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कुंडेश्वर मंदिर में विवाद से गरमाया माहौल, संत के अपमान के आरोपों पर उठे सवाल“अध्यक्ष-सचिव मालिक नहीं, व्यवस्थापक हैं” —...
31/08/2026

कुंडेश्वर मंदिर में विवाद से गरमाया माहौल, संत के अपमान के आरोपों पर उठे सवाल

“अध्यक्ष-सचिव मालिक नहीं, व्यवस्थापक हैं” — बुंदेलखंड पीठाधीश्वर सीताराम दास महाराज ने जताई नाराजगी, कलेक्टर से आमसभा बुलाकर जांच की मांग

टीकमगढ़/कुंडेश्वर। बुंदेलखंड के प्रमुख आस्था केंद्र कुंडेश्वर धाम में मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। श्री आशुतोष अपर्णा धर्म सेतु लोक न्यास ट्रस्ट के अध्यक्ष और सचिव की कार्यशैली को लेकर ट्रस्ट सदस्यों एवं श्रद्धालुओं की नाराजगी के बीच संत के मंदिर प्रवेश से जुड़े विवाद ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।

बुंदेलखंड पीठाधीश्वर एवं धजरई मंदिर के महंत श्री सीताराम दास जी महाराज ने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से ट्रस्ट की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाते हुए नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि “अध्यक्ष-सचिव मालिक नहीं हैं, मंदिर के व्यवस्थापक हैं।” साथ ही उन्होंने टीकमगढ़ कलेक्टर से ट्रस्ट की आमसभा बुलाकर शिकायतों, संचालन व्यवस्था और कथित कमियों की समीक्षा कराने की मांग की है।

संत के मंदिर प्रवेश को लेकर क्या हुआ?

आरोप लगाया जा रहा है कि बुंदेलखंड पीठाधीश्वर को कुंडेश्वर मंदिर में प्रवेश एवं दर्शन को लेकर ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा, जिसे श्रद्धालु संत समाज के सम्मान से जोड़कर देख रहे हैं।

हालांकि, घटना की स्वतंत्र पुष्टि और पूरे घटनाक्रम के सभी पक्षों का आधिकारिक विवरण सामने आना अभी बाकी है। इसलिए संत के अपमान अथवा मंदिर प्रवेश रोकने के आरोपों की वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

“मंदिर की सेवा है, मालिकाना हक नहीं”

विवाद के बीच श्रद्धालुओं का कहना है कि मंदिर ट्रस्ट का पद सेवा, संरक्षण और व्यवस्था की जिम्मेदारी है, न कि मालिकाना अधिकार। उनका कहना है कि धार्मिक परंपराओं, संत समाज और श्रद्धालुओं के सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

ट्रस्ट से जुड़े कुछ लोगों की ओर से अध्यक्ष-सचिव की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगाए जाने की बात भी सामने आ रही है। शराब के नशे में विवाद और अन्य कथित अनियमितताओं से जुड़े आरोप भी लगाए जा रहे हैं, लेकिन इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

अब कलेक्टर के हस्तक्षेप पर टिकी निगाहें

पूरे मामले में अब ट्रस्ट की आगामी आमसभा महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बैठक में ट्रस्ट की कार्यप्रणाली, मंदिर व्यवस्थाओं और कथित अनियमितताओं से जुड़े मुद्दे उठ सकते हैं। कुछ सदस्यों द्वारा निंदा प्रस्ताव लाने की चर्चा भी है, हालांकि अंतिम निर्णय ट्रस्ट के नियमों के अनुसार आमसभा में ही होगा।

आस्था के केंद्र में आखिर व्यवस्था कैसी हो?

कुंडेश्वर सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में विवाद चाहे ट्रस्ट के भीतर का हो या व्यवस्थाओं से जुड़ा—उसका समाधान पारदर्शिता, धार्मिक मर्यादा और संवाद के साथ होना जरूरी है।

अब सवाल यही है—

क्या कुंडेश्वर धाम की व्यवस्था सेवा और मर्यादा के आधार पर चलेगी?
क्या ट्रस्ट की शिकायतों की निष्पक्ष समीक्षा होगी?
और क्या संतों एवं श्रद्धालुओं के सम्मान को लेकर स्पष्ट व्यवस्था तय की जाएगी?

इन सवालों के जवाब अब प्रशासन और ट्रस्ट की अगली कार्रवाई से सामने आएंगे।

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भुजरिया लेकर घर-घर पहुंचे लोग, प्रेम और भाईचारे से सजा तेंदूखेड़ाभुजरिया मिलन समारोह में दिखी सामाजिक एकता, सुख-दुख में ...
31/08/2026

भुजरिया लेकर घर-घर पहुंचे लोग, प्रेम और भाईचारे से सजा तेंदूखेड़ा

भुजरिया मिलन समारोह में दिखी सामाजिक एकता, सुख-दुख में साथ खड़े रहने का दिया संदेश

तेंदूखेड़ा। आपसी प्रेम, स्नेह, भाईचारे और सामाजिक समरसता का प्रतीक भुजरिया मिलन समारोह नगर में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर नगर के विभिन्न वर्गों के लोगों ने एक-दूसरे के घर पहुंचकर भुजरियों का आदान-प्रदान किया और आपसी रिश्तों को और मजबूत किया।

भुजरिया मिलन के दौरान लोगों ने बुराइयों को दूर कर प्रेम और सद्भाव के साथ मिल-जुलकर रहने का संदेश दिया। खास बात यह रही कि नगर के विभिन्न शोकाकुल परिवारों के घर पहुंचकर लोगों ने अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं और सुख-दुख में साथ खड़े रहने की परंपरा को जीवंत किया।

भुजरियों के साथ बांटा अपनापन

ब्राह्मण महासभा एवं श्री राम रसिया भक्त मंडल के सदस्यों ने बड़ी संख्या में सामूहिक रूप से नगर में भ्रमण कर भुजरियों का आदान-प्रदान किया। इस दौरान लोगों के बीच आत्मीयता और भाईचारे का भाव देखने को मिला।

भुजरिया मिलन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि त्योहार सिर्फ खुशियां मनाने का अवसर नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और रिश्तों में अपनापन बढ़ाने का माध्यम भी हैं।

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सड़क पर गड्ढे ही गड्ढे, जिम्मेदारों की आंखों पर पट्टी!तेंदूखेड़ा की मुख्य एप्रोच सड़क लंबे समय से बदहाल, पानी से भरे गड्...
31/08/2026

सड़क पर गड्ढे ही गड्ढे, जिम्मेदारों की आंखों पर पट्टी!

तेंदूखेड़ा की मुख्य एप्रोच सड़क लंबे समय से बदहाल, पानी से भरे गड्ढों ने बढ़ाई राहगीरों और वाहन चालकों की परेशानी

तेंदूखेड़ा। नगर की मुख्य एप्रोच सड़क इन दिनों सड़क कम, गड्ढों का रास्ता ज्यादा नजर आ रही है। लंबे समय से सड़क पर बने बड़े-बड़े गड्ढे अब राहगीरों और वाहन चालकों के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। भारी वाहनों के साथ छोटे वाहन, पैदल यात्री और स्कूली छात्र-छात्राएं भी इसी मार्ग से गुजरते हैं।

बारिश के बाद गड्ढों में पानी भर जाने से स्थिति और खराब हो जाती है। वाहन निकलते समय पानी के छींटे राहगीरों पर पड़ते हैं, वहीं गहरे गड्ढों के कारण दुर्घटना का खतरा भी बना हुआ है।

ब्रिज के नीचे भी बदहाल रास्ता

सिर्फ मुख्य सड़क ही नहीं, बल्कि ब्रिज के नीचे की ओर भी जगह-जगह गड्ढे होने से वाहनों की आवाजाही प्रभावित हो रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि समस्या लंबे समय से बनी हुई है, लेकिन जिम्मेदार विभाग की ओर से स्थायी समाधान की पहल नजर नहीं आ रही।

स्थानीय स्तर पर सड़क के मेंटेनेंस की जिम्मेदारी एनएचआई की बताई जा रही है। लोगों का आरोप है कि बार-बार समस्या सामने आने के बावजूद सड़क की मरम्मत और गड्ढों को भरने की दिशा में पर्याप्त कार्रवाई नहीं की गई।

अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी गुजरते हैं, फिर क्यों नहीं दिखते गड्ढे?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसी सड़क से प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का भी लगातार आवागमन होता है। इसके बावजूद लंबे समय से बनी इस समस्या का समाधान नहीं होना स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

समाचार माध्यमों के जरिए भी समस्या जिम्मेदारों तक पहुंचाए जाने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने से लोगों में नाराजगी है।

खुली नालियां बनीं दूसरा खतरा

मुख्य सड़क के किनारे बनी बड़ी नालियां भी कई स्थानों पर खुली पड़ी हैं और कचरे से अटी हुई हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार आए दिन लोग और मवेशी इनमें गिरने से परेशान होते हैं।

नालियों की साफ-सफाई और उन्हें ढंकने को लेकर कई बार शिकायतें किए जाने की बात कही जा रही है, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।

जनता पूछ रही—आखिर कब जागेंगे जिम्मेदार?

एक तरफ सड़क के गड्ढे हादसों को न्योता दे रहे हैं, दूसरी तरफ खुली और गंदगी से भरी नालियां अलग खतरा बनी हुई हैं। ऐसे में स्थानीय लोगों की मांग है कि संबंधित विभाग मौके का निरीक्षण कर सड़क की तत्काल मरम्मत और नालियों की सफाई व सुरक्षित व्यवस्था सुनिश्चित करे।

सवाल सिर्फ गड्ढों का नहीं, जिम्मेदारी का है।

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300 की आबादी… 3 किलोमीटर का दलदल!बिलगुआ टोला में सड़क नहीं, हर बारिश में मजबूरी का सफरस्कूली बच्चे हों या गर्भवती महिलाए...
31/08/2026

300 की आबादी… 3 किलोमीटर का दलदल!

बिलगुआ टोला में सड़क नहीं, हर बारिश में मजबूरी का सफर

स्कूली बच्चे हों या गर्भवती महिलाएं—कीचड़ भरे रास्ते से गुजरने को मजबूर ग्रामीण, जर्जर पुल ने बढ़ाई मुसीबत

नरसिंहपुर/करेली। नेशनल हाईवे-45 से महज 3 किलोमीटर दूर बसा बिलगुआ टोला आज भी विकास की उस सड़क का इंतजार कर रहा है, जो कागजों में शायद कहीं मौजूद है, लेकिन जमीन पर बारिश आते ही कीचड़ और दलदल में बदल जाती है।

करीब 300 की आबादी वाले इस गांव के लिए बारिश सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि हर साल लौटने वाली मुसीबत है। गांव तक पहुंचने वाला लगभग 3 किलोमीटर का कच्चा रास्ता इतना खराब हो जाता है कि पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है। इसी रास्ते से स्कूली बच्चे रोज स्कूल जाते हैं और ग्रामीण अपने जरूरी कामों के लिए बाहर निकलते हैं।

बीमार पड़े तो अस्पताल नहीं, पहले दलदल पार करना पड़ता है

सबसे भयावह स्थिति तब बनती है जब किसी गर्भवती महिला या गंभीर मरीज को अस्पताल ले जाना हो। ग्रामीणों के मुताबिक अंग्रेजी शासनकाल का जर्जर पुल बड़े वाहनों और एंबुलेंस के लिए भी बड़ी बाधा बना हुआ है।

ऐसे में गंभीर मरीजों को कई बार पैदल, बैलगाड़ी या स्थानीय साधनों के सहारे करीब 3 किलोमीटर तक ले जाने की मजबूरी सामने आती है।

नल-जल की पाइपलाइन दिखी, लेकिन घरों तक पानी नहीं पहुंचा

गांव की समस्या सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों के मुताबिक नल-जल योजना के तहत पाइपलाइन और डीपी दिखाई देती है, नलकूप भी खोदा गया है, लेकिन घरों तक नल का पानी नहीं पहुंचा है।

पानी, सड़क और श्मशान घाट जैसी मूलभूत सुविधाओं की समस्याओं को लेकर ग्रामीणों ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लेकर कलेक्टर कार्यालय तक शिकायतें किए जाने की बात कही है।

अधिकारी बोले—फिलहाल मुरम डालकर रास्ता चलाएंगे

अपर कलेक्टर अरविंद कुमार सिंह ने माना कि बारिश के दौरान मिट्टी वाले रास्ते पर आवागमन मुश्किल हो रहा है। उन्होंने जिला पंचायत सीईओ को मुरम या डस्ट डलवाकर फिलहाल रास्ता चालू रखने के निर्देश दिए हैं।

उन्होंने बताया कि सड़क को प्रधानमंत्री योजना में लिया गया है, लेकिन बारिश के दौरान स्थायी निर्माण संभव नहीं है। जर्जर पुल के संबंध में जानकारी लेकर आवश्यक कार्रवाई की बात भी कही गई है।

सवाल वही है… हर साल बारिश आती है, परेशानी क्यों नहीं जाती?

अगर सड़क हर साल बारिश में दलदल बनती है, तो स्थायी समाधान की तैयारी पहले क्यों नहीं होती?

करीब 300 लोगों की जिंदगी आखिर कब तक 3 किलोमीटर के दलदल में फंसी रहेगी?

बिलगुआ टोला के ग्रामीणों को राहत की नहीं, अब एक ऐसी पक्की सड़क की जरूरत है जो बारिश देखकर अपना रास्ता न बदले।

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₹22 करोड़ की सड़क… सिर्फ 4 महीने में उखड़ गई!तेंदूखेड़ा–सहजपुर मार्ग की बदहाली ने खोली विकास के दावों की पोल, गड्ढों में...
31/08/2026

₹22 करोड़ की सड़क… सिर्फ 4 महीने में उखड़ गई!

तेंदूखेड़ा–सहजपुर मार्ग की बदहाली ने खोली विकास के दावों की पोल, गड्ढों में फंसे वाहन तो ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर डलवाई मुरम

तेंदूखेड़ा/नरसिंहपुर। करोड़ों रुपये की लागत से बनी सड़क अगर कुछ ही महीनों में गड्ढों में तब्दील हो जाए, तो सवाल सिर्फ सड़क की गुणवत्ता पर नहीं, बल्कि पूरे निर्माण और निगरानी तंत्र पर उठना लाजिमी है।

तेंदूखेड़ा से सहजपुर तक करीब ₹22 करोड़ की लागत से बनाई गई सड़क महज चार महीने बाद ही खराब होने के आरोपों को लेकर चर्चा में है। सड़क से डामर उखड़ने और जगह-जगह बड़े गड्ढे बनने के कारण वाहन चालकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

गड्ढों में फंसे वाहन, घंटों लगा जाम

सड़क की बदहाल स्थिति के चलते वाहनों की रफ्तार थम गई और कई जगह लंबा जाम लग गया। गड्ढों में वाहन फंसने से यात्रियों को घंटों परेशान होना पड़ा।

सबसे हैरान करने वाली तस्वीर तब सामने आई, जब रास्ता खुलवाने के लिए वाहन चालकों और ग्रामीणों ने खुद मोर्चा संभाला। लोगों ने आपस में चंदा जुटाया और अपने स्तर पर मुरम डलवाकर आवागमन बहाल करने की कोशिश की।

करोड़ों खर्च के बाद जनता क्यों भुगते खामियाजा?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि सड़क निर्माण में गुणवत्ता की अनदेखी और कथित भ्रष्टाचार के कारण यह स्थिति बनी है। हालांकि भ्रष्टाचार या कमीशनखोरी के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए निर्माण की गुणवत्ता और जिम्मेदारी का वास्तविक निर्धारण तकनीकी जांच के बाद ही हो सकता है।

सड़क की देखरेख MPRDC से जुड़ी बताई जा रही है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि निर्माण के कुछ ही समय बाद सड़क खराब होने की शिकायतों पर जिम्मेदार विभाग ने क्या कार्रवाई की?

सवाल बड़ा है—₹22 करोड़ की सड़क आखिर 4 महीने में कैसे हार गई?

क्या सड़क निर्माण की गुणवत्ता की जांच होगी?
क्या जिम्मेदार ठेकेदार की जवाबदेही तय होगी?
क्या निगरानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होगी?

जनता के पैसे से बनी सड़क को अगर जनता ही अपने पैसे से चलने लायक बनाए, तो फिर करोड़ों के निर्माण बजट और सरकारी निगरानी का मतलब क्या रह जाता है?

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भविष्य की आहट / डा. रवीन्द्र अरजरियाघातक है कर्ज में डूबी सरकारों का सत्तामंत्रलोकतंत्र में सरकार जनता की सेवा के लिए हो...
31/08/2026

भविष्य की आहट / डा. रवीन्द्र अरजरिया

घातक है कर्ज में डूबी सरकारों का सत्तामंत्र

लोकतंत्र में सरकार जनता की सेवा के लिए होती है, जनता को अपने राजनीतिक अस्तित्व की कीमत पर खरीदने के लिए नहीं। देश की चुनावी राजनीति के कारण जनकल्याण और मुफ्तखोरी के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। हाल ही में संपन्न हुए रक्षाबंधन पर्व के भावनात्मक और सांस्कृतिक पर्व पर चुनावी धरातल तैयार करने की होड देखने को मिली। महिलाओं के खातों में रकम डालने, मुफ्त बस यात्रा कराने और नई आर्थिक घोषणाओं की बाढ सी आ गई। महिलाओं के सम्मान की आड में सरकारी खजानों को मतपेटी तक पहुंचने का साधन बनाया जाने लगा है। मध्य प्रदेश में लाड़ली बहिना योजना के तहत सामान्य 1500 रुपये की मासिक किस्त के अतिरिक्त 250 रुपये का शगुन देकर उन्हें 1750 रुपये दिए गए। बिहार में 5 लाख जीविका दीदियों के खातों में 600 करोड़ रुपये अंतरित किए गए और 10 हजार महिलाओं को 50 करोड़ रुपये का ऋण देने की घोषणा हुई। ओडिशा में सुभद्रा योजना के तहत पात्र महिलाओं को 10 हजार रुपये वार्षिक की सहायता दी जा रही है, जिसकी 5 हजार रुपये की किस्त रक्षाबंधन के अवसर पर जारी की गई। झारखंड में महिलाओं को 2500 रुपये की किस्त दी गई। पंजाब में 1 लाख 37 हजार सत्कार सखियों को 52 करोड 20 लाख रुपये की सम्मान राशि हस्तांतरित की गई। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में महिलाओं के लिए विशेष मुफ्त बस यात्रा की घोषणाएं हुईं। राजस्थान में महिलाओं को 48 घंटे तक रोडवेज बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा दी गई। यह सत्य है कि संविधान का अनुच्छेद 38 के द्वारा राज्य को ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने का निर्देश दिया गया है जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को प्रेरित किया जा सके। अनुच्छेद 39 में आर्थिक संसाधनों के समान वितरण और आर्थिक विषमता कम करने की दिशा दिखाई गई है। अनुच्छेद 41 द्वरा काम, शिक्षा और आवश्यकता की स्थिति में सार्वजनिक सहायता की बात की गई है तथा अनुच्छेद 47 द्वारा पोषण स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य को राज्य का प्राथमिक दायित्व मानता गया है लेकिन संविधान सरकार को यह अधिकार नहीं देता कि वह वित्तीय विवेक को ताक पर रखकर हर चुनाव से पहले सरकारी खजाना खोल दे। आज नागरिकों को मुफ्तखोरी की आदत डाली जा रही है। स्थायी रूप से सरकारी सहायता पर निर्भर बनाया जा रहा है। सहायता को अधिकार की श्रेणी में पहुंचाया जा रहा है। नागरिकों को दी जाने वाली नकद सहायता का कोई स्पष्ट सामाजिक - आर्थिक लक्ष्य निर्धारित न होने के कारण इसे चुनावी काल का मतदाता प्रलोभन कहना अतिशयोक्ति न होगा। वास्तविकता तो यह है कि राज्य सरकारें आज स्वयं भारी कर्ज के नीचे दबी हुई हैं। पीआरएस के अनुसार मार्च 2025 तक राज्यों की कुल बकाया देनदारी लगभग 27.5 प्रतिशत जीडीपी के बराबर थी, जो एफआरबीएम समीक्षा समिति द्वारा सुझाए गए 20 प्रतिशत के स्तर से काफी अधिक है। केवल गुजरात, महाराष्ट्र और ओडिशा राज्य ही इस अनुशंसित ऋण स्तर की सीमा में पाये गये थे। अन्य राज्यों की कई सरकारें पहले ही अपनी आने वाली पीढ़ियों की आय का एक हिस्सा आज खर्च कर चुकी हैं। ऐसे में राज्यों के कर्ज को भी आंकडों के साथ रेखांकित करना आवश्यक है। सन् 2023-24 में राज्यों ने सामूहिक रूप से अपनी राजस्व आय का 62 प्रतिशत वेतन, पेंशन, ब्याज और सब्सिडी पर खर्च किया था। केवल सब्सिडी पर 24 राज्यों का खर्च 3.18 लाख करोड़ रुपये था, जो औसतन राजस्व आय का लगभग 9 प्रतिशत था। पंजाब में यह अनुपात 21 प्रतिशत, तमिलनाडु में 14 प्रतिशत, राजस्थान में 14 प्रतिशत तथा कर्नाटक में भी 14 प्रतिशत रहा। महिलाओं के लिए बिना शर्त नकद हस्तांतरण की राजनैतिक प्रतिस्पर्धायें चल रहीं है। सन् 2025-26 में 12 राज्य ऐसी योजनाएं चला रहे थे जिन पर अनुमानित सामूहिक खर्च 1.68 लाख करोड़ रुपये था। प्रश्न यह कि क्या महिलाओं को दी जाने वाली इस धनराशि से वे अपने स्थाई आर्थिक स्रोत पैदा कर रहीं है या फिर मुफ्त की थौली पर अहंकार का आवरण चढा रहीं है। सरकारों की यह भेडचाल नागरिकों के गले का फंदा बनती जा रही है। सरकारें कर्ज लेकर आज खाते में पैसा डाल रहीं है, मुफ्त यात्रा करवा रहीं है, बिना मेहनत के राशन की बोरियां – सामान भिजवा रहीं है, बिजली - पानी पर सब्सिडी दे रहीं है लेकिन कल उसी कर्ज का ब्याज ईमानदार करदाताओं की चमडी उधेड कर वसूला जायेगा। ब्याज बढ़ता है तो पूंजीगत व्यय के लिए पैसा कम होता है। सड़क, सिंचाई, स्कूल, अस्पताल, रोजगार और उद्योग पर खर्च घटता है। फिर विकास की कमी को दूर करने के लिए नई योजनाओं की घोषणा होती है और उन्हें वित्त पोषित करने के लिए फिर नया कर्ज लिया जाता है। यही वह चक्रब्यूह है जिसमें देश फंसता जा रहा है। कथित योजनाओं के कथित पात्रों को अपने बैंक खातों में सरकारी पैसा आने की प्रतीक्षा रहती है। यहां बुन्देलखण्ड की यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है कि अल्लाह दे खाने को, तो कुतका जाये कमाने को। देश के नागरिकों को निकम्मा, कामचोर और आलसी बनाने की यह खेल अब गले की हड्डी बनाता जा रहा है। जीवकोपार्जन की चिन्ता छोडकर लोग राजनैतिक आन्दोलनों का झंडा उठाने, आतंक का परचम फहराने और अपराधों का ग्राफ बढाने में लगे हैं। ऐसे लोगों को ही डीप स्टेट के द्वारा जेन जी नाम देकर देश में अशान्ति का ठेका दिया जा रहा है। ऐसे में आम आवाम को यह जानने का पूरा हक है कि प्रत्येक राज्य अपने बजट में यह बताए कि प्रत्येक मुफ्त योजना की दस वर्ष की कुल लागत कितनी होगी, उसका वित्तीय स्रोत क्या है और उसके कारण पूंजीगत निवेश पर कितना प्रभाव पड़ेगा। राजनीतिक दलों को भी अपने घोषणा-पत्रों के साथ राजकोषीय उत्तरदायित्व पत्र भी जारी करना चाहिये ताकि उससे दलों के विवेक, दूरदर्शिता और योग्यता की बानगी मिल सके। हकीकत तो यह है कि सत्ता पाने के लिए उधार लेकर घी पीने - पिलाने का यह सत्तामंत्र जितना आकर्षक दिखाई देता है, उसका आर्थिक अंत उतना ही भयावह है। इस सप्ताह बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

वरिष्ठ पत्रकार कमलेश घोष के पिता बाबू सिंह घोष का निधन93 वर्ष की आयु में ली अंतिम सांस, आज सुबह 10 बजे निकलेगी अंतिम यात...
30/08/2026

वरिष्ठ पत्रकार कमलेश घोष के पिता बाबू सिंह घोष का निधन

93 वर्ष की आयु में ली अंतिम सांस, आज सुबह 10 बजे निकलेगी अंतिम यात्रा

छतरपुर। छतरपुर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र ‘हम पांच’ के संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार कमलेश घोष के पूज्य पिता बाबू सिंह घोष का रविवार रात करीब 9 बजे 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पत्रकार जगत, सामाजिक क्षेत्र एवं परिचितों में शोक की लहर है।

परिजनों के अनुसार बाबू सिंह घोष ने अपने जीवन का लंबा समय परिवार और समाज के बीच बिताया। उनके निधन से परिवार ने अपने वरिष्ठ एवं मार्गदर्शक सदस्य को खो दिया है। उनके सरल स्वभाव और पारिवारिक जीवन में उनके योगदान को परिजन एवं शुभचिंतक भावुक होकर याद कर रहे हैं।

आज सुबह 10 बजे निकलेगी अंतिम यात्रा

स्वर्गीय बाबू सिंह घोष की अंतिम यात्रा आज सुबह 10 बजे उनके निवास स्थान बसारी दरवाजा से प्रारंभ होगी। इसके बाद उनका अंतिम संस्कार सिंघाड़ी नदी स्थित मुक्तिधाम में किया जाएगा।

बाबू सिंह घोष, दैनिक समाचार पत्र ‘हम पांच’ के संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार कमलेश घोष, बबलू घोष और जगत सिंह घोष के पूज्य पिता थे। उनके निधन की सूचना मिलते ही रिश्तेदारों, मित्रों, पत्रकारों एवं शुभचिंतकों द्वारा शोक संवेदनाएं व्यक्त की जा रही हैं।

परिवार पर टूटा दुःख का पहाड़

पिता के निधन से वरिष्ठ पत्रकार कमलेश घोष एवं उनके परिवार में गहरा शोक व्याप्त है। 93 वर्ष की उम्र में बाबू सिंह घोष का निधन परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है। परिजनों ने ईश्वर से दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करने तथा शोकाकुल परिवार को इस कठिन समय में धैर्य एवं शक्ति देने की प्रार्थना की है।

दबंग मीडिया परिवार की ओर से वरिष्ठ पत्रकार कमलेश घोष एवं समस्त शोकाकुल परिवार के प्रति गहरी संवेदना।

ॐ शांति।

96% अंक लाने वाली छात्रा के पिता बने शाला विकास समिति के अध्यक्षनवागत प्राचार्य की पहल पर पहली बार व्यवस्थित तरीके से हु...
30/08/2026

96% अंक लाने वाली छात्रा के पिता बने शाला विकास समिति के अध्यक्ष

नवागत प्राचार्य की पहल पर पहली बार व्यवस्थित तरीके से हुआ चुनाव, दर्जनों गांवों से पहुंचे सैकड़ों अभिभावक
पवन चौबे
ईशानगर। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ईशानगर में शनिवार को नवागत प्राचार्य बसंत लाल प्रजापति की अध्यक्षता में शाला विकास एवं प्रबंधन समिति के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव कराया गया। चुनाव प्रक्रिया में दर्जनों गांवों से सैकड़ों अभिभावक एवं ग्रामीण शामिल हुए। सर्वसम्मति से कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी के अभिभावक को अध्यक्ष बनाए जाने का निर्णय लिया गया।

कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा में 500 में से 480 अंक (96%) प्राप्त करने वाली छात्रा नैन्सी पटेल के पिता प्रमोद कुमार पटेल को समिति का अध्यक्ष निर्वाचित घोषित किया गया। वहीं उपाध्यक्ष पद के लिए 472-472 अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के अभिभावकों में जन्मतिथि के आधार पर निर्णय लिया गया। इसके बाद सुहानी अहिरवार के पिता नंदलाल अहिरवार को उपाध्यक्ष निर्वाचित किया गया।

पुष्पमाला पहनाकर किया सम्मान

निर्वाचन के बाद उपस्थित शिक्षकों, अभिभावकों एवं ग्रामीणों ने नवनिर्वाचित अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को पुष्पमाला पहनाकर बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने चुनाव प्रक्रिया को व्यवस्थित एवं पारदर्शी तरीके से संपन्न कराने के लिए प्राचार्य बसंत लाल प्रजापति का आभार जताया।

स्वच्छता से लेकर स्कूल विकास तक काम कराने की बात

अध्यक्ष प्रमोद कुमार पटेल और उपाध्यक्ष नंदलाल अहिरवार ने कहा कि शाला विकास समिति के माध्यम से विद्यालय के विकास कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी। स्कूल की स्वच्छता, विद्यार्थियों के लिए बेहतर शैक्षणिक वातावरण, विद्यालय की गतिविधियों और आवश्यक सुविधाओं को लेकर व्यवस्थित तरीके से कार्य कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि विद्यालय के विकास में शिक्षकों, अभिभावकों और ग्रामीणों की सहभागिता सुनिश्चित करते हुए मिलकर काम किया जाएगा।

नवागत प्राचार्य की पहल पर चुनाव प्रक्रिया व्यवस्थित तरीके से संपन्न होने और बड़ी संख्या में अभिभावकों की भागीदारी को लेकर उपस्थित लोगों में उत्साह देखने को मिला।

*लवकुशनगर में राखी का पावन पर्व बना आत्म परिवर्तन का उत्सव**ब्रह्माकुमारी बहनों ने जेल में बंदियों की कलाई पर बांधी राखी...
30/08/2026

*लवकुशनगर में राखी का पावन पर्व बना आत्म परिवर्तन का उत्सव*

*ब्रह्माकुमारी बहनों ने जेल में बंदियों की कलाई पर बांधी राखी, बुराइयों को छोड़ नई जिंदगी शुरू करने का दिलाया संकल्प*
अरविंद द्विवेदी
लवकुशनगर। रक्षाबंधन का पावन पर्व लवकुशनगर उपजेल में इस बार भाई-बहन के प्रेम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आत्म परिवर्तन और सकारात्मक जीवन की नई शुरुआत का संदेश लेकर आया। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की बहनों ने जेल में निरुद्ध सभी बंदी भाइयों की सूनी कलाई पर राखी बांधकर उन्हें जीवन में अच्छाई अपनाने और बुराइयों को त्यागने का संकल्प दिलाया।
कार्यक्रम के दौरान ब्रह्माकुमारी सुलेखा बहन ने प्रत्येक भाई की कलाई पर राखी बांधते हुए कहा कि रक्षाबंधन पर भाई अपनी बहन को कोई न कोई उपहार देते हैं, लेकिन इस बार उन्हें भाइयों से एक विशेष उपहार चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस कमी, कमजोरी, बुराई या अपराध के कारण वे यहां पहुंचे हैं, राखी बंधवाते समय यह संकल्प लें कि भविष्य में उस कार्य को दोबारा नहीं करेंगे।
उन्होंने सभी बंदियों से अपने जीवन को परिवार, समाज और स्वयं के हित में लगाने तथा ऐसा कोई कार्य नहीं करने का वचन लेने की अपील की, जिससे उनके माता-पिता और परिवार की आंखों में आंसू आएं या उन्हें समाज के सामने शर्मिंदा होना पड़े।
इस दौरान ध्यान एवं मेडिटेशन के माध्यम से अपने अंदर की नकारात्मकता और बुराइयों को परमात्मा को समर्पित कर जीवन की नई शुरुआत करने का संदेश दिया गया। भावुक कर देने वाले इस अवसर पर कई बंदियों की आंखों से आंसू छलक पड़े। सभी भाइयों ने बुराइयों को छोड़कर सकारात्मक जीवन जीने का संकल्प लिया।
जेल अधीक्षक मुकेश मांझी ने ब्रह्माकुमारी बहनों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बहनों द्वारा बताई गई जीवन को सकारात्मक दिशा देने वाली बातों को सभी को अपने जीवन में उतारना चाहिए। उन्होंने कहा कि बंदियों ने जो संकल्प लिया है, उसे पूरी ईमानदारी के साथ निभाना भी जरूरी है।
कार्यक्रम में उषा बहन ने सभी बंदियों को तिलक लगाकर रक्षाबंधन पर्व की शुभकामनाएं दीं। वहीं अरुण भाई, नवल दीक्षित सहित जेल स्टाफ ने भी सभी को राखी बांधकर पर्व की बधाई दी। इसके बाद सभी का मुंह मीठा कराया गया और कार्यक्रम का समापन हुआ।

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