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भोर भी अभी पूरी तरह अपनी पलकें खोल नहीं पाई थी 🌅 पूरब की कोख में सिंदूरी रंग बस घुलना शुरू ही हुआ था, जैसे कोई नई दुल्हन...
07/10/2025

भोर भी अभी पूरी तरह अपनी पलकें खोल नहीं पाई थी 🌅 पूरब की कोख में सिंदूरी रंग बस घुलना शुरू ही हुआ था, जैसे कोई नई दुल्हन लाज से धीरे-धीरे अपना घूँघट सरका रही हो। गाँव का नाम बेलवरिया 🏡 कोसी मैया की कृपा और कहर, दोनों को अपनी छाती पर झेलता हुआ एक जीता-जागता, धड़कता हुआ गाँव। यहाँ की सुबह किसी घड़ी की टिक-टिक से नहीं, बल्कि चक्की के घरघराने, मंदिर के घंटे की टुनटुनाहट 🔔 और गायों के रँभाने 🐄 की मिली-जुली आवाज़ से होती थी। और इन सब आवाज़ों के बीच, एक आवाज़ और थी, जो बेलवरिया की आत्मा का संगीत थी — बुढ़िया माई के आँगन से आती थाप-थाप की लयबद्ध ध्वनि।

बुढ़िया माई 👵 जिनका असली नाम कब का गाँव की याददाश्त की धूल में खो चुका था, अपने घर की पिछली दीवार के सहारे बैठी थीं। उनकी उम्र? कौन गिने! उनके चेहरे की झुर्रियाँ किसी पुराने बरगद 🌳 की जड़ों की तरह फैली थीं, हर लकीर में एक कहानी, एक मौसम, एक पूरी पीढ़ी का इतिहास कैद था। उनकी आँखें, जो अब थोड़ी धँस गई थीं, उनमें आज भी सुबह की पहली किरण जैसी एक चमक 🌞 थी — एक ऐसी चमक जो बहुत कुछ देख चुकी थी और अब जो देखती थी, उसे बस महसूस करती थी।

उनके हाथ चल रहे थे 🙌 गाय के ताज़े गोबर में भूसा मिलाकर, वो दीवार पर उपले थाप रही थीं। हर थाप के साथ एक अनकहा मंत्र, एक प्रार्थना बुनी जाती थी — अग्नि देवता 🔥 के लिए, घर के चूल्हे 🏠 के लिए, उस रोटी 🍞 के लिए जो इस आग पर सिकेगी। उनके हाथ मिट्टी और गोबर से सने थे, लेकिन ये हाथ बेलवरिया की ज़मीन की तरह ही थे — उर्वर, जीवन देने वाले। उनकी हथेलियों की रेखाएँ गाँव की पगडंडियों की तरह उलझी हुई थीं, और उनकी उंगलियों के पोर ज़मीन की नमी को ऐसे पहचानते थे, जैसे कोई माँ अपने बच्चे के माथे का ताप पहचानती हो 🤱

*- शीलभद्र उपाध्याय*

आप सभी बंधुओं को नमस्कार 🙏
मुझे यह सूचित करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि *‘विरासत की सुगंध’* की यात्रा, जिसकी शुरुआत मैंने लगभग पाँच वर्ष पूर्व की थी, अब एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर आ पहुँची है। मैं बहुत समय से एक विशेष रचना पर कार्य कर रहा था और आज उसी साधना का एक छोटा सा अंश आप सबके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।

ऊपर दिया गया अंश मेरे आगामी *उपन्यास* 📖 का एक छोटा सा हिस्सा है। मैं अभी भी इसके लिए एक उपयुक्त शीर्षक (नाम) की तलाश में हूँ। मेरा आप सभी से विनम्र निवेदन है कि इस अंश क

सनातन काल से जारी होली की बधाई!सनातन धर्म संस्कृति के रहस्यों को समझने के लिए जो जितनी भी गहराई में डुबकी लगाता है उसे उ...
14/03/2025

सनातन काल से जारी होली की बधाई!

सनातन धर्म संस्कृति के रहस्यों को समझने के लिए जो जितनी भी गहराई में डुबकी लगाता है उसे उतने ही बहुमूल्य रत्नों की उपलब्धि होती है। भोलेबाबा के मसाने में होली खेलने की परंपरा हो या बरसाने में में राधारानी और कान्हा की होरी की मधुर यादों की परिपाटी, सभी में एक नई ऊर्जा को समेट हर्षोल्लास का उत्सव हो, सभी का निर्वहन सनातन संस्कृति सदियों से कर रही है। हमारा सौभाग्य है कि हम आज इसे अपनी झोली में समेटने के लिए मौजूद है।आप सभी के लिए होली मंगलमय हो।
हर हर महादेव।
- शीलभद्र उपाध्याय

14/03/2025



आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ

13/03/2025

दाती जी महाराज के साथ।

होली की शुभ कामनाएं!!!!!

आएं, हम सब मिलकर होलिका दहन के अवसर पर अधर्म फैलाने वालों विचारधारा की होलिका का दहन कर धर्मपथ अग्रसर होने वाले भक्तिसाधना के आदर्श बालक प्रह्लाद की रक्षा उसके ही अधर्मी पिता हिरण्यकश्यप से करने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ एकजुटता से खड़े रहें। ऐसा होने पर ही समाज में नवीन ऊर्जा के सतरंगी फुहारों से उल्लास का रस पूरे समाज को बिना किसी भेदभाव के सराबोर करता रहे।
प्रभु आप सबके मनोरथ सिद्ध करें और समाज के अंतिम कतार में खड़े व्यक्ति तक आनंद की संपदा बड़ी सरलता से पहुंच जाए। कोई भी उस दिव्य संपत्ति से वंचित्र न रहे इसी शुभकामना के साथ सबको होली की मंगल कामनाएं।
पंचांग के अनुसार, होलिका दहन 13 मार्च 2025 को किया जाएगा। होलिका दहन का शुभ मुहूर्त रात 11:26 बजे से 14 मार्च को सुबह 12:29 बजे तक रहेगा. देश के अलग-अलग हिस्सों में होली 14 मार्च और 15 मार्च को मनाई जाएगी।
हर हर महादेव।
- शीलभद्र उपाध्याय

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Chhatarpur
110074

Website

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