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अक्सर लोग सेहत के लिए काले चने को ज्यादा फायदेमंद मानते हैं, लेकिन हरा चना (हरा चोलिया) भी किसी सुपरफूड से कम नहीं है। इ...
05/02/2026

अक्सर लोग सेहत के लिए काले चने को ज्यादा फायदेमंद मानते हैं, लेकिन हरा चना (हरा चोलिया) भी किसी सुपरफूड से कम नहीं है। इसमें भरपूर प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स पाए जाते हैं, जो शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाते हैं।

आइए जानते हैं हरा चना खाने की 4 बड़ी वजहें।

1. वजन घटाने में मददगार

हरा चना फाइबर और प्रोटीन से भरपूर होता है, जिससे पेट लंबे समय तक भरा रहता है। इससे बार-बार भूख नहीं लगती और ओवरईटिंग से बचाव होता है। जो लोग वजन कम करना चाहते हैं, उनके लिए हरा चना एक बेहतरीन स्नैक है।

2. पाचन तंत्र को रखे दुरुस्त

इसमें मौजूद डाइटरी फाइबर कब्ज की समस्या दूर करने में मदद करता है और आंतों की सफाई करता है। रोजाना सीमित मात्रा में हरा चना खाने से गैस, अपच और पेट की भारीपन की समस्या कम हो सकती है।

3. दिल को बनाए मजबूत

हरा चना खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने में सहायक माना जाता है। यह ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने और दिल की धमनियों को स्वस्थ रखने में मदद करता है, जिससे हार्ट डिजीज का खतरा कम हो सकता है।

4. शरीर को दे ताकत और एनर्जी

हरा चना आयरन, मैग्नीशियम और विटामिन B से भरपूर होता है, जो शरीर में खून की कमी दूर करने और कमजोरी कम करने में मदद करता है। इसे खाने से दिनभर एनर्जी बनी रहती है और थकान कम महसूस होती है।

हरा चना खाने का सही तरीका

इसे उबालकर सलाद की तरह खाएं
अंकुरित (sprouts) करके सेवन करें
सब्जी या चाट के रूप में भी खा सकते हैं
सुबह या दोपहर में खाना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है
किन लोगों को सावधानी रखनी चाहिए?

बहुत ज्यादा मात्रा में न खाएं
गैस की समस्या वालों को सीमित मात्रा में लेना चाहिए
डायबिटीज मरीज डॉक्टर की सलाह से सेवन करें
हरा चना स्वाद में अच्छा होने के साथ-साथ सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है। वजन कंट्रोल से लेकर दिल की सेहत तक, इसके फायदे इसे काले चने का मजबूत विकल्प बनाते हैं।

किसी भी धर्म में रहने या जुड़ने की उपयोगिता 5 सकारात्मक बातों से लगाई जाती है।1 सहभागिता _ धर्म अपने सभी मानने वालों को ...
02/02/2026

किसी भी धर्म में रहने या जुड़ने की उपयोगिता 5 सकारात्मक बातों से लगाई जाती है।

1 सहभागिता _ धर्म अपने सभी मानने वालों को समान रूप से नीति निर्माण और नियंत्रण करने वाली संस्थाओं में सहभागी बनाता है या नहीं।
2 समर्थन _ समान धर्म के मानने वाले सामाजिक या राजनैतिक कार्यों में अपने लोगों का समर्थन करते हैं या नहीं।
3 सहयोग _ किसी धर्म के लोग अपने सहधर्मियों का बाहरी संकट और आंतरिक समस्या समाधान में सहयोग करते हैं या नहीं।
4 सुरक्षा _ धर्म प्राकृतिक आपदा या अन्य सांसारिक विपत्ति में अपने मानने वालों को सुरक्षा प्रदान करता है या नहीं।
5 सम्मान _ धर्म को मानने वाले अपने धर्म के विद्वान और बुद्धिजीवी लोगों का सम्मान करते हैं या नहीं।
कायस्थों को सोचना चाहिए कि हमारी कितनी आवश्यकताएं इस तथाकथित धर्म से पूरी हो रही हैं। हमारी समझ में तो एक भी नहीं अपलोग अपनी बताईए।

 #कायस्थ बंगाल से बिहार को अलग कर एक पृथक् प्रान्त के रूप में प्रतिष्ठित करने के आंदोलन में अग्रणी रहे। शिक्षा एवं राजनी...
01/02/2026

#कायस्थ बंगाल से बिहार को अलग कर एक पृथक् प्रान्त के रूप में प्रतिष्ठित करने के आंदोलन में अग्रणी रहे।
शिक्षा एवं राजनीतिक चेतना की दृष्टि से वे सबसे अग्रणी जमात रहे। फिर भी सामाजिक तौर पर उनका स्थान जातिव्यवस्था में काफी नीचा रहा। जॉन विल्सन ने अपन "टेबुलर व्यू ऑफ द कास्ट्स" में "कायस्थों को शूद्रों से भी नीचा "दिखलाया तथा जाति क्रमबद्धता में चौतीसवाँ स्थान दिया था।' मैक्स वेबर ने जोर देकर कहा था कि "कायस्थ निःसंदेह शूद्र थे।"

मध्यकाल से ही उनके उद्‌गम और सामाजिक स्थिति को लेकर गरमागरम विवाद चल रहे थे। बहुधा उन्हें उच्च जाति या सवर्ण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता था। कट्टरपथी ब्राह्मण उनके हाथों से पानी नहीं पीते थे। आए दिन व्यंग्यात्मक लहजे में उनसे पूछा जाता था कि वे चार वर्णों में से किसमें आत हैं। धर्मग्रथों का उद्धरण देकर रेखांकित करने की कोशिश की जाती थी कि व शूद्र है यानी निम्नतम वर्ण के हैं।" अनेक पुराने ग्रथों का सहारा लेकर दावा किया जाता था कि वे भरोसा करने लायक नहीं हैं। "याज्ञवल्यक्य स्मृति" और अनेक अन्य पुराने ग्रंथों के आधार पर कायस्थों द्वारा शोषण और परेशान करने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया जाता था।''

इन सब का उद्गम स्रोत राज्य प्रशासन के साथ कायस्थों के जुड़ाव मे देखा जा सकता है। राज्य प्रशासन की बढ़ती जटिलता तथा अभिलेखों को तैयार करने और सुरक्षित बनाए रखने के लिए विशेष ज्ञान और कौशल की जरूरत पड़ी। कालक्रम में वे लिपिक शासकों के लिए अपरिहार्य बन गए जिन्हें ये योग्यताएं प्राप्त थीं। आगे चलकर उनकी अपनी अलग जाति "कायस्थ" वन गई। गौतम, अपस्तंब, बौधायन, वशिष्ठ और मनु के प्राचीन धर्मशास्त्रों में 'कायस्थ' शब्द का कोई उल्लेख नहीं है। कौटिल्य के "अर्थशास्त्र" में भी यह शब्द नहीं मिलता।

"विष्णु संहिता" (VII/3) 12 में यह शब्द जरूर मिलता है मगर वहां इसका उल्लेख अधिकारी के लिए किया गया है। कहना न होगा कि कायस्थ अपने आचरण में काफी लचीले थे। वे आसानी से नए शासकों और नई परिस्थितियों से तालमेल बैठाने में माहिर थे। खाने-पीने में उन्हें कोई परहेज न था। मांस-मछली खाने और दारू पीने में कोई हिचक न थी।

प्रशासनिक मामलों की उनकी जानकारी बेजोड़ थी। वे कायदे-कानूनों तथा नजीरों की व्याख्या मनचाहे ढंग से कर रिश्वत कमाने में माहिर थे। कई बार जो उन्हें खुश नहीं करते उनके प्रति बेरहमी का बर्ताव करते नहीं हिचकते थे। कल्हण ने "राजतरंगिणी" में अनेक उदाहरणों को देकर बतलाया है कि कैसे कश्मीर के कई राजा अपने लालची कायस्थ मंत्रियों और अधिकारियों पर अंकुश लगाने में विफल होने के कारण अलोकप्रिय हो गए।

पांडुरंग वामन काणे के अनुसार कायस्थों का एक जाति विशेष के रूप में उदय मध्यकाल में ही हुआ। ईसा के जन्म के बाद की आरंभिक शताब्दियों के दौरान कायस्थ जाति सूचक शब्द नहीं था बल्कि मात्र पदसूचक था। संभवतः वह अधिकारी के लिए प्रयुक्त किसी विदेशी शब्द का समतुल्य था।" गुप्त काल में विशाखदत्त लिखित नाटक "मुद्राराक्षस" में शंकटदास नामक कायस्थ का जिक्र जरूर आता है।

बंगाल से बिहार को पृथक करने का आदोलन जब चल रहा था तब बिहारी कायस्थों और आदोलन के नेता सच्चिदानद सिन्हा के लिए काफी अपमानजक और ओछी बातें कही गई। कुछ विरोधियों ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उन कुछ फैसलों का जिक्र किया जिनमें कायस्थों को शूद्र कह कर सामाजिक दृष्टि से नीचा बतलाया गया था। राजकुमार लाल बनाम बिसेशर दयाल (1884, आईएलआर 10, कल 688), और असितामोहन घोष बनाम निरोदमोहन घोष मल्लिक (1920, एलआर, 47 आई.ए. 140 (145) में कायस्थों को शूद्र कहा गया था और हिदायत दी गई थी कि जायदाद और विरासत संबधी मामलों में उन्हें उच्च जाति वाले हिन्दुओं के समान अधिकार नहीं होंगे। इस प्रकार के मुकदमों में न्यायाधीशों ने अपने निर्णय का आधार श्यामाचरण सरकार की पुस्तक "व्यवस्था दर्पण" को बनाया।

एक मुकदमे में न्यायाधीशों ने यह व्यवस्था दी कि "हमारे न्यायालय में वर्षों से कायस्थों को शूद्र माना गया है और, इस प्रकार उनकी स्थिति के संबंध में अब कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।''

कहना न होगा कि इससे कायस्थों के आत्म सम्मान को धक्का लगा। उन्होंने सामाजिक तौर पर अपनी स्थिति बेहतर बनाने की भरसक कोशिश की। बिहार और संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) ने मिलकर 1887 में कायस्थ कांफ्रेंस की स्थापना की। इसके तहत बिहार और संयुक्त प्रांत के कायस्थों की 12 उपजातिया इकट्ठी हुईं। इनमें शामिल प्रत्येक उपजाति के विवाह संबंध अपने में ही होते थे यानी एक उपजाति का शादी संबंध दूसरी उपजाति में नहीं होता था। कायस्थ क्रांफ्रेंस का पहला अधिवेशन 1887 में लखनऊ में हुआ।

कायस्थ कांफ्रेंस की स्थापना मुख्यतया लखनऊ के एक अग्रणी वकील काली प्रसाद की पहल और वित्तीय समर्थन का परिणाम थी। वे श्रीवास्तव उपजाति के थे। वे बहुत धनवान मगर निःसंतान थे। उन्होंने अपने धन का इस्तेमाल अपनी जाति के बीच, शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए किया। उन्होंने 1873 में इलाहाबाद की मशहूर कायस्थ पाठशाला की स्थापना की। कायस्थ कांफ्रेंस के जन्म के काफी पहले ही उन्होंने कायस्थ धर्म सभा की स्थापना की थी और "कायस्थ समाचार" उर्दू पत्रिका निकाली थी।

याद रहे कि सभी प्रयासों के बावजूद कायस्थ कांफ्रेंस का जन्म काली प्रसाद के जीवनकाल में नहीं हो सका। उनका निधन 1886 में हुआ और वे अपनी लगभग सारी संपत्ति (जिसका मूल्य उस समय पांच लाख रुपये में अधिक था) पाठशाला को दे गए। उनकी मृत्यु के कुछ महीने बाद उनके दो घनिष्ठ सहयोगियों - हरगोविन्द दयाल और श्रीराम ने संयुक्त प्रांत और विहार के कायस्थों के नाम एक अपील जारी की। सच्चिदानंद सिन्हा के अनुसार यह अपील मुख्यतया अंग्रेजी पढ़े-लिखे कायस्थों के नाम थी।"

डुमरावं राज (जो मुगलसराय की ओर से बिहार में घुसते ही आता है) के दीवान जय प्रकाश लाल ने प्रथम कायस्थ कांफ्रेंस की अध्यक्षता की। वे बिहार के अत्यंत गणमान्य कायस्थों में थे और श्रीराम के रिश्तेदार थे।

उसी वर्ष सारे बिहार में 'कायस्थ सभा' की स्थापना हुई। शाहाबाद जिले के कायस्थों ने सभा की स्थापना करने और उसे मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं। पहला, जयप्रकाश लाल शाहाबाद जिले के थे। इस कारण वे प्रेरणा तथा समर्थन के स्रोत बने। दूसरा, शाहाबाद जिले के कायस्थ शिक्षा की दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक आगे थे। उनमें राजनीतिक एवं सामाजिक चेतना का स्तर काफी ऊंचा था। नवम्बर 1889 में अखिल भारतीय कायस्थ कांफ्रेंस का तीसरा अधिवेशन बांकीपुर (पटना) में हुआ जिसमें लगभग पांच हजार प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

यहां याद रखना चाहिए कि मुंशी काली प्रसाद कायस्थों के वर्ण से जुड़े कानूनी विवादों से संबंद्ध थे और जिस प्रकार कलकत्ता हाईकोर्ट ने सारे मामले को लिया था उससे उनके आत्म सम्मान को काफी धक्का लगा था। उनके निधन के वर्षों बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नार्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेज एंड अवध (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) के कायस्थों को क्षत्रिय घोषित कर दिया। इस निर्णय का श्रेय मरणोपरांत मुंशी काली प्रसाद को उनके प्रयासों और उनके द्वारा जुटाए गए प्रमाणों तथा साक्ष्यों को ही जाता है।"

भूलना नहीं चाहिए कि पीठ के पांच जजों में चार यूरोपीय थे। एक ही जज हिन्दुस्तानी था और वह भी मुसलमान। यह फैसला 1890 में एक अपील के सदर्भ में आया। इस प्रकार कायस्थ समुदाय बेहिचक हराया कर सकता था कि निर्णय निष्पक्ष और प्रामाणिक है।

वर्षों बाद पटना हाईकोर्ट ने इसी तरह का फैसला सुनाया। वर्ष 1927 में 48 पृष्ठों के फैसले में विश्वासोत्पादक तकों के आधार पर कायस्थों को सवर्ण घोषित किया गया। यह फैसला सर ज्वाला प्रसाद नामक जज ने लिखा था जो स्वयं एक कायस्थ थे। उनके अंग्रेज सहकर्मी ने फैसले पर सहमति जताई।

इतिहासकार प्रो. रामशरण शर्मा ने कायस्थों की सामाजिक स्थिति से जुड़े विवादों को लेकर निम्नलिखित बातें की हैं:

"राजाओं द्वारा पुरोहितों, मंदिरों और अधिकारियों को निरंतर भूमि या भूराजस्व हस्तांतरित करने के कारण मध्य काल के आरंभ में लिपिकों या कायस्थ समुदाय का उदय और विस्तार हुआ। बड़ी संख्या में लिपिकों और अभिलेखों की देखभाल करनेवालों की जरूरत पड़ी जो भूमि के दानपत्रों से जुड़े दस्तावेजों को तैयार करें और जमीन तथा गावों के अभिलेखों को देखभाल कर सकें। उन्हें अनुदान के तौर पर राजस्व के रूप में निरंतर बढ़ते हुए मदों का लेखा-जोखा रखना था। बंटवारे के कानूनों के कारण गुप्तकाल से भूमि के विखंडन ने पृथक् जोतों के विवरणों को बनाए रखना आवश्यक कर दिया था...। इसलिए गांवों और भूमि संबंधी अभिलेखों को सावधानीपूर्वक रखना जरूरी हो गया था जिससे लगातार उठने वाले विवादों से बचा जाय और उनका निपटारा किया जाय।

"यह सारा काम लिपिकों के एक वर्ग के द्वारा किया जाता था जो विभिन्न नामों, जैसे कायस्थ, कर्ण... आदि से जाने जाते थे.... आरंभ में कायस्थ दर्जनों प्रकार के लिपिकों और अभिलेख प्रभारियों का एक ही वर्ग था। कालक्रम में अन्य सब प्रकार के अभिलेख प्रभारी कायस्थ नाम से जाने गए। आरंभिक चरण में उच्च वर्णों के साक्षर सदस्यों को कायस्थ या लिपिक के रूप में समुदाय की राजकोषीय एवं प्रशासनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भर्ती किया गया... कितु शनैः शनैः विभिन्न वर्णों से जो लोग लिपिक के रूप में आए वे मूल वर्णों के साथ शादी-संबंधों तथा अन्य सामाजिक संबंधों के जरिए जुड़े थे और उन्होंने नए समुदाय को अपने सारे परस्पर सामाजिक व्यवहार सौंप दिए, उन्होंने वर्ण के अंदर और परिवार के बाहर शादी-संबंध बनाए। वर्णव्यवस्था के अंतर्गत कायस्थों के लिए कौन-सा स्थान नियत किया जाय, इसको लेकर ब्राह्मण विधि व्यवस्थापक दुविधा में पड़ गए और उन्होंने उन्हें शूद्रों और द्विजों, दोनों के साथ जोड़ दिया। चूंकि धर्मशास्त्र कायस्थों के उद्गम को लेकर अस्पष्ट है तथा ऐतिहासिक उदाहरण सिर्फ एक ही वर्ण तक सीमित नहीं है, इसीलिए हाल के समय में कलकत्ता हाईकोर्ट ने उन्हें शूद्र घोषित किया है जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ब्राह्मण।"

कायस्थ कांफ्रेंस की स्थापना के तुरंत बाद उसके सदस्यों ने अपने नाम के साथ 'सिन्हा' और 'वर्मा' जोड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों और कर्मकाण्ड को अपना लिया। जो कर्मकाण्ड परम्परापंथी नहीं उन्हें छोड़ दिया गया। कायस्थों ने यज्ञोपवित धारण करना शुरू कर दिया और वे सस्कृत पढ़ने लगे। बिहार और संयुक्त प्रान्त के कायस्थों ने कई किताबें (जैसे 'चित्रगुप्त उत्पत्ति प्रकाश', कायस्थ संस्कार प्रकाश' आदि) प्रकाशित की जिससे यह तथ्य उजागर हो कि वे ईश्वर के लिपिक पौराणिक चित्रगुप्त के वंशज हैं। "पदम् महापुराण". 'स्कंद पुराण' (भाग-।।।, प्रभाष खंड, 1-2), "गरुड़ पुराण', "शिव पुराण" (भाग-।।।, अनुच्छेद: उमा संहिता, अध्याय-VI, ई. डब्लू. हॉपकिंस की पुस्तक 'एपिकमाइथोलोजी' (पृ. 44, 87,113 और 218) आदि को समर्थन में उद्धृत किया गया। माना गया कि चित्रगुप्त की उत्पत्ति पौराणिक ब्रह्मा की काया से हुई। इसी से कायस्थ शब्द निकला।

समुदाय के हितपोषण के लिए अनेक पत्रिकाएं निकाली गई जैसे दरभंगा से "कायस्थ हितैषी" (जिसके संपादक महेश नारायण थे जिन्होंने आगे चलकर "द बिहार टाइम्स" का प्रकाशन किया) और "कायस्थ मेसेंजर"। इन पत्रिकाओं ने समुदाय की समान तकलीफों को उजागर किया जिनमें रोजगार के पर्याप्त अवसरों का अभाव, शिक्षा की सुविधाओं की कमी, और निम्न सामाजिक स्थिति शामिल थीं। सच्चिदानंद सिन्हा द्वारा संपादित "हिन्दुस्तान रिव्यू" ने भी "कायस्थ वर्ल्ड" से जुड़े समाचारों और गतिविधियों का एक नियमित स्तंभप्रकाशित किया। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों के दौरान तत्कालीन शाहाबाद जिले के सासाराम में एक कायस्थ इंस्टीट्यूट की स्थापना हुई।

बिहार के कायस्थ एक अन्य बात को लेकर चिढ़े हुए थे। मुस्लिम शासकों के दरबारों के साथ लम्बे अरसे से जुड़े होने के कारण उनकी जीवन शैली अन्य बिहारी हिन्दुओं से काफी कुछ अलग थी। खाने-पीने को लेकर कोई परहेज नहीं था। वे मुख्यतया सामिष थे। उनका दृष्टिकोण सांप्रदायिकता और कठमुल्लापन से परे था। उनकी खड़ी बोली हिंदी पर अवधी का असर था (उदाहरण के लिए वे "कहिन", खाइस. "बैठा जाए", आदि का प्रयोग करते थे)। ऐसा अवध के मुसलमान अफसरों के साथ संपर्क के कारण हुआ था। दस्तावेजों के लेखन के लिए जिस लिपि का इस्तेमाल वे करते थे वह 'कैथी' के नाम से प्रसिद्ध हुई। इन सब बातों के आधार पर कई दकियानूसी लोगों ने उन्हें हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों का करीबी बताना शुरू किया। कभी-कभी इससे तनाव की स्थिति पैदा हुई।

कायस्थ कांफ्रेंस का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य सामाजिक सुधार लाना था यद्यपि इस दिशा में शाहाबाद जिले के मुशी प्यारे लाल ने काफी पहले पहल शुरू कर दी थी। 1870 के दशक के पूर्वार्ध में उन्होंने एक आआंदोलन शुरू किया था जिसका उद्देश्य कायस्थों को व्याह-शादी में होनेवाले खर्च में कमी लाने के लिए प्रेरित करना था। उन्होंने हिसाब लगाया था कि तिलक समारोह में पचास हजार रुपए तक देना आम है। दुल्हन के मां-बाप की गाढ़ी कमाई के इन पैसों को अनुत्पादक मदों पर खर्च किया जाता था। बहुधा मां-बाप को पैसे जुटाने के लिए अपनी चल-अचल परिसंपतियों को बेचना भा बंधक रखना पड़ता था। इसके परिणामस्वरूप वर्षों ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक परिवार की कमाई की क्षमता और जीवन स्तर प्रभावित होता था। मुंशी प्यारे लाल तिलक समारोह में दी जानेवाली नकदी की अधिकतम सीमा इक्यावन रुपए निश्चित करने के पक्षधर थे। कुछ समय तक मुंशीजी ने निश्चित ही लोगों का ध्यान आकर्षित किया। उत्साहित होकर अपने आंदोलन को व्यापक बनाने की कोशिश की जिससे अन्य सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध मोर्चा खोला जा सके। यद्यपि आंदोलन बहुत दिनों तक नहीं चलाया जा सका फिर भी उसकी प्रतिध्वनि बार-बार सुनाई पड़ती रही। उदाहरण के लिए 1903 में मोतिहारी में आयोजित कायस्थ कांफ्रेंस के अधिवेशन ने छः वचन निर्धारित किए जिनमें से किन्हीं दो को लेना हर सदस्य के लिए अनिवार्य कर दिया गया। वचन इस प्रकार थे :

"मैं सत्यनिष्ठा पूर्वक घोषित करता हूं कि मैं निम्नलिखित वचनों में से कम से कम दो (जिनको मैंने निरस्त नहीं किया है) का हमेशा पालन करूंगा और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनका उल्लंघन यथाशक्ति नहीं करूंगा तथा अन्य लोगों को उनका पालन करने के लिए प्रोत्साहित करूंगा-

1. मैं अपने साधनों और क्षमताओं के अनुसार गरीब कायस्थों के बच्चों को शिक्षित करने के लिए सहायता और सहयोग दूंगा।

2. मैं द्विजधर्म के नियमों का पालन करूंगा।

3. मैं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शादी के करारदाद में शामिल नहीं होऊंगा।

4. मैं शादी या अन्य समारोहों में फिजूलखर्ची नहीं दिखलाऊंगा।

5. मैं अपनी उपजाति द्वारा बनाये गए या बनाए जानेवाले शादी-ब्याह के नियमों (दस्तूर उल-अमल शादी) का पालन करूंगा।

6. मैं बाल विवाह को रोकने और अनुत्साहित करने के लिए व्यावहारिक कदम उठाऊगा।

7. 8. आदि (इनके अंतर्गत समय-समय पर कांफ्रेंस की स्वीकृति से अन्य विषय शामिल किए जाएंगे।) 24

चूंकि सदस्यों को किन्हीं दो वचनों को निभाने की प्रतिज्ञा करनी थी, इसलिए वे आम तौर से 3-5 से कन्नी काट लेते थे जिससे कांफ्रेंस का उन पर कोप न हो।" कायस्थ मैसेंजर" के संपादक और अनेक वर्षों तक कांफ्रेंस के सचिव रहे फतह बहादुर निगम ने एक रजिस्टर रखा जिसमें उन सब लोगों के नाम दर्ज किए जाते रहे जो दहेज और शादी पर होनेवाले व्यय संबंधी निर्देशों का पालन करते थे। समय-समय पर इन और उन लोगों के नाम प्रकाशित किए जाते रहे जो दहेज और शादी संबंधी व्यय के सिलसिले में कांफ्रेंस के निर्देशों का उल्लंघन करते थे। इस प्रयास के वांछित परिणाम नहीं निकले।

बिहार के लगभग सब महत्वपूर्ण कायस्थ परिवार और व्यक्ति कांफ्रेंस की गतिविधियों से जुड़े थे। इनमें महेश नारायण, सच्चिदानन्द सिन्हा, राजेन्द्र प्रसाद, दीवान जयप्रकाश लाल, सूरजपुरा के राजा राजेश्वरी प्रसाद, आरा के हरवंश सहाय, रामनवमी प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, तिलौथू का राजपरिवार, बाघी का सहाय परिवार, शिकारपुर के दीवान जी का परिवार, आदि प्रमुख थे। हम जिक्र कर चुके हैं कि दीवान जय प्रकाश लाल कांफ्रेंस के पहले अध्यक्ष थे। 1925 में कायस्थ कांफ्रेंस के जौनपुर अधिवेशन की अध्यक्षता डा० राजेन्द्र प्रसाद ने की जिसमें कायस्थों की विभिन्न उपजातियों के बीच शादी-ब्याह पर जोर दिया गया।

सच्चिदानन्द सिन्हा ने कांफ्रेंस के पैतीसवें अधिवेशन की अध्यक्षता की जो 29 मार्च 1929 को दिल्ली में हुआ। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण का शीर्षक "जाति सम्मेलन और राष्ट्रीय प्रगति" रखा था जिसमें उन्होंने जाति संगठनों के निर्माण और अस्तित्व को उचित ठहराया था। उन्होंने जो कुछ कहा वह काफी दिलचस्प था :

"किसी समुदाय विशेष तक सीमित क्या कोई आआंदोलन अपनी गतिविधियों से देश की सामान्य प्रगति में सहायता दे सकता है.... दिवंगत डा०सर रामकृष्ण भंडारकर ने... इस सिलसिले में अपने विचार यों रखें हैं- हमारे बीच अनेक वर्षों से प्रतिक्रिया की एक लहर चल रही है। मैंने जाति क्लबों की स्थापना के बारे में सुना है और हाल में अनेक जातियों के नियतकालिक सम्मेलनों को देखा है। इन सम्मेलनों के पक्ष में बहुधा यह कहा जाता है कि वे इन समुदायों में समाज सुधार के जरिए हैं। जिस हद तक ऐसा होता है उस हद तक सम्मेलन लाभकारी है, किंतु जिस हद तक कोई समुदाय जो सम्मेलन करता या क्लब चलाता है अपने को अन्य सबसे अलग होने का दावा करता है वह जाति विभेद को कम करने के बदले सख्त बनाता है। इसलिए मेरे विचार से ये सम्मेलन और क्लब पीछे ढकेलने वाले हैं क्योंकि हमें अपनी सभाओं और सम्मेलनों के एक सूत्रबद्ध राष्ट्र की भावनाओं को ही अपना पथ-प्रदर्शक मानना चाहिए.... हमें इस बात को लेकर सदा जागरूक रहना चाहिए कि हमारे भाषण या कार्य किसी भी तरह राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से देश की प्रगति को रंगमात्र भी धक्का न पहुंचाएं।

".... यह समस्या उतनी सरल नहीं है जितनी पहली नजर में लगती है। यदि हम अपने भाषण या लेखन में जातिगत विभेदों को दरकिनार कर और एक सूत्रबद्ध राष्ट्र की चर्चा द्वारा सही अर्थ में भारतीय राष्ट्रीयता विकसित कर सकते तो इस सिलसिले में भरपूर वार्ता को देखते हुए हम काफी पहले अपने प्रयास में सफल हो गए होते। मगर दुर्भाग्यवश, तथ्य बड़े ही अनम्य होते हैं। और यह बेतुकी बात है कि हम अपनी वर्तमान सीमाओं को दरकिनार कर उन समाजशास्त्रीय परिस्थितियों से अपना पीछा छुड़ा लेंगे जिनमें हम हजारों सालों से रहते आए हैं। हमारी समाज व्यवस्था अनेक सहस्राब्दियों से जाति और उससे जुड़ी स्थितियों पर आधारित रही है। इसलिए उन अनेक समाजशास्त्रियों ने, जिन्होंने जातिव्यवस्था के उद्भव, विकास और इस देश की जनता पर उसके प्रभाव का अध्ययन किया है, यह निष्कर्ष निकाला है कि जब भी भारत उस राजनीतिक अर्थ में राष्ट्रीयता विकसित करने में समर्थ होगा जिसमें पश्चिमी देशों में लिया जाता है तब उसे जाति की व्यवस्था को हमारी अपनी आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालना और परिवर्तित करना होगा। न कि उसे नजरअंदाज या उसे संभावित सुपरिणामों के लिए इस्तेमाल करने से इंकार कर। अगर सही भावना से आगे बढ़ें... तो सच्ची एकता जो राष्ट्रीयता का एकमात्र आधार हो सकती है किसी समान विरोधी के अन्याय के प्रति भावना... के कारण नहीं। अतः जबतक देश के सारे समुदाय आत्मनिर्भर और आत्म-अभिव्यक्ति में सक्षम न होते तबतक सच्ची भारतीय राष्ट्रीयता का जन्म संभव नहीं है, क्योंकि पक्की एकता संपूर्ण संगठन के प्रत्येक अवयव के पूर्ण विकसित व्यष्टिवाद... का परिणाम होगी।"

उस जमाने के एक मशहूर पत्रकार ईश्वर शरण ने कांफ्रेंस को एक अलगाववादी तत्व कहकर उसकी आलोचना की थी। उनके अनुसार भारत की मुक्ति राष्ट्रवाद से ही हो सकती है। राष्ट्रवाद के विकास के मार्ग में जातियों और असंख्य जातियों द्वारा पैदा की गई अलगाव की भावना बाधक है। ऐसी स्थिति में कैसे कोई भारतीय राष्ट्रवादी जातिगत संगठनों में भाग ले सकता है? शरण के अनुसार कोई व्यक्ति जातिगत आंदोलन में तभी भाग लेकर जाति विशेष और राष्ट्र का भला कर सकता है जब वह हमेशा राष्ट्रवाद को सर्वोपरि मानता है। सच्चिदानन्द सिन्हा ने शरण की भावनाओं का आदर करते हुए उनसे सहमति जताई और उन्होंने एकत्र प्रतिनिधियों से आग्रह किया कि वे ऐसी कोई बात न कहें और न कोई ऐसा कार्य करें जिससे देश के हितों को धक्का लगे।"

पीछे मुड़कर देखने पर स्पष्ट होता है कि भंडारकर और ईश्वर शरण सही साबित हुए सिन्हा साहब चाहते हुए भी कांफ्रेंस के दृष्टिकोण को व्यापक नहीं बना पाए क्योंकि ऐसा करने से कांफ्रेंस के मूल उद्देश्य (कायस्थों के हितों की रक्षा और केवल उन्हें ही एक सूत्रबद्ध करना) को प्राप्त नहीं किया जा सकता था। हम आगे अपनी चर्चा के क्रम में देखेंगे कि सिन्हा साहब स्वयं अपनी जाति की संकुचित सीमाओं को नहीं लांघ पाए। उनके लिए यह त्रासदी ही थी कि उनके जैसा प्रतिभावान, बुद्धिमान और सुशिक्षित व्यक्ति अखिल बिहार के सर्वोच्च नेता और आधुनिक बिहार के जनक का दर्जा बनाए नहीं रख सका। दुःख की बात है कि अलग बिहार प्रान्त बनने के बाद उनकी हैसियत एक जाति नेता मात्र की हो गई।

कायस्थ कांफ्रेंस को यह अहसास था कि औद्योगीकरण के बिना बेरोजगारी की समस्या हल नहीं की जा सकती। उसने अपने सदस्यों को हर प्रकार से प्रेरित करने और उनकी मदद करने की कोशिश की कि वे आधुनिक उद्योगों की स्थापना करें। 1889 में हुए पटना अधिवेशन के समय से कायस्थ कांफ्रेंस अपने कार्यक्रम के अंग के रूप में व्यापारिक एवं औद्योगिक प्रदर्शनी लगाने लगा जिससे कायस्थ लोग उद्योग व्यापार में लगने के लिए प्रेरित हों तथा सरकारी नौकरियों पर उनकी निर्भरता कम हो। आगे चलकर मोतिहारी अधिवेशन में प्रतिनिधियों को शपथ दिलाई गई कि वे न केवल अनावश्यक सामाजिक एवं व्यक्तिगत खर्च को कम करें बल्कि क्लर्क की नौकरी के पीछे दौड़ने के बदले औद्योगिक उद्यमी बनें।

बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने अखिल भारतीय कायस्थ कांफ्रेंस के जौनपुर अधिवेशन में प्रतिनिधियों को अपने अध्यक्षीय भाषण के क्रम में कहा, "हमें निश्चित रूप से वैज्ञानिक गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए और व्यावसायिक एवं औद्योगिक उद्यमों तथा अपने सामाजिक और नैतिक जीवन के लिए उनसे फायदा उठाना चाहिए। मैं जिस चीज के खिलाफ हूं वह है आवश्यकताओं को व्यर्थ बढ़ाना और अपनी जिन्दगी को कृत्रिम बना देना।"

उन्होंने अपनी बिरादरी वालों से अपील की कि वे दिखावटी उपभोग. दहेज और शराब से दूर रहें।

चार वर्ष बाद सच्चिदानंद सिन्हा ने ऑल इंडिया कायस्थ कांफ्रेंस के पैंतीसवें अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा :

"हमारे युवकों की बेरोजगारी एवं आर्थिक परेशानी की इस समस्या का... एकमात्र हल यह है कि वे साहित्यिक विषयों या कानून का कम, और विज्ञान एवं तकनीकी विषयों का अधिक, प्रशिक्षण लें। उन्हें उद्योग के महान नायक तथा वाणिज्य के क्षेत्र में धुरधर बनने की आकांक्षा रखनी चाहिए न कि राज्य के तहत मात्र बड़े वकील अथवा बड़े अफसर बनने की। ''

अगले एक अध्याय में हम कायस्थों द्वारा कतिपय औद्योगिक उद्यमों की शुरूआत करने तथा आगे चलकर विफल होने के ऊपर प्रकाश डालेंगे। उनकी विफलता के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कारणों की चर्चा करेंगे।

आगे बढ़ने के पहले इस तथ्य को रेखांकित करने की आवश्यकता है कि कांफ्रेंस और उसके नेताओं ने अपने समुदाय की सामाजिक एवं आर्थिक दशा को सुधारने की दिशा में सच्चा प्रयास किया और उसको औद्योगिक एवं वाणिज्यिक गतिविधियों तथा वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा की दिशा में प्रेरित करने की कोशिश द्वारा अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया। इसके बावजूद कांफ्रेंस ने उस समय के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न देश की आजादी से अपने का दूर रखा। स्वतंत्रतापूर्व के दिनों में उसने अपने को ब्रिटिश सरकार के विश्वास पात्र के रूप में रखने की कोशिश की। शायद इसी कारण 1890 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के यूरोपीय जजों और 1927 में पटना हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति बकनिल्ल ने कलकत्ता हाई कोर्ट और प्रिवी काउंसिल के अरुचिकर फैसलों को बदलने में भरपूर सहयोग दिया। काफ्रेंस के अनेक महत्वपूर्ण नेताओं को उपाधियों से अंग्रेजों ने सम्मानित किया।

~गिरीश मिश्रा की पुस्तक बिहार में जातिवाद स्वतंत्रता पूर्व के अंश

🚩 क्या प्राचीन भारत में सच में छुआछूत और जातिगत शोषण था?या फिर यह झूठ हमें बार-बार पढ़ाया गया?चलिए, हज़ारों साल पुराने इ...
31/01/2026

🚩 क्या प्राचीन भारत में सच में छुआछूत और जातिगत शोषण था?
या फिर यह झूठ हमें बार-बार पढ़ाया गया?
चलिए, हज़ारों साल पुराने इतिहास से खुद जवाब ढूंढते हैं 👇
📜 वैदिक और प्राचीन भारत
🔹 सम्राट शांतनु ने मछुआरे की पुत्री सत्यवती से विवाह किया।
उनके पुत्र के लिए भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली — क्या यह शोषण था या त्याग?
🔹 महाभारत के रचयिता वेदव्यास मछुआरे कुल से थे, फिर भी महर्षि बने, गुरुकुल चलाया।
🔹 विदुर, दासी पुत्र होकर भी हस्तिनापुर के महामंत्री बने — विदुर नीति आज भी राजनीति का महाग्रंथ है।
🔹 भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।
🔹 श्रीकृष्ण ग्वाल परिवार में जन्मे,
🔹 बलराम हल धारण करने वाले कृषक थे।
फिर भी श्रीकृष्ण पूरे विश्व के पूजनीय बने और गीता दी।
🔹 राम के मित्र निषादराज उनके साथ गुरुकुल में पढ़े।
🔹 लव-कुश ने शिक्षा पाई वनवासी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में।
👉 साफ़ है —
📌 शिक्षा, सम्मान और पद योग्यता से मिलते थे, जन्म से नहीं।
📌 वर्ण काम के आधार पर थे — आज की भाषा में Division of Labour।
🏹 जनपद और साम्राज्य काल
🔹 नन्द वंश (मगध) — नाई कुल से उठकर सम्राट बने।
🔹 मौर्य वंश — मोर पालने वाले चंद्रगुप्त को ब्राह्मण चाणक्य ने भारत का सम्राट बनाया।
🔹 गुप्त वंश — घोड़े का व्यापार करने वाले, 140 वर्षों तक स्वर्ण युग।
👉 प्राचीन काल का 92% शासन उन्हीं वर्गों का रहा जिन्हें आज “दलित-पिछड़ा” कहा जाता है।
तो फिर शोषण कहाँ था?
⚔️ मध्यकाल और मराठा युग
🔹 बाजीराव पेशवा ने
— ग्वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया
— चरवाहा होलकर को मालवा का शासक।
🔹 अहिल्याबाई होलकर — शिवभक्त, मंदिर और गुरुकुलों की निर्माता।
🔹 मीरा बाई (राजपूत) के गुरु — चर्मकार रविदास,
और रविदास के गुरु — ब्राह्मण रामानंद।
👉 यहाँ भी कोई जातिगत दीवार नहीं दिखती।
⛓️ असल गंदगी कब शुरू हुई?
🔻 मुगल काल में — पर्दा, गुलामी, बाल विवाह।
🔻 अंग्रेज़ी शासन (1800–1947) में —
“Divide & Rule” और जाति की सख़्त दीवारें।
📚 अंग्रेज अधिकारी Nicholas Dirks की किताब “Castes of Mind” बताती है
कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद को मजबूत किया
और कैसे कुछ स्वार्थी नेताओं ने उसे राजनीति बना दिया।
🌍 मेगास्थनीज, फाहियान, ह्वेनसांग, अलबरूनी —
किसी भी विदेशी यात्री ने नहीं लिखा कि भारत में जातिगत शोषण था।
🚩 निष्कर्ष
👉 प्राचीन भारत = योग्यता, कर्म और समरसता
👉 जातिवाद = औपनिवेशिक साजिश + आधुनिक राजनीति
अगर इतिहास सच में जानना है,
तो किताबें पढ़िए — न कि प्रोपेगेंडा।
✊ सच कड़वा हो सकता है,
लेकिन इतिहास झूठ नहीं बोलता।

हिन्दू धर्म : जम्बू द्वीप में कहां था सुमेरू पर्वत?जम्बू द्वीप के आसपास 6 द्वीप थे- प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एव...
03/01/2026

हिन्दू धर्म : जम्बू द्वीप में कहां था सुमेरू पर्वत?

जम्बू द्वीप के आसपास 6 द्वीप थे- प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। जम्बू द्वीप धरती के मध्य में स्थित है और इसके मध्य में इलावृत नामक देश है। आज के कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया और चीन के मध्य के स्थान को इलावृत कहते हैं। इस इलावृत के मध्य में स्थित है सुमेरू पर्वत।

इलावृत के दक्षिण में कैलाश पर्वत के पास भारतवर्ष, पश्चिम में केतुमाल (ईरान के तेहरान से रूस के मॉस्को तक), पूर्व में हरिवर्ष (जावा से चीन तक का क्षेत्र) और भद्राश्चवर्ष (रूस), उत्तर में रम्यकवर्ष (रूस), हिरण्यमयवर्ष (रूस) और उत्तकुरुवर्ष (रूस) नामक देश हैं।

मिस्र, सऊदी अरब, ईरान, इराक, इसराइल, कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया, चीन, बर्मा, इंडोनेशिया, मलेशिया, जावा, सुमात्रा, हिन्दुस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान का संपूर्ण क्षेत्र जम्बू द्वीप था।

अगले पन्ने पर सुमेरू पर्वत का रोचक वर्णन...

इलावृत देश के मध्य में स्थित सुमेरू पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ, दक्षिण की ओर गंधमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नंदन कानन नामक वन हैं, जहां अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस (मानसरोवर)- ये चार सरोवर हैं। माना जाता है कि नंदन कानन का क्षेत्र ही इंद्र का लोक था जिसे देवलोक भी कहा जाता है। महाभारत में इंद्र के नंदन कानन में रहने का उल्लेख मिलता है।

सुमेरू के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक पर्वत हैं, जो अलग-अलग देश की भूमि का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुमेरू के उत्तर में नील, श्वेत और श्रृंगी पर्वत हैं, वे भी भिन्न-भिन्न देश में स्थित हैं।

इस सुमेरू पर्वत को प्रमुख रूप से बहुत दूर तक फैले 4 पर्वतों ने घेर रखा है। 1. पूर्व में मंदराचल, 2. दक्षिण में गंधमादन, 3. पश्चिम में विपुल और 4. उत्तर में सुपार्श्व। इन पर्वतों की सीमा इलावृत के बाहर तक है।

सुमेरू के पूर्व में शीताम्भ, कुमुद, कुररी, माल्यवान, वैवंक नाम से आदि पर्वत हैं। सुमेरू के दक्षिण में त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक और निषाद आदि पर्वत हैं। सुमेरू के उत्तर में शंखकूट, ऋषभ, हंस, नाग और कालंज आदि पर्वत हैं।
अगले पन्ने पर, अन्य पर्वत और गंगा नदी के स्वर्ग से उतरना...

अन्य पर्वत : माल्यवान तथा गंधमादन पर्वत उत्तर तथा दक्षिण की ओर नीलांचल तथा निषध पर्वत तक फैले हुए हैं। उन दोनों के बीच कर्णिकाकार मेरू पर्वत स्थित है। मर्यादा पर्वतों के बाहरी भाग में भारत, केतुमाल, भद्राश्व और कुरुवर्ष नामक देश सुमेरू के पत्तों के समान हैं। जठर और देवकूट दोनों मर्यादा पर्वत हैं, जो उत्तर और दक्षिण की ओर नील तथा निषध पर्वत तक फैले हुए हैं। पूर्व तथा पश्चिम की ओर गंधमादन तथा कैलाश पर्वत फैला है। इसी समान सुमेरू के पश्चिम में भी निषध और पारियात्र- दो मर्यादा पर्वत स्थित हैं। उत्तर की ओर निश्रृंग और जारुधि नामक वर्ष पर्वत हैं। ये दोनों पश्चिम तथा पूर्व की ओर समुद्र के गर्भ में स्थित हैं।

गंगा की नदियां : माना जाता है कि सुमेरू के ऊपर अंतरिक्ष में ब्रह्माजी का लोक है जिसके आस-पास इंद्रादि लोकपालों की 8 नगरियां बसी हैं। गंगा नदी चंद्रमंडल को चारों ओर से आप्लावित करती हुई ब्रह्मलोक (शायद हिमवान पर्वत) में गिरती है और सीता, अलकनंदा, चक्षु और भद्रा नाम से 4 भागों में विभाजित हो जाती है।

सीता पूर्व की ओर आकाश मार्ग से एक पर्वत से दूसरे पर्वत होती हुई अंत में पूर्व स्थित भद्राश्ववर्ष (चीन की ओर) को पार करके समुद्र में मिल जाती है। अलकनंदा दक्षिण दिशा से भारतवर्ष में आती है और 7 भागों में विभक्त होकर समुद्र में मिल जाती है। चक्षु पश्चिम दिशा के समस्त पर्वतों को पार करती हुई केतुमाल नामक वर्ष में बहते हुए सागर में मिल जाती है। भद्रा उत्तर के पर्वतों को पार करते हुए उतरकुरुवर्ष (रूस) होते हुए उत्तरी सागर में जा मिलती है।

पृथ्वी के मध्य में जम्बू द्वीप है। इसका विस्तार एक लाख योजन का बतलाया गया है। जम्बू द्वीप की आकृति सूर्यमंडल के सामान है। वह उतने ही बड़े खारे पानी के समुद्र से घिरा है। जम्बू द्वीप और क्षार समुद्र के बाद शाक द्वीप है, जिसका विस्तार जम्बू द्वीप से दोगुना है। वह अपने ही बराबर प्रमाण वाले क्षीर समुद्र से, उसके बाद उससे दोगुना बड़ा पुष्कर द्वीप है, जो दैत्यों को मदोन्मत्त कर देने वाले उतने ही बड़े सुरा समान समुद्र से घिरा हुआ है। उससे परे कुश द्वीप की स्थिति मानी गई है, जो अपने से पहले द्वीप की अपेक्षा दोगुना विस्तार वाला है। कुश द्वीप को उतने ही बड़े विस्तार वाले दही समान के समुद्र ने घेर रखा है। उसके बाद क्रोंच नामक द्वीप है; जिसका विस्तार कुश द्वीप से दोगुना है, यह अपने ही सामान विस्तार वाले घी समान समुद्र से घिरा है। इसके बाद दोगुना विस्तार वाला शाल्मलि द्वीप है; जो इतने ही बड़े ईख रस समान समुद्र से घिरा हुआ है। उसके बाद उससे दोगुने विस्तार वाले गोमेद (प्लक्ष) नामक द्वीप है; जिसे उतने ही बड़े रमणीय स्वादिष्ट जल के समुद्र ने घेर रखा है।

जम्बू द्वीप के मध्यभाग में मेरु पर्वत है, यह ऊपर से नीचे तक एक लाख योजन ऊंचा है। सोलह हजार योजन तो यह पृथ्वी के नीचे तक गया हुआ है और चौरासी हजार योजन पृथ्वी से ऊपर उसकी ऊंचाई है। मेरु के शिखर का विस्तार बत्तीस हजार योजन है। उसकी आकृति प्याले के सामान है। वह पर्वत तीन शिखरों से युक्त है, उसके मध्य शिखर पर ब्रह्माजी का निवास है, ईशान कोण में जो शिखर है, उस पर शंकरजी का स्थान है तथा नैऋत्य कोण के शिखर पर भगवान विष्णु की स्तिथि है।

मेरु पर्वत के चारों ओर चार विष्कम्भ पर्वत माने गए हैं। पूर्व में मंदराचल, दक्षिण में गंधमादन, पश्चिम में सुपार्श्व तथा उत्तर में कुमुद नामक पर्वत है। इनके चार वन हैं जो पर्वतों के शिखर पर ही स्थित हैं। पूर्व में नंदन वन, दक्षिण में चैत्र रथ वन, पश्चिम में वैभ्राज वन और उत्तर में सर्वतोभद्र वन है। इन्हीं चरों में चार सरोवर भी हैं। पूर्व में अरुणोद सरोवर, दक्षिण में मान सरोवर, पश्चिम में शीतोद सरोवर तथा उत्तर में महाह्रद सरोवर है। ये विष्कम्भ पर्वत पच्चीस पच्चीस हजार योजन ऊचे हैं। इनकी चोड़ाई भी हजार हजार योजन मानी गई है। मेरुगिरी के दक्षिण में निषध, हेमकूट और हिमवान- ये तीन मर्यादा पर्वत हैं। इनकी लम्बाई एक लाख योजन और चौड़ाई दो हजार योजन मानी गई है। मेरु के उत्तर में भी तीन मर्यादा पर्वत हैं- नील, श्वेत और श्रंग्वान। मेरु से पूर्व माल्यवान पर्वत है और मेरु के पश्चिम में गंधमादन पर्वत है। ये सभी पर्वत जम्बू द्वीप पर चारों ओर फैले हुए हैं। गंधमादन पर्वत पर जो जम्बू का वृक्ष है, उसके फल बड़े बड़े हाथियों के समान होते हैं। उस जम्बू के ही नाम पर इस द्वीप को जम्बू द्वीप कहते हैं।

पूर्व काल में स्वायम्भुव नाम से प्रसिद्ध एक मनु हुए हैं; वे ही आदि मनु और प्रजापति कहे गए हैं। उनके दो पुत्र हुए, प्रियव्रत और उत्तानपाद। राजा उत्तानपाद के पुत्र परम धर्मात्मा ध्रुव हुए, जिन्होंने भक्ति भाव से भगवान् विष्णु की आराधना करके अविनाशी पद को प्राप्त किया। राजर्षि प्रियव्रत के दस पुत्र हुए, जिनमें से तीन तो संन्यास ग्रहण करके घर से निकल गए और परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो गए। शेष सात द्वीपों में उन्होंने अपने सात पुत्रों को प्रतिष्ठित किया। राजा प्रियव्रत के ज्येष्ठ पुत्र आग्नीघ्र जम्बू द्वीप के अधिपति हुए। उनके नौ पुत्र जम्बू द्वीप के नौ खण्डों के स्वामी माने गए हैं, जिनके नाम उन्हीं के नामों के अनुसार इलावृतवर्ष, भद्राश्ववर्ष, केतुमालवर्ष, कुरुवर्ष, हिरण्यमयवर्ष, रम्यकवर्ष, हरीवर्ष, किंपुरुष वर्ष और हिमालय से लेकर समुद्र के भू-भाग को नाभि खंड (भारतवर्ष) कहते हैं।

नाभि और कुरु ये दोनों वर्ष धनुष की आकृति वाले बताए गए हैं। नाभि के पुत्र ऋषभ हुए और ऋषभ से ‘भरत’ का जन्म हुआ; जिनके आधार पर इस देश को भारतवर्ष भी कहते हैं।

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