25/07/2021
डॉ बाबासाहेब आंबेडकर और महात्मा गांधी के विवाद जगजाहिर थे, दोनों ही अपने अपने तरीके से जाति को खत्म करने का उदाहरण देते थे, जहाँ बाबा साहब अंबेडकर की सोच दूरदर्शिता वाली था,उनकी परिकल्पना एक अखंड राष्द्र की थी वे चाहते थे कि हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था यानि
चार्तुवर्ण सिद्धांत और उससे उत्पन्न जातियों को समाप्त किया जाय, वही तथाकथित महात्मा गांधीजी वर्ण व्यवस्था के सिद्धांत के कट्टर समर्थक थे उनका मानना था कि यह व्यवस्था हिंदू धर्म का अभिन्न अंग है, और एक ढांचे की तरह है,
जिसने सभी को बाँध रखा है और इसे खत्म करते की यह ढांचा ही खत्म हो जाएगा , और सारे हिंदू तार-तार हो जाएंगे
जाति की उत्पत्ति के बारे में समाजशास्त्रियों द्वारा बहसें होती रहेंगी, लेकिन इसके सांगठनिक सिद्धान्तों को समझ मुश्किल नहीं है, जो ऊँच-नीच, 'जाति अधिकारों और कर्तव्यों' के रपटते मापक, पवित्रता और मलिनता आधारित हैं, और जो तौर-तरीक़े पहले थे और आज भी हैं, उन्हें आज भी लागू करने के लिए विवश और बाध्य किय जाता है। जाति के पिरामिड की चोटी पर बैठे लोगों को पवित्र माना जाता है और उनके बहुत सारे विशेषाधिकार पिरामिड के तल पर बैठे लोगों को मलिन, प्रदूषित माना जाता है,उन्हें कोई अधिकार तो नहीं हैं लेकिन ढेरों कत्वर्य ज़रूर हैं। मलिनता-पवित्रता का फ़ार्मूला,असल में पैतृक व्यवसाय और एक विस्तृत जाति-आधारित व्यवस्था से हुआ है।आंबेडकर ने 1916 में (उस समय उनकी आयु मात्र 25 वर्ष थी) कोलम्बिया विश्वविद्यालय के सेमिना के लिए एक पेपर लिखा, जिसका शीर्षक था *भारत में जातियाँ*। इसमें उन्होंने जाति की परिभाषा दी। उनके अनुसार *जाति एक अन्तर्विवाही इकाई है और एक 'खुद में बन्द वर्ग*' है। एक अन्य अवसर पर उन्होंने इसका वर्णन इस प्रकार किया, *एक ऐसी व्यवस्था जिसमें जितना ऊपर जाएँ उतना मान-सम्मान है, जितना नीचे खिसकें उतना ही घृणा-अपमान है* ।
आज जिसे हम जाति व्यवस्था के नाम से जानते है, हिन्दू धर्मग्रंथों में उस वर्णश्रम धर्म या चातुवर्ण अथात चार वर्णों की व्यवस्था के नाम से जाना जाता है। हिन्दू समाज की लगभग चार हजार सजातीय विवाही जातियाँ और उपजातियाँ हैं, जिनमें प्रत्येक का एक विशिष्ट वंशानुगत व्यवसाय है, और जिन्हें चार वर्णों में बाँटा गया है—ब्राह्मण (पुजारी), क्षत्रिय (सैनिक), वैश्य (व्यापारी) और शूद्र (सेवक) । इन वर्णों के बाहर अवर्ण जातियाँ हैं, अति शूद्र, अवमानवीय (मनुष्य से कमतर) जिनकी अपनी अलग श्रेणी-अनुक्रम हैं—अछुत, दर्शन-अयोग्य, समीप जाने के अयोग्य जिनकी उपस्थिति, जिनका छूना, जिनकी परछाईं भी विशेषाधिकार प्राप्त जाति के व्यक्ति को प्रदूषित कर सकती है। कुछ समुदायों में सजातीय प्रजनन से बचने के लिए, प्रत्येक सजातीय विवाही जाति को ऐसे गोत्रों में बाँटा गया है, जिनके अन्दर आपस में विवाह निषेध है। गोत्रेतर-विवाह का वैसी ही क्रूरता से अनुपालन कराया जाता है,
जैसे विजातीय विवाह का—बड़े-बूढों की सहमति से सर क़लम करके और भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या करके। भारत के हर क्षेत्र ने बड़े प्रेम से जाति-क्रूरता के अपने अलग-अलग और अनूठे तरीकों में दक्षता हासिल कर ली है। यह अलिखित नियम-संहिता अमेरिका के नस्लवादी जिम क्रो' क़ानून से भी कहीं ज्यादा बदतर है। पृथक् बस्तियों में रहने को मजबूर करने के अलावा, अछूतों पर उन सार्वजनिक मार्गों का प्रयोग निषेध था जिन्हें विशेषाधिकारप्राप्त जातियों प्रयोग करती थीं दलितों को सार्वजनिक कुओं का पानी पीना मना था, वे हिन्दू मन्दिरों में प्रवेश नहीं कर सकते थे, विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के स्कूल में उनका प्रवेश निषेध था, उन्हें अपने जिस्म का ऊपरी भाग ढकने की मनाही थी, हर प्रकार के कपड़े पहनने की उ न्हें स्वतंत्रता नहीं थी, बस कुछ घटियाकिस्म के कपड़े और आभूषण ही पहनने की उन्हें इजाज़त थी। कुछ जातियों को, जैसे महार, जिस जाति में आंबेडकर पैदा हुए थे, उन्हें अपनी कमर से झाडू बाँधना होता था ताकि उनके प्रदूषित पदचिह्नों पर खुद-ब-खुद झाडू लगती जाए। अन्य को अपने गले में मटकीनुमा थूकदान लटकाना होता था, ताकि उनका थूक ज़मीन पर गिरकर जमीन को अपवित्र न कर दे। विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के पुरुषों को अछूत महिलाओं के जिस्म पर अविवादित अधिकार हासिल था। प्रेम प्रदूषित करता है, लेकिन बलात्कार पवित्र है। भारत के कई हिस्सों में आज भी यह सब जारी है। उस मानवीय या दिव्य कल्पना के बारे में कहने को और क्या बचता है. जिसने इस प्रकार की सामाजिक संरचना
की परिकल्पना की?
जैसे वर्णाश्रम का धर्म अपने आप में काफ़ी नहीं था, इसके साथ ही कर्मों का बोझ भी लाद दिया गया। उन लोगों को, जिनका जन्म अधीनस्थ जातियों में हुआ, बताया गया कि उन्हें उनके पिछले जन्मों के कुकर्मों की सज़ा मिल रही है। असल में वे लोग एक तरह का कारावास भुगत रहे हैं। यदि उनके द्वारा अवज्ञा या अवमानना हुई तो उनकी सज़ा में वृद्धि हो जाएगी, जिसका अर्थ होगा पुनर्जन्म का एक और चक्र, फिर से एक अछूत या शूद्र जाति में। इसलिए बेहतर यही है कि वे अपनी सीमाओं में रहें। आंबेडकर ने कहा, *जाति-व्यवस्था से बढ़कर अपमानजनक सामाजिक संगठन हो ही नहीं सकता। यह एक ऐसी व्यवस्था है जो लोगों को शिथिल, पंगु और विकलांग बनाकर, उन्हें कुछ भी उपयोगी गतिविधि नहीं करने देती*।"
दुनिया में सर्वाधिक प्रसिद्ध भारतीय, मोहनदास करमचन्द गांधी, आंबेडकर से असहमत थे। उनका विश्वास था कि जाति, भारतीय समाज की प्रतिभा का प्रतिनिधित्व करती है। 1916 में मद्रास के एक मिशनरी सम्मेलन में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा:
*जाति का व्यापक संगठन न केवल समाज की धार्मिक आवश्यकताओं को पूरा करता है बल्कि यह राजनीतिक आवश्यकताओं को भी परिपूर्ण करता है।