28/08/2026
*बुआ आईं तो लगा जैसे कुछ पल के लिए बचपन लौट आया…कुछ रिश्ते कभी पुराने नही होते* ❤️
आज रक्षाबंधन के इस पावन अवसर पर बहुत दिनों बाद बुआ घर आईं। उन्हें देखते ही मन में एक अजीब-सी खुशी हुई, लेकिन उस खुशी के साथ आंखों के किसी कोने में नमी भी उतर आई। ऐसा लगा जैसे समय ने अचानक पीछे मुड़कर मुझे उसी बचपन में पहुंचा दिया हो, जहां रिश्तों में कोई औपचारिकता नहीं थी, जहां त्योहार का मतलब सिर्फ नए कपड़े, मिठाई और खुशियां हुआ करता था और जहां बुआ के आने की खबर सुनते ही घर का माहौल ही बदल जाता था।
आज बुआ को सामने देखकर सबसे पहले पिताजी की याद आई।
कितना अजीब है न… कुछ लोग हमारे बीच नहीं होते, लेकिन उनसे जुड़े रिश्ते जब हमारे सामने आते हैं तो उनकी यादें और भी गहरी हो जाती हैं। बुआ को देखते ही लगा जैसे पिताजी भी कहीं आसपास ही हैं। उनकी आवाज, उनका मुस्कुराना, बुआ का भाई को राखी बांधना, घर में होने वाली बातें… सब कुछ एक-एक करके आंखों के सामने आने लगा।
बचपन में जब रक्षाबंधन का त्योहार आता था और बुआ पिताजी को राखी बांधने के लिए घर आती थीं, तो हम बच्चों के लिए वह दिन किसी उत्सव से कम नहीं होता था। हमें राखी बांधने से ज्यादा इंतजार रहता था बुआ के आने का। उनके हाथ में मिठाई का डिब्बा होता, चेहरे पर मुस्कान होती और घर में कदम रखते ही जैसे खुशियों की बहार आ जाती थी।
हम बच्चे उनके आसपास मंडराते रहते थे। कभी मिठाई के लिए, कभी कोई चीज मांगने के लिए और कभी सिर्फ इसलिए कि बुआ के पास बैठकर उनकी बातें सुन सकें।
उस समय हमें कहां पता था कि जिंदगी इतनी जल्दी बदल जाएगी।
कहां पता था कि एक दिन वही रक्षाबंधन आएगा, वही बुआ आएंगी, वही घर होगा, वही रिश्ते होंगे… लेकिन पिताजी नहीं होंगे।
आज बुआ फिर आईं, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग थी।
पहले बुआ आती थीं तो पिताजी उनका इंतजार करते थे। आज पिताजी की जगह उनकी यादें थीं। पहले बुआ अपने भाई को राखी बांधती थीं और हम बच्चे उस पल की खुशियों में शामिल होते थे। आज बुआ के हाथ में राखी तो थी, लेकिन भाई की कलाई नहीं थी।
समय कितना कुछ छीन लेता है।
बचपन छीन लिया, बेफिक्री छीन ली, परिवार के कुछ सबसे प्यारे लोग छीन लिए और धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने हमारे अपनों के चेहरों पर उम्र की लकीरें भी खींच दीं।
आज बुआ के चेहरे को गौर से देखा तो लगा कि समय ने उनके चेहरे पर भी अपनी कहानी लिख दी है। चेहरे पर उम्र का असर साफ दिखाई देता है। आंखों में पहले जैसी चमक है, मुस्कान में वही अपनापन है, लेकिन शरीर में अब पहले जैसी फुर्ती नहीं रही। चेहरे पर थकान दिखाई देती है।
और मन ने अचानक सवाल किया—
क्या यही जिंदगी है?
जो बुआ कभी हंसते हुए घर आती थीं, आज उम्र की थकान लेकर आती हैं। जो पिताजी कभी उनका इंतजार करते थे, आज वह इस दुनिया में नहीं हैं। जो हम बच्चे कभी उनकी गोद और प्यार के लिए बेचैन रहते थे, आज हम अपनी-अपनी जिंदगी की जिम्मेदारियों में उलझे हुए हैं।
लेकिन इन सबके बावजूद एक चीज नहीं बदली—
रक्षाबंधन पर बुआ का घर आना।
पिताजी के नहीं रहने के बाद भी बुआ हर रक्षाबंधन पर आती हैं। शायद यह सिर्फ एक परंपरा नहीं है। शायद यह उनके भाई के प्रति उनका प्रेम है। शायद यह उस रिश्ते को जिंदा रखने की उनकी कोशिश है, जिसे समय भी खत्म नहीं कर सकता।
भाई इस दुनिया में नहीं है, लेकिन बहन आज भी उसके घर आती है।
कितना भावुक कर देने वाला रिश्ता है यह।
आज जब बुआ घर आईं तो लगा कि वह सिर्फ राखी लेकर नहीं आई हैं, बल्कि अपने साथ पिताजी की बहुत सारी यादें लेकर आई हैं। उनके आने से घर के पुराने कोने जैसे फिर से बोलने लगे। ऐसा लगा जैसे दीवारों के भीतर कहीं दबे हुए पुराने किस्से बाहर निकल आए हों।
मन बार-बार उसी समय में लौटता रहा जब पिताजी हमारे बीच थे।
याद आता है कि रक्षाबंधन के दिन घर में कितनी चहल-पहल होती थी। बुआ के आने से पहले ही हम बच्चों को पता रहता था कि आज घर में कुछ खास होने वाला है। पिताजी भी अपनी बहन का इंतजार करते थे। बुआ आतीं, राखी बांधतीं, मिठाई खिलातीं और फिर भाई-बहन के बीच वही पुरानी बातें शुरू हो जातीं।
हम बच्चे पास बैठकर सब देखते रहते थे।
तब लगता था कि यह सब हमेशा ऐसे ही चलता रहेगा।
बुआ आती रहेंगी… पिताजी बैठे रहेंगे… हम बच्चे आसपास रहेंगे… और हर साल रक्षाबंधन इसी तरह आएगा।
लेकिन जिंदगी किसी की इच्छा के मुताबिक नहीं चलती।
आज न वह समय है, न वह बचपन है और न ही पिताजी हैं।
बस उनकी यादें हैं।
और शायद यादों की सबसे खूबसूरत बात यही है कि उन्हें कोई हमसे छीन नहीं सकता।
आज बुआ को देखकर बचपन की न जाने कितनी तस्वीरें स्मृति पटल पर दौड़ने लगीं। वह समय जब छोटी-छोटी चीजों में बड़ी खुशियां मिलती थीं। परिवार साथ बैठता था। त्योहार सिर्फ त्योहार नहीं होते थे, बल्कि अपनों के साथ मिलने का बहाना होते थे।
आज हमारे पास सुविधाएं बहुत हैं, लेकिन शायद वह सुकून कम हो गया है।
आज मोबाइल में तस्वीरें बहुत हैं, लेकिन उन तस्वीरों में मौजूद लोग धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं।
आज बातचीत के लिए कई माध्यम हैं, लेकिन अपनों के साथ बैठकर दिल की बात करने का समय कम हो गया है।
और शायद इसीलिए आज बुआ का घर आना मेरे लिए बहुत बड़ा अवसर है।
यह सिर्फ रक्षाबंधन नहीं है।
यह बचपन से मिलने का दिन है।
यह पिताजी को याद करने का दिन है।
यह बुआ के प्यार को महसूस करने का दिन है।
और यह एहसास करने का दिन है कि रिश्ते समय के साथ पुराने जरूर होते हैं, लेकिन अगर उनमें सच्चा प्रेम हो तो कभी खत्म नहीं होते।
आज मन में एक बात बार-बार आ रही है—
काश पिताजी आज होते।
काश आज बुआ को देखकर पिताजी वैसे ही मुस्कुराते जैसे बचपन में मुस्कुराते थे।
काश आज दोनों भाई-बहन फिर से उसी तरह बैठकर बातें करते।
काश हम बच्चे फिर से उसी तरह उनके आसपास बैठ पाते।
काश समय कुछ घंटों के लिए ही सही, पीछे लौट जाता।
लेकिन जिंदगी में "काश" का कोई रास्ता नहीं होता।
जो चला गया, वह लौटकर नहीं आता।
हां, उसकी यादें जरूर लौट आती हैं।
और आज बुआ के आने के साथ पिताजी की वही यादें लौट आईं।
बुआ को देखकर मन में यह भी एहसास हुआ कि हम अक्सर अपने रिश्तों की कीमत तब समझते हैं जब समय हमारे हाथ से निकल चुका होता है। जब कोई अपना हमारे साथ नहीं रहता, तब उसकी मौजूदगी का महत्व और ज्यादा महसूस होता है।
आज बुआ के चेहरे पर उम्र की थकान देखकर मन अंदर तक भर आया।
सोचा, आखिर हम कितने व्यस्त हो गए हैं कि अपने उन रिश्तों के लिए भी समय नहीं निकाल पाते, जिन्होंने हमें बचपन में इतना प्यार दिया।
बुआ के हाथों में आज भी वही स्नेह है, लेकिन उन हाथों में उम्र की लकीरें बढ़ गई हैं।
चेहरे पर वही मुस्कान है, लेकिन उस मुस्कान के पीछे जिंदगी की न जाने कितनी कहानियां छिपी हैं।
आज मन करता है कि बुआ से बस इतना कह दूं—
बुआ, आप आती रहा कीजिए।
घर में आपकी मौजूदगी से सिर्फ खुशी नहीं आती, पिताजी की यादें भी लौट आती हैं।
आप आती हैं तो लगता है जैसे हमारा अपना कोई पुराना हिस्सा हमारे पास लौट आया है।
आप आती हैं तो घर में सिर्फ एक सदस्य नहीं आता, बल्कि अपने साथ पूरा बचपन लेकर आता है।
आपकी आवाज में हमें पिताजी की झलक मिलती है।
आपकी बातों में पुराने दिनों की खुशबू मिलती है।
और आपकी आंखों में उस भाई के लिए आज भी वही प्यार दिखाई देता है, जो शायद समय और दूरी से कभी कम नहीं हुआ।
पिताजी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बहन के रूप में उनका एक अंश आज भी हमारे साथ है।
शायद यही रिश्तों की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
इंसान चला जाता है, लेकिन उससे जुड़े रिश्ते उसकी यादों को जिंदा रखते हैं।
आज बुआ ने जब रक्षाबंधन के इस पावन अवसर पर घर में कदम रखा तो मन ने महसूस किया कि समय भले ही बदल गया हो, लेकिन रिश्तों की डोर आज भी उतनी ही मजबूत है।
आज भी बुआ अपने भाई को याद करके आती हैं।
आज भी रक्षाबंधन पर उनके कदम हमारे घर की ओर बढ़ते हैं।
आज भी उनके आने से मन खुश होता है।
बस फर्क इतना है कि अब वह खुशी पहले जैसी नहीं रही। उसमें यादों की मिठास के साथ बिछड़ने का दर्द भी शामिल है।
यही तो जिंदगी है।
कुछ खुशियां आंसुओं के साथ आती हैं और कुछ आंसू अपने साथ बहुत सारी खुशियां लेकर आते हैं।
आज का दिन भी कुछ ऐसा ही है।
बुआ आईं तो खुशी हुई।
पिताजी की याद आई तो आंखें नम हुईं।
बचपन याद आया तो चेहरे पर मुस्कान आई।
और समय का सच याद आया तो दिल भर आया।
आज समझ आया कि बचपन कभी वापस नहीं आता, लेकिन बचपन से जुड़े लोग जब हमारे पास आते हैं तो कुछ पलों के लिए वही एहसास जरूर लौट आता है।
आज बुआ आईं तो लगा जैसे घर के किसी पुराने कमरे का दरवाजा खुल गया हो, जिसके अंदर हमारी हंसी, हमारी शरारतें, पिताजी की आवाज और परिवार की पुरानी खुशियां अब भी सुरक्षित रखी हुई हैं।
न वह बचपन रहा, न वह समय रहा…
न वह बेफिक्री रही, न वह चहल-पहल रही…
लेकिन रिश्तों की वह गर्माहट आज भी बाकी है।
और शायद इसी गर्माहट का नाम परिवार है।
इस रक्षाबंधन पर मैं भगवान से बस यही प्रार्थना करता हूं कि मेरी बुआ हमेशा स्वस्थ रहें, खुश रहें और उनके चेहरे की मुस्कान यूं ही बनी रहे।
उनके सिर पर हमारे परिवार का प्यार बना रहे और हमारे सिर पर उनका आशीर्वाद।
पिताजी जहां भी हों, आज जरूर देख रहे होंगे कि उनकी बहन आज भी उसी प्यार से उनके घर आई है।
शायद ऊपर कहीं वह भी मुस्कुरा रहे होंगे और कह रहे होंगे—
“मेरी बहन आई है…”
बुआ, आज आपके आने से सच में लगा कि कुछ पल के लिए बचपन लौट आया था।
पिताजी तो वापस नहीं आ सकते, वह समय भी वापस नहीं आ सकता, लेकिन आपकी मौजूदगी ने उनकी यादों को फिर से हमारे बीच ला दिया।
बस यूं ही आती रहिए बुआ…
क्योंकि आपका आना सिर्फ आपका आना नहीं है।
आपके साथ पिताजी की यादें आती हैं,
आपके साथ हमारा बचपन आता है,
आपके साथ पुराने दिनों की खुशियां आती हैं,
और आपके साथ वह परिवार आता है, जिसे हमने कभी बहुत करीब से जिया था।
आज रक्षाबंधन पर दिल से बस यही कहना है—
“बुआ, राखी की यह डोर सिर्फ एक भाई की कलाई से नहीं, बल्कि बीते हुए समय से भी जुड़ी है। पिताजी भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आपका हर रक्षाबंधन पर आना यह याद दिलाता है कि सच्चे रिश्ते शरीर के साथ खत्म नहीं होते… वे यादों में, भावनाओं में और दिल में हमेशा जिंदा रहते हैं।” ❤️
रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं बुआ।
ईश्वर आपको लंबी उम्र, अच्छा स्वास्थ्य और ढेर सारी खुशियां दें।
आपका प्यार और आशीर्वाद हमेशा हमारे ऊपर बना रहे। 🙏❤️
पिताजी, आज आपकी बहुत याद आई…
आपकी बहन आई थीं।
आपकी कलाई पर राखी तो नहीं बांध सकीं,
लेकिन उनकी आंखों में आज भी अपने भाई के लिए वही प्यार था।
और शायद यही रिश्तों की सबसे खूबसूरत सच्चाई है—
**“लोग चले जाते हैं, रिश्ते नहीं जाते…
वक्त गुजर जाता है, यादें नहीं जातीं…
और कुछ अपने दूर होकर भी कभी दूर नहीं होते।”** ❤️
बुआ आईं तो लगा…
सच में कुछ पल के लिए मेरा बचपन लौट आया था। 🥺❤️🙏