06/06/2026
सरायकेला : ईचागढ़ में डेरा डाले हैं दलमा के हाथी, जंगल कटने और पानी-भोजन की कमी से बढ़ा मानव-हाथी संघर्ष"
"पर्यावरण दिवस पर पौधरोपण का दिखावा, दूसरी ओर कॉटेज के लिए कट रहे पेड़"
सरायकेला : चांडिल वन क्षेत्र अंतर्गत ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के तूतां और दुलमीडीह जंगल में शनिवार को हाथियों का एक झुंड जलाशय के आसपास विचरण करते देखा गया। बीते 6-8 वर्षों से दलमा वाइल्डलाइफ सेंचुरी छोड़कर दर्जनों हाथी ईचागढ़ के चारों प्रखंडों—ईचागढ़, चांडिल, नीमडीह और कुकड़ू—में स्थायी डेरा डाले हुए हैं। नतीजा, रोजाना मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं सामने आ रही हैं।
*"पौधा लगाने में साल, उखाड़ने में पलभर"*
विश्व पर्यावरण दिवस पर केंद्र और राज्य सरकार की ओर से "एक पेड़ माँ के नाम" अभियान चलाकर पौधारोपण किया जा रहा है। मगर सवाल उठ रहा है कि जंगल बनने में दशकों लगते हैं, लेकिन उखाड़ने में पलभर। ईचागढ़ के ग्रामीण पूछ रहे हैं—आखिर दलमा के हाथी अपना घर छोड़कर क्यों भाग रहे हैं?
*193 वर्ग किमी का दलमा, फिर भी हाथी बेघर क्यों?*
चांडिल अनुमंडल में स्थित दलमा वाइल्डलाइफ सेंचुरी 193.22 वर्ग किमी में फैली है। इसे 'गज परियोजना जमशेदपुर' के नाम से भी जाना जाता है। विडंबना यह है कि आज गज परियोजना में ही हाथी देखने को नहीं मिलते। पर्यटक और ग्रामीण दोनों जानना चाहते हैं कि आखिर कारण क्या है?
वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार हर साल जंगल एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिए करोड़ों रुपये देती है। बावजूद इसके दलमा सेंचुरी में वन्य जीवों को पर्याप्त भोजन-पानी नहीं मिल रहा। इसी कारण वर्षों से हाथी अपना आवासीय क्षेत्र छोड़कर पलायन कर रहे हैं और भोजन-पानी की तलाश में ईचागढ़ क्षेत्र में शरण लिए हुए हैं।
*ईको सेंसेटिव जोन में भी कट रहे पेड़*
दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी को 'ईको सेंसेटिव जोन' भी घोषित किया गया है। इसके बावजूद विभाग पर्यटकों को बढ़ावा देने के नाम पर नए-नए कॉटेज और रिसॉर्ट का निर्माण कर रहा है। इसके लिए धड़ल्ले से पेड़-पौधे काटे जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विकास के नाम पर हाथियों का प्राकृतिक आवास उजाड़ा जा रहा है।
*बंगाल का अयोध्या पहाड़ भी बना कारण*
दूसरी ओर पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले का अयोध्या पहाड़ इलाका भी हाथी बहुल क्षेत्र रहा है। वहां भी बड़े होटल, गेस्ट हाउस और कॉटेज बनने से हाथियों की आवासीय जगह सिकुड़ती जा रही है। नतीजा, झारखंड-बंगाल सीमा के हाथी भोजन की तलाश में जंगल छोड़कर सुदूरवर्ती गांवों तक पहुंच रहे हैं। फसल बर्बादी और जनहानि की घटनाएं बढ़ी हैं।
*"हमें भी जीने का अधिकार है"*
ग्रामीणों का कहना है कि हाथी शांत और एकांत जगह चाहता है। लगातार जंगल कटने, बड़े होटल बनने और शोर-शराबे से हाथी अशांत होकर रिहायशी इलाकों में घुस रहे हैं। सवाल वन विभाग पर उठ रहा है—जब करोड़ों का बजट है तो दलमा में जल स्रोत और चारा विकास क्यों नहीं हो रहा? हाथी पूछ रहे हैं, "हमें भी जीने का अधिकार है, हमें भी जगह दो?"
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