीजेपी में उपाध्यक्ष जैसे अहम पद तक पहुंचे।
हालांकि, भाजपा में रहते हुए वे न तो पार्टी की राज्य-स्तरीय रणनीति के केंद्र में रहे और न ही उन्हें वह राजनीतिक विस्तार मिला, जिसकी उनसे अपेक्षा थी।

रणनीति या व्यक्तिगत संबंध?

अरविंद खन्ना और सुखबीर बादल के संबंध महज़ राजनीतिक नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी व्यक्तिगत और व्यावसायिक समझ पर भी आधारित रहे हैं। अकाली दल के भीतर “पुराने भरोसेमंद चेहरों” को फिर से जोड़ने की जो कोशिश सुखबीर बादल कर रहे हैं, खन्ना की वापसी उसी रणनीति का हिस्सा मानी जा सकती है।
यह कदम अकाली दल के लिए संगठनात्मक मजबूती और 2027 के लिहाज़ से कैडर को संकेत देने वाला संदेश भी है कि पार्टी अपने पुराने नेताओं को वापस लाने में सफल हो रही है।

बीजेपी की रणनीतिक विफलता?

दूसरी ओर, यह सवाल भी उतना ही अहम है कि क्या अरविंद खन्ना का जाना पंजाब बीजेपी के लिए चेतावनी है। भाजपा में शामिल कई नेता खुद को “पोस्टर और पद” तक सीमित महसूस कर रहे हैं। ज़मीनी राजनीति, निर्णय प्रक्रिया और भविष्य की भूमिका को लेकर असंतोष लगातार सामने आता रहा है।
खन्ना जैसे संसाधन-संपन्न और नेटवर्क वाले नेता का जाना इस धारणा को मज़बूत करता है कि पंजाब में भाजपा अभी भी स्पष्ट स्थानीय नेतृत्व और दीर्घकालिक रणनीति तलाश रही है।

अरविंद खन्ना का अकाली दल में जाना न तो सिर्फ व्यक्तिगत दोस्ती का परिणाम है और न ही मात्र एक अवसरवादी कदम। यह एक बहु-स्तरीय राजनीतिक संकेत है—
• अकाली दल के लिए: पुराने आधार की पुनर्बहाली
• भाजपा के लिए: आत्ममंथन की ज़रूरत
• और पंजाब की राजनीति के लिए: 2027 से पहले नई राजनीतिक जमावट की आहट

यह देखना दिलचस्प होगा कि खन्ना की यह “घर वापसी” अकाली दल को कितना संगठनात्मक लाभ देती है और भाजपा इससे क्या सबक लेती है।
Narender Singh Dudi Next CM Sukhbir Singh Badal Arvind Khanna

Voter Plus
13/02/2026

Voter Plus

पंजाब की राजनीति में इन दिनों कैप्टन अमरिंदर सिंह के दोबारा कांग्रेस में लौटने की चर्चाओं ने सियासी माहौल को गर्म कर दिया है। भले ही यह खबर आधिकारिक तौर पर पुष्ट न हुई हो, लेकिन सिर्फ़ “संभावना” भर ने ही मीडिया और राजनीतिक विमर्श का रुख बदल दिया है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस चर्चा ने कांग्रेस, बीजेपी और आम आदमी पार्टी के कई सक्रिय नेताओं की मीडिया स्पेस को लगभग निगल लिया है। जो नेता अपने-अपने मुद्दों, बयानों और आंदोलनों के ज़रिये सुर्खियों में रहना चाहते थे, वे अचानक हाशिये पर जाते दिख रहे हैं। टीवी डिबेट, अख़बारों की हेडलाइन और डिजिटल मीडिया—हर जगह सवाल एक ही है: क्या कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस में वापसी संभव है?

कांग्रेस के लिए ‘संभावना की राजनीति’

कांग्रेस के भीतर यह चर्चा संजीवनी की तरह देखी जा रही है। पार्टी के कई धड़े इस बहस के सहारे संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व संकट और गुटबाज़ी जैसे असहज सवालों से ध्यान हटाने में सफल हो रहे हैं। मीडिया में यह नैरेटिव गढ़ा जा रहा है कि अगर कैप्टन लौटते हैं, तो कांग्रेस का खोया हुआ जनाधार वापस आ सकता है—चाहे ज़मीनी हकीकत इससे मेल खाए या नहीं।

बीजेपी और आप की रणनीतिक बेचैनी

दूसरी ओर, बीजेपी और आम आदमी पार्टी के लिए यह चर्चा असहज करने वाली है। बीजेपी, जो कैप्टन के नाम पर पंजाब में अपनी राजनीतिक संभावनाएं तलाशती रही है, अब रक्षात्मक मुद्रा में दिख रही है। वहीं आप, जो सरकार के कामकाज और अपनी उपलब्धियों को केंद्र में लाना चाहती थी, उसे भी मीडिया स्पेस में अपेक्षित जगह नहीं मिल पा रही।

मीडिया बनाम मुद्दे

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह पूरा विमर्श वास्तविक राजनीतिक घटनाक्रम पर आधारित है या फिर एक सोची-समझी मीडिया-रणनीति है? बेरोज़गारी, कानून-व्यवस्था, किसान संकट और प्रशासनिक फैसलों जैसे ठोस मुद्दे इस शोर में दबते नज़र आ रहे हैं। राजनीति में ‘कयास’ ने ‘कार्य’ पर बढ़त बना ली है।

कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस में वापसी की चर्चा ने यह साफ कर दिया है कि पंजाब की राजनीति में एक नाम मात्र की संभावना भी पूरे राजनीतिक एजेंडे को मोड़ सकती है। सवाल यह नहीं कि वापसी होगी या नहीं, सवाल यह है कि क्या पंजाब की राजनीति हमेशा ऐसे ही चर्चाओं के इर्द-गिर्द घूमती रहेगी, या फिर असली मुद्दे कभी केंद्र में आएंगे?
Narender Singh Dudi Next CM

With Narender Dudi – I just got recognised as one of their top fans! 🎉
10/02/2026

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10/01/2026

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10/01/2026

पंजाब 2027 में किसकी बनेगी सरकार ?

Aam Aadmi Party - Punjab BJP Punjab Shiromani Akali Dal Indian National Congress - Punjab

आम आदमी पार्टी ने पंजाब किसान विंग के पद धारकों की घोषणा की। सभी पदाधिकारियों को नवीन दायित्व के लिए हार्दिक शुभकामनाएं!...
04/08/2025

आम आदमी पार्टी ने पंजाब किसान विंग के पद धारकों की घोषणा की। सभी पदाधिकारियों को नवीन दायित्व के लिए हार्दिक शुभकामनाएं!

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