18/02/2026
राष्ट्रीय कवि संगम के संरक्षक, राष्ट्रीय गोरक्षा वाहिनी गौसेवा संघ के राष्ट्रीय सरंक्षक ,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक ,राष्ट्र समर्पित, सामाजिक समरसता के शिल्पी, बहुआयामी व्यक्तित्व डॉ. इंद्रेश कुमार जीको जन्मदिवस पर स्वस्थ और यशस्वी जीवन के लिए अनंत शुभकामनाएं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) केवल एक संगठन नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण की एक अनवरत चलने वाली कार्यशाला है। इस कार्यशाला से निकले अनगिनत तपस्वियों में एक प्रमुख नाम इंद्रेश कुमार जी का है। उनका जीवन एक ऐसी यात्रा है जहाँ निजी महत्त्वाकांक्षाओं का पूर्ण विसर्जन है और राष्ट्रहित सर्वोपरि है। इस फलक पर उनके जीवन के त्याग और तपस्या के पहलुओं को समझना वास्तव में आधुनिक भारत के एक कर्मयोगी को समझने जैसा है।
त्याग की पृष्ठभूमि,वैभव से वैराग्य तक।
एक मेधावी छात्र के रूप में उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। उस समय,एक इंजीनियर के लिए करियर के असीमित अवसर थे, सुख-सुविधाओं भरा जीवन था और समाज में प्रतिष्ठा थी। लेकिन उनके भीतर राष्ट्र के प्रति कुछ बड़ा करने की तड़प थी।
उन्होंने अपने कैरियर और पारिवारिक सुखों का मोह त्यागकर संघ के 'प्रचारक' के रूप में जीवन जीने का कठिन निर्णय लिया। प्रचारक बनने का अर्थ है—अपना कोई घर न होना,कोई बैंक बैलेंस न होना और पूरा जीवन समाज के चरणों में अर्पित कर देना। यह उनके जीवन का पहला और सबसे बड़ा 'त्याग' था।
तपस्या के कठिन वर्ष
इंद्रेश जी की तपस्या का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव उनका जम्मू-कश्मीर में बिताया गया समय है। जब घाटी में अलगाववाद और आतंकवाद चरम पर था, तब उन्होंने वहां संघ के कार्य को विस्तार दिया। एक ऐसे क्षेत्र में जहाँ राष्ट्रवाद की बात करना जान जोखिम में डालना था,वहां उन्होंने 'राष्ट्र प्रथम' का मंत्र फूंका।
उनकी तपस्या का स्वरूप केवल शारीरिक श्रम नहीं था, बल्कि वैचारिक संघर्ष भी था। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में,बिना किसी सुरक्षा के, दुर्गम पहाड़ियों और संवेदनशील इलाकों की यात्राएं कीं। उनका उद्देश्य केवल हिंदुओं को संगठित करना नहीं था,बल्कि कश्मीर के हर नागरिक को भारत की मुख्यधारा से जोड़ना था।
सामाजिक समरसता की अनूठी पहल
इंद्रेश कुमार जी के जीवन का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक समरसता को समर्पित रहा है। उन्होंने महसूस किया कि भारत की एकता तब तक पूर्ण नहीं हो सकती जब तक अल्पसंख्यक समुदाय के मन से भय और अलगाव की भावना दूर न हो। इसी उद्देश्य से उन्होंने 'मुस्लिम राष्ट्रीय मंच' (MRM) की नींव रखने में मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।
यह कार्य किसी कठोर तपस्या से