09/01/2026
ज्योतिष शास्त्र में भद्रा को काल का एक विशिष्ट भाग माना गया है। शास्त्रों में इसके स्वभाव और परिणामों को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं।
यहाँ भद्रा से संबंधित महत्वपूर्ण श्लोक और उनकी व्याख्या दी गई है:
1. भद्रा की उत्पत्ति और स्वभाव
भद्रा को सूर्य की पुत्री और शनि देव की बहन माना जाता है। इनके स्वभाव को लेकर ज्योतिष ग्रंथों में कहा गया है:
"न भद्रायां कृतं कार्यं सिद्धिं गच्छति कर्हिचित्।"
अर्थ: भद्रा काल में किया गया कोई भी (शुभ) कार्य कभी भी सिद्धि (सफलता) को प्राप्त नहीं होता।
2. भद्रा में वर्जित कार्य
मुहूर्त चिंतामणि और अन्य ग्रंथों के अनुसार, भद्रा में कौन से कार्य नहीं करने चाहिए, इसके लिए यह श्लोक प्रसिद्ध है:
"तस्मिन् भद्रादिदोषे तु न कुर्यान्मंगलादिकम्।
विवाहं व्रतबन्धं च यात्रां च गृहवेशनम्॥"
अर्थ: भद्रा के दोष के समय मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिए, जैसे:
विवाह: शादी-ब्याह।
व्रतबन्ध: उपनयन या यज्ञोपवीत संस्कार।
यात्रा: किसी नए स्थान के लिए प्रस्थान।
गृहवेशनम्: गृह प्रवेश।
3. भद्रा का वास (स्थान निर्णय)
भद्रा का फल इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस लोक में है। इसके लिए चंद्रमा की स्थिति देखी जाती है:
"स्वर्गे भद्रा शुभं कुर्यात् पाताले च धनागमम्।
मृत्युलोके स्थिता भद्रा सर्वकार्यविनाशिनी॥"
व्याख्या:
स्वर्ग लोक: यदि चंद्रमा मेष, वृष, मिथुन या वृश्चिक राशि में हो, तो भद्रा स्वर्ग में होती है और शुभ फल देती है।
पाताल लोक: यदि चंद्रमा कन्या, तुला, धनु या मकर राशि में हो, तो भद्रा पाताल में होती है और धन लाभ कराती है।
मृत्यु लोक (पृथ्वी): यदि चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन राशि में हो, तो भद्रा पृथ्वी पर होती है। यही भद्रा "सर्वकार्यविनाशिनी" (सभी कार्यों का नाश करने वाली) मानी जाती है।
4. भद्रा मुख और पुच्छ (आपातकाल के लिए)
यदि कोई कार्य अत्यंत अनिवार्य हो, तो भद्रा के 'पुच्छ' भाग का उपयोग किया जा सकता है:
"भद्रा मुखे कार्यविनाशनी स्यात्, पुच्छे तु सिद्धिश्च जयप्रदा स्यात्।"
अर्थ: भद्रा के मुख में कार्य करने से विनाश होता है, लेकिन भद्रा के पुच्छ (पूंछ) भाग में कार्य करने से सिद्धि और विजय प्राप्त होती है।