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07/09/2022

इंडिया से एक आदमी अमेरिका जाता है और वह माइक्रोसेफ्ट का चीफ बन जाता है, एक आदमी गूगल का CEO बन जाता है, एक आदमी अडोबी का CEO बन जाता है एक आदमी IBM का CEO बन जाता है।

ऐसे ही एक आदमी साउथ अफ्रीका से अमेरिका जाता है और वो अमेरिका जाकर ना केवल अमेरिका का सबसे बड़ा आदमी बनता है बल्कि वह दुनिया का सबसे अमीर आदमी बन जाता है।
अमेरिका सरकार का सबसे बड़ा क्रिटिक होकर भी वो दुनिया का सबसे बड़ा फ्री स्पीच का प्लेटफार्म खरीदता हैं ,
वह ऐसा इसलिए कर पाता है, क्योंकि अमेरिका दुनिया भर से आये प्रतिभाओं का सम्मान करता है वो अपने सभी नागरिकों को और दुनिया भर से वीजा लेकर काम करने आए लोगो को भी अपने देश की तरक्की का भागीदार मानता है उन्हे आगे बढ़ने का मौका देती है।

और ऐसे समय मे हम क्या कर रहे है? हम यानी दुनिया का सबसे यंग पॉपुलेशन वाला देश अपने युवाओं को रोजगार तो नही दे रहे बल्कि उन्हें एक दूसरे के कान मे अजान और हनुमान चालीसा चिल्लाने के काम मे लगाए हुए हैं।

जब इस दौर का इतिहास लिखा जायेगा तो उसमे यह भी लिखा जायेगा की जब दुनिया तरक्की कर रहा था तब भारत के 80% लोग खाने के लिए मुफ्त सरकारी 5 किलो अनाज पर पल कर अपना धर्म बचा रहे थे।

27/07/2021

नारी शिक्षा से काँपता सनातन धर्म !
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9 साल की उम्र में शादी का धार्मिक-शास्त्रीय प्रावधान इसलिए रखा गया, ताकि स्त्री पढ़ ना सके।

माहवारी के बाद पुत्री को जो पिता घर मे रखता है, वह उसका वही रक्त पीता है, ये लिखने वाले ठग आखिर चाहते क्या थे ?

एक तरफ पुरुष के लिए 25 वर्ष ब्रह्मचर्य आश्रम तो स्त्री के लिए नादान उम्र में पति-परमेश्वर !
ये स्त्रियों के लिए सनातन ठगी नहीं तो क्या है ?
कोई उसे 'ताड़न का अधिकारी' बता रहा है तो कोई 'एकांत का दुरुपयोग करने वाली।' सारे व्रत, सारे गुनाह, सारे एहतियात स्त्री को लिखने का मकसद आखिर क्या रहा होगा ?

सती प्रथा, जौहर, कन्या वध, दहेज, देवदासी, वैधव्य प्रताड़ना, पर्दा प्रथा, सब नारी को ही क्यों ?
क्या माँ, बहन म, बीवी, बेटी के प्रति इतना क्रूर है हमारा समाज ?
किसने बनाया उन्हें इतना नियमबद्ध क्रूर ?
सनातन संस्कृति का आधार क्या यही क्रूरताएँ हैं ?
जब जब नारी ने पढ़ने की सोची, सनातन पाखण्डियों के पसीने क्यो आये ?

क्योंकि धर्म डरता है शिक्षा से, जो कि ज्ञान देती है और तर्क करती है। जहाँ तर्क है, वहां धर्म को आस्था के पीछे छुपना पड़ता है। गौरी लंकेश से इतना डरा सनातन धर्म कि उनकी हत्या ही करा डाली। पुरुष लिखते हैं धर्म को कम खतरा था, मगर स्त्री होकर लिखे यह तो क्रांति का आगाज़ है, धर्म का काल है भई।

अगर स्त्री ने धर्म के स्वार्थपूर्ण नियमों को समझ लिया तो कौन ढोएगा इस पाखण्ड को ?
कलश यात्रा, जागरण, व्रत कथा, सत्संग, कथाएं, रिवाज, दक्षिणा, जिद, सस्वर नृत्य, आभूषण, बन्धन, रिश्ते, समागम, पवित्रता, सात जन्म, वचन सब बोझ पुरुष के बस का थोड़े ही है ?

अभी हाल ही में जेएनयू में चंद लड़कियों ने आजादी क्या माँगी धर्म से लेकर राष्ट्रवाद तक को लपेट लिया 'सनातन पाखण्डियों' ने। बीएचयू में हमारी बच्चियों के साथ पुलिसिया क्रूरता का आधार यही सनातनी सोच है। यह घटना राज्य सरकार की बागडौर संभाले बैठे सनातन-धार्मिक मुखौटे की मंशा ज़ाहिर करती है। कोई आम आदमी मुख्यमंत्री होता तो शायद उसे धार्मिक समझ कम होती लेकिन यहां तो सनातन संत परम्परा के शिरोमणि विराजमान हैं। ये ''धर्म की नगरी बनारस'' में नही होगा तो कहां होगा ?

क्योंकि उसी बनारस में विधवाओं को 'सभी मानवीय हकों' से वंचित रखकर उनके 'बीमार पति-परमेश्वर की मृत्यु या आत्महत्या' का दंड देने की बहुत पुरानी परंपरा रही है। यहां नारी को जिस्म के रूप में देखने के आदी 'वहशी' के लिए सब नारियाँ एक उपभोग की चीज-वस्तु मात्र हैं।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में जो घटित हुआ, जेएनयू में जो हंगामा हुआ यह नया नही है। इन्ही पाखंडी ठगों के पूर्वजों ने पुणे में सावित्री बाई फूले के साथ भी तो यही किया था। उनके कपड़ों पर गोबर, कीचड़ डालने की बात तो सबने सुन रखी है लेकिन क्या आप जानते हैं इन सनातनियों ने बालिका शिक्षा को बंद करने की दूसरी नीच साजिश कौनसी की ?

1848 में भीड़ेवाड़ा बुधवार पेठ पुणे में जिस पहली बालिका स्कूल की स्थापना की गयी थी उस स्कूल के आजू-बाजू बुधवार पेठ में आज भारत की दूसरी सबसे बड़ी 'जिस्म की मंडी' कैसे बना दिया गया ?
रेड-लाइट एरिया बसाने वाले लोग किस जाति वर्ग के होते हैं ? धर्म की दुहाई देने वाले, धर्म के होलसेलर, डीलर और ठेकेदार कौन लोग हैं ? ये हम आसानी से समझ सकते हैं।

कैसे बहुत ही नीचता से स्त्री-शिक्षा के पहले पौधे के आसपास तेज़ाब बिखेरा गया ताकि भविष्य में धर्म के खिलाफ किसी क्रांति का आधार ही न बन पाए। आज भी जब किसी लड़की द्वारा घर पर खुद से छेड़छाड़ की बात कही जाती है अधिकतर परिवार उसको घर मे कैद करने का उपचार करते हैं। रेप विक्टिम को उसके कपड़े, रहन सहन और बेखौफ हँसी के लिए कोसा जाता है।
आखिर क्या गुनाह हुआ उस से समाज का सृजनहारी बनने की क्षमता पाकर ?
काश ! हर औरत इस सनातनी धार्मिक साजिश को समझ पाती !!

मैं फिर दोहराऊंगा, संविधान नही होता तो नारी का अस्तित्व सिर्फ और सिर्फ 'भोग-विलास की वस्तु' होने तक ही सिमट जाता। पौराणिक भागवत कथाओं की बजाय संविधान से प्राप्त 'नारी अधिकार की धाराओं' के प्रचार कीजिये ताकि कोई भी रिश्ता उस से कुछ भी धार्मिक प्रपंच के नाम पर लूट ना पाए।

धर्म-ग्रंथ नही आईपीसी की धाराएं पढ़ाइये अपनी बेटियों को, व्रत नही भरपेट खिलाइए अपनी बेटियों को, दहेज नही अच्छी शिक्षा पर खर्चे, जूडो कराटे सिखाइये अपनी बेटियों को और अगर उसके साथ कोई भी अनहोनी होती है तो उसे अहसास दीजिये कि पापा पति या भाई उसे समाज द्वारा स्त्री होने की परम्परागत सजा नही थोपने देंगे।

25/07/2021

भारत से आरएसएस की गद्दारी का इतिहास:
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1. मुंजे , हेडगेवार का गुरु था।
2. मुंजे 1920 से 1948 तक हिंदू महासभा का अध्यक्ष रहा।
3. हेडगेवार ने 1925 में 'रायल सीक्रेट सर्विस' का नाम 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' किया।
4. 1928 में जब देश के हिन्दू मुसलमान मिलकर अंग्रेज़ों के खिलाफ देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे थे तब "सावरकर" ने खुलेआम यह ऐलान किया था
कि भारत में दो राष्ट्र, हिन्दू और मुसलमान बसते हैं, भारत के बँटवारे का विचार यहीं से जन्म लेता है।
5. 1930-31 में लंदन में हुए गोलमेज सम्मेलन से लौटते हुए मुंजे इटली के तानाशाह मुसोलिनी से मिला।
6. इसमें उसने भारत को इटली का गुलाम बना देने का वायदा किया।
7. आरएसएस का ढांचा और शाखाओं की रचना 1931 में मुंजे ने की।
8. संघियों ने 1930-31 में भगतसिंह के खिलाफ गवाही दी।
9. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 1934 में अंग्रेजों ने कलकत्ता विवि का कुलपति बनाया। उन दिनों बंगाल में बहुत से वरिष्ठ शिक्षाविदों का नजर अंदाज कर अंग्रेजों ने सिर्फ 33 साल के श्यामा प्रसाद मुखर्जी को इसलिए VC बना दिया था, ताकि गांधी के आह्वान पर हज़ारों की तादाद में विश्वविद्यालय के होनहार छात्रों द्वारा आज़ादी के लड़ाई में शामिल होने से रोका जा सकें।
10. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1937 में मुहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ सरकार बनाई।
11. सावरकर ने 1940-41 नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी का साथ छोड़ा।
12. 1940-41 में ही संघ ने घोषणा की कि कोई भी हिन्दू 'आज़ाद हिन्द सेना' में भर्ती न हो।
13. 1940-41 में ही सावरकर ने 'आज़ाद हिन्द सेना' के खिलाफ अंग्रेजों की सेना में हिन्दुओं की भर्ती करवायी ।
14. 1942 में अटल बिहारी बाजपाई ने देश के क्रांतिकारियों के खिलाफ गवाही दी और २ क्रांतिकारियों को 'कालापानी की सजा' हुई।
15. 11 फरवरी 1943, श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने एक हिन्दू रैली में कहा था,
"if Muslims wanted to live in Pakistan they should "pack their bag and baggage and leave India"
16. महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 1942 में 9 अगस्त को जब ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा दिया, तो हिंदु महासभा ने उसका विरोध किया था।
17. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल में मुस्लिम लीग के नेतृत्व में बनी सरकार के मंत्री के रूप में अंग्रेज सरकार को 26 जुलाई 1942 को पत्र लिखकर कहा था —
कि युद्धकाल में ऐसे आंदोलन का दमन कर देना किसी भी सरकार का फ़र्ज़ है।
18. 1941-42 में हिंदु महासभा मुस्लिम लीग के साथ बंगाल मे फजलुल हक़ सरकार में शामिल थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी उस सरकार में वित्त मंत्री थे।
19. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1946 में बंगाल को विभाजित कर देने की मांग रखी।
20. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1946 में कहा, "बिना गृहयुद्ध के हिंदु-मुस्लिम समस्या का हल नहीं"।
21. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1947 में सरत बोस के बंगाल को एक करने के प्रयास का विरोध किया।

बताइए आज़ादी की लड़ाई में कौन शामिल था और कौन गद्दार थे ? आज यह देश प्रेम का प्रमाणपत्र बाँटने वाले अंग्रेजों की कभी आलोचना और निन्दा क्युँ नहीं करते ? सोचिएगा ।
ध्यान दें — अंग्रेजों ने हिन्दू महासभा और आरएसएस पर कभी प्रतिबन्ध नहीं लगाया ।
प्वाईंट नंबर 20 पर ध्यान दीजिए "श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1946 में कहा था:—
"बिना गृहयुद्ध के हिंदु-मुस्लिम समस्या का हल नहीं"; और संघी आजतक यही कोशिश लगातार कर रहे हैं, कभी मंदिर-मस्जिद तो कभी गाय, लव जिहाद ।

25/07/2021

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर और महात्मा गांधी के विवाद जगजाहिर थे, दोनों ही अपने अपने तरीके से जाति को खत्म करने का उदाहरण देते थे, जहाँ बाबा साहब अंबेडकर की सोच दूरदर्शिता वाली था,उनकी परिकल्पना एक अखंड राष्द्र की थी वे चाहते थे कि हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था यानि
चार्तुवर्ण सिद्धांत और उससे उत्पन्न जातियों को समाप्त किया जाय, वही तथाकथित महात्मा गांधीजी वर्ण व्यवस्था के सिद्धांत के कट्टर समर्थक थे उनका मानना था कि यह व्यवस्था हिंदू धर्म का अभिन्न अंग है, और एक ढांचे की तरह है,
जिसने सभी को बाँध रखा है और इसे खत्म करते की यह ढांचा ही खत्म हो जाएगा , और सारे हिंदू तार-तार हो जाएंगे

जाति की उत्पत्ति के बारे में समाजशास्त्रियों द्वारा बहसें होती रहेंगी, लेकिन इसके सांगठनिक सिद्धान्तों को समझ मुश्किल नहीं है, जो ऊँच-नीच, 'जाति अधिकारों और कर्तव्यों' के रपटते मापक, पवित्रता और मलिनता आधारित हैं, और जो तौर-तरीक़े पहले थे और आज भी हैं, उन्हें आज भी लागू करने के लिए विवश और बाध्य किय जाता है। जाति के पिरामिड की चोटी पर बैठे लोगों को पवित्र माना जाता है और उनके बहुत सारे विशेषाधिकार पिरामिड के तल पर बैठे लोगों को मलिन, प्रदूषित माना जाता है,उन्हें कोई अधिकार तो नहीं हैं लेकिन ढेरों कत्वर्य ज़रूर हैं। मलिनता-पवित्रता का फ़ार्मूला,असल में पैतृक व्यवसाय और एक विस्तृत जाति-आधारित व्यवस्था से हुआ है।आंबेडकर ने 1916 में (उस समय उनकी आयु मात्र 25 वर्ष थी) कोलम्बिया विश्वविद्यालय के सेमिना के लिए एक पेपर लिखा, जिसका शीर्षक था *भारत में जातियाँ*। इसमें उन्होंने जाति की परिभाषा दी। उनके अनुसार *जाति एक अन्तर्विवाही इकाई है और एक 'खुद में बन्द वर्ग*' है। एक अन्य अवसर पर उन्होंने इसका वर्णन इस प्रकार किया, *एक ऐसी व्यवस्था जिसमें जितना ऊपर जाएँ उतना मान-सम्मान है, जितना नीचे खिसकें उतना ही घृणा-अपमान है* ।

आज जिसे हम जाति व्यवस्था के नाम से जानते है, हिन्दू धर्मग्रंथों में उस वर्णश्रम धर्म या चातुवर्ण अथात चार वर्णों की व्यवस्था के नाम से जाना जाता है। हिन्दू समाज की लगभग चार हजार सजातीय विवाही जातियाँ और उपजातियाँ हैं, जिनमें प्रत्येक का एक विशिष्ट वंशानुगत व्यवसाय है, और जिन्हें चार वर्णों में बाँटा गया है—ब्राह्मण (पुजारी), क्षत्रिय (सैनिक), वैश्य (व्यापारी) और शूद्र (सेवक) । इन वर्णों के बाहर अवर्ण जातियाँ हैं, अति शूद्र, अवमानवीय (मनुष्य से कमतर) जिनकी अपनी अलग श्रेणी-अनुक्रम हैं—अछुत, दर्शन-अयोग्य, समीप जाने के अयोग्य जिनकी उपस्थिति, जिनका छूना, जिनकी परछाईं भी विशेषाधिकार प्राप्त जाति के व्यक्ति को प्रदूषित कर सकती है। कुछ समुदायों में सजातीय प्रजनन से बचने के लिए, प्रत्येक सजातीय विवाही जाति को ऐसे गोत्रों में बाँटा गया है, जिनके अन्दर आपस में विवाह निषेध है। गोत्रेतर-विवाह का वैसी ही क्रूरता से अनुपालन कराया जाता है,
जैसे विजातीय विवाह का—बड़े-बूढों की सहमति से सर क़लम करके और भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या करके। भारत के हर क्षेत्र ने बड़े प्रेम से जाति-क्रूरता के अपने अलग-अलग और अनूठे तरीकों में दक्षता हासिल कर ली है। यह अलिखित नियम-संहिता अमेरिका के नस्लवादी जिम क्रो' क़ानून से भी कहीं ज्यादा बदतर है। पृथक् बस्तियों में रहने को मजबूर करने के अलावा, अछूतों पर उन सार्वजनिक मार्गों का प्रयोग निषेध था जिन्हें विशेषाधिकारप्राप्त जातियों प्रयोग करती थीं दलितों को सार्वजनिक कुओं का पानी पीना मना था, वे हिन्दू मन्दिरों में प्रवेश नहीं कर सकते थे, विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के स्कूल में उनका प्रवेश निषेध था, उन्हें अपने जिस्म का ऊपरी भाग ढकने की मनाही थी, हर प्रकार के कपड़े पहनने की उ न्हें स्वतंत्रता नहीं थी, बस कुछ घटियाकिस्म के कपड़े और आभूषण ही पहनने की उन्हें इजाज़त थी। कुछ जातियों को, जैसे महार, जिस जाति में आंबेडकर पैदा हुए थे, उन्हें अपनी कमर से झाडू बाँधना होता था ताकि उनके प्रदूषित पदचिह्नों पर खुद-ब-खुद झाडू लगती जाए। अन्य को अपने गले में मटकीनुमा थूकदान लटकाना होता था, ताकि उनका थूक ज़मीन पर गिरकर जमीन को अपवित्र न कर दे। विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के पुरुषों को अछूत महिलाओं के जिस्म पर अविवादित अधिकार हासिल था। प्रेम प्रदूषित करता है, लेकिन बलात्कार पवित्र है। भारत के कई हिस्सों में आज भी यह सब जारी है। उस मानवीय या दिव्य कल्पना के बारे में कहने को और क्या बचता है. जिसने इस प्रकार की सामाजिक संरचना
की परिकल्पना की?
जैसे वर्णाश्रम का धर्म अपने आप में काफ़ी नहीं था, इसके साथ ही कर्मों का बोझ भी लाद दिया गया। उन लोगों को, जिनका जन्म अधीनस्थ जातियों में हुआ, बताया गया कि उन्हें उनके पिछले जन्मों के कुकर्मों की सज़ा मिल रही है। असल में वे लोग एक तरह का कारावास भुगत रहे हैं। यदि उनके द्वारा अवज्ञा या अवमानना हुई तो उनकी सज़ा में वृद्धि हो जाएगी, जिसका अर्थ होगा पुनर्जन्म का एक और चक्र, फिर से एक अछूत या शूद्र जाति में। इसलिए बेहतर यही है कि वे अपनी सीमाओं में रहें। आंबेडकर ने कहा, *जाति-व्यवस्था से बढ़कर अपमानजनक सामाजिक संगठन हो ही नहीं सकता। यह एक ऐसी व्यवस्था है जो लोगों को शिथिल, पंगु और विकलांग बनाकर, उन्हें कुछ भी उपयोगी गतिविधि नहीं करने देती*।"
दुनिया में सर्वाधिक प्रसिद्ध भारतीय, मोहनदास करमचन्द गांधी, आंबेडकर से असहमत थे। उनका विश्वास था कि जाति, भारतीय समाज की प्रतिभा का प्रतिनिधित्व करती है। 1916 में मद्रास के एक मिशनरी सम्मेलन में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा:

*जाति का व्यापक संगठन न केवल समाज की धार्मिक आवश्यकताओं को पूरा करता है बल्कि यह राजनीतिक आवश्यकताओं को भी परिपूर्ण करता है।

29/04/2020

दिल्ली:दिल्ली के मुख्यमंत्री से एक कोरोना पीड़ित परिवार की अपील।नावलिग बच्चे को प्राईवेट या सरकारी अस्पताल नही कर रहे भर्ती।

29/04/2020

VIDEO: टीवी पर अरनब को देख उतारने लगे आरती, लोग बोले- अंधभक्ति चरम सीमा पर है।
वीडियो में दिख रहा है कि एक परिवार के करीब 6-7 लोग जिसमें महिला, पुरुष औऱ बच्चे सभी शामिल हैं, टीवी पर अरनब गोस्वामी की पूजा करते हुए उनकी आरती उतार रहे हैं। महिला टीवी पर अरनब को टीका भी लगा रही है तो वहीं बच्चे अरनब के जयकारे लगा रहे हैं।

जिन तब्लीग़ी ज़मात के कोरोना संक्रमित लोगों को मीडिया और सोशल मीडिया पर खलनायक की तरह पेश किया गया, अब कोरोना संक्रमण से...
28/04/2020

जिन तब्लीग़ी ज़मात के कोरोना संक्रमित लोगों को मीडिया और सोशल मीडिया पर खलनायक की तरह पेश किया गया, अब कोरोना संक्रमण से ठीक हुए वो कुछ जमाती प्लाज़्मा थैरेपी के लिए अपना खून देने के लिए लाइनों में लगे हुए हैं. इससे क्या कुछ बदलेगा?

28/04/2020

आंखों में आंसू ला देंगी ये तस्वीरें, नमक पानी में डुबोकर सूखी रोटी खाते नौनिहाल।सरकार के दावे फ़ेल।

26/04/2020

अहमदाबाद: खानपुर इलाके में हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की एक बहतरीन मिसाल सामने आई!
75 वर्षीय मन्दाकिनी बेन का कोई भी रिश्तेदार पास न होने के कारण, मुस्लिम समुदाय के लोगों ने की मदद!

22/04/2020

आप चाहे गल्फ देश में हो या भारत में ये काम बिलकुल भी ना करें नही तो हो सकता है ये नुक्सान।

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