14/11/2025
1937 से 2025 तक: भारतीय लोकतंत्र का सच — पैसा, प्रतीक, संघर्ष और अम्बेडकर की चेतावनी
1937 के चुनाव में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने बॉम्बे शहर की आरक्षित सीट से ‘मानूस’ (मनुष्य) के प्रतीक पर चुनाव लड़ा।
उनके पास न संसाधन थे, न बड़े चंदे, न कोई धनिक समर्थन — सिर्फ विचार, संघर्ष और समाज को जगाने की शक्ति।
फिर भी उन्होंने हिंदू महासभा समर्थित पी. बालू को मामूली अंतर से हराया।
पर यह जीत अम्बेडकर को लोकतंत्र की गहरी समस्या दिखाकर गई —
भारत में चुनाव पैसा तय करता है, सिद्धांत नहीं।
1940 में ‘जनता’ में अम्बेडकर ने लिखा कि बिना 5000 रुपये जुटाए (आज के लगभग 50 लाख रुपये) कोई साधारण व्यक्ति चुनाव में उतर ही नहीं सकता।
मतलब लोकतंत्र की दौड़ शुरू होने से पहले ही
गरीब, दलित, पिछड़े, महिला, मध्यमवर्गीय — सब बाहर हो चुके हैं।
सिर्फ वही दौड़ते हैं जिनके पीछे पैसा है या पार्टियों का संरक्षण।
अम्बेडकर ने समाधान भी दिया था —
राज्य द्वारा हर उम्मीदवार के खर्च की प्रतिपूर्ति (State Reimbursement System)
ताकि चुनाव बराबरी से लड़ा जा सके।
दुनिया के कई देशों ने यह मॉडल अपनाया भी।
पर भारत में इसे छूने की हिम्मत किसी भी राजनीतिक पार्टी ने नहीं की —
न तब, न आज।
क्यों?
क्योंकि जैसे ही राज्य खर्च उठाएगा —
कॉरपोरेट फंडिंग की ताकत खत्म
चुनाव में पैसों का वर्चस्व खत्म
टिकट बेचने का खेल खत्म
दलों का ‘हाई-कमान नियंत्रण’ कमजोर
स्वतंत्र उम्मीदवार भी ताकत के साथ खड़े हो सकेंगे
यानी पूरा राजनीतिक ढांचा बदल जाएगा —
और यही बदलाव कोई दल चाहता ही नहीं।
इसीलिए आज अगर आप मध्यमवर्गीय हैं,
तो आपकी बेटी चुनाव लड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकती
जब तक किसी पैसे वाले दल से न जुड़े।
मैं जीतने की बात नहीं कर रहा —
उतरने की क्षमता ही नहीं है।
इसीलिए भारत में
“लेवल प्लेइंग फील्ड”
सिर्फ भाषणों में है,
वास्तविकता में नहीं।
यहाँ मैदान झुका हुआ है—
और पैसा उसे और झुकाता है।
अम्बेडकर ने संसद, लोकतंत्र और वोट की ताकत को महान कहा,
पर बार-बार चेताया कि
राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता
जब तक सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र न हो।
वोट समान है,
पर अवसर समान नहीं।
कानून समान है,
पर स्थितियां समान नहीं।
आज 2025 में
अम्बेडकर की चेतावनी और भी सटीक लगती है।
भारत का लोकतंत्र मजबूत है,
पर उसकी जड़ें कमजोर हैं
क्योंकि असमानता,
पैसों की शक्ति,
और चुनाव की लागत
लोकतंत्र को भीतर से खोखला बनाती है।
भारत ने हमेशा प्रगतिशील सुधारों का विरोध किया है।
पर समय की गति ने देश को आगे बढ़ाया —
क्योंकि प्रगति अपरिहार्य है,
चाहे सरकार चाहे या न चाहे।
आज भी भारत आगे बढ़ रहा है,
पर टेढ़े रास्ते से,
अनचाही देरी के साथ,
और वैसे ही संघर्षों के बीच
जैसे 1937 में थे।
समानता का विचार पुराना है,
पर असमानता का ढांचा आज भी नया नहीं हुआ।