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1942 की क्रांति: सूर्यानंद अखौरी को 24 अगस्त को लेस्लीगंज में गिरफ्तार किया गया था --------------------------------नौ अग...
24/08/2026

1942 की क्रांति: सूर्यानंद अखौरी को 24 अगस्त को लेस्लीगंज में गिरफ्तार किया गया था
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नौ अगस्त 1942 से शुरू हुए अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का असर पलामू के ग्रामीण क्षेत्रों में भी फैलने लगा था। लेस्लीगंज (आज का नीलांबर पीतांबर पुर) भी इससे अछूता नहीं रहा। यहां के लोगों का नेतृत्व पांकी प्रखंड के डंडार कला निवासी सूर्यानंद अखौरी कर रहे थे। लेस्लीगंज थाने में सात कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पकड़ कर रखा गया था। सूर्यानंद अखौरी के नेतृत्व में आंदोलनकारियो ने कार्यकर्ताओं को छुड़ाने का प्रयास किया। डालटनगंज के आए सशस्त्र दल ने इन लोगों को भगा दिया और सूर्यानंद अखौरी सहित कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया। वे डालटनगंज व हजारीबाग में करीब डेढ़ साल तक जेल में रहे।
सूर्यानंद अखौरी के त्याग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस समय वे जेल में थे उसी समय उनके पहले बेटे का जन्म हुआ था। जब वह बीमार पड़ा तो तात्कालिक उचित इलाज की व्यवस्था नहीं होने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। बाद में शोक में डूबी उनकी पत्नी की भी मौत हो गई। इन दो हृदय विदारक घटनाओं के बाद भी सूर्यानंद अखौरी का मनोबल नहीं टूटा। वह सजा पूरी करने के बाद ही रिहा हुए।
उनका जन्म पलामू जिले के पांकी प्रखंड के डंडार कला ग्राम में 10 सितंबर 1907 को हुआ था इनके पिता का नाम अखौरी गोखुलानंद और माता का नाम श्रीमती अनारकली देवी था। इनके पिता अंग्रेजी हुकुमत के दारोगा थे, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि मात्र 11 साल की उम्र में ही इनके ऊपर दे पिता का साया उठ गया। अब इनके लालन पालन की सारी जिम्मेवारी माँ पर ही आई, जो बिलकुल ही अशिक्षित थी। इनके बड़े‌ भाई का नाम मंगलानंद अखौरी था जो इनसे तीन साल बड़े थे। इनकी स्कूली शिक्षा डालटनगंज में हुई। मैट्रिक की परीक्षा पास करके वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी चले गये । वहाँ के उन्होंने आईए पास किया। उस समय वहाँ के प्राचार्य महामना पंडित मदन मोहन मालवीय थे। इसी बीच देश में गाँधी जी का आन्दोलन चल रहा था। वे आन्दोलन में हिस्सा लेने लगे तथा अंग्रेजी अत्याचार के विरुद्ध लोगों को जागृत करने लगे। जगह - जगह सभाएँ करके अंग्रेजी हुकुमत की त्रुटियों से लोगों
को अवगत कराने लगे।
वे दस साल तक पलामू जिले के डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के उपाध्यक्ष रहे। इसी बीच उन्होंने गांव में सड़क का निर्माण करवाया। पहले गांव के लोगों को मेन जगह में आने के लिए पगडंडी का सहारा लेना पड़ता था। डंडार कला गांव में न कोई विद्यालय था और न ही कोई अस्पताल इन्होंने ही अपने कार्यकाल में एक प्राइमरी विद्यालय की स्थापना की व एक आयुर्वेदिक दवाखाना भी खुलवाया। अब गांव के लोगों के लिए अपनी छोटी बीमारियों के लिए चार मील पैदल चलकर नहीं जाना पड़ता था। अपने इन कार्यों के लिए वे गांव में काफी प्रसिद्ध हो चुके थे।
उनकी दूसरी शादी 1949 में हुई। इनकी पत्नी को नाम श्रीमती विद्याधारी देवी था। जिससे उनकी सात बेटियाँ व एक बेटा हैं। बेटे अच्युतानंद अखौरी मेदिनीनगर कोर्ट में वकालत करते है। उनकी पहली बेटी शकुंतला कुमारी हैं, जो पटना में विवाहित है। इनके पति जी अजित कुमार प्रमाद पुरातत्व विभाग के निदेशक से अवकाश प्राप्त कर चुके है। दूसरी लड़की शैल अखौरी हैं जो रांची में रहती हैं। उनकी तीसरी लड़की सुमन अखौरी, चौथी लड़की कामिनी कुमारी, पांचवी लड़‌की सुनीता अखौरी, छठी लड़की संगीता कुमारी और सातवी लड़की शैलजा अखौरी हैं।
सूर्यानंद अखौरी को स्वतंत्रता के पच्चीसवें वर्ष के अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम में स्मरणीय योगगदान के लिए राष्ट्र की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र भेंट किया था। दो जनवरी 1982 में उनका निधन रांची में हो गया। उनकी स्मृति में पांकी सह अंचल कार्यालय परिसर में शिलापट्ट लगाया गया है लेकिन आज जर्जर हालत में है।

स्कंद पुराण के रेवा खंड में भगवान श्रीमन नारायण (सत्यनारायण) की पूजा और व्रत कथा का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह कथा महर्ष...
23/08/2026

स्कंद पुराण के रेवा खंड में भगवान श्रीमन नारायण (सत्यनारायण) की पूजा और व्रत कथा का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह कथा महर्षि व्यास द्वारा रचित है, जिसमें महर्षि सूत जी नैमिषारण्य क्षेत्र में ऋषियों को भगवान सत्यनारायण के प्राकट्य और उनके महात्म्य के बारे में बताते हैं।

सत्यनारायण व्रत के मूल प्राकट्य से जुड़ी पूरी कथा और घटनाक्रम इस प्रकार है:

1. देवर्षि नारद का संशय और भगवान विष्णु का समाधान
एक बार देवर्षि नारद लोक-कल्याण की इच्छा से मृत्युलोक (पृथ्वी) पर भ्रमण कर रहे थे। वहाँ उन्होंने देखा कि मनुष्य अपने-अपने कर्मों के अनुसार अनेक प्रकार के दुखों, बीमारियों और कष्टों से पीड़ित हैं।

जीवों के कष्टों को देखकर नारद जी का हृदय द्रवित हो गया। वे तुरंत क्षीरसागर पहुँचे और भगवान श्रीहरि विष्णु की स्तुति करते हुए बोले— "हे प्रभु! पृथ्वीलोक पर मनुष्य अपने पाप कर्मों और अज्ञानता के कारण अनेक कष्ट भोग रहे हैं। कृपया कोई ऐसा सरल और सुलभ उपाय बताइए, जिससे मनुष्य को अल्प प्रयास में ही दुखों से मुक्ति मिले और उसे सब सुख प्राप्त हों।"

2. भगवान सत्यनारायण का प्राकट्य
नारद जी की बात सुनकर भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले— "हे नारद! तुमने प्राणिमात्र के कल्याण के लिए अत्यंत उत्तम प्रश्न पूछा है। स्वर्ग और मृत्युलोक में एक ऐसा दुर्लभ और परम पवित्र व्रत है, जिसे करने से मनुष्य तुरंत दुखों से मुक्त हो जाता है। वह है— 'भगवान सत्यनारायण का व्रत'।"

भगवान ने बताया कि जो भी मनुष्य सत्य (भगवान) को ही परम परमेश्वर मानकर निष्ठा और श्रद्धा से यह पूजन करता है, उसे धन, धान्य, संतान और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

3. पूजा की विधि और नियम
भगवान विष्णु ने नारद जी को इस व्रत के नियम भी बताए:

यह व्रत किसी भी पूर्णिमा, संक्रांति, एकादशी या किसी भी शुभ दिन किया जा सकता है।

इसमें केले के पत्तों का मंडप बनाकर भगवान सत्यनारायण का पूजन किया जाता है।

प्रसाद में गेहूँ के आटे (या सूजी) को भूनकर उसमें शक्कर, केला, दूध, घी और तुलसी दल मिलाकर पंजरी तैयार की जाती है।

कथा सुनने के पश्चात आरती करके सभी में प्रसाद वितरित किया जाता है और स्वयं भी प्रसाद ग्रहण किया जाता है।

4. पृथ्वी लोक पर पहला आयोजन (शतानंद ब्राह्मण)
भगवान से यह ज्ञान प्राप्त करके नारद जी ने पृथ्वी पर इसका प्रचार किया।

काशी नगरी में 'शतानंद' नाम का एक अत्यंत भिक्षुक और दरिद्र ब्राह्मण रहता था। वह प्रतिदिन भोजन की तलाश में भटकता था। भगवान विष्णु ने स्वयं एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और शतानंद के पास जाकर पूछा कि वह इतना दुखी क्यों है। जब ब्राह्मण ने अपनी निर्धनता बताई, तब वृद्ध रूपी भगवान ने उसे सत्यनारायण व्रत की विधि बताई।

शतानंद ने पूर्ण श्रद्धा से अगले ही दिन यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसकी दरिद्रता दूर हो गई, वह धन-धान्य से संपन्न हुआ और अंत में वैकुंठ लोक को प्राप्त हुआ।

5. कथा का प्रसार (लकड़हारा और साधु वैश्य)

काष्ठविक्रेता (लकड़हारा): जब शतानंद ब्राह्मण अपने घर में सत्यनारायण पूजा कर रहे थे, तब एक वृद्ध लकड़हारा वहाँ आया। पूजा का प्रसाद ग्रहण करने और कथा सुनने के बाद उसने भी यह व्रत करने का संकल्प लिया। उस दिन लकड़ी बेचने पर उसे दोगुना धन मिला, जिससे उसने भगवान का पूजन किया और जीवनभर सुखी रहा।

साधु वैश्य और लीलावती-कलावती: इसके बाद यह कथा समाज के अन्य वर्गों में फैली। राजा उल्कामुख, साधु नाम के वैश्य व्यापारी और उसकी पुत्री कलावती ने इस व्रत के प्रभाव से संतान, धन और खोई हुई नाव/व्यापार को पुनः प्राप्त किया।

स्कंद पुराण के अनुसार, सत्यनारायण रूप का मूल संदेश यही है कि "सत्य" ही ईश्वर है। जो मनुष्य सत्य का आचरण करता है और भगवान के प्रति समर्पित रहता है, उसके जीवन के सभी संकट नष्ट हो जाते हैं।

देवी पुराण (श्रीमद्देवीभागवत पुराण) के सातवें स्कंध में भगवती सती के आत्मदाह और 51 शक्तिपीठों की उत्पत्ति का अत्यंत भावु...
22/08/2026

देवी पुराण (श्रीमद्देवीभागवत पुराण) के सातवें स्कंध में भगवती सती के आत्मदाह और 51 शक्तिपीठों की उत्पत्ति का अत्यंत भावुक और अलौकिक वर्णन मिलता है।

1. प्रजापति दक्ष का महायज्ञ और शिव का अपमान
प्रजापति दक्ष (माता सती के पिता) ने एक विशाल 'बृहस्पतिसर्व' नामक यज्ञ का आयोजन किया। दक्ष, भगवान शिव से द्वेष रखते थे, इसलिए उन्होंने इस यज्ञ में सभी देवताओं, ऋषियों और मुनियों को आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव और सती को निमंत्रण नहीं भेजा।

2. सती का पिता के घर गमन
जब माता सती ने आकाश मार्ग से देवताओं को अपनी पत्नियों सहित यज्ञ में जाते देखा, तो उन्होंने भी पिता के घर जाने की इच्छा प्रकट की। भगवान शिव ने बिना बुलाए जाने पर अपमान की आशंका जताई और सती को रोकने का प्रयास किया। परंतु, सती के अत्यधिक हठ करने पर शिव जी ने उन्हें अपने गणों के साथ जाने की अनुमति दे दी।

3. यज्ञ मंडप में अनादर और सती का आत्मदाह
पिता के घर पहुँचने पर सती ने देखा कि यज्ञ मंडप में भगवान शिव के लिए कोई स्थान या भाग नहीं रखा गया था। जब सती ने इसका कारण पूछा, तो दक्ष ने भगवान शिव के लिए अत्यंत कटु और अपमानजनक शब्द कहे।

पति के इस घोर अपमान को सती सहन न कर सकीं। उन्होंने कहा कि जिस शरीर ने शिव-निंदा सुनी है, वह शरीर अब धारण करने योग्य नहीं है। सती ने योगबल से अपनी ही देह में 'योगाग्नि' प्रकट की और स्वयं को उस अग्नि में भस्म कर दिया।

4. शिव का तांडव और सती का पार्थिव शरीर
सती के आत्मदाह की सूचना मिलते ही भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपनी जटा से 'वीरभद्र' को उत्पन्न किया, जिसने जाकर दक्ष के यज्ञ को विध्वंस कर दिया और दक्ष का वध कर दिया।

इसके बाद, वियोग से व्याकुल भगवान शिव सती के आंशिक रूप से जले हुए पार्थिव शरीर को अपने कंधों पर उठाकर संपूर्ण ब्रह्मांड में उन्मत्त होकर तांडव करने लगे। इससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा।

5. 51 शक्तिपीठों की उत्पत्ति
सृष्टि को प्रलय से बचाने और भगवान शिव का मोह-भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर को धीरे-धीरे काटना शुरू किया।

सती के शरीर के अंग, वस्त्र और आभूषण भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका आदि) के जिन-जिन 51 स्थानों पर गिरे, वे स्थान परम पवित्र 'शक्तिपीठ' कहलाए।

उदाहरण स्वरूप:

जहाँ सती की जीभ गिरी — ज्वालामुखी (हिमाचल प्रदेश)

जहाँ सती के नयन गिरे — नैना देवी (उत्तराखंड)

जहाँ सती का मस्तक/सिंदूर गिरा — कामाख्या (असम)

जहाँ सती के चरण गिरे — कालिकाट/कालीघाट (कोलकाता)

आध्यात्मिक संदेश
देवी पुराण के अनुसार, प्रत्येक शक्तिपीठ पर माता सती (भगवती) एक विशेष रूप में और उनके साथ भगवान शिव 'भैरव' के रूप में सदैव विराजमान रहते हैं। यह कथा सिखाती है कि अहंकार से किए गए कर्म (दक्ष का यज्ञ) का विनाश निश्चित है और भगवती तथा शिव का संबंध अजर-अमर है।

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🌿 "तेरह गुण ताम्बूल में, अवगुण केवल एक..." 🌿तेरह गुण ताम्बूल में, अवगुण केवल एक।सादर जाको भेंटिए, ताहि विदा कर देत।।भारत...
31/07/2026

🌿 "तेरह गुण ताम्बूल में, अवगुण केवल एक..." 🌿

तेरह गुण ताम्बूल में, अवगुण केवल एक।
सादर जाको भेंटिए, ताहि विदा कर देत।।

भारतीय संस्कृति में ताम्बूल (पान) केवल स्वाद की वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान, सद्भाव और आतिथ्य का प्रतीक रहा है।

लोकमान्यता है कि ताम्बूल में तेरह गुण हैं—
✔️ मुखशुद्धि
✔️ सुगंध
✔️ पाचन में सहायता
✔️ ताजगी
✔️ कंठ की मधुरता
✔️ कफ शमन
✔️ वात शमन
✔️ रुचिवर्धन
✔️ लार स्राव में वृद्धि
✔️ स्फूर्ति
✔️ हृदय प्रसन्नता
✔️ सम्मान का प्रतीक
✔️ भोजन का मंगलमय समापन

फिर भी कवि मुस्कुराते हुए कहते हैं कि इसका एक अवगुण भी है—
जिसे आदरपूर्वक ताम्बूल भेंट किया जाता है, उसे विनम्रतापूर्वक विदा भी कर दिया जाता है।

यह दोहा हमें याद दिलाता है कि हमारी परंपराओं में छोटी-सी वस्तु भी केवल वस्तु नहीं होती, बल्कि उसके पीछे शिष्टाचार, संस्कृति और जीवन-दर्शन छिपा होता है।

क्या आपने कभी किसी अतिथि को विदाई के समय पान भेंट करने की यह परंपरा देखी है? अपने अनुभव अवश्य साझा करें।
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 #स्वर्ग, नरक और हम #मृत्यु के बाद स्वर्ग मिले—इस आशा में मनुष्य जीवन भर कितने जतन करता है।  #कोई व्रत रखता है, कोई दान-...
28/07/2026

#स्वर्ग, नरक और हम

#मृत्यु के बाद स्वर्ग मिले—इस आशा में मनुष्य जीवन भर कितने जतन करता है।
#कोई व्रत रखता है, कोई दान-पुण्य करता है, कोई तीर्थों की यात्रा करता है, तो कोई भगवान से मन्नतें माँगता है।
#मानो स्वर्ग कोई नई हाउसिंग सोसायटी हो और वहाँ एक छोटा-सा फ्लैट पाने के लिए पुण्य अंक जमा करने पड़ते हों।

लेकिन कभी एक पल ठहरकर यह भी सोचिए...

क्या हो, यदि हम पहले से ही स्वर्ग में रह रहे हों?

सुबह उठिए और अपने चारों ओर नज़र दौड़ाइए।

एक बटन दबाते ही अंधेरा उजाले में बदल जाता है।

दूसरा बटन दबाते ही पंखा चलने लगता है।

तीसरा दबाते ही ठंडी हवा कमरा भर देती है।

नल खोलते ही पानी बहने लगता है।

गैस जलाते ही कुछ ही मिनटों में भोजन तैयार हो जाता है।

जेब से मोबाइल निकाला और पूरी दुनिया आपकी हथेली पर आ गई।

हज़ारों किलोमीटर दूर बैठा अपना कोई प्रिय व्यक्ति कुछ ही सेकंड में आपके सामने दिखाई देने लगता है।

इतनी अद्भुत सुविधाएँ... और हम उन्हें इतना सामान्य मान बैठे हैं, जैसे ये हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हों।

ज़रा कल्पना कीजिए...

यदि दो सौ वर्ष पहले का कोई सम्राट आज आपके घर आ जाए, तो शायद वह लौटकर अपने महल जाना ही न चाहे।

वह आश्चर्य से पूछे—

"यह क्या है?"

"गर्म पानी।"

"और यह?"

"ठंडी हवा।"

"यह?"

"पूरी दुनिया की जानकारी।"

"और यह?"

"दस मिनट में घर तक पहुँचने वाला भोजन।"

वह शायद मुस्कुराकर कहे—

"मैंने जीवन भर राज्य किया, युद्ध जीते, अपार धन कमाया... लेकिन ऐसा सुख तो मुझे भी कभी नसीब नहीं हुआ।"

यही सच्चाई है।

आज का एक सामान्य व्यक्ति भी अनेक सुविधाओं के मामले में बीते समय के सबसे शक्तिशाली राजाओं से कहीं अधिक संपन्न है।

फिर भी...

हम खुश नहीं हैं।

क्यों?

क्योंकि इंसान को जो मिल जाता है, उसकी कीमत धीरे-धीरे कम लगने लगती है।

एसी चल रहा है—कोई खुशी नहीं।

बंद हो जाए—परेशानी शुरू।

मोबाइल है—कोई खुशी नहीं।

नेटवर्क चला जाए—मानो दुनिया ही खत्म हो गई।

अपना घर है—खुशी नहीं।

पड़ोसी का घर बड़ा है—बस वही दुःख।

अपनी गाड़ी है—संतोष नहीं।

दूसरे की गाड़ी बड़ी है—यही पीड़ा।

यानी इंसान अपने ही स्वर्ग में खड़ा होकर, दूसरे के स्वर्ग से अपनी तुलना करता रहता है।

लेकिन उसी धरती पर एक और दुनिया भी है...

जहाँ आज भी लाखों लोग एक बाल्टी पानी के लिए घंटों कतार में खड़े रहते हैं।

जहाँ लाखों परिवारों के पास पक्का घर नहीं है।

जहाँ दो वक्त की रोटी भी निश्चित नहीं।

जहाँ बच्चों के सपने स्कूल तक पहुँचने से पहले ही टूट जाते हैं।

जहाँ तन ढकने के लिए पूरे कपड़े भी नहीं हैं।

हम जिन सुविधाओं को "सामान्य" कहते हैं, वही किसी और की सबसे बड़ी आकांक्षा होती हैं।

हमें एसी का रिमोट नहीं मिलता, तो गुस्सा आ जाता है।

उन्हें धूप से बचने के लिए पेड़ की छाँव भी नसीब नहीं होती।

हम डाइट चार्ट खोजते हैं।

वे अगली रोटी की चिंता में सोते हैं।

तभी लगता है...

स्वर्ग और नरक मृत्यु के बाद मिलने वाले स्थान नहीं हैं।

वे यहीं हैं...

इसी धरती पर...

इसी शहर में...

इसी गली में...

और कभी-कभी तो एक ही दीवार के दो ओर।

एक घर का बच्चा इसलिए उदास है कि उसका नया मोबाइल थोड़ा धीमा हो गया।

सामने वाले घर का बच्चा इसलिए उदास है कि उसके पास ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मोबाइल ही नहीं है।

एक व्यक्ति शिकायत करता है कि गर्म पानी पाँच मिनट देर से आया।

दूसरा केवल इतना चाहता है कि आज पानी मिल जाए।

फर्क केवल हालात का नहीं...

फर्क नज़रिए का भी है।

कुछ लोग कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराना जानते हैं।

और कुछ लोग हर सुख-सुविधा के बीच भी शिकायतों से बाहर नहीं निकल पाते।

मनुष्य की सबसे विचित्र आदत यही है—

वह हर दिन यह गिनता है कि उसके पास क्या नहीं है...

लेकिन कभी यह नहीं गिनता कि उसके पास कितना कुछ है।

यदि हर रात सोने से पहले हम केवल पाँच बातें लिख दें—

आज मैं साँस ले पा रहा हूँ।

आज मेरे पास पीने का पानी है।

आज मुझे भोजन मिला।

आज मेरे पास सिर छिपाने की जगह है।

आज मेरे अपने लोग मेरे साथ हैं।

तो शायद हमारी पूरी ज़िंदगी बदल जाए।

शायद स्वर्ग कोई जगह नहीं...

एक एहसास है।

और नरक भी कोई जगह नहीं...

बल्कि उस एहसास को भूल जाना है।

जो हमारे पास है, उसकी कद्र करना ही स्वर्ग है।

और जो मिला है, उसे भूलकर केवल शिकायत करते रहना ही नरक है।

मृत्यु के बाद क्या होगा, यह किसी को नहीं पता।

लेकिन जब जीते-जी हमें पृथ्वी जैसा सुंदर ग्रह, साँस लेने के लिए हवा, पीने के लिए पानी, खाने के लिए अन्न, प्रेम करने वाले अपने लोग और एक बटन दबाते ही मिलने वाली अनगिनत सुविधाएँ प्राप्त हैं...

फिर भी यदि हम हर समय दुखी रहें...

तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है?

शायद ऊपर बैठा ईश्वर भी मुस्कुरा रहा होगा और कहता होगा

"मैंने तुम्हें स्वर्ग में भेजा था... और तुमने वहाँ भी शिकायतों का दफ़्तर खोल लिया!"

इसलिए आज से शिकायतें नहीं... कृतज्ञता गिनिए।

क्योंकि कृतज्ञ मन में ही स्वर्ग बसता है।🕉️
🙏🌹🌸🌼💕🌷🪷❤️🙏

अक्सर लोग सेहत के लिए काले चने को ज्यादा फायदेमंद मानते हैं, लेकिन हरा चना (हरा चोलिया) भी किसी सुपरफूड से कम नहीं है। इ...
05/02/2026

अक्सर लोग सेहत के लिए काले चने को ज्यादा फायदेमंद मानते हैं, लेकिन हरा चना (हरा चोलिया) भी किसी सुपरफूड से कम नहीं है। इसमें भरपूर प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स पाए जाते हैं, जो शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाते हैं।

आइए जानते हैं हरा चना खाने की 4 बड़ी वजहें।

1. वजन घटाने में मददगार

हरा चना फाइबर और प्रोटीन से भरपूर होता है, जिससे पेट लंबे समय तक भरा रहता है। इससे बार-बार भूख नहीं लगती और ओवरईटिंग से बचाव होता है। जो लोग वजन कम करना चाहते हैं, उनके लिए हरा चना एक बेहतरीन स्नैक है।

2. पाचन तंत्र को रखे दुरुस्त

इसमें मौजूद डाइटरी फाइबर कब्ज की समस्या दूर करने में मदद करता है और आंतों की सफाई करता है। रोजाना सीमित मात्रा में हरा चना खाने से गैस, अपच और पेट की भारीपन की समस्या कम हो सकती है।

3. दिल को बनाए मजबूत

हरा चना खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने में सहायक माना जाता है। यह ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने और दिल की धमनियों को स्वस्थ रखने में मदद करता है, जिससे हार्ट डिजीज का खतरा कम हो सकता है।

4. शरीर को दे ताकत और एनर्जी

हरा चना आयरन, मैग्नीशियम और विटामिन B से भरपूर होता है, जो शरीर में खून की कमी दूर करने और कमजोरी कम करने में मदद करता है। इसे खाने से दिनभर एनर्जी बनी रहती है और थकान कम महसूस होती है।

हरा चना खाने का सही तरीका

इसे उबालकर सलाद की तरह खाएं
अंकुरित (sprouts) करके सेवन करें
सब्जी या चाट के रूप में भी खा सकते हैं
सुबह या दोपहर में खाना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है
किन लोगों को सावधानी रखनी चाहिए?

बहुत ज्यादा मात्रा में न खाएं
गैस की समस्या वालों को सीमित मात्रा में लेना चाहिए
डायबिटीज मरीज डॉक्टर की सलाह से सेवन करें
हरा चना स्वाद में अच्छा होने के साथ-साथ सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है। वजन कंट्रोल से लेकर दिल की सेहत तक, इसके फायदे इसे काले चने का मजबूत विकल्प बनाते हैं।

किसी भी धर्म में रहने या जुड़ने की उपयोगिता 5 सकारात्मक बातों से लगाई जाती है।1 सहभागिता _ धर्म अपने सभी मानने वालों को ...
02/02/2026

किसी भी धर्म में रहने या जुड़ने की उपयोगिता 5 सकारात्मक बातों से लगाई जाती है।

1 सहभागिता _ धर्म अपने सभी मानने वालों को समान रूप से नीति निर्माण और नियंत्रण करने वाली संस्थाओं में सहभागी बनाता है या नहीं।
2 समर्थन _ समान धर्म के मानने वाले सामाजिक या राजनैतिक कार्यों में अपने लोगों का समर्थन करते हैं या नहीं।
3 सहयोग _ किसी धर्म के लोग अपने सहधर्मियों का बाहरी संकट और आंतरिक समस्या समाधान में सहयोग करते हैं या नहीं।
4 सुरक्षा _ धर्म प्राकृतिक आपदा या अन्य सांसारिक विपत्ति में अपने मानने वालों को सुरक्षा प्रदान करता है या नहीं।
5 सम्मान _ धर्म को मानने वाले अपने धर्म के विद्वान और बुद्धिजीवी लोगों का सम्मान करते हैं या नहीं।
कायस्थों को सोचना चाहिए कि हमारी कितनी आवश्यकताएं इस तथाकथित धर्म से पूरी हो रही हैं। हमारी समझ में तो एक भी नहीं अपलोग अपनी बताईए।

 #कायस्थ बंगाल से बिहार को अलग कर एक पृथक् प्रान्त के रूप में प्रतिष्ठित करने के आंदोलन में अग्रणी रहे। शिक्षा एवं राजनी...
01/02/2026

#कायस्थ बंगाल से बिहार को अलग कर एक पृथक् प्रान्त के रूप में प्रतिष्ठित करने के आंदोलन में अग्रणी रहे।
शिक्षा एवं राजनीतिक चेतना की दृष्टि से वे सबसे अग्रणी जमात रहे। फिर भी सामाजिक तौर पर उनका स्थान जातिव्यवस्था में काफी नीचा रहा। जॉन विल्सन ने अपन "टेबुलर व्यू ऑफ द कास्ट्स" में "कायस्थों को शूद्रों से भी नीचा "दिखलाया तथा जाति क्रमबद्धता में चौतीसवाँ स्थान दिया था।' मैक्स वेबर ने जोर देकर कहा था कि "कायस्थ निःसंदेह शूद्र थे।"

मध्यकाल से ही उनके उद्‌गम और सामाजिक स्थिति को लेकर गरमागरम विवाद चल रहे थे। बहुधा उन्हें उच्च जाति या सवर्ण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता था। कट्टरपथी ब्राह्मण उनके हाथों से पानी नहीं पीते थे। आए दिन व्यंग्यात्मक लहजे में उनसे पूछा जाता था कि वे चार वर्णों में से किसमें आत हैं। धर्मग्रथों का उद्धरण देकर रेखांकित करने की कोशिश की जाती थी कि व शूद्र है यानी निम्नतम वर्ण के हैं।" अनेक पुराने ग्रथों का सहारा लेकर दावा किया जाता था कि वे भरोसा करने लायक नहीं हैं। "याज्ञवल्यक्य स्मृति" और अनेक अन्य पुराने ग्रंथों के आधार पर कायस्थों द्वारा शोषण और परेशान करने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया जाता था।''

इन सब का उद्गम स्रोत राज्य प्रशासन के साथ कायस्थों के जुड़ाव मे देखा जा सकता है। राज्य प्रशासन की बढ़ती जटिलता तथा अभिलेखों को तैयार करने और सुरक्षित बनाए रखने के लिए विशेष ज्ञान और कौशल की जरूरत पड़ी। कालक्रम में वे लिपिक शासकों के लिए अपरिहार्य बन गए जिन्हें ये योग्यताएं प्राप्त थीं। आगे चलकर उनकी अपनी अलग जाति "कायस्थ" वन गई। गौतम, अपस्तंब, बौधायन, वशिष्ठ और मनु के प्राचीन धर्मशास्त्रों में 'कायस्थ' शब्द का कोई उल्लेख नहीं है। कौटिल्य के "अर्थशास्त्र" में भी यह शब्द नहीं मिलता।

"विष्णु संहिता" (VII/3) 12 में यह शब्द जरूर मिलता है मगर वहां इसका उल्लेख अधिकारी के लिए किया गया है। कहना न होगा कि कायस्थ अपने आचरण में काफी लचीले थे। वे आसानी से नए शासकों और नई परिस्थितियों से तालमेल बैठाने में माहिर थे। खाने-पीने में उन्हें कोई परहेज न था। मांस-मछली खाने और दारू पीने में कोई हिचक न थी।

प्रशासनिक मामलों की उनकी जानकारी बेजोड़ थी। वे कायदे-कानूनों तथा नजीरों की व्याख्या मनचाहे ढंग से कर रिश्वत कमाने में माहिर थे। कई बार जो उन्हें खुश नहीं करते उनके प्रति बेरहमी का बर्ताव करते नहीं हिचकते थे। कल्हण ने "राजतरंगिणी" में अनेक उदाहरणों को देकर बतलाया है कि कैसे कश्मीर के कई राजा अपने लालची कायस्थ मंत्रियों और अधिकारियों पर अंकुश लगाने में विफल होने के कारण अलोकप्रिय हो गए।

पांडुरंग वामन काणे के अनुसार कायस्थों का एक जाति विशेष के रूप में उदय मध्यकाल में ही हुआ। ईसा के जन्म के बाद की आरंभिक शताब्दियों के दौरान कायस्थ जाति सूचक शब्द नहीं था बल्कि मात्र पदसूचक था। संभवतः वह अधिकारी के लिए प्रयुक्त किसी विदेशी शब्द का समतुल्य था।" गुप्त काल में विशाखदत्त लिखित नाटक "मुद्राराक्षस" में शंकटदास नामक कायस्थ का जिक्र जरूर आता है।

बंगाल से बिहार को पृथक करने का आदोलन जब चल रहा था तब बिहारी कायस्थों और आदोलन के नेता सच्चिदानद सिन्हा के लिए काफी अपमानजक और ओछी बातें कही गई। कुछ विरोधियों ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उन कुछ फैसलों का जिक्र किया जिनमें कायस्थों को शूद्र कह कर सामाजिक दृष्टि से नीचा बतलाया गया था। राजकुमार लाल बनाम बिसेशर दयाल (1884, आईएलआर 10, कल 688), और असितामोहन घोष बनाम निरोदमोहन घोष मल्लिक (1920, एलआर, 47 आई.ए. 140 (145) में कायस्थों को शूद्र कहा गया था और हिदायत दी गई थी कि जायदाद और विरासत संबधी मामलों में उन्हें उच्च जाति वाले हिन्दुओं के समान अधिकार नहीं होंगे। इस प्रकार के मुकदमों में न्यायाधीशों ने अपने निर्णय का आधार श्यामाचरण सरकार की पुस्तक "व्यवस्था दर्पण" को बनाया।

एक मुकदमे में न्यायाधीशों ने यह व्यवस्था दी कि "हमारे न्यायालय में वर्षों से कायस्थों को शूद्र माना गया है और, इस प्रकार उनकी स्थिति के संबंध में अब कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।''

कहना न होगा कि इससे कायस्थों के आत्म सम्मान को धक्का लगा। उन्होंने सामाजिक तौर पर अपनी स्थिति बेहतर बनाने की भरसक कोशिश की। बिहार और संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) ने मिलकर 1887 में कायस्थ कांफ्रेंस की स्थापना की। इसके तहत बिहार और संयुक्त प्रांत के कायस्थों की 12 उपजातिया इकट्ठी हुईं। इनमें शामिल प्रत्येक उपजाति के विवाह संबंध अपने में ही होते थे यानी एक उपजाति का शादी संबंध दूसरी उपजाति में नहीं होता था। कायस्थ क्रांफ्रेंस का पहला अधिवेशन 1887 में लखनऊ में हुआ।

कायस्थ कांफ्रेंस की स्थापना मुख्यतया लखनऊ के एक अग्रणी वकील काली प्रसाद की पहल और वित्तीय समर्थन का परिणाम थी। वे श्रीवास्तव उपजाति के थे। वे बहुत धनवान मगर निःसंतान थे। उन्होंने अपने धन का इस्तेमाल अपनी जाति के बीच, शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए किया। उन्होंने 1873 में इलाहाबाद की मशहूर कायस्थ पाठशाला की स्थापना की। कायस्थ कांफ्रेंस के जन्म के काफी पहले ही उन्होंने कायस्थ धर्म सभा की स्थापना की थी और "कायस्थ समाचार" उर्दू पत्रिका निकाली थी।

याद रहे कि सभी प्रयासों के बावजूद कायस्थ कांफ्रेंस का जन्म काली प्रसाद के जीवनकाल में नहीं हो सका। उनका निधन 1886 में हुआ और वे अपनी लगभग सारी संपत्ति (जिसका मूल्य उस समय पांच लाख रुपये में अधिक था) पाठशाला को दे गए। उनकी मृत्यु के कुछ महीने बाद उनके दो घनिष्ठ सहयोगियों - हरगोविन्द दयाल और श्रीराम ने संयुक्त प्रांत और विहार के कायस्थों के नाम एक अपील जारी की। सच्चिदानंद सिन्हा के अनुसार यह अपील मुख्यतया अंग्रेजी पढ़े-लिखे कायस्थों के नाम थी।"

डुमरावं राज (जो मुगलसराय की ओर से बिहार में घुसते ही आता है) के दीवान जय प्रकाश लाल ने प्रथम कायस्थ कांफ्रेंस की अध्यक्षता की। वे बिहार के अत्यंत गणमान्य कायस्थों में थे और श्रीराम के रिश्तेदार थे।

उसी वर्ष सारे बिहार में 'कायस्थ सभा' की स्थापना हुई। शाहाबाद जिले के कायस्थों ने सभा की स्थापना करने और उसे मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं। पहला, जयप्रकाश लाल शाहाबाद जिले के थे। इस कारण वे प्रेरणा तथा समर्थन के स्रोत बने। दूसरा, शाहाबाद जिले के कायस्थ शिक्षा की दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक आगे थे। उनमें राजनीतिक एवं सामाजिक चेतना का स्तर काफी ऊंचा था। नवम्बर 1889 में अखिल भारतीय कायस्थ कांफ्रेंस का तीसरा अधिवेशन बांकीपुर (पटना) में हुआ जिसमें लगभग पांच हजार प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

यहां याद रखना चाहिए कि मुंशी काली प्रसाद कायस्थों के वर्ण से जुड़े कानूनी विवादों से संबंद्ध थे और जिस प्रकार कलकत्ता हाईकोर्ट ने सारे मामले को लिया था उससे उनके आत्म सम्मान को काफी धक्का लगा था। उनके निधन के वर्षों बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नार्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेज एंड अवध (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) के कायस्थों को क्षत्रिय घोषित कर दिया। इस निर्णय का श्रेय मरणोपरांत मुंशी काली प्रसाद को उनके प्रयासों और उनके द्वारा जुटाए गए प्रमाणों तथा साक्ष्यों को ही जाता है।"

भूलना नहीं चाहिए कि पीठ के पांच जजों में चार यूरोपीय थे। एक ही जज हिन्दुस्तानी था और वह भी मुसलमान। यह फैसला 1890 में एक अपील के सदर्भ में आया। इस प्रकार कायस्थ समुदाय बेहिचक हराया कर सकता था कि निर्णय निष्पक्ष और प्रामाणिक है।

वर्षों बाद पटना हाईकोर्ट ने इसी तरह का फैसला सुनाया। वर्ष 1927 में 48 पृष्ठों के फैसले में विश्वासोत्पादक तकों के आधार पर कायस्थों को सवर्ण घोषित किया गया। यह फैसला सर ज्वाला प्रसाद नामक जज ने लिखा था जो स्वयं एक कायस्थ थे। उनके अंग्रेज सहकर्मी ने फैसले पर सहमति जताई।

इतिहासकार प्रो. रामशरण शर्मा ने कायस्थों की सामाजिक स्थिति से जुड़े विवादों को लेकर निम्नलिखित बातें की हैं:

"राजाओं द्वारा पुरोहितों, मंदिरों और अधिकारियों को निरंतर भूमि या भूराजस्व हस्तांतरित करने के कारण मध्य काल के आरंभ में लिपिकों या कायस्थ समुदाय का उदय और विस्तार हुआ। बड़ी संख्या में लिपिकों और अभिलेखों की देखभाल करनेवालों की जरूरत पड़ी जो भूमि के दानपत्रों से जुड़े दस्तावेजों को तैयार करें और जमीन तथा गावों के अभिलेखों को देखभाल कर सकें। उन्हें अनुदान के तौर पर राजस्व के रूप में निरंतर बढ़ते हुए मदों का लेखा-जोखा रखना था। बंटवारे के कानूनों के कारण गुप्तकाल से भूमि के विखंडन ने पृथक् जोतों के विवरणों को बनाए रखना आवश्यक कर दिया था...। इसलिए गांवों और भूमि संबंधी अभिलेखों को सावधानीपूर्वक रखना जरूरी हो गया था जिससे लगातार उठने वाले विवादों से बचा जाय और उनका निपटारा किया जाय।

"यह सारा काम लिपिकों के एक वर्ग के द्वारा किया जाता था जो विभिन्न नामों, जैसे कायस्थ, कर्ण... आदि से जाने जाते थे.... आरंभ में कायस्थ दर्जनों प्रकार के लिपिकों और अभिलेख प्रभारियों का एक ही वर्ग था। कालक्रम में अन्य सब प्रकार के अभिलेख प्रभारी कायस्थ नाम से जाने गए। आरंभिक चरण में उच्च वर्णों के साक्षर सदस्यों को कायस्थ या लिपिक के रूप में समुदाय की राजकोषीय एवं प्रशासनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भर्ती किया गया... कितु शनैः शनैः विभिन्न वर्णों से जो लोग लिपिक के रूप में आए वे मूल वर्णों के साथ शादी-संबंधों तथा अन्य सामाजिक संबंधों के जरिए जुड़े थे और उन्होंने नए समुदाय को अपने सारे परस्पर सामाजिक व्यवहार सौंप दिए, उन्होंने वर्ण के अंदर और परिवार के बाहर शादी-संबंध बनाए। वर्णव्यवस्था के अंतर्गत कायस्थों के लिए कौन-सा स्थान नियत किया जाय, इसको लेकर ब्राह्मण विधि व्यवस्थापक दुविधा में पड़ गए और उन्होंने उन्हें शूद्रों और द्विजों, दोनों के साथ जोड़ दिया। चूंकि धर्मशास्त्र कायस्थों के उद्गम को लेकर अस्पष्ट है तथा ऐतिहासिक उदाहरण सिर्फ एक ही वर्ण तक सीमित नहीं है, इसीलिए हाल के समय में कलकत्ता हाईकोर्ट ने उन्हें शूद्र घोषित किया है जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ब्राह्मण।"

कायस्थ कांफ्रेंस की स्थापना के तुरंत बाद उसके सदस्यों ने अपने नाम के साथ 'सिन्हा' और 'वर्मा' जोड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों और कर्मकाण्ड को अपना लिया। जो कर्मकाण्ड परम्परापंथी नहीं उन्हें छोड़ दिया गया। कायस्थों ने यज्ञोपवित धारण करना शुरू कर दिया और वे सस्कृत पढ़ने लगे। बिहार और संयुक्त प्रान्त के कायस्थों ने कई किताबें (जैसे 'चित्रगुप्त उत्पत्ति प्रकाश', कायस्थ संस्कार प्रकाश' आदि) प्रकाशित की जिससे यह तथ्य उजागर हो कि वे ईश्वर के लिपिक पौराणिक चित्रगुप्त के वंशज हैं। "पदम् महापुराण". 'स्कंद पुराण' (भाग-।।।, प्रभाष खंड, 1-2), "गरुड़ पुराण', "शिव पुराण" (भाग-।।।, अनुच्छेद: उमा संहिता, अध्याय-VI, ई. डब्लू. हॉपकिंस की पुस्तक 'एपिकमाइथोलोजी' (पृ. 44, 87,113 और 218) आदि को समर्थन में उद्धृत किया गया। माना गया कि चित्रगुप्त की उत्पत्ति पौराणिक ब्रह्मा की काया से हुई। इसी से कायस्थ शब्द निकला।

समुदाय के हितपोषण के लिए अनेक पत्रिकाएं निकाली गई जैसे दरभंगा से "कायस्थ हितैषी" (जिसके संपादक महेश नारायण थे जिन्होंने आगे चलकर "द बिहार टाइम्स" का प्रकाशन किया) और "कायस्थ मेसेंजर"। इन पत्रिकाओं ने समुदाय की समान तकलीफों को उजागर किया जिनमें रोजगार के पर्याप्त अवसरों का अभाव, शिक्षा की सुविधाओं की कमी, और निम्न सामाजिक स्थिति शामिल थीं। सच्चिदानंद सिन्हा द्वारा संपादित "हिन्दुस्तान रिव्यू" ने भी "कायस्थ वर्ल्ड" से जुड़े समाचारों और गतिविधियों का एक नियमित स्तंभप्रकाशित किया। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों के दौरान तत्कालीन शाहाबाद जिले के सासाराम में एक कायस्थ इंस्टीट्यूट की स्थापना हुई।

बिहार के कायस्थ एक अन्य बात को लेकर चिढ़े हुए थे। मुस्लिम शासकों के दरबारों के साथ लम्बे अरसे से जुड़े होने के कारण उनकी जीवन शैली अन्य बिहारी हिन्दुओं से काफी कुछ अलग थी। खाने-पीने को लेकर कोई परहेज नहीं था। वे मुख्यतया सामिष थे। उनका दृष्टिकोण सांप्रदायिकता और कठमुल्लापन से परे था। उनकी खड़ी बोली हिंदी पर अवधी का असर था (उदाहरण के लिए वे "कहिन", खाइस. "बैठा जाए", आदि का प्रयोग करते थे)। ऐसा अवध के मुसलमान अफसरों के साथ संपर्क के कारण हुआ था। दस्तावेजों के लेखन के लिए जिस लिपि का इस्तेमाल वे करते थे वह 'कैथी' के नाम से प्रसिद्ध हुई। इन सब बातों के आधार पर कई दकियानूसी लोगों ने उन्हें हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों का करीबी बताना शुरू किया। कभी-कभी इससे तनाव की स्थिति पैदा हुई।

कायस्थ कांफ्रेंस का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य सामाजिक सुधार लाना था यद्यपि इस दिशा में शाहाबाद जिले के मुशी प्यारे लाल ने काफी पहले पहल शुरू कर दी थी। 1870 के दशक के पूर्वार्ध में उन्होंने एक आआंदोलन शुरू किया था जिसका उद्देश्य कायस्थों को व्याह-शादी में होनेवाले खर्च में कमी लाने के लिए प्रेरित करना था। उन्होंने हिसाब लगाया था कि तिलक समारोह में पचास हजार रुपए तक देना आम है। दुल्हन के मां-बाप की गाढ़ी कमाई के इन पैसों को अनुत्पादक मदों पर खर्च किया जाता था। बहुधा मां-बाप को पैसे जुटाने के लिए अपनी चल-अचल परिसंपतियों को बेचना भा बंधक रखना पड़ता था। इसके परिणामस्वरूप वर्षों ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक परिवार की कमाई की क्षमता और जीवन स्तर प्रभावित होता था। मुंशी प्यारे लाल तिलक समारोह में दी जानेवाली नकदी की अधिकतम सीमा इक्यावन रुपए निश्चित करने के पक्षधर थे। कुछ समय तक मुंशीजी ने निश्चित ही लोगों का ध्यान आकर्षित किया। उत्साहित होकर अपने आंदोलन को व्यापक बनाने की कोशिश की जिससे अन्य सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध मोर्चा खोला जा सके। यद्यपि आंदोलन बहुत दिनों तक नहीं चलाया जा सका फिर भी उसकी प्रतिध्वनि बार-बार सुनाई पड़ती रही। उदाहरण के लिए 1903 में मोतिहारी में आयोजित कायस्थ कांफ्रेंस के अधिवेशन ने छः वचन निर्धारित किए जिनमें से किन्हीं दो को लेना हर सदस्य के लिए अनिवार्य कर दिया गया। वचन इस प्रकार थे :

"मैं सत्यनिष्ठा पूर्वक घोषित करता हूं कि मैं निम्नलिखित वचनों में से कम से कम दो (जिनको मैंने निरस्त नहीं किया है) का हमेशा पालन करूंगा और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनका उल्लंघन यथाशक्ति नहीं करूंगा तथा अन्य लोगों को उनका पालन करने के लिए प्रोत्साहित करूंगा-

1. मैं अपने साधनों और क्षमताओं के अनुसार गरीब कायस्थों के बच्चों को शिक्षित करने के लिए सहायता और सहयोग दूंगा।

2. मैं द्विजधर्म के नियमों का पालन करूंगा।

3. मैं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शादी के करारदाद में शामिल नहीं होऊंगा।

4. मैं शादी या अन्य समारोहों में फिजूलखर्ची नहीं दिखलाऊंगा।

5. मैं अपनी उपजाति द्वारा बनाये गए या बनाए जानेवाले शादी-ब्याह के नियमों (दस्तूर उल-अमल शादी) का पालन करूंगा।

6. मैं बाल विवाह को रोकने और अनुत्साहित करने के लिए व्यावहारिक कदम उठाऊगा।

7. 8. आदि (इनके अंतर्गत समय-समय पर कांफ्रेंस की स्वीकृति से अन्य विषय शामिल किए जाएंगे।) 24

चूंकि सदस्यों को किन्हीं दो वचनों को निभाने की प्रतिज्ञा करनी थी, इसलिए वे आम तौर से 3-5 से कन्नी काट लेते थे जिससे कांफ्रेंस का उन पर कोप न हो।" कायस्थ मैसेंजर" के संपादक और अनेक वर्षों तक कांफ्रेंस के सचिव रहे फतह बहादुर निगम ने एक रजिस्टर रखा जिसमें उन सब लोगों के नाम दर्ज किए जाते रहे जो दहेज और शादी पर होनेवाले व्यय संबंधी निर्देशों का पालन करते थे। समय-समय पर इन और उन लोगों के नाम प्रकाशित किए जाते रहे जो दहेज और शादी संबंधी व्यय के सिलसिले में कांफ्रेंस के निर्देशों का उल्लंघन करते थे। इस प्रयास के वांछित परिणाम नहीं निकले।

बिहार के लगभग सब महत्वपूर्ण कायस्थ परिवार और व्यक्ति कांफ्रेंस की गतिविधियों से जुड़े थे। इनमें महेश नारायण, सच्चिदानन्द सिन्हा, राजेन्द्र प्रसाद, दीवान जयप्रकाश लाल, सूरजपुरा के राजा राजेश्वरी प्रसाद, आरा के हरवंश सहाय, रामनवमी प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, तिलौथू का राजपरिवार, बाघी का सहाय परिवार, शिकारपुर के दीवान जी का परिवार, आदि प्रमुख थे। हम जिक्र कर चुके हैं कि दीवान जय प्रकाश लाल कांफ्रेंस के पहले अध्यक्ष थे। 1925 में कायस्थ कांफ्रेंस के जौनपुर अधिवेशन की अध्यक्षता डा० राजेन्द्र प्रसाद ने की जिसमें कायस्थों की विभिन्न उपजातियों के बीच शादी-ब्याह पर जोर दिया गया।

सच्चिदानन्द सिन्हा ने कांफ्रेंस के पैतीसवें अधिवेशन की अध्यक्षता की जो 29 मार्च 1929 को दिल्ली में हुआ। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण का शीर्षक "जाति सम्मेलन और राष्ट्रीय प्रगति" रखा था जिसमें उन्होंने जाति संगठनों के निर्माण और अस्तित्व को उचित ठहराया था। उन्होंने जो कुछ कहा वह काफी दिलचस्प था :

"किसी समुदाय विशेष तक सीमित क्या कोई आआंदोलन अपनी गतिविधियों से देश की सामान्य प्रगति में सहायता दे सकता है.... दिवंगत डा०सर रामकृष्ण भंडारकर ने... इस सिलसिले में अपने विचार यों रखें हैं- हमारे बीच अनेक वर्षों से प्रतिक्रिया की एक लहर चल रही है। मैंने जाति क्लबों की स्थापना के बारे में सुना है और हाल में अनेक जातियों के नियतकालिक सम्मेलनों को देखा है। इन सम्मेलनों के पक्ष में बहुधा यह कहा जाता है कि वे इन समुदायों में समाज सुधार के जरिए हैं। जिस हद तक ऐसा होता है उस हद तक सम्मेलन लाभकारी है, किंतु जिस हद तक कोई समुदाय जो सम्मेलन करता या क्लब चलाता है अपने को अन्य सबसे अलग होने का दावा करता है वह जाति विभेद को कम करने के बदले सख्त बनाता है। इसलिए मेरे विचार से ये सम्मेलन और क्लब पीछे ढकेलने वाले हैं क्योंकि हमें अपनी सभाओं और सम्मेलनों के एक सूत्रबद्ध राष्ट्र की भावनाओं को ही अपना पथ-प्रदर्शक मानना चाहिए.... हमें इस बात को लेकर सदा जागरूक रहना चाहिए कि हमारे भाषण या कार्य किसी भी तरह राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से देश की प्रगति को रंगमात्र भी धक्का न पहुंचाएं।

".... यह समस्या उतनी सरल नहीं है जितनी पहली नजर में लगती है। यदि हम अपने भाषण या लेखन में जातिगत विभेदों को दरकिनार कर और एक सूत्रबद्ध राष्ट्र की चर्चा द्वारा सही अर्थ में भारतीय राष्ट्रीयता विकसित कर सकते तो इस सिलसिले में भरपूर वार्ता को देखते हुए हम काफी पहले अपने प्रयास में सफल हो गए होते। मगर दुर्भाग्यवश, तथ्य बड़े ही अनम्य होते हैं। और यह बेतुकी बात है कि हम अपनी वर्तमान सीमाओं को दरकिनार कर उन समाजशास्त्रीय परिस्थितियों से अपना पीछा छुड़ा लेंगे जिनमें हम हजारों सालों से रहते आए हैं। हमारी समाज व्यवस्था अनेक सहस्राब्दियों से जाति और उससे जुड़ी स्थितियों पर आधारित रही है। इसलिए उन अनेक समाजशास्त्रियों ने, जिन्होंने जातिव्यवस्था के उद्भव, विकास और इस देश की जनता पर उसके प्रभाव का अध्ययन किया है, यह निष्कर्ष निकाला है कि जब भी भारत उस राजनीतिक अर्थ में राष्ट्रीयता विकसित करने में समर्थ होगा जिसमें पश्चिमी देशों में लिया जाता है तब उसे जाति की व्यवस्था को हमारी अपनी आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालना और परिवर्तित करना होगा। न कि उसे नजरअंदाज या उसे संभावित सुपरिणामों के लिए इस्तेमाल करने से इंकार कर। अगर सही भावना से आगे बढ़ें... तो सच्ची एकता जो राष्ट्रीयता का एकमात्र आधार हो सकती है किसी समान विरोधी के अन्याय के प्रति भावना... के कारण नहीं। अतः जबतक देश के सारे समुदाय आत्मनिर्भर और आत्म-अभिव्यक्ति में सक्षम न होते तबतक सच्ची भारतीय राष्ट्रीयता का जन्म संभव नहीं है, क्योंकि पक्की एकता संपूर्ण संगठन के प्रत्येक अवयव के पूर्ण विकसित व्यष्टिवाद... का परिणाम होगी।"

उस जमाने के एक मशहूर पत्रकार ईश्वर शरण ने कांफ्रेंस को एक अलगाववादी तत्व कहकर उसकी आलोचना की थी। उनके अनुसार भारत की मुक्ति राष्ट्रवाद से ही हो सकती है। राष्ट्रवाद के विकास के मार्ग में जातियों और असंख्य जातियों द्वारा पैदा की गई अलगाव की भावना बाधक है। ऐसी स्थिति में कैसे कोई भारतीय राष्ट्रवादी जातिगत संगठनों में भाग ले सकता है? शरण के अनुसार कोई व्यक्ति जातिगत आंदोलन में तभी भाग लेकर जाति विशेष और राष्ट्र का भला कर सकता है जब वह हमेशा राष्ट्रवाद को सर्वोपरि मानता है। सच्चिदानन्द सिन्हा ने शरण की भावनाओं का आदर करते हुए उनसे सहमति जताई और उन्होंने एकत्र प्रतिनिधियों से आग्रह किया कि वे ऐसी कोई बात न कहें और न कोई ऐसा कार्य करें जिससे देश के हितों को धक्का लगे।"

पीछे मुड़कर देखने पर स्पष्ट होता है कि भंडारकर और ईश्वर शरण सही साबित हुए सिन्हा साहब चाहते हुए भी कांफ्रेंस के दृष्टिकोण को व्यापक नहीं बना पाए क्योंकि ऐसा करने से कांफ्रेंस के मूल उद्देश्य (कायस्थों के हितों की रक्षा और केवल उन्हें ही एक सूत्रबद्ध करना) को प्राप्त नहीं किया जा सकता था। हम आगे अपनी चर्चा के क्रम में देखेंगे कि सिन्हा साहब स्वयं अपनी जाति की संकुचित सीमाओं को नहीं लांघ पाए। उनके लिए यह त्रासदी ही थी कि उनके जैसा प्रतिभावान, बुद्धिमान और सुशिक्षित व्यक्ति अखिल बिहार के सर्वोच्च नेता और आधुनिक बिहार के जनक का दर्जा बनाए नहीं रख सका। दुःख की बात है कि अलग बिहार प्रान्त बनने के बाद उनकी हैसियत एक जाति नेता मात्र की हो गई।

कायस्थ कांफ्रेंस को यह अहसास था कि औद्योगीकरण के बिना बेरोजगारी की समस्या हल नहीं की जा सकती। उसने अपने सदस्यों को हर प्रकार से प्रेरित करने और उनकी मदद करने की कोशिश की कि वे आधुनिक उद्योगों की स्थापना करें। 1889 में हुए पटना अधिवेशन के समय से कायस्थ कांफ्रेंस अपने कार्यक्रम के अंग के रूप में व्यापारिक एवं औद्योगिक प्रदर्शनी लगाने लगा जिससे कायस्थ लोग उद्योग व्यापार में लगने के लिए प्रेरित हों तथा सरकारी नौकरियों पर उनकी निर्भरता कम हो। आगे चलकर मोतिहारी अधिवेशन में प्रतिनिधियों को शपथ दिलाई गई कि वे न केवल अनावश्यक सामाजिक एवं व्यक्तिगत खर्च को कम करें बल्कि क्लर्क की नौकरी के पीछे दौड़ने के बदले औद्योगिक उद्यमी बनें।

बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने अखिल भारतीय कायस्थ कांफ्रेंस के जौनपुर अधिवेशन में प्रतिनिधियों को अपने अध्यक्षीय भाषण के क्रम में कहा, "हमें निश्चित रूप से वैज्ञानिक गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए और व्यावसायिक एवं औद्योगिक उद्यमों तथा अपने सामाजिक और नैतिक जीवन के लिए उनसे फायदा उठाना चाहिए। मैं जिस चीज के खिलाफ हूं वह है आवश्यकताओं को व्यर्थ बढ़ाना और अपनी जिन्दगी को कृत्रिम बना देना।"

उन्होंने अपनी बिरादरी वालों से अपील की कि वे दिखावटी उपभोग. दहेज और शराब से दूर रहें।

चार वर्ष बाद सच्चिदानंद सिन्हा ने ऑल इंडिया कायस्थ कांफ्रेंस के पैंतीसवें अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा :

"हमारे युवकों की बेरोजगारी एवं आर्थिक परेशानी की इस समस्या का... एकमात्र हल यह है कि वे साहित्यिक विषयों या कानून का कम, और विज्ञान एवं तकनीकी विषयों का अधिक, प्रशिक्षण लें। उन्हें उद्योग के महान नायक तथा वाणिज्य के क्षेत्र में धुरधर बनने की आकांक्षा रखनी चाहिए न कि राज्य के तहत मात्र बड़े वकील अथवा बड़े अफसर बनने की। ''

अगले एक अध्याय में हम कायस्थों द्वारा कतिपय औद्योगिक उद्यमों की शुरूआत करने तथा आगे चलकर विफल होने के ऊपर प्रकाश डालेंगे। उनकी विफलता के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कारणों की चर्चा करेंगे।

आगे बढ़ने के पहले इस तथ्य को रेखांकित करने की आवश्यकता है कि कांफ्रेंस और उसके नेताओं ने अपने समुदाय की सामाजिक एवं आर्थिक दशा को सुधारने की दिशा में सच्चा प्रयास किया और उसको औद्योगिक एवं वाणिज्यिक गतिविधियों तथा वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा की दिशा में प्रेरित करने की कोशिश द्वारा अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया। इसके बावजूद कांफ्रेंस ने उस समय के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न देश की आजादी से अपने का दूर रखा। स्वतंत्रतापूर्व के दिनों में उसने अपने को ब्रिटिश सरकार के विश्वास पात्र के रूप में रखने की कोशिश की। शायद इसी कारण 1890 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के यूरोपीय जजों और 1927 में पटना हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति बकनिल्ल ने कलकत्ता हाई कोर्ट और प्रिवी काउंसिल के अरुचिकर फैसलों को बदलने में भरपूर सहयोग दिया। काफ्रेंस के अनेक महत्वपूर्ण नेताओं को उपाधियों से अंग्रेजों ने सम्मानित किया।

~गिरीश मिश्रा की पुस्तक बिहार में जातिवाद स्वतंत्रता पूर्व के अंश

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