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वरिष्ठ आईएएस अधिकारी श्री रविन्द्र को राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद का अतिरिक्त प्रभार, कृषि क्षेत्र को मिलेगी नई गतितहल...
04/08/2026

वरिष्ठ आईएएस अधिकारी श्री रविन्द्र को राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद का अतिरिक्त प्रभार, कृषि क्षेत्र को मिलेगी नई गति

तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश शासन ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एवं कृषि प्रशासन के अनुभवी अधिकारी श्री रविन्द्र (आईएएस, 1999 बैच) को एक और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपते हुए निदेशक, राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद, उत्तर प्रदेश का अतिरिक्त प्रभार दिया है। वह अपने वर्तमान पद प्रमुख सचिव, कृषि, कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान, कृषि विपणन, कृषि विदेश व्यापार तथा निर्यात प्रोत्साहन विभाग के साथ यह नई जिम्मेदारी भी निभाएंगे।

शासन का यह निर्णय ऐसे समय में आया है, जब प्रदेश में कृषि क्षेत्र के आधुनिकीकरण, किसानों की आय बढ़ाने, कृषि उत्पादों के बेहतर विपणन और निर्यात को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि श्री रविन्द्र के प्रशासनिक अनुभव और कार्यशैली का लाभ अब राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद को भी मिलेगा।

प्रशासनिक अनुभव से भरपूर अधिकारी

श्री रविन्द्र भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के वर्ष 1999 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी हैं। वे अपनी सादगी, पारदर्शी कार्यशैली, तेज निर्णय क्षमता तथा परिणामोन्मुख प्रशासन के लिए जाने जाते हैं। प्रशासनिक सेवा में आने से पहले वे चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) रहे तथा लोक प्रशासन में उच्च शिक्षा प्राप्त की।

इन जिलों में रहे जिलाधिकारी

अपने प्रशासनिक जीवन में उन्होंने कई महत्वपूर्ण जनपदों में जिलाधिकारी एवं जिला मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य किया—

कुशीनगर (19 जून 2004 – 16 दिसंबर 2004)
संत रविदास नगर (भदोही) (16 दिसंबर 2004 – 4 जून 2005)
महोबा (4 जून 2005 – 27 अप्रैल 2006)
औरैया (28 अप्रैल 2006 – 22 मई 2007)
बाराबंकी (16 अक्टूबर 2007 – 31 जुलाई 2008)
वाराणसी (8 फरवरी 2010 – 31 मार्च 2012)

इन जिलों में उन्होंने कानून-व्यवस्था, विकास कार्यों, ग्रामीण योजनाओं, राजस्व प्रशासन तथा जनहित से जुड़े अनेक कार्यों में प्रभावी नेतृत्व दिया।

महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्व

जिलाधिकारी के अलावा उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दीं, जिनमें—

मंडलायुक्त, वाराणसी
मंडलायुक्त, अलीगढ़

भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में निदेशक एवं संयुक्त सचिव स्तर की जिम्मेदारियां
सचिव, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, उत्तर प्रदेश
वर्तमान में प्रमुख सचिव, कृषि विभाग सहित कई महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व
कृषि क्षेत्र में व्यापक अनुभव

श्री रविन्द्र ने कृषि नीति, कृषि अनुसंधान, कृषि शिक्षा, कृषि विपणन, निर्यात संवर्धन तथा किसानों की आय बढ़ाने से जुड़े विषयों पर प्रभावी कार्य किया है। उनका विशेष जोर कृषि को आधुनिक तकनीक से जोड़ने, कृषि उत्पादों की बेहतर मार्केटिंग, वैल्यू एडिशन, कृषि निर्यात को बढ़ावा देने तथा किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने पर रहा है।

मंडी परिषद को मिलेगा नया नेतृत्व

राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद किसानों और कृषि व्यापारियों के बीच सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है। इसके माध्यम से किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य, पारदर्शी मंडी व्यवस्था तथा आधुनिक विपणन सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

श्री रविन्द्र को इस संस्था का अतिरिक्त प्रभार दिए जाने से कृषि विभाग और मंडी परिषद के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होने की उम्मीद है। इससे प्रदेश की मंडियों के आधुनिकीकरण, डिजिटल सेवाओं के विस्तार, कृषि व्यापार को गति देने तथा किसानों को अधिक सुविधाएं उपलब्ध कराने में मदद मिलने की संभावना है।

शासन की बड़ी पहल

प्रदेश सरकार का यह निर्णय कृषि क्षेत्र में सुशासन, पारदर्शिता और प्रभावी प्रशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। प्रशासनिक अनुभव, वित्तीय प्रबंधन की समझ और विकासोन्मुख दृष्टिकोण रखने वाले श्री रविन्द्र से उम्मीद की जा रही है कि वे अपनी नई जिम्मेदारी में भी प्रदेश की कृषि व्यवस्था को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

IAS Association
Drishti IAS
MYogiAdityanath



tahalkatoday.com/ias-ravindra-a…

30/07/2026

🚨 क्या 4 करोड़ लेकर मस्जिद खोद दी गई?
क्या वक्फ मंत्री, पुरातत्व विभाग और यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की मिलीभगत से तहसीन चौक की ऐतिहासिक मस्जिद पर किया टुडे कबाबी ने ये खराब काम ?

आफताब-ए-शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी साहब ने वीडियो जारी कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से तत्काल सख्त कार्रवाई की मांग की है।

❓सच है? गंभीर मामला हैं?

पूरा वीडियो देखें, अपनी राय कमेंट में लिखें और इस मुद्दे को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए शेयर करें।

🌀 *तहलका टुडे* 🌀*जब 5,000 औकाफ़ पुकारते रहे, तब ख़ामोश रही सपा अल्पसंख्यक सभा...**जौहर यूनिवर्सिटी की नोटिस आई तो खुल गई...
27/07/2026

🌀 *तहलका टुडे* 🌀

*जब 5,000 औकाफ़ पुकारते रहे, तब ख़ामोश रही सपा अल्पसंख्यक सभा...*

*जौहर यूनिवर्सिटी की नोटिस आई तो खुल गई सियासत की आँख!*

*दस लाख मुस्लिम आबादी वाले बाराबंकी में इंतिखाब आलम नोमानी के ज्ञापन में सिर्फ 2.5 दर्जन फोटो खिंचवाने वाली की रही चर्चा |*

*हसनैन मुस्तफा की रिपोर्ट पढ़ने के लिए क्लिक कीजिये*

https://www.tahalkaindia.in/2026/07/5000-25.html

*तहलका टुडे टीम/हसनैन मुस्तफ़ा*

बाराबंकी। कहते हैं राजनीति जनता की नब्ज़ पहचानती है। लेकिन बाराबंकी में इन दिनों लोग पूछ रहे हैं—क्या राजनीति अब दर्द नहीं, सिर्फ़ मुद्दे पहचानती है?

जनपद में वर्षों से लगभग 5,000 औकाफ़ संपत्तियों पर कथित अवैध कब्ज़ों, कब्रिस्तानों और करबला की ज़मीनों को लेकर सवाल उठते रहे। अदालतों के दरवाज़े खटखटाए गए, सामाजिक संगठनों ने आवाज़ बुलंद की, लेकिन समाजवादी पार्टी की अल्पसंख्यक सभा की ओर से न कोई बड़ा धरना हुआ, न कोई प्रदर्शन और न ही जिलाधिकारी कार्यालय तक कोई व्यापक जनआंदोलन देखने को मिला।

लेकिन जैसे ही पूर्व मंत्री आज़म ख़ान के ड्रीम प्रोजेक्ट मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के 38 ब्लॉकों को लेकर सरकारी नोटिस की चर्चा हुई, बाराबंकी में समाजवादी पार्टी का अल्पसंख्यक संगठन सक्रिय हो गया।

*इंतिखाब आलम नोमानी पहुँचे डीएम कार्यालय*

सपा अल्पसंख्यक सभा के जिलाध्यक्ष इंतिखाब आलम नोमानी अपनी टीम के साथ जिलाधिकारी कार्यालय पहुँचे और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को संबोधित ज्ञापन सौंपते हुए जौहर यूनिवर्सिटी के विरुद्ध कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की।

उनके साथ हुमायूं नईम खान, हिमांशु यादव, नसीम कीर्ति, कामता प्रसाद यादव, विजय कुमार यादव, अजय कुमार वर्मा (बब्लू), प्रद्युम्न यादव, जितेन्द्र पटेल, क्यूम प्रधान, मोहम्मद अकरम अंसारी, अब्दुल रहीम, परवेज अहमद, सीतासरन यादव, रामशंकर यादव, राजेन्द्र यादव और फैसल अंसारी सहित अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे।

इसके बाद पार्टी कार्यालय में इंतिखाब आलम नोमानी का माल्यार्पण कर सम्मान किया गया और जौहर यूनिवर्सिटी बचाने के अभियान में उनके प्रयासों की सराहना की गई।

लेकिन शहर की चर्चा कुछ और रही...
बाराबंकी की मुस्लिम मोहल्लों की चाय की दुकानों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक एक ही सवाल सुनाई दिया—

*"दस लाख मुस्लिम आबादी वाले जिले में विरोध के लिए इतने कम लोग क्यों पहुँचे?"*

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा रही कि जिले के मुस्लिम विधायक फरीद महफूज़ किदवई कार्यक्रम में दिखाई नहीं दिए। वहीं पार्टी के कई प्रवक्ता, चेयरमैन, ब्लॉक प्रमुख, प्रधान और अन्य प्रभावशाली स्थानीय नेता भी इस विरोध प्रदर्शन से दूर रहे।

*सबसे बड़ा सवाल...*

जिस बाराबंकी में औकाफ़ की ज़मीनों को बचाने के लिए वर्षों तक कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ...

जिस बाराबंकी में कब्रिस्तान और करबला की ज़मीनों पर उठते अतिक्रमण के सवालों पर अल्पसंख्यक सभा की ओर से व्यापक जनआंदोलन देखने को नहीं मिला...

उसी बाराबंकी में जौहर यूनिवर्सिटी के मुद्दे पर अचानक इतनी राजनीतिक सक्रियता क्यों?

*क्या औकाफ़ की ज़मीनें अल्पसंख्यकों का मुद्दा नहीं थीं?*

*क्या कब्रिस्तान और करबला संविधान के दायरे से बाहर हैं?*

*क्या पाँच हज़ार औकाफ़ की पीड़ा, 38 ब्लॉकों से कम महत्वपूर्ण थी?*

चाय वाले की दुकान पर एक बात...
एक बुज़ुर्ग ने चाय की दुकान पर मुस्कुराते हुए कहा—

*"साहब, अब सियासत वहाँ नहीं जाती जहाँ औक़ाफ़ को ज़मीन बचानी हो... वहाँ जाती है जहाँ सुर्खियाँ बननी हों।"*

और शायद यही वाक्य आज बाराबंकी की राजनीति का सबसे बड़ा तफरीह का सबब बन गया है।






















Akhilesh Yadav
Samajwadi Party
Farid Mahfooz Faraz Uddin Kidwai
SP Congress Barabanki
Barabanki Fever
Lucknow News18 India
Tahalka TODAY

📢 Call to Action

"क्या आपको लगता है कि औकाफ़ की 5,000 संपत्तियों पर भी इसी तरह आंदोलन होना चाहिए था? अपनी राय कमेंट में ज़रूर लिखें। पोस्ट शेयर करें ताकि चर्चा हर घर तक पहुँचे।"

तहलका टुडे टीम/हसनैन मुस्तफ़ा बाराबंकी। कहते हैं राजनीति जनता की नब्ज़ पहचानती है। लेकिन बाराबंकी में इन दिनों लो.....

🌀 *तहलका टुडे* 🌀*जब वक्फ़ की ज़मीनें रोती रहीं... और सियासत जौहर यूनिवर्सिटी पर जाग उठी ,**बाराबंकी की सरज़मीं से उठता ए...
26/07/2026

🌀 *तहलका टुडे* 🌀

*जब वक्फ़ की ज़मीनें रोती रहीं... और सियासत जौहर यूनिवर्सिटी पर जाग उठी ,*

*बाराबंकी की सरज़मीं से उठता एक अनुत्तरित सवाल*

*वाह समाजवादी पार्टी वाह*

https://www.tahalkaindia.in/2026/07/blog-post_26.html

*तहलका टुडे टीम/मनोज शुक्ला*

बाराबंकी।पुराने शहरों की मिट्टी अजीब होती है। वह बोलती नहीं, लेकिन सब याद रखती है। किसने उसकी हिफाज़त की, किसने उसकी तरफ़ पीठ फेर ली, किसने उसकी विरासत को बचाया और किसने उसे वक्त के हवाले छोड़ दिया—धरती सबका हिसाब अपने सीने में लिखती रहती है।

*बाराबंकी की धरती भी बरसों से ऐसे ही सवाल अपने भीतर दबाए बैठी है।*

कब्रिस्तानों की दीवारें बूढ़ी हो चुकी हैं। करबला की मिट्टी आज भी अपने असली वारिसों को पुकारती है। औकाफ़ की कई ज़मीनें वर्षों से विवादों और कथित अतिक्रमण की कहानियाँ सुनाती हैं। दस्तावेज़ सरकारी अलमारियों में पड़े-पड़े पीले हो गए, लेकिन उन पर जमी धूल झाड़ने वाला कोई नहीं आया।

लोग कहते हैं कि जनपद में हजारों वक्फ़ संपत्तियाँ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। सवाल उठते रहे, शिकायतें होती रहीं, ज्ञापन दिए जाते रहे, मगर राजनीतिक मंचों पर इस दर्द की गूँज बहुत कम सुनाई दी।

*बाराबंकी की राजनीतिक स्मृतियों में एक और घटना दर्ज है। समाजवादी पार्टी के शासनकाल में तत्कालीन मंत्री आज़म ख़ान का हेलीकॉप्टर, जिसमें उस समय का गुनाह उत्तर प्रदेश शिया वक्फ़ बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष वसीम रिज़वी भी साथ था, बाराबंकी में गिरा था। उस घटना को आज भी लोग याद करते हैं। लेकिन आलोचक यह सवाल भी उठाते हैं कि जिस ज़मीन पर उस दिन पूरा गुनाह लिए गिरा था, उसी ज़िले में वक्फ़ संपत्तियों से जुड़े विवादों और कथित अतिक्रमणों पर उतनी राजनीतिक सक्रियता क्यों दिखाई नहीं दी।*

*समय बदला।*

और अब वही समाजवादी पार्टी मौलाना मोहम्मद जौहर अली यूनिवर्सिटी के 38 ब्लॉकों को तोड़े जाने के सरकारी नोटिस के विरोध में पूरी ताक़त से खड़ी दिखाई दे रही है।

संविधान-मानस्तंभ के दूसरे स्थापना दिवस पर जिला समाजवादी पार्टी कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय सचिव एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद कुमार सिंह गोप ने कहा कि संविधान देश के प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की गारंटी है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है और यदि जौहर यूनिवर्सिटी पर कार्रवाई हुई तो समाजवादी पार्टी बड़ा आंदोलन करेगी।

उन्होंने कार्यकर्ताओं से 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटने का आह्वान करते हुए कहा कि किसानों, छात्रों, गरीबों और वंचितों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा।

पूर्व कैबिनेट मंत्री राकेश वर्मा ने कहा कि समाजवादी सरकारों ने संविधान की भावना के अनुरूप कार्य किया, जबकि वर्तमान सरकार शिक्षा और सामाजिक अधिकारों को कमजोर कर रही है।

सदर विधायक धर्मराज सिंह उर्फ़ सुरेश यादव ने प्राथमिक विद्यालयों के बंद होने पर चिंता व्यक्त की। जैदपुर विधायक गौरव रावत ने संविधान की रक्षा के लिए समाज को एकजुट रहने की बात कही। जिलाध्यक्ष हाफिज़ अयाज़ अहमद ने संविधान को लोकतंत्र की सबसे बड़ी ढाल बताते हुए उसकी रक्षा का संकल्प दोहराया।

सभा समाप्त हुई। तालियाँ थम गईं। कुर्सियाँ खाली हो गईं। नेता अपने-अपने काफ़िलों के साथ लौट गए।

*लेकिन बाराबंकी की हवा में एक सवाल अब भी तैरता रहा।*

यदि संविधान हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा करता है, तो क्या वक्फ़ की ज़मीनें संविधान के दायरे से बाहर हैं?

यदि जौहर यूनिवर्सिटी की दीवारों के लिए आंदोलन हो सकता है, तो क्या कब्रिस्तान, करबला और वर्षों से विवादों में घिरी वक्फ़ संपत्तियाँ आंदोलन के योग्य नहीं हैं?

राजनीति की विश्वसनीयता केवल भाषणों से नहीं बनती, बल्कि उस समान संवेदना से बनती है जो हर पीड़ित तक पहुँचे।

*बाराबंकी आज यही पूछ रहा है—*

*जिस सरज़मीं पर कभी सत्ता का हेलीकॉप्टर गिरा था वक्फ के गुनाह गार के साथ, क्या उसी सरज़मीं पर बिखरती वक्फ़ की विरासत किसी आंदोलन की हक़दार नहीं थी?*

*शायद इतिहास का सबसे कठिन सवाल यही होता है कि नेता किसके लिए बोले, और किसकी ख़ामोशी को अपनी राजनीति का हिस्सा बना लिया।*

*और इतिहास का न्यायालय गवाहों से नहीं, समय की ख़ामोश ज़मीनों से फैसला लिखवाता है।*

तहलका टुडे टीम/मनोज शुक्ला बाराबंकी। पुराने शहरों की मिट्टी अजीब होती है। वह बोलती नहीं, लेकिन सब याद रखती है। किस.....

25/07/2026
25/07/2026


23/07/2026

🔴 AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी का सरकार पर तीखा हमला!

"आप छोटे बच्चों को बुलाकर बेइज्जत करते हैं, उनसे बात करना सीखिए" संसद में गरजते हुए ओवैसी ने सरकार को घेरा और कहा कि अपनी गलतियों का ठीकरा विपक्ष पर मत फोड़िए।
ओवैसी ने साफ कहा "आप बड़ी मेजोरिटी के दम पर हमें दबा नहीं पाएंगे, आप इसे कम आंक रहे हैं।"

क्या आप ओवैसी की बात से सहमत हैं? कमेंट में बताएं 👇
📌 पूरा वीडियो देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें

नजफ़-ए-हिंद, जोगीपुरा जहाँ मौला अली (अ.स.) की याद ने एक गाँव को अमर कर दियाएक वक्फ़नामे, एक करामत और एक खानदान की चार सौ...
20/07/2026

नजफ़-ए-हिंद, जोगीपुरा
जहाँ मौला अली (अ.स.) की याद ने एक गाँव को अमर कर दिया
एक वक्फ़नामे, एक करामत और एक खानदान की चार सौ साल की दास्तान
"जायदादें वारिसों में बँट जाती हैं, लेकिन अमानतें सदियों तक इंसानियत की हो जाती हैं..."

सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा

हिंदुस्तान की धरती पर न जाने कितने शहर बने, कितने उजड़े, कितनी सल्तनतें आईं और चली गईं। बादशाहों के महल मिट्टी हो गए, फौजों के निशान इतिहास के पन्नों में खो गए। लेकिन कुछ जगहें ऐसी होती हैं जिन्हें न तलवार मिटा सकती है, न वक्त।

बिजनौर की धरती पर बसा अहमदपुर सादात उर्फ़ जोगीपुरा भी ऐसी ही एक जगह है।

यह केवल एक गाँव नहीं।

यह केवल एक दरगाह नहीं।

यह केवल एक मजार नहीं।

यह एक ऐसी रूहानी अमानत है, जिसे स्थानीय परंपरा में "नजफ़-ए-हिंद" कहा गया—क्योंकि लोगों की आस्था के अनुसार यह स्थान हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) की याद, उनकी करामत और उनके नाम से जुड़ी एक मुबारक निशानी का केंद्र बन गया।

जब मुग़ल सल्तनत काँप उठी

सन 1657।

दिल्ली और आगरा का लाल किला बेचैन था।

खबर फैल गई—

"बादशाह शाहजहाँ का इंतिकाल हो गया।"

हालाँकि वे जीवित थे, लेकिन बीमारी ने पूरे मुल्क में अफ़वाह फैला दी।

चारों शहज़ादे तख़्त के लिए निकल पड़े।

खून का रिश्ता...

ताज के सामने छोटा पड़ गया।

एक भाई ने दूसरे भाई पर तलवार उठाई।

आख़िरकार औरंगज़ेब जीत गया।

उसने अपने पिता शाहजहाँ को ही आगरा के किले में क़ैद कर दिया।

जो कल तक बादशाह के वफ़ादार थे...

आज मौत की सूची में थे।

एक वफ़ादार जिसने ताज नहीं, ज़मीर चुना

उन वफ़ादारों में एक नाम था—

सैयद राजू रहमतुल्लाह अलैह।

वह सत्ता का आदमी नहीं था।

वह वफ़ा का आदमी था।

उसे मालूम था—

अब दिल्ली में उसके लिए जगह नहीं बची।

वह अपने पुश्तैनी गाँव...

जोगी रामपुरा (वर्तमान जोगीपुरा) लौट आया।

गाँव वालों ने उसे छिपा लिया।

दिन में जंगल...

रात में दुआ...

यही उसकी ज़िंदगी बन गई।

जंगल में उठती एक पुकार

हर रात...

घने जंगल में...

एक अकेली आवाज़ गूँजती—

"नाद-ए-अली..."

"या अली अद्रिकनी..."

पेड़ सुनते।

हवा सुनती।

सितारे सुनते।

और शायद...

आसमान भी सुनता था।

बूढ़ा ब्राह्मण

एक सुबह...

एक वृद्ध ब्राह्मण घास काट रहा था।

उम्र इतनी कि आँखें साथ छोड़ चुकी थीं।

अचानक...

घोड़े की टाप सुनाई दी।

उसने सिर उठाया।

एक नूरानी सवार सामने खड़ा था।

उसने पूछा—

"राजू कहाँ है... जो मुझे हर रोज़ पुकारता है?"

बूढ़ा काँप गया।

कहा—

"मालिक...

मैं तो ठीक से देख भी नहीं सकता...

जंगल तक कैसे जाऊँ?"

इतना सुनना था कि उसकी आँखों में रोशनी लौट आई।

जिस्म में ताक़त आ गई।

सवार ने मुस्कुराकर कहा—

"अब जाओ... उसे कहो... मैं आया हूँ।"

सात दिन की प्रतीक्षा

राजू दादा दौड़ पड़े।

गाँव वाले भी पीछे।

जब वह पहुँचे...

तो कोई दिखाई नहीं दिया।

लेकिन...

घोड़े के खुरों के निशान मिट्टी पर मौजूद थे।

राजू दादा उसी जगह बैठ गए।

उन्होंने खाना छोड़ दिया।

पानी छोड़ दिया।

सिर्फ़ एक आवाज़...

"या अली..."

एक दिन...

दो दिन...

तीन दिन...

सात दिन...

बशारत

सातवीं रात...

रूहानी सुकून उतरा।

स्थानीय परंपरा के अनुसार, हज़रत अली (अ.) ने राजू दादा को बशारत दी—

"डरो मत... औरंगज़ेब तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।"

राजू दादा रो पड़े।

उन्होंने कहा—

"मौला...

मेरे लिए कुछ नहीं चाहिए...

मेरी कौम के लिए कोई ऐसी निशानी छोड़ जाइए...

जो सदियों तक लोगों के काम आए।"

चश्मा

कहा जाता है...

उसी क्षण...

धरती फटी।

उसमें से पानी निकला।

मीठा...

ठंडा...

शफ़ा देने वाला।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, वहीं एक समय दूध जैसा चश्मा भी प्रकट हुआ था।

लोग दूर-दूर से आने लगे।

कोई पानी लेकर जाता।

कोई मिट्टी।

कोई दुआ।

कोई उम्मीद।

बारगाह

जहाँ वह मुबारक निशानी थी...

वहीं एक बारगाह-ए-अलवी बनी।

फिर मस्जिद बनी।

फिर इमामबाड़ा।

फिर मेहमानख़ाना।

फिर ज़ायरीन के मकान।

और जब सैयद राजू रहमतुल्लाह अलैह का विसाल हुआ...

तो उसी बाग़ में उनकी मजार बनाई गई।

ढाई सौ साल बाद

समय बीत गया।

मुग़ल खत्म हो गए।

अंग्रेज़ आ गए।

लेकिन दरगाह आबाद रही।

चश्मा बहता रहा।

मजलिसें होती रहीं।

मुसाफ़िर आते रहे।

20 अप्रैल 1931

उस दिन...

एक ऐसा फैसला हुआ...

जिसने जोगीपुरा को हमेशा के लिए बदल दिया।

सैयद नज़र अब्बास और पूरे खानदान ने कहा—

"यह दरगाह हमारी नहीं है।

यह हमारी औलाद की भी नहीं है।

यह अल्लाह की अमानत है।"

उन्होंने—

दरगाह...

मस्जिद...

इमामबाड़ा...

मेहमानख़ाना...

मजार...

बाग़...

ज़ायरीन के मकान...

लगभग 6 बीघा से अधिक वक्फ़ी भूमि...

सब कुछ वक्फ़ अलल औलाद फ़ी सबीलिल्लाह कर दिया।

उन्होंने साफ़ लिखा—

कोई इसे बेचेगा नहीं।

कोई गिरवी नहीं रखेगा।

कोई हिबा नहीं करेगा।

मुतवल्ली मालिक नहीं होगा।

वह केवल अमानतदार होगा।

क्यों किया गया वक्फ़?

उन्होंने इसलिए वक्फ़ नहीं किया कि ज़मीन बच जाए।

उन्होंने इसलिए वक्फ़ किया...

कि करामत की निशानी बची रहे।

चश्मा बचा रहे।

बारगाह बची रहे।

मजार बची रहे।

गरीब का खाना चलता रहे।

मुसाफ़िर का बिस्तर बिछा रहे।

मजलिसें होती रहें।

और आने वाली नस्लें यह न कह सकें—

"यह हमारी जायदाद है।"

बल्कि कहें—

"यह हमारी अमानत है।"

आज...

जब कोई जोगीपुरा की उस पुरानी बारगाह में दाख़िल होता है...

तो वह सिर्फ़ एक इमारत नहीं देखता।

वह चार सदियों की दास्तान देखता है।

एक वफ़ादार सैयद की वफ़ा...

एक बूढ़े ब्राह्मण की गवाही...

एक रूहानी करामत की लोक-परंपरा...

एक चश्मे की ठंडक...

एक मजार की ख़ामोशी...

और 1931 के उस वक्फ़नामे की स्याही...

जो आज भी कहती है—

**"जायदादें इंसानों की होती हैं...

लेकिन अमानतें अल्लाह की होती हैं।

जिसने अमानत को जायदाद बना लिया...

उसने इतिहास नहीं, अपना ज़मीर खो दिया।"**

यही जोगीपुरा है।

यही उसकी पहचान है।

और इसी वजह से श्रद्धा रखने वाले लोग उसे प्रेम से "नजफ़-ए-हिंद" कहते हैं।

आगे भी पढ़ते रहिए.........

हिंदुस्तान की धरती पर न जाने कितने शहर बने, कितने उजड़े, कितनी सल्तनतें आईं और चली गईं। बादशाहों के महल मिट्टी हो गए...

20/07/2026

लखनऊ से बड़ी लखनऊ से बड़ी खबर: बीजेपी नेता मोहसिन रज़ा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बताया कि उत्तर प्रदेश की पंजीकृत वक्फ संपत्तियाँ 2 लाख से घटकर सिर्फ 1.27 लाख रह गईं। पिछले 20–25 साल में कोई ऑडिट नहीं हुआ। आरोप: वक्फ संपत्तियों में हजारों करोड़ रुपये का गबन।
क्या यह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक है या बड़े पैमाने पर घोटाला? पारदर्शिता और तुरंत जांच की माँग क्यों जरूरी है — आपकी राय बताएँ, शेयर करें और टैग करें उन लोगों को जिन्हें यह खबर जाननी चाहिए।
#वक्फघोटाला #लखनऊ #वक्फ को बताया कि उत्तर प्रदेश की पंजीकृत वक्फ संपत्तियाँ 2 लाख से घटकर सिर्फ 1.27 लाख रह गईं। पिछले 20–25 साल में कोई ऑडिट नहीं हुआ। आरोप : वक्फ संपत्तियों में हजारों करोड़ रुपये का गबन।
क्या यह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक है या बड़े पैमाने पर घोटाला? पारदर्शिता और तुरंत जांच की माँग क्यों जरूरी है - आपकी राय बताएँ, शेयर करें और टैग करें उन लोगों को जिन्हें यह खबर जाननी चाहिए।
#वक्फघोटाला #लखनऊ #वक्फ

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