09/11/2017
देहरादून। उत्तराखंड आज अपनी स्थापना के 17 वर्ष पूरा कर चुका है और 18वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। दशकों तक चले आंदोलनों, शहीदों की शहादत और लाखों सपनों उम्मीदों के साथ राज्य की स्थापना हुई थी। शुरुआती दौर से ही उत्तराखंड को पड़ोसी राज्य हिमाचल से सीखने की सलाह मिलती रही। हजारों लेख स्थापना दिवस से लेकर कई मौकों पर विभिन्न अखबारों, पत्र पत्रिकाओं में छपते रहे कि उत्तराखंड को विकास कार्यों को लेकर पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश से सीख लेनी चाहिए। दोनों राज्यों की भौगोलिक, सांस्कृतिक स्थिति एक सी है, हिमाचल की शायद कई मायनों में ज्यादा दुष्कर। खैर, हिमाचल प्रदेश की स्थापना उत्तराखंड से करीब चार दशक पहले हो चुकी थी और प्रति व्यक्ति आय हो या संपन्नता या फिर संसाधनों को लेकर हिमाचल समान परिस्थितियों के बावजूद उत्तराखंड से मीलों आगे दिखता है। उत्तराखंड राज्य जो आज 18 वर्ष का हो रहा है, हर स्थापना दिवस के साथ ही उन उम्मीदों, आंकक्षाओं को तोड़ता नजर आया है जिसके लिए इस राज्य की स्थापना को लंबे आंदोलन चले थे, कई लोगों ने अपनी शहादत दी थी। ऐसे में हर उत्तराखंडी के जेहन में सवाल उठता रहता है कि क्यों उत्तराखंड हिमाचल प्रदेश से सबक नहीं लेता। उत्तराखंड में जहां सभी गांवों को सड़क से जोड़ना दूर की कौड़ी नजर आता है तो हिमाचल प्रदेश समुद्रतट से साढ़े 12 हजार फीट की ऊंचाई पर महज छह गांवों को जोड़ने के लिए सड़क पहुंचा देता है, जबकि उत्तराखंड में इतनी ऊंचाई पर सड़क तो दूर की बात ढंग के ट्रैक तक नहीं बन सके है। बागवानी, पर्यटन ने हिमाचल की तकदीर बदल दी। हालांकि, दोनों की संभावनाएं उत्तराखंड में भी बराबर ही है लेकिन इस राज्य ने इन दोनों पर ही कभी ध्यान देने की जेहमत नहीं उठाई। उत्तराखंड में चारधाम को छोड़ दे तो सरकारों ने कभी बारहमासा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कोई ढंग की योजना तक नहीं चलाई। हजारों बुग्यालों में जहां पर्यटन की अपार संभावनाएं है वहां ढंग के ट्रैक तक नहीं है तो हिमाचल ने चाईंशील जैसे बुग्याल जो समुद्रतल से साढ़े बारह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है उसे दस वर्ष पहले सड़क से जोड़ दिया। कसौल, कूल्लू मनाली, धर्मशाला, किन्नौर, रिकांगपिओ, चितकुल जैसे कई प्रमुख पर्यटन स्थलों पर सालभर पर्यटकों का तांता लगा रहता है लेकिन उत्तराखंड में चारधाम में छह महीने के सीजन में ही पर्यटन व्यवसाय सिमट कर रह गया है। हिमाचल प्रदेश फिलम निर्माताओं की पसंदीदा जगह बनी रही है लेकिन जिस फिल्म निर्माता निर्देशक ने उत्तराखंड में फिल्मों की शूटिंग की कोशिश की यहां की बेढंग नीति और महंगे शुल्कों की वजह से वह यहां दोबारा लौट कर नहीं आया। हिमाचल से सीखने की जरूरत है जहां हर गांव, हर बगीचे को सड़क से जोड़ने की मुहिम चलाई गई जिससे किसानों की उपज बाजार तक पहुंच सके। हालांकि, ज्यादातर सड़कों की हालत खराब है पर किसानों की उपज तो बाजार तक पहुंच ही जाती है, जहां सड़के नहीं वहां छोटे छोटे रोपवे के जरिए उपज को सड़क तक पहुंचाया जाता है, लेकिन उत्तराखंड में इस ओर कभी ही शायद सरकार का ध्यान गया हो। उत्तरकाशी के नाल्ड कठूड क्षेत्र में सीजनल सब्जी और ककड़ी का वृहद पैमाने पर उत्पादन होता है। सड़क से दूर बसे इन गांवों के ग्रामीणों को छह किमी की पैदल दुर्गम दूरी नाप पीठ पर ढोकर अपनी ककड़ी को सड़क तक पहुंचाना होता है जहां से उन्हें बिचौलियां औने पौने दामों पर लूट लेते है। इन गांवों में छेाटे छोटे रोपवे की संभावनाएं थी जिससे इन किसानों की मेहनत से उगाई ककड़ी आसानी से सड़क तक पहुंचे पसीने से तरबतर होकर अपनी लागत को औने पौने दामों पर न बेचना पड़े और या कीमत के बराबर खच्चर की ढुलान ने देनी पड़े। इसे कुछ इस तरह समझे कि इस साल आलू बेहद कम कीमतों पर बिका। उत्तरकाशी का सालंग गांव सड़क से छह किमी दूरी पर है। आलू चार सौ रुपये क्विंटल के दाम पर बिका और यहां के ग्रामीणों को सड़क तक पहुंचाने के लिए आलू के हर क्विंटल पर दो सौ रुपये खर्च करने पड़े। जबकि, एक अदद छोटा रोपवे होता तो शायद यह ढुलान की लागत बच जाती। लेकिन, हमें क्या सिर्फ हिमाचल से ही सबक लेना चाहिए। क्यों सरकारी नीतियों को अपनाने भर से हम हिमाचल की तरह विकास की पटरी पर आ सकते हैं। शायद नहीं, हिमाचल की जिस तस्वीर को देख हमें उत्तराखंड राज्य को उसी तरह सजाने संवारने की बात करते हैं उसके पीछे छिपा है हिमाचलवासियों की अथक मेहनत पर समर्पण। हिमाचल में सड़कों अगर जाल बिछा है और हर गांव हर सेब के बागीचे तक सड़क पहुंची है तो इसके पीछे हिमाचलवासियों का त्याग भी महत्वपूर्ण है। हिमाचल प्रदेश में सड़क बनवाने की पहली शर्त है कि बिना मुआवजा लिए यह शपथ पत्र देना कि सड़क के लिए खेत का जो हिस्सा खोदा जाएगा मुझे कोई एतराज नहीं होगा। किसान भी सड़क के लिए बिना मुआवजा लिए खुशी खुशी अपनी खेती को सरकार को सौंप देते हैं। जिस सेब की वजह से हिमाचल की आर्थिक स्थिति के साथ ही यहां के जन जन की स्थिति सुधरी उसके लिए भी हिमाचलवासियों का त्याग नकारा नहीं जा सकता। रोहडू के किसी दुर्गम गांव में एक किसान ने बातचीत के दौरान बताया कि करीब बीस साल पहले जब सेब लगाने का जोखिम लिया तो सब की तरह की खेती को अलविदा कहना पड़ा और शुरुआती पांच सालों तक मजदूरी करके पेट भरना पड़ा पर खेत सारे सेब के नाम कुर्बान कर दिए थे, नतीजा आज सामने हैं, वह किसान हर साल तीन करोड़ रुपये के सेब बेचता है। दुर्गम क्षेत्र में आलीशान मकान व बेहतरीन गाड़ी का मालिक। हिमाचल में सरकार की नीतियां और आम आदमी की मेहनत ने हिमाचल को हिमालयी प्रदेशों में सिरमौर बनाया है। हालात वहां के भी उत्तराखंड जैसे हैं बस वहां नेता और आम जन अपने राज्य के प्रति ईमानदार है। वहां यह प्रथा तो नहीं है कि जिसको मौका मिले वह अपने हिस्से के संसाधन लूट ले।
देहरादून। उत्तराखंड आज अपनी स्थापना के 17 वर्ष पूरा कर चुका है और 18वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। दशकों तक चले आंदोलनों, शहीदों की शहादत और लाखों सपनों उम्मीदों के साथ राज्य की स्थापना हुई थी। शुरुआती दौर से ही उत्तराखंड को पड़ोसी राज्य हिमाचल से सीखने की सलाह मिलती रही। हजारों लेख स्थापना