26/05/2026
“देश बचाने निकले लोग… शायद देश को ही बाँट रहे !”
यह किस दिशा में चल पड़े हैं हम सब? कौन-सी मंज़िल है हमारी और जाना आखिर कहाँ है? समझ में अब कुछ आता नहीं। कभी लगता है हम देश को विकसित कर रहे हैं, फिर सोशल मीडिया खोलते ही एहसास हो जाता है कि नहीं… हम तो बस नए-नए तरीकों से एक-दूसरे से नफरत करना सीख रहे हैं।
अब हाल यह है कि आदमी सुबह उठते ही सबसे पहले यह तय करता है कि आज किससे नफरत करनी है — धर्म से, जाति से, प्रदेश से या भाषा से। देश बाद में याद आता है, दुश्मन पहले खोज लिया जाता है।
जब मेरा जन्म हुआ तब देश को आज़ाद हुए 24 साल हो चुके थे। भारत अपनी सिल्वर जुबली की तैयारी कर रहा था। जब समझ आने लगी तब देश स्वर्ण जयंती मना रहा था। उस दौर में लोगों को यह नहीं सिखाया जाता था कि सामने वाला हिंदू है या मुसलमान, ऊँची जाति का है या नीची जाति का, उत्तर का है या दक्षिण का। तब नेताओं के भाषणों में “एकता” और अखंडता की बात होती थी। नफरती “एजेंडा” नहीं होता था ।
फिर हमने वह समय भी देखा जब देश की प्रधानमंत्री Indira Gandhi की हत्या हुई। देश रो रहा था। लोग सड़कों पर थे। नारे लग रहे थे — “जब तक सूरज चाँद रहेगा…”। लेकिन मज़े की बात देखिए, जहां भीड़ को सिख धर्म के प्रति उत्साया जा रहा था तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोग सिख समाज की रक्षा के लिए खड़े थे। उस भीड़ में किसी ने किसी से यह नहीं पूछा कि “पहले अपना धर्म बताओ, फिर श्रद्धांजलि देना।”
आज तो श्रद्धांजलि भी विचारधारा देखकर दी जाती है।
अब देशभक्ति का नया संस्करण आ चुका है। पहले लोग देश के लिए लड़ते थे, अब देश के अंदर धर्म के लिए लड़ रहे हैं। कोई धर्म के नाम पर सेना बना रहा है, कोई जाति के नाम पर क्रांति कर रहा है, कोई प्रदेश के नाम पर नफरत बेच रहा है। और सबसे मजेदार बात — हर कोई खुद को “राष्ट्रवादी” भी घोषित किए बैठा है।
कभी हिंदू-मुसलमान, फिर जाति, अब क्षेत्रवाद। उत्तर भारतीय बनाम दक्षिण भारतीय, पहाड़ी बनाम मैदानी, पूर्वोत्तर बनाम बाकी भारत। अभी हाल में सोशल मीडिया पर एक महान ज्ञानी बता रहा था कि “उत्तराखंड को हरियाणा पाल रहा है।” उधर जवाब में दूसरे महापुरुष पूरे हरियाणा को गालियाँ देने लगे।
वाह! एक आदमी बेवकूफ निकला, तो बदले में करोड़ों लोगों को बेवकूफ घोषित कर दो। यही है नया डिजिटल राष्ट्रवाद।
अब स्थिति यह है कि किसी प्रदेश का एक आदमी गलत क्या बोल दे, लोग पूरे प्रदेश को दुश्मन मान लेते हैं। जैसे राज्यों में इंसान नहीं, एक ही साँचे में ढले रोबोट रहते हों।
राजनीति भी क्या कमाल का खेल खेल रही है। वोट चाहिए तो जनता को बाँटो। धर्म में बाँटो, जाति में बाँटो, भाषा में बाँटो, क्षेत्र में बाँटो। और अगर कुछ न मिले तो सोशल मीडिया पर दो फर्जी वीडियो डाल दो — जनता खुद एक-दूसरे का गला पकड़ लेगी।
देश बचाने का शोर इतना ज़्यादा है कि अब सच में डर लगने लगा है। क्योंकि इतिहास गवाह है — जिन देशों में सबसे ज्यादा “धर्म बचाओ” के नारे लगे, अक्सर वहीं सबसे पहले समाज टूटा।
सबको धर्म बचाना है, बस कोई इंसान बचाना नहीं चाहता।
सच कहूँ तो डर अपनी जान का नहीं है। डर इस बात का है कि जिन लोगों ने कुर्बानियाँ देकर यह देश बनाया, कहीं हम उनकी मेहनत को ट्रोल, नफरत और राजनीतिक दुकानों में बेच तो नहीं रहे?
हम आज़ादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे, क्योंकि हमारा जन्म बाद में हुआ। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि देश तोड़ने का लाइसेंस मिल गया?
भारत सिर्फ नक्शे पर बना एक भूभाग नहीं है। यह अलग-अलग भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों और प्रदेशों से मिलकर बनी हुई साझी आत्मा है। अगर हर कोई अपने-अपने हिस्से का भारत लेकर बैठ जाएगा, तो अंत में बचेगा क्या?
और फिर शायद आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी —
“देश को सबसे ज्यादा नुकसान किसने पहुँचाया?”
तो जवाब होगा —
“उन लोगों ने, जो हर समय धर्म बचाने का दावा कर रहे थे।”