09/08/2026
विश्व आदिवासी दिवस: उत्सव के साथ अधिकार, सुरक्षा और भविष्य की चिंता भी जरूरी
सरायकेला-खरसावां। आज 9 अगस्त को पूरी दुनिया विश्व आदिवासी दिवस मना रही है। झारखंड में यह दिन सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान, संस्कृति, परंपरा, जल-जंगल-जमीन और संवैधानिक अधिकारों को याद करने का अवसर भी है। सरायकेला-खरसावां जिला प्रशासन की ओर से भी विश्व आदिवासी दिवस-2026 को लेकर जिले में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। विद्यालयों और महाविद्यालयों में जनजातीय संस्कृति एवं विरासत से जुड़ी गतिविधियों के आयोजन पर भी जोर दिया गया है।
झारखंड की पहचान आदिवासी संस्कृति और परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है। सरायकेला-खरसावां भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। खरसावां की ऐतिहासिक स्मृतियां हों, सरायकेला की सांस्कृतिक विरासत हो या जंगल और गांवों से जुड़ा पारंपरिक जीवन—यह क्षेत्र आदिवासी इतिहास की कई महत्वपूर्ण परतों को अपने भीतर समेटे हुए है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल एक दिन आदिवासी संस्कृति का उत्सव मनाना पर्याप्त है?
आज आदिवासी समाज पहले की तुलना में शिक्षा, राजनीति, प्रशासन, खेल और रोजगार के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। संविधान ने अनुसूचित जनजातियों के लिए कई विशेष अधिकार और संरक्षण दिए हैं। बावजूद इसके, जमीन, विस्थापन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति और पारंपरिक अधिकारों को लेकर कई जगहों पर चिंता बनी हुई है।
सरायकेला-खरसावां और आसपास के इलाकों में विकास परियोजनाओं तथा विस्थापन से जुड़े सवाल समय-समय पर सामने आते रहे हैं। चांडिल डैम, ईचा-खरकई परियोजना को लेकर भी कई गांवों के लोगों ने अपनी आशंकाएं और विरोध दर्ज कराया है। ग्रामीणों की मुख्य चिंता यही रही है कि विकास की कीमत कहीं उनकी जमीन, आजीविका और सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को खत्म करके न चुकानी पड़े।
इसलिए आज के दिन सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि आदिवासी समाज सुरक्षित है या असुरक्षित, बल्कि यह होना चाहिए कि ऐसा समाज और ऐसी व्यवस्था कैसे बनाई जाए, जहां किसी आदिवासी परिवार को अपनी जमीन, पहचान, संस्कृति, आजीविका या सम्मान को लेकर असुरक्षित महसूस न करना पड़े।
विकास जरूरी है, लेकिन विकास के साथ संवाद भी जरूरी है। सड़क, उद्योग, बांध, खनन और दूसरी परियोजनाएं क्षेत्र की आर्थिक तस्वीर बदल सकती हैं, लेकिन किसी भी परियोजना की सफलता तभी मानी जाएगी जब स्थानीय लोगों का भरोसा भी उसके साथ हो।
सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि आदिवासी क्षेत्रों में कानून का निष्पक्ष पालन हो, जमीन और अधिकारों से जुड़े मामलों में पारदर्शिता रहे, ग्रामीणों की शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए और किसी भी विवाद को समय रहते संवाद के जरिए सुलझाने की कोशिश हो।
वहीं आदिवासी समाज और सामाजिक संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि अपने अधिकारों की लड़ाई लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से आगे बढ़ाएं तथा विकास और अधिकारों के बीच संतुलन बनाने में सकारात्मक भूमिका निभाएं।
विश्व आदिवासी दिवस का वास्तविक संदेश शायद यही है—आदिवासी समाज को केवल संस्कृति और परंपरा के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि समान अधिकार, सम्मान, सुरक्षा और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी रखने वाले नागरिक के रूप में देखा जाए।
आज जरूरत केवल आदिवासी दिवस मनाने की नहीं, बल्कि ऐसा भविष्य बनाने की है जहां झारखंड का आदिवासी युवा अपनी पहचान पर गर्व करे, गांव का परिवार अपनी जमीन और आजीविका को लेकर आश्वस्त रहे और हर व्यक्ति को कानून और प्रशासन पर भरोसा हो।
उत्सव एक दिन का हो सकता है, लेकिन अधिकार, सम्मान और सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरे साल की होनी चाहिए।
| | | |