31/08/2025
गडकरी, इथेनॉल नीति और हितों का टकराव
भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति को लेकर सरकार ने बीते कुछ वर्षों में बड़े कदम उठाए हैं। नितिन गडकरी ने पेट्रोल में 20–27% तक इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य तय किया, ताकि कच्चे तेल पर निर्भरता घटे और किसानों को गन्ना एवं मक्का जैसी फसलों का नया बाज़ार मिले। यह नीति कागज़ पर पर्यावरण, किसान और अर्थव्यवस्था — तीनों के लिए लाभकारी नज़र आती है।
लेकिन हाल ही में यह ख़ुलासा हुआ कि गडकरी के बेटे की कंपनी ने इथेनॉल कारोबार में पिछले एक साल में हैरतअंगेज़ 17 करोड़ से 510 करोड़ रुपये तक की छलांग लगाई। सवाल यह उठता है कि क्या यह उछाल केवल कारोबारी दक्षता और नीतिगत फायदे का नतीजा है, या फिर नीति निर्माण और निजी हितों के बीच कोई गहरा संबंध है?
हितों का टकराव (Conflict of Interest)
लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल "हितों का टकराव" होता है। अगर एक मंत्री वही नीति बनाता है जिससे उसके परिवार का कारोबार सीधे लाभान्वित हो रहा है, तो यह गंभीर नैतिक संकट है।
इथेनॉल की अनिवार्य ब्लेंडिंग से मांग अचानक कई गुना बढ़ी।
कंपनियाँ, जिनमें गडकरी के बेटे की कंपनी शामिल है, सीधे इस मांग का लाभ उठा रही हैं।
इथेनॉल पेट्रोल के भाव पर बेचा जा रहा है, यानी लागत अपेक्षाकृत कम होते हुए भी मुनाफ़ा कहीं ज़्यादा है।
सवाल जो उठने चाहिए
1. क्या नीति बनाते समय गडकरी ने अपने बेटे की कंपनी के हितों का खुलासा किया था?
2. सरकार इथेनॉल की कीमत तय करते समय पारदर्शिता बरत रही है या फिर यह खेल चुनिंदा कंपनियों के पक्ष में है?
3. क्या इथेनॉल उद्योग में प्रतियोगिता निष्पक्ष है, या परिवार/राजनीतिक प्रभाव वाली कंपनियों को बढ़त मिल रही है?
लोकतंत्र और जवाबदेही
किसी भी नीति का उद्देश्य जनता और देशहित होना चाहिए, न कि किसी मंत्री के परिवार का लाभ। अगर गडकरी की नीयत और नीति दोनों साफ़ हैं, तो उन्हें सामने आकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके बेटे की कंपनी को किस आधार पर इतना बड़ा उछाल मिला और सरकार ने हितों के टकराव से बचने के लिए क्या कदम उठाए।