28/01/2026
26 जनवरी को देश भर में गणतंत्र दिवस मनाया गया, लेकिन मध्यप्रदेश के मैहर ज़िले से आई एक तस्वीर ने व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। शासकीय हाईस्कूल भटिगवां में बच्चों को विशेष मध्यान्ह भोजन प्लेट की जगह फटे कागज़ और पुरानी नोटबुक के पन्नों पर परोसा गया। बच्चे ज़मीन पर बैठकर इन्हीं कागज़ों पर हलवा-पूरी खाते नजर आए।
जिस दिन देश संविधान, समानता और सम्मान की बात करता है, उसी दिन बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। मध्यान्ह भोजन योजना का उद्देश्य बच्चों को पोषण देना और स्कूल से जोड़ना है, लेकिन इस घटना ने योजना के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सिर्फ़ संसाधनों की कमी का मामला नहीं, बल्कि लापरवाही और असंवेदनशीलता का उदाहरण है।
यह भी चिंता का विषय है कि इससे पहले नवंबर 2025 में श्योपुर ज़िले में भी इसी तरह का मामला सामने आ चुका है, जहाँ बच्चों को कागज़ पर भोजन परोसा गया था। यानी यह कोई एकल घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था में मौजूद खामी का संकेत है।
सरकार पोषण, शिक्षा और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती। बच्चों को सम्मान के साथ भोजन मिलना कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि उनका अधिकार है। ऐसे मामलों में केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरे तंत्र की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
गणतंत्र दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर सामने आई यह घटना सरकार और प्रशासन के लिए आत्ममंथन का विषय है। सवाल यही है कि जब तक ऐसी घटनाओं पर स्थायी और ठोस सुधार नहीं होंगे, तब तक योजनाओं के उद्देश्य और ज़मीनी सच्चाई के बीच की खाई कैसे पाटी जाएगी।