09/11/2025
🌸 “वो अधूरी कॉफ़ी”
शहर की सुबहें हमेशा जल्दी उठ जाती थीं, पर आरव नहीं।
हर दिन वो उसी छोटे-से कैफ़े की खिड़की वाली सीट पर बैठकर अपनी ब्लैक कॉफ़ी का इंतज़ार करता था — बिना किसी जल्दी के।
एक दिन, बारिश ज़रा ज़्यादा हो गई थी। खिड़की के शीशे पर पानी की बूँदें बह रही थीं, और तभी कैफ़े का दरवाज़ा खुला।
अंदर आई कियारा — एक किताब को अपने बैग में सँभालती हुई, भीगे बालों को झटकते हुए।
वो वही सीट चाहती थी, जो आरव की “रोज़ की सीट” थी।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा, फिर मुस्कुरा दिए।
“आप बैठिए,” आरव ने कहा।
“नहीं, आप बैठे हैं तो मैं यहीं सामने बैठ जाती हूँ,” उसने जवाब दिया।
उस दिन की कॉफ़ी थोड़ी ज़्यादा मीठी लगी दोनों को — जबकि दोनों ने शुगर फ्री मंगाई थी।
दिन बीतते गए।
कॉफ़ी की जगह अब बातें होने लगीं — किताबों, संगीत और सपनों की बातें।
आरव को उसका हँसना पसंद आने लगा, और कियारा को उसकी खामोश मुस्कान।
लेकिन हर कहानी में एक मोड़ होता है।
कियारा को अपने शहर वापस जाना था — नौकरी के लिए।
आख़िरी दिन दोनों फिर उसी सीट पर बैठे।
आरव ने पूछा, “क्या कभी वापस आओगी?”
कियारा ने कहा, “अगर तुम्हारी कॉफ़ी अभी तक अधूरी होगी, तो ज़रूर।”
वो चली गई।
महीनों बाद, कैफ़े वैसा ही था, बस एक कॉफ़ी हमेशा अधूरी रह जाती थी।
और एक शाम, जब बारिश फिर से वही सुर छेड़ने लगी,
आरव ने देखा — खिड़की के पार कोई मुस्कुरा रहा था।
कियारा।
उसी मुस्कान के साथ।
इस बार कॉफ़ी ठंडी नहीं हुई —
क्योंकि अब किसी को जाने की जल्दी नहीं थी। ☕❤️
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क्या आप चाहेंगे कि मैं इस कहानी का दूसरा भाग भी लिखूँ — जहाँ उनकी ज़िंदगी आगे बढ़ती है?