Mandeepsheoran Foji

Mandeepsheoran Foji Mandeep Sheoran

भक्ति हीन गुण सब सुख कैसे।लवण बिना बहु व्यंजन जैसे॥जिस प्रकार नमक के बिना अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन भी फीके लगते ह...
16/07/2026

भक्ति हीन गुण सब सुख कैसे।
लवण बिना बहु व्यंजन जैसे॥

जिस प्रकार नमक के बिना अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन भी फीके लगते हैं, उसी प्रकार यदि मनुष्य के पास अनेक गुण, विद्या, धन, बल, यश और सभी प्रकार के सांसारिक सुख हों, परंतु भगवान के प्रति भक्ति न हो, तो वे सब गुण और सुख वास्तविक आनंद नहीं दे सकते।

गोस्वामी तुलसीदास जी बताते हैं कि भक्ति जीवन का प्राण है। मनुष्य चाहे कितना भी विद्वान, धनी, बलवान या गुणवान क्यों न हो, यदि उसके हृदय में भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण नहीं है, तो उसके सारे गुण अधूरे रह जाते हैं।

जैसे—

नमक थोड़ा-सा होता है, लेकिन वही पूरे भोजन का स्वाद बढ़ा देता है।

उसी प्रकार भक्ति भी जीवन में प्रेम, शांति, संतोष और ईश्वर-कृपा का स्वाद भर देती है।

जीवन के सभी गुणों का सौंदर्य भक्ति से ही बढ़ता है।

धन, ज्ञान और प्रतिष्ठा तभी सार्थक हैं जब वे भगवान की सेवा और लोककल्याण में लगें।

सच्ची भक्ति मनुष्य को विनम्र, करुणामय और ईश्वर के निकट ले जाती हैं
जय श्री सीताराम 🙏🌺🪷

*जगन्नाथ कथा**भक्त सलबेग और श्रीजगन्नाथ की कृपा*बहुत समय पहले की बात है। उड़ीसा राज्य में एक मुस्लिम सरदार था – नाम था ज...
15/07/2026

*जगन्नाथ कथा*

*भक्त सलबेग और श्रीजगन्नाथ की कृपा*

बहुत समय पहले की बात है। उड़ीसा राज्य में एक मुस्लिम सरदार था – नाम था जगन्नाथ खाँ। वह एक वीर योद्धा था और उसका बेटा सलबेग। एक बार युद्ध में गंभीर रूप से घायल सलबेग को जब कोई सहारा न मिला, तब उसकी माँ, जो एक हिन्दू महिला थी, ने उसे भगवान श्रीजगन्नाथ का नाम लेने को कहा।

सलबेग ने मरणासन्न अवस्था में पहली बार "जय जगन्नाथ" का जाप किया। कहते हैं, उसी क्षण उसकी हालत सुधरने लगी। यह अनुभव उसके जीवन का मोड़ बन गया। उसने सारे वैभव छोड़कर भगवान जगन्नाथ की भक्ति में स्वयं को समर्पित कर दिया।

सलबेग दिन-रात हरिनाम जपता, भजन गाता और पूरी (पुरी) यात्रा पर निकल पड़ा – श्रीमंदिर में भगवान के दर्शन के लिए।

दर्शन की व्याकुलता और चमत्कार

जब वह पूरी पहुँचा, तब रथ यात्रा शुरू होने वाली थी। लेकिन दुर्भाग्यवश, वह देर से पहुँचा और रथ यात्रा निकल चुकी थी। वह व्याकुल होकर जगन्नाथजी के रथ के पीछे दौड़ा और पुकारने लगा —

"हे प्रभु! मेरे लिए तो आप ही सब कुछ हैं। अगर आप ही नहीं रुके, तो मैं किसके आगे अपने भाव अर्पित करूँ?"

उसकी पुकार इतनी भावपूर्ण थी कि कहते हैं, भगवान जगन्नाथ का रथ एकाएक रुक गया। कोई भी उसे आगे खींच न सका। पुजारी, राजा, सेवक सब चकित रह गए।

सलबेग दौड़कर आया, रथ के सामने गिर पड़ा, और आँसुओं के साथ भगवान को नमन किया।

जब तक उसने प्रभु के दर्शन न कर लिए, रथ आगे नहीं बढ़ा। तभी से, जगन्नाथ जी की रथ यात्रा में एक विशेष पड़ाव 'सलबेग समाधि' के पास होता है, जहाँ रथ कुछ समय विश्राम करता है।

यह कथा दर्शाती है कि

भगवान जात-पात,धर्म,कुल या रूप नहीं देखते।

वह केवल सच्ची भक्ति और मन की पुकार सुनते हैं।

जो भी अपने ह्रदय से उन्हें पुकारता है,वे अवश्य उसके पास आते हैं..!!

जय श्री जगन्नाथ

*एकादशी के दिन क्यों नहीं खाते चावल❓*               पद्म पुराण के अनुसार एकादशी के दिन भगवान विष्णु के अवतारों की पूजा व...
15/07/2026

*एकादशी के दिन क्यों नहीं खाते चावल❓*

पद्म पुराण के अनुसार एकादशी के दिन भगवान विष्णु के अवतारों की पूजा विधि-विधान से की जाती है। माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने पर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। साथ ही इस दिन दान करने हजारों यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है। इस दिन निर्जला व्रत रहा जाता है। जो लोग इस दिन व्रत नही रख पाते। वह लोग सात्विक का पालन करते है यानी कि इस दिन लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडा नहीं खाएं और झूठ, ठगी आदि का त्याग कर दें। साथ ही इश दिन चावल और इससे बनी कोई भी चीज नहीं खानी चाहिए।

हम पुराने जमाने से यह बात सुनते चले आ रहे कि एकादशी के दिन चावल और इससे बनी कोई भी चीज नही खाई जाती है। लेकिन इसके पीछे सच्चाई क्या है यह नहीं जानते हैं। जब भी हम यह बात सुनते होंगे कि आज एकादशी है और आज चावल नहीं खाए जाते है, तो हमारे दिमाग में एक ही बात है कि ऐसा क्यों है, जानिए इसके पीछे क्या रहस्य है।

शास्त्रों में चावल का संबंध जल से किया गया हैं और जल का संबंध चंद्रमा से है। पांचों ज्ञान इन्द्रियां और पांचों कर्म इन्द्रियों पर मन का ही अधिकार है। मन और श्वेत रंग के स्वामी भी चंद्रमा ही हैं, जो स्वयं जल, रस और भावना के कारक हैं, इसीलिए जलतत्त्व राशि के जातक भावना प्रधान होते हैं, जो अक्सर धोखा खाते हैं।

एकादशी के दिन शरीर में जल की मात्रा जितनी कम रहेगी, व्रत पूर्ण करने में उतनी ही अधिक सात्विकता रहेगी। आदिकाल में देवर्षि नारद ने एक हजार साल तक एकादशी का निर्जल व्रत करके नारायण भक्ति प्राप्त की थी। वैष्णव के लिए यह सर्वश्रेष्ठ व्रत है। चंद्रमा मन को अधिक चलायमान न कर पाएं, इसीलिए व्रती इस दिन चावल खाने से परहेज करते हैं।

शास्त्रों में एक पौराणिक कथा भी है। इसके अनुसार माता शक्ति के क्रोध से भागते-भागते भयभीत महर्षि मेधा ने अपने योग बल से शरीर छोड़ दिया और उनकी मेधा पृथ्वी में समा गई। वही मेधा जौ और चावल के रूप में उत्पन्न हुईं।

ऐसा माना गया है कि जिस दिन यह घटना हुई। उस दिन एकादशी का दिन था। यह जौ और चावल महर्षि की ही मेधा शक्ति है, जो जीव हैं। इस दिन चावल खाना महर्षि मेधा के शरीर के छोटे-छोटे मांस के टुकड़े खाने जैसा माना गया है, इसीलिए इस दिन से जौ और चावल को जीवधारी माना गया है।

एकादशी के दिन चावल न खाने के पीछें वैज्ञानिक तथ्य भी है। इसके अनुसार चावल में जल की मात्रा अधिक होती है। जल पर चन्द्रमा का प्रभाव अधिक पड़ता है। चावल खाने से शरीर में जल की मात्रा बढ़ती है इससे मन विचलित और चंचल होता है। मन के चंचल होने से व्रत के नियमों का पालन करने में बाधा आती है। एकादशी व्रत में मन का निग्रह और सात्विक भाव का पालन अति आवश्यक होता है इसलिए एकादशी के दिन चावल से बनी चीजे खाना वर्जित कहा गया है।

*योगिनी एकादशी व्रत कथा*अलकापुरी में कुबेर नाम का राजा रहता था. वह प्रत्येक दिन भगवान शिव की पूजा करता है. एक माली हेम ह...
15/07/2026

*योगिनी एकादशी व्रत कथा*

अलकापुरी में कुबेर नाम का राजा रहता था. वह प्रत्येक दिन भगवान शिव की पूजा करता है. एक माली हेम हर दिन पूजन के लिए फूल लेकर आता था. उसकी पत्नी का नाम विशालाक्षी था. ए​क दिन वह फूल लेकर आया, लेकिन पत्नी की सुंदरता के वशीभूत होकर कामवासना में लिप्त हो गया.

उधर राजा पूजा के लिए फूल की प्रतीक्षा करता रहा. दोपहर तक जब माली नहीं आया, तो राजा ने सैनिकों को उसका पता लगाने को कहा. तब सैनिकों ने कहा कि वह कामी है, वह पत्नी के साथ हास्य विनोद कर रहा होगा.

इस पर राजा ने उसे तत्काल बुलाने को कहा. वह डराते हुए राजा के दरबार में उपस्थित हुआ. क्रोधित राजा कुबेर ने उस माली से कहा कि तुमने भगवान शिव का अनादर किया है. कुबेर ने उसे श्राप दिया कि वह पृथ्वी पर कोढ़ी बनकर कष्ट भोगेगा और पत्नी का वियोग सहन करेगा.

श्राप के कारण माली हेम स्वर्ग से पृथ्वी लोक पर​ गिर गया. उसे कोढ़ हो गया और उसकी पत्नी भी गायब हो गई. वह भूख, प्यास से जंगल में भटकता रहा, उसने भयंकर दुख भोगे. एक दिन वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुंचा. वह उस ऋषि के चरणों में दंडवत हो गया.

तब ऋषि ने उससे पूछा कि इतना कष्ट भोगने का क्या कारण है? ऐसे तुमने कौन से कर्म किए थे? तब उस हेम माली ने पूरी घटना उनको बताई. तब ऋषि ने कहा कि तुमने सत्य घटना के बारे में बताया है, इसलिए तुमको एक व्रत के बारे में बताता हूं. यदि तुम आषाढ़ मा​​ह के कृष्ण पक्ष की एकादशी यानी योगिनी एकादशी व्रत को करोगे, तो सारे पाप नष्ट हो जाएंगे.

ऋषि के बताए अनुसार हेम माली ने विधिपूर्वक योगिनी एकादशी व्रत किया और भगवान विष्णु का पूजन किया. उस व्रत के प्रभाव से उसके सारे पाप मिट गए और वह पहले के स्वरूप में आ गया. उसको पत्नी भी प्राप्त हो गई. वह सुखीपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगा.

पूजा विधि

इस दिन प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान करें या घर में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।इसके बाद पूजा स्थल पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठे और मंदिर में दीपक जलाएं। फिर भगवान विष्णु को पंचामृत से अभिषेक कराएं व उनको फूल और तुलसी दल अर्पित करें। इसके बाद भगवान विष्णु को सात्विक चीज़ों का भोग लगाकर कपूर से आरती करें। इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ पीपल के वृक्ष की पूजा का भी विधान है। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए इस दिन आसमान के नीचे सांयकाल घरों,मंदिरों,पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीप प्रज्वलित करने चाहिए,गंगा आदि पवित्र नदियों में दीप दान करना चाहिए। रात्रि के समय भगवान नारायण की प्रसन्नता के लिए नृत्य,भजन-कीर्तन और स्तुति के द्वारा जागरण करना चाहिए। जागरण करने वाले को जिस फल की प्राप्ति होती है,वह हज़ारों बर्ष तपस्या करने से भी नहीं मिलता।

*जगन्नाथजी से जुड़े दस चमत्कार*पहला चमत्कार :- हवा के विपरीत लहराता ध्वज : श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदै...
15/07/2026

*जगन्नाथजी से जुड़े दस चमत्कार*

पहला चमत्कार :- हवा के विपरीत लहराता ध्वज : श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। ऐसा किस कारण होता है यह तो वैज्ञानिक ही बता सकते हैं लेकिन यह निश्चित ही आश्चर्यजनक बात है। यह भी आश्चर्य है कि प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। ध्वज भी इतना भव्य है कि जब यह लहराता है तो इसे सब देखते ही रह जाते हैं। ध्वज पर शिव का चंद्र बना हुआ है।

दूसरा चमत्कार :- गुंबद की छाया नहीं बनती : यह दुनिया का सबसे भव्य और ऊंचा मंदिर है। यह मंदिर 4 लाख वर्गफुट में क्षेत्र में फैला है और इसकी ऊंचाई लगभग 214 फुट है। मंदिर के पास खड़े रहकर इसका गुंबद देख पाना असंभव है। मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य ही रहती है। हमारे पूर्वज कितने बड़े इंजीनियर रहे होंगे यह इस एक मंदिर के उदाहरण से समझा जा सकता है। पुरी के मंदिर का यह भव्य रूप 7वीं सदी में निर्मित किया गया।

तीसरा चमत्कार :- चमत्कारिक सुदर्शन चक्र : पुरी में किसी भी स्थान से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है।

चौथा चमत्कार :- हवा की दिशा : सामान्य दिनों के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है और शाम के दौरान इसके विपरीत, लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है। अधिकतर समुद्री तटों पर आमतौर पर हवा समुद्र से जमीन की ओर आती है, लेकिन यहाँ हवा जमीन से समुद्र की ओर जाती है।

पांचवां चमत्कार :- गुंबद के ऊपर नहीं उड़ते पक्षी : मंदिर के ऊपर गुंबद के आसपास अब तक कोई पक्षी उड़ता हुआ नहीं देखा गया। इसके ऊपर से विमान नहीं उड़ाया जा सकता। मंदिर के शिखर के पास पक्षी उड़ते नजर नहीं आते, जबकि देखा गया है कि भारत के अधिकतर मंदिरों के गुंबदों पर पक्षी बैठ जाते हैं या आसपास उड़ते हुए नजर आते हैं।

छठा चमत्कार :- दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर : 500 रसोइए 300 सहयोगियों के साथ बनाते हैं भगवान जगन्नाथजी का प्रसाद। लगभग 20 लाख भक्त कर सकते हैं यहाँ भोजन। कहा जाता है कि मंदिर में प्रसाद कुछ हजार लोगों के लिए ही क्यों न बनाया गया हो लेकिन इससे लाखों लोगों का पेट भर सकता है। मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं और सब कुछ लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है अर्थात सबसे ऊपर रखे बर्तन का खाना पहले पक जाता है। है न चमत्कार!

सातवां चमत्कार :- समुद्र की ध्वनि : मंदिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर ही (मंदिर के अंदर से) आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि को नहीं सुन सकते। आप (मंदिर के बाहर से) एक ही कदम को पार करें, तब आप इसे सुन सकते हैं। इसे शाम को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। इसी तरह मंदिर के बाहर स्वर्ग द्वार है, जहाँ पर मोक्ष प्राप्ति के लिए शव जलाए जाते हैं लेकिन जब आप मंदिर से बाहर निकलेंगे तभी आपको लाशों के जलने की गंध महसूस होगी।

आठवां चमत्कार :- रूप बदलती मूर्ति : यहाँ श्रीकृष्ण को जगन्नाथ कहते हैं। जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा विराजमान हैं। तीनों की ये मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं। यहाँ प्रत्येक 12 साल में एक बार होता है प्रतिमा का नव कलेवर। मूर्तियां नई जरूर बनाई जाती हैं लेकिन आकार और रूप वही रहता है।

नौवां चमत्कार :- विश्व की सबसे बड़ी रथयात्रा : आषाढ़ माह में भगवान रथ पर सवार होकर अपनी मौसी रानी गुंडिचा के घर जाते हैं। यह रथयात्रा 5 किलोमीटर में फैले पुरुषोत्तम क्षेत्र में ही होती है। (रानी गुंडिचा भगवान जगन्नाथ के परम भक्त राजा इंद्रदयुम्न की पत्नी थी इसीलिए रानी को भगवान जगन्नाथ की मौसी कहा जाता है।) अपनी मौसी के घर भगवान 8 दिन रहते हैं। आषाढ़ शुक्ल दशमी को वापसी की यात्रा होती है। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष है। देवी सुभद्रा का रथ दर्पदलन है और भाई बलभद्र का रक्ष तल ध्वज है। पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू बुहारते हैं जिसे छेरा पैररन कहते हैं।

दसवां चमत्कार :- हनुमानजी करते हैं जगन्नाथ की समुद्र से रक्षा : माना जाता है कि 3 बार समुद्र ने जगन्नाथजी के मंदिर को तोड़ दिया था। कहते हैं कि महाप्रभु जगन्नाथ ने वीर मारुति (हनुमानजी) को यहाँ समुद्र को नियंत्रित करने हेतु नियुक्त किया था, परंतु जब-तब हनुमान भी जगन्नाथ-बलभद्र एवं सुभद्रा के दर्शनों का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे। वे प्रभु के दर्शन के लिए नगर में प्रवेश कर जाते थे, ऐसे में समुद्र भी उनके पीछे नगर में प्रवेश कर जाता था। केसरीनंदन हनुमानजी की इस आदत से परेशान होकर जगन्नाथ महाप्रभु ने हनुमानजी को यहाँ स्वर्ण बेड़ी से आबद्ध कर दिया। यहाँ जगन्नाथपुरी में ही सागर तट पर बेदी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। भक्त लोग बेड़ी में जकड़े हनुमानजी के दर्शन करने के लिए आते हैं।

"जय जय श्रीजगन्नाथजी"🙏🏻💫
**************************

*जगन्नाथ कथा**राजा इंद्रद्युम्न की भक्ति और जगन्नाथ मंदिर का निर्माण*अवंती के राजा इंद्रद्युम्न भगवान पुरुषोत्तम (विष्णु...
15/07/2026

*जगन्नाथ कथा*

*राजा इंद्रद्युम्न की भक्ति और जगन्नाथ मंदिर का निर्माण*

अवंती के राजा इंद्रद्युम्न भगवान पुरुषोत्तम (विष्णु) के दर्शन की इच्छा से प्रेरित होकर पुरुषोत्तम क्षेत्र की यात्रा पर गए। इस स्थान की पवित्रता का अनुभव करने के बाद, उन्होंने यहीं निवास करने और अपना शेष जीवन भगवान की पूजा करने का संकल्प लिया। इसके अलावा, उन्होंने भगवान को समर्पित एक भव्य मंदिर बनवाने का भी निर्णय लिया।

मंदिर की तैयारी

एक बार निर्णय हो जाने के बाद, राजा इंद्रद्युम्न ने विशेषज्ञ ज्योतिषियों को 'भूमि उपचार' करने के लिए बुलाया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्थल अनुष्ठानिक रूप से शुद्ध और मंदिर निर्माण के लिए उपयुक्त है। इन ज्योतिषियों के साथ-साथ वेदों के जानकार लोग, मंत्री, बुद्धिमान ब्राह्मण और वास्तु विशेषज्ञ भी इस प्रयास में शामिल हुए। धार्मिक अनुष्ठानों के पूरा होने के बाद, राजा ने उत्कल, कोशल और कलिंग के राजाओं से कुशल पत्थर काटने वालों के साथ विंध्य पर्वत से सुंदर पत्थर इकट्ठा करने का अनुरोध किया।

इसके बाद, राजा इंद्रद्युम्न ने अपने आदमियों को दुनिया के सभी राजाओं को संदेश भेजने का आदेश दिया, जिसमें उन्हें अपनी सेनाओं, दरबारियों और पुजारियों के साथ पुरुषोत्तम क्षेत्र में आने का आग्रह किया गया। पहाड़ी इलाकों, मैदानों, द्वीपों और पठारों सहित विभिन्न क्षेत्रों से राजा धन और संसाधन लेकर इस स्थान पर आए।

संसाधन जुटाना और यज्ञ करना

राजा इंद्रद्युम्न ने एकत्रित राजाओं का स्वागत किया और अश्वमेध यज्ञ करने तथा मंदिर बनवाने की अपनी योजना बताई। राजाओं ने तुरंत अपनी सहायता की पेशकश की, धन, सोना, कीमती पत्थर, मोती, कंबल, हिरण की खाल, सुंदर गद्दे, हीरे, हाथी, घोड़े और विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ दान किए।

सहायता और संसाधनों से संतुष्ट होकर राजा ने अपने पुरोहित को यज्ञ के लिए उपयुक्त स्थान खोजने का काम सौंपा। पुरोहित ने ब्राह्मणों और वास्तुकारों के साथ मिलकर मछुआरों का एक गाँव ढूँढ़ा और वहाँ सैकड़ों महलनुमा कमरों से घिरा एक यज्ञ शाला बनवाया। यज्ञ के लिए मंच को कीमती पत्थरों से सजाया गया था और आमंत्रित राजघरानों के लिए ठहरने की व्यवस्था सावधानीपूर्वक की गई थी, जिसमें विभिन्न व्यंजनों, गन्ने के रस और दूध के साथ उनकी सुविधा सुनिश्चित की गई थी। प्रतिष्ठित और बुद्धिमान ब्राह्मणों का गर्मजोशी से स्वागत किया गया।

भव्य यज्ञ

यज्ञ मंच का निर्माण जल्द ही पूरा हो गया, और राजा ने ब्राह्मणों को भोजन कराना शुरू कर दिया। हर दिन, लगभग 100,000 ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता था, जिसमें तुरही की गड़गड़ाहट के साथ भोजन परोसा जाता था। भारत के विभिन्न हिस्सों से लोग इकट्ठा होते थे, और घी, दूध और दही की नदियाँ वितरित की जाती थीं। राजा ने वेदों के जानकार ब्राह्मणों को सोने की टोपी वाले सींग और पीतल के दूध के डिब्बे के साथ-साथ कीमती पत्थर, हिरण के फर के गद्दे, महंगे कपड़े और हीरे भी दान किए। कोई भी भूखा नहीं रहा और न ही असंतुष्ट रहा, और यहाँ तक कि देवता भी यज्ञ की सफलता से आश्चर्यचकित थे।

राजा इंद्रद्युम्न ने तब अपने पुत्रों को यज्ञ के लिए उपयुक्त घोड़ा ढूंढने और उसे पूरे देश में घुमाने का निर्देश दिया, तथा घोषणा की कि जब तक भगवान प्रकट नहीं होते, तब तक यज्ञ जारी रहेगा।

प्रभु का दर्शन और मंदिर निर्माण

अंततः राजा के अथक प्रयासों ने उन्हें सफलता दिलाई। यज्ञ के सफल समापन के बाद उन्हें भगवान के दर्शन हुए। इस दिव्य दर्शन के बाद, राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान के लिए एक भव्य मंदिर के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया, जिसके परिणामस्वरूप प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर का निर्माण हुआ।

सीखने योग्य सबक

भक्ति और दृढ़ संकल्प: राजा इंद्रद्युम्न की भगवान के दर्शन करने और मंदिर बनवाने की अटूट भक्ति और दृढ़ संकल्प आध्यात्मिक खोज में समर्पण के महत्व को उजागर करता है।
एकता और सहयोग: यज्ञ और मंदिर निर्माण के लिए संसाधन और सहायता प्रदान करने में विभिन्न राजाओं और उनकी प्रजा का सामूहिक प्रयास महान लक्ष्यों को प्राप्त करने में एकता और सहयोग की शक्ति को प्रदर्शित करता है।
उदारता और सेवा: ब्राह्मणों और उपस्थित लोगों को धन, भोजन और संसाधन वितरित करने में राजा की उदारता आध्यात्मिक प्रयासों में निस्वार्थ सेवा और दान के गुण को रेखांकित करती है।
श्रीमद् भागवतम् से शिक्षा
श्रीमद् भागवतम् 10.22.35:

सांख्य-योगौ प्रथमग यायौ
पूर्वपरव अनेकधा
युञ्जन नमो 'भिसन्धाय
देव-देवम उपासते'

"यह ज्ञान, अपनी अलग-अलग शाखाओं के साथ, विभिन्न तरीकों से प्रस्तुत किया जाएगा, उन लोगों की संतुष्टि के लिए जो ज्ञान की इच्छा रखते हैं और जो जीवन के अंतिम लक्ष्य की तलाश करते हैं।"

यह श्लोक विभिन्न साधकों को संतुष्ट करने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान को विभिन्न तरीकों से प्रस्तुत करने के महत्व पर जोर देता है।

चैतन्य चरितामृत से शिक्षा
चैतन्य चरितामृत, मध्य-लीला 22.62:

'कृष्णेर संसार कारा, चांडी' अनाचार जीव दया
, कृष्ण-नाम-सर्व-धर्म-सार

"कृष्ण के प्रति समर्पण के धर्म का पालन करने का अर्थ है सभी बुरी आदतों को त्यागना, सभी जीवों के प्रति दया दिखाना और पवित्र नाम का जप करना, क्योंकि यह सभी धार्मिक सिद्धांतों का सार है।"

यह श्लोक कृष्ण के प्रति समर्पण के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डालता है, जिसमें करुणा, जप और बुरी आदतों का त्याग शामिल है।

श्रील प्रभुपाद की शिक्षा
श्रील प्रभुपाद ने कहा: "हरे कृष्ण मंत्र का जाप करने की प्रक्रिया इतनी शक्तिशाली है कि इसके जाप से व्यक्ति सभी पाप कर्मों से मुक्त हो सकता है। इसलिए, जाप भक्ति सेवा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।" ( भगवद-गीता 2.13 पर व्याख्यान, हैदराबाद, 21 नवंबर, 1972 )

यह शिक्षा भक्ति सेवा में पवित्र नाम जप की परिवर्तनकारी शक्ति को रेखांकित करती है।

प्रार्थना
हे भगवान जगन्नाथ,
कृपया हमें राजा इंद्रद्युम्न की तरह दृढ़ संकल्प और भक्ति प्रदान करें ताकि हम आपकी दिव्य उपस्थिति की तलाश कर सकें और निस्वार्थ भाव से आपकी सेवा कर सकें।
हमें अपने आध्यात्मिक प्रयासों में दूसरों के साथ एकजुट होने और सहयोग करने में मदद करें, सभी प्राणियों के प्रति उदारता और करुणा दिखाएं।
हम हमेशा ईमानदारी और विश्वास के साथ आपके पवित्र नाम का जाप करें, और आपकी दिव्य कृपा हमें आध्यात्मिक ज्ञान और शाश्वत आनंद की ओर ले जाए।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

आपका आशीर्वाद सदैव हम पर बना रहे, तथा
हमें जीवन के परम लक्ष्य की ओर मार्गदर्शन प्रदान करते हुए आपके चरण कमलों की अनंत सेवा करने में सहायता मिलती रहे।

मैं सभी भक्तों से विनम्र निवेदन करता हूं कि कृपया इन नैतिक और शिक्षाप्रद कहानियों को आगे बढ़ाएं और साझा करें ताकि हर कोई कृष्ण और उनके प्रिय भक्तों के बारे में सुनकर लाभान्वित हो सके।

🚩 *राम कथा* 🚩_*हनुमान और माता सीता का मोतियों का हार*_श्री राम के अयोध्या लौटने और राजा के रूप में उनके राज्याभिषेक के ब...
15/07/2026

🚩 *राम कथा* 🚩

_*हनुमान और माता सीता का मोतियों का हार*_

श्री राम के अयोध्या लौटने और राजा के रूप में उनके राज्याभिषेक के बाद बहुत खुशी और उत्सव मनाया गया। भगवान राम ने अपनी सेना में योद्धा के रूप में सेवा करने वाले सभी वानरों को उपहार वितरित किए। श्री राम ने अपने परम भक्त हनुमान को देखा और पूछा:

“हे पराक्रमी नायक, आपने मेरे और मेरे परिवार के लिए जो कुछ किया है, मैं उसकी भरपाई कैसे करूँ?”

बहुत से लोग अपनी सेवाओं के बदले में धन, नाम या प्रसिद्धि, प्रशंसा या मान्यता चाहते थे। लेकिन श्री हनुमान इन सबसे ऊपर थे।

हनुमान की निस्वार्थ भक्ति

हनुमान ने उत्तर दिया, “प्रभु, मुझे कुछ नहीं चाहिए!”

तब माता सीता ने अपने गले से मोतियों का एक बहुमूल्य हार निकाला और उसे विनम्र श्री हनुमान को अर्पित कर दिया।

श्री हनुमान ने माता सीता से बड़े आदर के साथ मोतियों की माला ग्रहण की, लेकिन अपने दांतों से मोतियों को तोड़ना शुरू कर दिया।

सभा का आश्चर्य

सीता और सभा-कक्ष में बैठे मंत्रीगण श्री हनुमान के इस विचित्र कृत्य से बहुत आश्चर्यचकित हुए। कुछ लोगों को आश्चर्य हुआ कि महान योद्धा श्री हनुमान बंदर की तरह क्यों व्यवहार कर रहे हैं। क्या यह बंदर का दिमाग था?

सीता ने हनुमान से पूछा, "हे पराक्रमी वीर! आप क्या कर रहे हैं? आप मोती क्यों तोड़ रहे हैं?"

श्री हनुमान ने उत्तर दिया, "हे पूजनीय माता! यह वास्तव में सबसे मूल्यवान हार है, क्योंकि यह आपके पवित्र हाथों से मुझे प्राप्त हुआ है। लेकिन मैं यह जानना चाहता हूँ कि क्या इनमें से किसी मोती में मेरे प्रिय भगवान राम हैं। मैं उनसे रहित कोई वस्तु नहीं रखता। मुझे किसी भी मोती में वे नहीं मिलते।"

भक्ति सिद्ध करना

इस पर सभा के एक सदस्य ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी की, "आप ऐसी कोई भी चीज़ नहीं पहनेंगे जिसमें राम का नाम न हो। खैर, आप अपना शरीर पहन रहे हैं। आप इसे अपने साथ लेकर चल रहे हैं। हमें साबित करें कि आपके शरीर में राम का नाम है।"

हनुमान जोर से हंसे और बोले, "मैं सिद्ध कर दूंगा। देखो!"

श्री हनुमान ने तब अपने शक्तिशाली हाथों से अपनी छाती फाड़ दी और देखा कि श्री राम और माँ सीता उनके हृदय में विराजमान थे!

राम का उपहार

भगवान राम सिंहासन से उतरे, हनुमान को गले लगाया और उन्हें आशीर्वाद दिया। उन्होंने पूछा, "हनुमान! इस अवसर पर मैं आपको क्या भेंट कर सकता हूँ? मेरे पास आपको देने के लिए कोई उपहार नहीं है। मैं खुद को ही आपको भेंट के रूप में दे रहा हूँ।" फिर, उन्होंने अपना शरीर हनुमान के हाथों में सौंप दिया। कृपा के इस अनूठे कार्य को देखकर सभा में "जय हो" के नारे गूंज उठे। उन्होंने हनुमान की प्रशंसा की और घोषणा की कि पूरी दुनिया में उनकी बराबरी करने वाला कोई नहीं है। उन्होंने हनुमान की भक्ति और समर्पण की प्रशंसा की।

हनुमान की शाश्वत सेवा

जब श्री राम अपने परमधाम चले गए, तो हनुमान भी उनके पीछे जाना चाहते थे। लेकिन भगवान ने उनसे कहा कि वे इस संसार में उनके प्रतिनिधि के रूप में रहें, संतों की सभाओं में भाग लें जहाँ उनके कार्यों पर प्रवचन (कथा) आयोजित की जाती हैं और उन्हें सुनें, तथा अपने भक्तों को भक्ति विकसित करने में मदद करें।

हनुमानजी चिरंजीवी हैं। वे सर्वत्र व्याप्त हैं। जो भक्ति करता है, वह उनके दर्शन करता है और उनका आशीर्वाद प्राप्त करता है।

कहानी की नीति

निःस्वार्थ भक्ति सच्ची भक्ति निःस्वार्थ होती है और बदले में कुछ नहीं मांगती।
ईश्वर की उपस्थिति सच्चे भक्तों के हृदय में देखी और महसूस की जा सकती है।
शाश्वत सेवा एक सच्चा भक्त भगवान के भौतिक रूप से चले जाने के बाद भी भगवान और उनके भक्तों की सेवा करता रहता है।

सीखने योग्य सबक

शुद्ध भक्ति का अर्थ है किसी भी भौतिक लाभ या मान्यता की इच्छा के बिना भगवान से प्रेम करना।
भगवान के प्रति समर्पण और निःस्वार्थ भाव से उनकी सेवा करने से सर्वोच्च संतुष्टि और आध्यात्मिक तृप्ति मिलती है।
अमर भक्ति हनुमान जैसे सच्चे भक्त की भक्ति समय से परे होती है तथा दूसरों को प्रेरित और आशीर्वाद देती रहती है।

प्रार्थना

"हे भगवान राम, कृपया हमें हनुमान जैसी शुद्ध भक्ति और निस्वार्थता प्रदान करें। हमें आपकी और आपके भक्तों की प्रेम और विनम्रता से सेवा करने में मदद करें। हम हमेशा आपको अपने दिल में रखें और सच्ची भक्ति और सेवा का जीवन जीने का प्रयास करें।"

*जगन्नाथ कथा*                 *भक्त के वश में है भगवान*उड़ीसा में बैंगन बेचनेवाले की एक बालिका थी | दुनियाकी दृष्टिसे उसम...
15/07/2026

*जगन्नाथ कथा*
*भक्त के वश में है भगवान*

उड़ीसा में बैंगन बेचनेवाले की एक बालिका थी | दुनियाकी दृष्टिसे उसमें कोई अच्छाई नहीं थी | न धन था, न रूप |

किन्तु दुनिया की दृष्टिसे नगण्य उस बालिका को संत जयदेव गोस्वामी जी का पद *गीत गोविंदम* बहुत ही भाता था | वह दिन-रात उसको गुनगुनाती रहती थी और भगवानके प्रेम में डूबती-उतराती रहती थी |

वह घर का सारा काम करती, पिता-माता की सेवा करती और दिनभर जयदेव जी का पद गुनगुनाया करती और भगवान की यादमें मस्त रहती |

पूर्णिमाकी रात थी, पिताजी ने प्यारी बच्ची को जगाया और आज्ञा दी कि बेटी ! अभी चाँदनी टिकी है, ईसी प्रकाशमें बैंगन तोड़ लो जिससे प्रातः मैं बेच आऊँ | वह गुनगुनाती हुई सोयी थी और गुनगुनाती हुई जाग गयी | जागने पर इस गुनगनाने में उसे बहुत रस मिल रहा था |
*वह गुनगुनाती हुई बैंगन तोड़ने लगी, कभी इधर जाती, कभी उधर; क्योंकि चुन-चुनकर बैंगन तोड़ना था |

उस समय एक ओर तो उसके रोम-रोमसे अनुराग झर रहा था और दूसरी ओर कण्ठसे गीतगोविन्द के सरस गीत प्रस्फुटित हो रहे थे |*

*प्रेमरूप भगवान् इसके पीछे कभी इधर आते, कभी उधर जाते | इस चक्कर में उनका पीताम्बर बैंगन के काँटों में उलझकर चिथड़ा हो रहा था, किन्तु इसका ज्ञान न तो बाला को हो रहा था और न उसके पीछे-पीछे दौड़नेवाले प्रेमी भगवान को ही

विश्वको इस रहस्य का पता तब चला *जब सबेरे भगवान् जगन्नाथ जी का पट खुला और उस देशके राजा पट खुलते ही भगवानकी झाँकी का दर्शन करने गये | उन्हें यह देखकर बहुत दुःख हुआ कि पुजारी ने नये पीताम्बर को भगवानको नहीं पहनाया था, जिसे वे शामको दे गये थे | वे समझ गये कि नया पीताम्बर पुजारीने रख लिया है और पुराना पीताम्बर भगवान को पहना दिया है | उन्होंने इस विषयमें पुजारी से पूछा |

बेचारा पुजारी इस दृश्य को देखकर अवाक था | उसने तो भगवानको राजाका दिया नया पीताम्बर ही पहनाया था, किन्तु राजाको पुजारी की नीयत पर संदेह हुआ और उन्होंने उसे जेलमें डाल दिया |

निर्दोष पुजारी जेलमें भगवानके नामपर फूट-फूटकर रोने लगा |

इसी बीचमें राजा कुछ विश्राम करने लगा और उसे नींद आ गयी | स्वप्नमें उसे भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन हुए और सुनायी पड़ा कि पुजारी निर्दोष है, उसे सम्मान के साथ छोड़ दो | रह गयी बात नये पीताम्बरकी तो इस तथ्यको बैंगन के खेतमें जाकर स्वयं देख लो, पीताम्बर के फटे अंश बैंगन के काँटों में उलझे मिलेंगे |

मैं तो प्रेमके अधीन हूँ, अपने प्रेमीजनों के पीछे-पीछे चक्कर लगाया करता हूँ | बैंगन तोड़नेवाली बालाके अनुरागभरे गीतों को सुनने के लिये मैं उसके पीछे-पीछे दौड़ा हूँ और इसीमें मेरा पीताम्बर काँटोंमें उलझकर फट गया |

जगन्नाथ-मन्दिरकी देख-रेख, भोग-आरती आदि सभी तरह व्यवस्था करने वाले राजा के जीवन में इस अद्भुत घटनाने रस भर दिया और भगवान के अनुराग में वे भी मस्त रहने लगे | बैंगन तोड़नेवाली एक बाला के पीछे-पीछे भगवान् उसके प्रेममें घूमते रहे |

यह कहानी फूसकी आगकी तरह फैल गयी | जगत के स्वार्थी लोगों की भीड़ उसके पास आने लगी | कोई पुत्र माँगता तो कोई धन |

इस तरह भगवान के प्रेममें बाधा पड़ते देख *राजा ने जगन्नाथ मन्दिर में नित्य मंगला आरती के समय गीत गोविंद गाने के लिए उस बालिका को मंदिर में संरक्षण दिया और उसकी सुरक्षा-व्यवस्था की | तब से नित्य मंगला आरती में गीत गोविंद का गान *श्री जगन्नाथ* मन्दिर में होता आ रहा है।

*हे नाथ! हे मेरे नाथ !!*
*आप बहुत ही दयालु हो...*

*हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे।*
*हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।*
*जय जगन्नाथ*

जब तुलसीदास जी काशी  में रहकर रामचरितमानस लिख रहे थे, तब उसकी लोकप्रियता और बढ़ते प्रभाव को देखकर कुछ ईर्ष्यालु लोगों ने ...
30/06/2026

जब तुलसीदास जी काशी में रहकर रामचरितमानस लिख रहे थे, तब उसकी लोकप्रियता और बढ़ते प्रभाव को देखकर कुछ ईर्ष्यालु लोगों ने उस पवित्र ग्रंथ को चुराने या नष्ट करने की योजना बनाई। उन्होंने दो चोरों को रात के समय तुलसीदास जी की कुटिया में चोरी करने के लिए भेजा।

पहरेदार और चोरों का हृदय परिवर्तन
अद्भुत पहरेदार: जब चोर तुलसीदास जी के घर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि कुटिया के बाहर दो अत्यंत सुंदर और तेजस्वी राजकुमार हाथ में धनुष-बाण लिए पहरा दे रहे हैं। उनके तेज को देखकर चोर डर गए और वापस लौट गए।

चोरों की जिज्ञासा: चोरों ने अगली रात फिर प्रयास किया, लेकिन उन्हें फिर से वही दो धनुर्धारी पहरेदार वहां मिले। ऐसा लगातार कई रातों तक हुआ। अंत में चोरों के मन में यह जानने की व्याकुलता हुई कि आखिर ये रक्षक कौन हैं।

सत्य का ज्ञान: अगले दिन सुबह वे चोर तुलसीदास जी के पास पहुँचे और उनसे पूछा कि, "बाबा! वे दो सांवले और गोरे रंग के धनुर्धारी युवक कौन हैं जो रात भर आपकी कुटिया के बाहर पहरा देते हैं?"

तुलसीदास जी की प्रतिक्रिया
जब तुलसीदास जी ने यह सुना, तो वे फूट-फूट कर रोने लगे। वे समझ गए कि स्वयं भगवान श्री राम और लक्ष्मण जी उनके तुच्छ घर की और उनकी रचना की रक्षा के लिए रात भर जागकर पहरा दे रहे थे।

तुलसीदास जी को बहुत आत्मग्लानि हुई कि उनके कारण उनके प्रभु को इतना कष्ट उठाना पड़ा। कहते हैं कि इसके बाद उन्होंने अपनी कुटिया का सारा सामान दान कर दिया और केवल प्रभु के चरणों में ध्यान लगाया। वहीं, उन दोनों चोरों का हृदय परिवर्तन हो गया, उन्होंने चोरी छोड़ दी और प्रभु के भक्त बन गए।

यह प्रसंग तुलसीदास जी की अनन्य भक्ति और भगवान की अपने भक्त के प्रति वत्सलता का अनुपम उदाहरण माना जाता है। इस प्रसंग का वर्णन भक्तमाल और तुलसीदास जी के जीवन चरित्र में प्रमुखता से मिलता है।

Address

VPO Kakroli Hukmi
Charkhi Dadri
127308

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Mandeepsheoran Foji posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Mandeepsheoran Foji:

Shortcuts

Share