04/10/2025
1857 की क्रांति में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के सहभागी रहे क्रांतिकारीओं को अंग्रेजों ने, बाद में ग्वालियर के सिंधिया राज्य ने, उन्हें भारी कष्ट पहुँचाये।
क्रान्तिकाल में चंदेरी, नानकपुर के धंधेरे और तात्या टोपे
ओरछा के मधुकरशाह बुंदेला के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र रामशाह 1592 ई. में ओरछा की गद्दी पर बैठे थे। परंतु जहांगीर बादशाह ने 1605 ई. में उन्हें अपदस्थ कर ओरछा की गद्दी उनके छोटे भाई वीरसिंहदेव बुंदेला को सौंपकर, उन्हें चंदेरी के समीप बार नामक स्थान की जागीर दे दी थी। बाद में इसी वंश के भरतसिंह बुंदेला (1612–1630) को शाहजहां ने बार के साथ चंदेरी भी दे दिया था।
इसी वंश में चंदेरी के शासक मोरप्रहलाद (1802–1842) हुए थे। वे कमजोर शासक थे, अतः अंग्रेजों में ग्वालियर के सिंधिया के सेनापति जॉन बेस्टनर ने चंदेरी के बहुत से क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था। बाद में अंग्रेजों के दबाव के चलते मोरप्रहलाद को बार, बानपुर, केलुंगों के भाग सहित 30 गाँव मिल गये। बाकी 2/3 भाग चंदेरी के सिंधिया के कब्जे में रह गया। इन्हीं मोरप्रहलाद के पुत्र मर्दनसिंह बुंदेला (1842–58) हुए, जिन्होंने अपनी नई राजधानी बानपुर से अंग्रेजों से संघर्ष किया, और रानी को भी सहयोग एवं समर्थन दिया था।
यह बानपुर कस्बा ललितपुर जिले में, उत्तर प्रदेश का भाग है; यह क्षेत्र चंदेरी के समीपवर्ती है। चंदेरी से 4–5 कि.मी. दूर स्थित नानकपुर ठिकाना, धंधेरों को चंदेरी के बुंदेलाओं ने जागीर में दिया था। ये धंधेरे ठाकुर इन भागों में पिछोर अनुबाग के धंधेरों के भागों से विवाहिक सम्बन्धों के माध्यम से आये थे।
क्रान्तिकाल में नानकपुर के धंधेरों ने अंग्रेजों का विरोध करते हुए मर्दनसिंह के साथ युद्ध किया था। फलस्वरूप नानकपुर के धंधेरे परिवार के पहले अंग्रेजों ने, बाद में ग्वालियर के सिंधिया राज्य ने, उन्हें भारी कष्ट पहुँचाये।
नानकपुर के धंधेरे और सिंधिया शासन
नानकपुर में दो गढ़ियाँ थीं, जिनमें से एक पुरानी गढ़ी गिर चुकी थी, दूसरी गढ़ी को सिंधिया का खुदादाद कहा जाता था। सन् 1813 ई. के समय नानकपुर सिंधिया का हिस्सा बन गया था, परंतु नानकपुर के धंधेरे का पुराना ठिकाना यथावत बना रहा।
ग्वालियर के सिंधिया प्रशासन के अधिकारी उमराव महिपतजुन ने 1815 ई. में दुर्गासिंह धंधेरे को संबोधित एक पत्र लिखा था, जिसमें कहा गया था—
“उमराव महिपतजुन दुर्गासिंह को कुशलता के समाचार का आदान-प्रदान करते हुए लिखते हैं कि पलटन ने गाँव के बैल पकड़ लिये थे। तब तुमने बड़ा फसाद अर्थात उपद्रव किया था, और सिपाही गाँव में पानी पीने आये तो तुमने उन पर हमला बोला और बंदूकें चलाईं। इस कारण तुम्हें चेताया जाता है कि तुम सरकार में उपस्थित हो, क्योंकि तुम सरकार की चाकरी पर हो।”
इस पत्र से स्पष्ट होता है कि सिंधिया की ओर से नानकपुर के धंधेरे को चाकर-नौकर समझा जाता था, जबकि वे चंदेरी के बुंदेलाओं के सामंत ठाकुर थे, जो अपने क्षेत्र में राजा समान माने जाते थे। यही कारण था कि अंग्रेजों और बुंदेलखण्ड–धंधेरखण्ड के ठाकुरों के बीच संघर्ष का वातावरण बना।
नानकपुर के धंधेरे सिंधिया के अधीन रहकर भी मर्दनसिंह के पक्षधर थे। मर्दनसिंह सिंधिया के विरोधी थे, क्योंकि सिंधिया ने उनसे चंदेरी का क्षेत्र छीन लिया था। मर्दनसिंह इस क्षेत्र को पुनः पाने के लिए सदा प्रयासरत रहे। संभवतः नानकपुर के धंधेरे भी यही चाहते थे कि चंदेरी पर मर्दनसिंह का अधिकार हो जाए, इसी कारण सिंधिया प्रशासन से उनकी नहीं बनती थी।
नानकपुर के धंधेरे दुर्गासिंह के दो पुत्र थे – जुझारसिंह और जवाहरसिंह। जुझारसिंह के नाम से चंदेरी, कैथरी से सन् 1851 ई. में भेजे गये एक परवाने में लिखा गया था—
“यह परवाना राजे दादा साहिब मोरपंत कामिस्सदर चंदेरी खास के गाँव मलारगढ़ से लिखा गया था। यह गाँव चंदेरी से दक्षिण में 35 कि.मी. दूर बेटवा नदी के समीप है। इसमें लिखा है कि आप कैथरी में आयें और निर्धारित रकम जमा कर गाँव के जागीरदार बने रहें।”
सन् 1857 की क्रांति और नानकपुर के धंधेरे
सूबेदार चंदेरी के दौरे पर आ रहे हैं। उनकी व्यवस्था यहाँ करना है और उनकी चाकरी सेवा में हाजिर रहना है।
चंदेरी के कामिस्सदर ने यह पत्र दी के दौरान मलारगढ़ से लिखा था। एक निश्चित राज्य आय की रकम नहीं देना चाहते थे, और उन्हें समय पर विद्रोही प्रवृत्तिकर रह रहे थे।
बुंदेलखण्ड के इतिहास लेखक दीवान प्रतापसिंह ने नानकपुर के धंधेरे जुझारसिंह का उल्लेख करते हुए लिखा है —
“चंदेरी में अप्रैल सन् 1857 ई. से ही विद्रोह की तैयारी आरंभ हो गई थी। पहले मई में नानकपुर के जुझारसिंह ने हथियार उठाये थे।”
यह स्पष्ट करता है कि नानकपुर के धंधेरे सिंधिया प्रशासन में रहते हुए भी अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़े हुए थे। मर्दनसिंह का उद्देश्य चंदेरी क्षेत्र, जो उनके पूर्वजों के अधीन रहा था, किसी भी प्रकार पुनः प्राप्त करना था।
वे कभी अंग्रेजों से संबंध रखते थे, परन्तु अंततः उन्हें अंग्रेजों पर विश्वास नहीं रहा। इस कारण वे झाँसी की रानी से भी संपर्क बनाए हुए थे।
झाँसी की छावनी के विद्रोह की लपटें ललितपुर तक पहुँचीं तो मर्दनसिंह ने वहाँ के सिपाहियों को उकसाकर कोषागार और शस्त्रागार को लुटवा दिया। इसी समय नानकपुर के दोनों धंधेरे भाई — जुझारसिंह और जवाहरसिंह — मर्दनसिंह के सहयोगी बन गए। वे दोनों 1857 के विद्रोह में वीरगति को प्राप्त हुए।
उनके बाद उनके गोद लिये पुत्र गणेशू ने नानकपुर की जागीरदारी का दावा किया।
सन् 1861 ई. के बाद नानकपुर का इलाका पूरी तरह सिंधिया राज्य के अधीन आ गया। पहले यह क्षेत्र सिंधिया के नियंत्रण में रहते हुए प्रशासनिक रूप से ललितपुर के अंग्रेज अधिकारियों की देखरेख में था। इस आशय का एक पत्र अंग्रेज अधिकारियों ने जारी किया, जिसमें लिखा था—
“बनाम जमींदारान व दियायामा किसान मौजा नानकपुर पर।
चंदेरी भूपबस हुकुम नवाब श्री मनमहाराज —
गवर्नर बहादुर पश्चिम उत्तर देशाधिकारियों तुमको इतिलाव दी जाती है कि तारीख 6 महीना अप्रैल सन् 1861 ई. से तुम्हारा इलाका महाराज आलीजाह सिंधिया बहादुर को सुपुर्द किया जायेगा और तुम लोग सरकार अंग्रेज बहादुर के रैयत नहीं होंगे। तुमको चाहिए कि तारीख मंज़कूर में ताबेदारी करो।”
निष्कर्ष
इस प्रकार नानकपुर और चंदेरी के धंधेरों ने न केवल अंग्रेजों का बल्कि सिंधिया शासन का भी विरोध किया। वे मर्दनसिंह बुंदेला के सच्चे सहयोगी रहे और 1857 की क्रांति में उनके साहस, देशभक्ति और बलिदान का विशेष योगदान रहा। बुंदेलखण्ड की इस भूमि ने ऐसे वीरों को जन्म दिया, जिन्होंने स्वराज की ज्योति को प्रज्वलित रखा।
लेख जानकारी का स्रोत - धंधेरखण्ड का इतिहास और 1857 की क्रांति में उनकी भूमिका (पुस्तक से )