24/08/2026
विकास की दौड़ में सुरक्षा का सवाल
पीपलकोटी टनल हादसे ने एक बार फिर उस मूल सवाल को सामने ला खड़ा किया है कि आखिर हिमालयी राज्य उत्तराखंड में बन रहे बड़े बांध और सुरंग कितने सुरक्षित हैं? विकास की जरूरत और ऊर्जा उत्पादन की महत्वाकांक्षा के बीच क्या हिमालय की संवेदनशीलता को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है? यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि उत्तराखंड भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में आता है और यहां की पहाड़ी संरचना सामान्य मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक जटिल और नाजुक है। जलविद्युत परियोजनाएं उत्तराखंड की ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। राज्य में कई बड़ी परियोजनाएं नदियों के प्रवाह और पहाड़ों के भीतर बनाई जा रही लंबी सुरंगों पर आधारित हैं। लेकिन हिमालय में सुरंग निर्माण केवल इंजीनियरिंग की चुनौती नहीं है, बल्कि यह प्रकृति की अनिश्चितताओं से लगातार मुकाबला भी है। विशेषज्ञों के अनुसार हिमालयी सुरंगों में पानी का दबाव, कमजोर चट्टानें, भूगर्भीय दरारें और अचानक होने वाले भू-परिवर्तन बड़ी चुनौती बनते हैं।
उत्तराखंड में इससे पहले भी कई घटनाएं यह संकेत दे चुकी हैं कि पहाड़ों के भीतर बड़े निर्माण कार्यों में अतिरिक्त सतर्कता की आवश्यकता है। वर्ष 2021 की ऋषिगंगा-धौलीगंगा आपदा में तपोवन-विष्णुगाड जलविद्युत परियोजना को भारी नुकसान पहुंचा था। ग्लेशियर टूटने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने बांध और टनल क्षेत्र को प्रभावित किया था और बड़ी संख्या में श्रमिकों की जान चली गई थी। वर्ष 2023 में सिलक्यारा सुरंग हादसे ने भी देश को दिखाया कि हिमालयी भूगर्भ में काम करना कितना चुनौतीपूर्ण है।
पीपलकोटी की घटना इसी चिंता को और गहरा करती है। विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना में लंबी सुरंगों और भूमिगत संरचनाओं का निर्माण हो रहा है। परियोजना से जुड़े तकनीकी दस्तावेजों में भी हिमालयी क्षेत्रों में भूगर्भीय परिस्थितियों, पानी के दबाव और निर्माण संबंधी चुनौतियों का उल्लेख किया गया है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि हर परियोजना में केवल निर्माण की गति नहीं, बल्कि सुरक्षा की गुणवत्ता सबसे बड़ा मानक हो। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या परियोजनाओं की सुरक्षा जांच केवल निर्माण शुरू होने से पहले की प्रक्रिया तक सीमित है या समय-समय पर वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर समीक्षा भी होती है? क्या पहाड़ के भीतर होने वाले छोटे बदलावों, पानी के रिसाव या चट्टानों की हलचल को गंभीर चेतावनी के रूप में लिया जाता है? यदि किसी स्थान पर खतरे के संकेत पहले से दिखाई दे रहे हों तो क्या तत्काल काम रोकने और श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की व्यवस्था प्रभावी है? बांध और टनल की सुरक्षा केवल तकनीकी डिजाइन से तय नहीं होती। इसके लिए लगातार निगरानी, मजबूत आपदा प्रबंधन तंत्र, स्थानीय भूगर्भीय अध्ययन और श्रमिक सुरक्षा जरूरी है। केवल आधुनिक मशीनों और विशेषज्ञों की मौजूदगी पर्याप्त नहीं है, बल्कि हर स्तर पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।
उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां एक ओर जलविद्युत उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं, वहीं दूसरी ओर हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी भी है। इसलिए विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जो पहाड़ों की क्षमता और सीमाओं दोनों को समझे। बड़े बांध और सुरंगें राज्य की जरूरत हो सकती हैं, लेकिन इनके निर्माण में यदि सुरक्षा की अनदेखी होती है तो यही विकास भविष्य में विनाश का कारण बन सकता है। पीपलकोटी हादसे के बाद अब केवल जांच रिपोर्ट का इंतजार पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि राज्य की सभी निर्माणाधीन और संचालित जलविद्युत परियोजनाओं का स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट कराया जाए। यह देखा जाए कि क्या वर्तमान सुरक्षा मानक हिमालय की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप हैं। क्योंकि सवाल केवल एक टनल या एक परियोजना का नहीं है, बल्कि उन हजारों श्रमिकों की जिंदगी का है जो पहाड़ों के भीतर राष्ट्र निर्माण के काम में लगे हैं। उत्तराखंड में विकास की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। सड़कें, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं और आधारभूत ढांचा राज्य की आर्थिक मजबूती के लिए जरूरी हैं, लेकिन विकास की कीमत मानव जीवन नहीं हो सकती। हिमालय में विकास का रास्ता प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही तय करना होगा।
पीपलकोटी हादसा चेतावनी है कि पहाड़ों में बड़े प्रोजेक्ट केवल इंजीनियरिंग की परीक्षा नहीं होते, बल्कि वे सुरक्षा, पर्यावरण और मानवीय संवेदनशीलता की भी कसौटी होते हैं। अब समय आ गया है कि हर परियोजना की सुरक्षा समीक्षा केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीन पर उसकी प्रभावी निगरानी सुनिश्चित की जाए, क्योंकि पहाड़ों में एक छोटी चूक भी कई परिवारों के जीवन में बड़ा अंधेरा ला सकती है। हिमालय उत्तराखंड की पहचान है, लेकिन यही हिमालय सबसे बड़ी चुनौती भी है। इसलिए यहां विकास की हर सुरंग और हर बांध को प्रकृति के साथ संतुलन और सुरक्षा की कसौटी पर खरा उतरना होगा।