29/08/2026
किलाघाट में गूंजा पैगम्बर-ए-इस्लाम की सीरत का पैगाम, तीन दिवसीय जलसा-ए-सीरतुन्नबी का हुआ समापन
उलेमाओं ने कहा—नबी की शिक्षाओं को जीवन में उतारकर समाज को बेहतर बनाएं
दरभंगा। किलाघाट स्थित मदरसा हमीदिया प्रांगण में बुधवार से आयोजित तीन दिवसीय जलसा-ए-सीरतुन्नबी का शुक्रवार देर रात समापन हो गया। पैगम्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम के जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित इस धार्मिक एवं सामाजिक कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे उलेमाओं और शायरों ने हज़रत मुहम्मद साहब की सीरत, उनके आदर्श चरित्र और उनकी शिक्षाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।
बताया जाता है कि शहर के किलाघाट में लगभग 80 वर्षों से सामाजिक एवं जनसेवा के क्षेत्र में सक्रिय संस्था अंजुमन खुद्दाम-ए-मिल्लत की ओर से आयोजित इस जलसे में देर रात तक सैकड़ों लोगों की मौजूदगी रही। उलेमाओं की तकरीरों के साथ-साथ शायर-ए-इस्लाम और नातख्वानों की प्रस्तुतियों ने भी लोगों को देर रात तक जोड़े रखा।
जलसे में बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार की रात बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। वहीं शुक्रवार दिन में महिलाओं के लिए विशेष जलसे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं और लड़कियों ने भाग लिया।
जलसे की सरपरस्ती प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान एवं पीर हज़रत सैयद शमशुल्लाह जान उर्फ बाबू हुज़ूर ने की, जबकि अध्यक्षता मुफ्ती हज़रत गफ्फार शाकिब ने की। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल समेत विभिन्न राज्यों से आए विद्वानों ने शिरकत की।
प्रमुख वक्ताओं में वरिष्ठ प्रवक्ता एवं इस्लामिक स्कॉलर मुफ्ती हाशिम अशरफी (कानपुर), मुफ्ती शाकिब कादरी (वाराणसी), मौलाना शफीकुल्लाह चतुर्वेदी (दिल्ली), मौलाना अख्तर काशिफ (गिरिडीह) और शाकिर रजा (पटना) शामिल रहे। वहीं कोलकाता से पहुंचे शायर-ए-इस्लाम शकील एवं शादाब ने अपने कलाम और नातिया प्रस्तुतियों से श्रोताओं को प्रभावित किया। कार्यक्रम में करीब दो दर्जन स्थानीय उलेमाओं ने भी संबोधित किया, जबकि आधा दर्जन से अधिक शायरों ने अपने कलाम पेश किए।
महिलाओं के जलसे में शिक्षा और संस्कार पर जोर
शुक्रवार को आयोजित महिलाओं के विशेष जलसे की अध्यक्षता आलिमा शरबत फातिमा अमजदी ने की, जबकि संचालन आलिमा इफत सुब्हानी अमजदी ने किया। इस दौरान आलिमा हिना कादरी अमजदी, आलिमा बहारे रहमत अमजदी और आलिमा खुशनुमा नूरानी समेत अन्य आलिमाओं ने महिलाओं को संबोधित किया।
आलिमाओं ने इस्लाम में महिलाओं को प्राप्त अधिकारों, उनके सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारियों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने महिलाओं से अपनी बेटियों और आने वाली पीढ़ी को बेहतर शिक्षा देने के साथ उन्हें नैतिक मूल्यों, अच्छे संस्कारों और सामाजिक जिम्मेदारियों से जोड़ने की अपील की। वक्ताओं ने इस्लामी तहजीब और संस्कारों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने पर भी जोर दिया।
हज़रत मुहम्मद साहब की जिंदगी पूरी मानवता के लिए आदर्श
जलसे को संबोधित करते हुए उलेमाओं ने कहा कि हजरत मुहम्मद की जिंदगी और उनका चरित्र पूरी मानवता के लिए आदर्श है। उन्होंने लोगों से पैगम्बर-ए-इस्लाम की सीरत का अध्ययन करने और उनकी शिक्षाओं को अपने व्यवहार एवं जीवन में अपनाने की अपील की।
वक्ताओं ने कहा कि हज़रत मुहम्मद साहब की जिंदगी से सत्य, ईमानदारी, करुणा, सहिष्णुता, न्याय और मानव सेवा की प्रेरणा मिलती है। उनके आदर्शों को अपनाकर व्यक्ति न केवल अपने जीवन को बेहतर बना सकता है, बल्कि समाज के लिए भी सकारात्मक योगदान दे सकता है।
उलेमाओं ने कहा कि इस्लाम का मूल संदेश प्रेम, शांति, न्याय, समानता और इंसानियत पर आधारित है। समाज में आपसी भाईचारा, सद्भाव और एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने लोगों से इन मूल्यों को अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।
आयोजन को सफल बनाने वालों का जताया आभार
कार्यक्रम के समापन अवसर पर अंजुमन खुद्दाम-ए-मिल्लत के सचिव सैयद आफताब अशरफ ने जलसे को सफल बनाने में सहयोग करने वाले संस्था के पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं, स्थानीय नागरिकों और तमाम प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि संस्था की ओर से प्रत्येक वर्ष हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम के जन्मदिवस के अवसर पर जलसा-ए-सीरतुन्नबी आयोजित करने का उद्देश्य लोगों को पैगम्बर-ए-इस्लाम की जिंदगी, उनके आदर्श चरित्र और उनकी शिक्षाओं से परिचित कराना है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से समाज में शांति, भाईचारे, सद्भाव और इंसानियत के मूल्यों को और मजबूत करने का प्रयास किया जाता है।
तीन दिनों तक चले इस आयोजन का समापन धार्मिक एवं सामाजिक संदेशों के साथ हुआ। देर रात तक मैदान में लोगों की मौजूदगी रही।