28/11/2025
पुरानी डायरी और खाली कमरा
शहर की एक पुरानी और संकरी गली में एक छोटा-सा कमरा था, जहाँ प्रशांत अकेला रहता था। उसकी दुनिया एक कोने में रखी लकड़ी की मेज, कुछ धुंधली तस्वीरें और एक पुरानी, जर्जर डायरी तक सिमटी हुई थी।
प्रशांत की पत्नी, अदिति, उसे छोड़कर जा चुकी थी। कोई झगड़ा नहीं, कोई मनमुटाव नहीं; बस एक लंबी, शांत बीमारी जिसने उसे छीन लिया था। यह बात दो साल पुरानी थी, पर प्रशांत के लिए हर सुबह वही पहला दिन होती थी जब अदिति की हँसी उस कमरे में गूँजनी बंद हो गई थी।
कमरे की दीवारें अब भी हल्के नीले रंग की थीं, वही रंग जो अदिति ने चुना था। खिड़की से जब शाम की पीली रोशनी अंदर आती, तो प्रशांत को लगता जैसे वह उसकी परछाईं ढूंढ रहा हो।
हर रात सोने से पहले, प्रशांत अपनी लकड़ी की मेज पर बैठता और पुरानी डायरी खोलता। यह डायरी अदिति की थी। डायरी के पहले पन्ने पर एक छोटी सी कविता थी, जिसमें लिखा था:
> हर खुशी तेरे नाम, हर दुःख मेरा हो,
> साथ न हो अगर, तो फिर सवेरा न हो।
>
कविता के नीचे अदिति की पेंसिल से बनी एक छोटी सी मुस्कान थी। प्रशांत उस मुस्कान को घंटों देखता रहता, और फिर अपनी उंगली से उस मुस्कान को छूता।
एक शाम, प्रशांत डायरी पलट रहा था। अंतिम पन्ने खाली थे, सिवाय एक जगह के जहाँ अदिति ने अपनी अंतिम साँस लेने से कुछ दिन पहले लिखा था। वह स्याही थोड़ी फीकी थी:
> "प्रशांत, उदास मत होना। मैंने तुम्हें हमेशा हँसते हुए देखा है, और मैं चाहती हूँ कि जब मैं न रहूँ, तब भी तुम वैसे ही रहो। इस कमरे में मेरी यादें हैं, पर तुम्हारी ज़िंदगी इस कमरे से बाहर है। खिड़की खोलो, बाहर देखो। मैं वहाँ मिलूँगी... हर नए फूल में, हर आती हुई हवा में।"
>
प्रशांत की आँखें भर आईं। वह उठकर खिड़की के पास गया और उसे खोल दिया। ठंडी हवा का एक झोंका अंदर आया, जिसने टेबल पर रखी डायरी के पन्नों को एक बार में पलट दिया।
उसने बाहर देखा। गली में बच्चे खेल रहे थे। एक छोटी-सी बच्ची अपने लाल गुब्बारे को ऊँचाई तक उड़ाने की कोशिश कर रही थी और जोर से हँस रही थी। प्रशांत ने अपनी हथेली में डायरी के पन्ने की गरमाहट महसूस की और फिर उसने गहरी साँस ली।
वह जानता था कि उसका दुःख कभी पूरी तरह खत्म नहीं होगा, पर आज पहली बार, उस खाली कमरे में उसे अदिति की आवाज़ नहीं, बल्कि उसकी इच्छा सुनाई दी थी—'हँसते हुए रहो।'
प्रशांत ने अपनी आँखें पोंछी। उसने डायरी बंद की और उसे मेज पर एक तरफ रख दिया। आज रात, वह पहली बार उस कविता को नहीं पढ़ेगा। वह कमरे की खिड़की को खुला छोड़ेगा, ताकि अगली सुबह की हवा अंदर आ सके, और शायद वह उस बच्ची की हँसी में अदिति को ढूंढ सके।
कमरा अब भी खाली था, पर अब प्रशांत को लग रहा था, शायद, अब कमरा उसके अकेलेपन से थोड़ा कम भरा हुआ है।
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