17/03/2026
ढकरानी में विकास की ऐसी आँधी चल रही है कि लोगों को अब अलग से धूल झाड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती—सांस लेते ही “नेचुरल फेस पैक” और “लंग पॉलिश” दोनों साथ में हो जा रहे हैं।
यहाँ चल रहे स्टोन क्रेशर मानो पर्यावरण नियमों को श्रद्धांजलि दे चुके हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियम किताबों में आराम फरमा रहे हैं, जबकि जमीन पर प्लांट बिना डस्ट सप्रेशन सिस्टम के पूरी शान से धूल उड़ाते नजर आ रहे हैं। दीवारें? पानी का छिड़काव? अरे, वो सब तो शायद सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए ही बनाए गए होंगे।
स्थानीय लोग भी अब “एडजस्ट” करना सीख गए हैं—सुबह की ताजी हवा की जगह धूल का गुबार, और बच्चों के खेल के मैदान की जगह मिनी-रेगिस्तान। सांस की बीमारी बढ़ रही है, लेकिन चिंता की कोई बात नहीं… आखिर विकास जो हो रहा है!
उधर खनन विभाग और बाकी जिम्मेदार विभाग स्थिति पर गहरी नजर बनाए हुए हैं—इतनी गहरी कि शायद उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा। सवाल उठता है कि ये खामोशी है, लाचारी है या फिर “सब सेट है” वाली पुरानी कहानी?
अब असली इंतजार शायद किसी बड़े हादसे या हेल्थ इमरजेंसी का है, क्योंकि कार्रवाई तो जैसे “लिमिटेड एडिशन” बन चुकी है। तब तक, ढकरानी के लोग मुफ्त में धूल का आनंद लेते रहें—क्योंकि यहां नियम नहीं, सिर्फ रुतबा उड़ता है???