11/07/2026
चन्द्रशेखर तिवारी की पुस्तक उत्तराखंड का भूगोल का दूसरा संस्करण बहुत जल्द आपके हाथों में होगा।
इस बार कलेवर कुछ बदला हुआ है, ज्यादा फ्रेश लगेगा।
उत्तराखंड का भूगोल
किसी भी स्थान विशेष की परियोजनाओं के नीति निर्धारण व नियोजन व संरचनात्मक विकास के लिए उस परिवेश से सम्बन्धित तथ्यात्मक विवरणों के साथ ही भौगोलिक सूचनाओं, आधारभूत आंकड़ों, व मानचित्रों की जरूरत होती है। इन विवरणों के अध्ययन और विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर ही सम्बन्धित परियोजनाओं के क्रियान्वयन में मदद मिलती है। इसी दिशा में हिमालयी भौगोलिक परिवेश पर केन्द्रित उत्तराखण्ड का भूगोल : प्राकृतिक व सामाजिक सन्दर्भ पुस्तक का लेखन एक बेहतरीन प्रयास है। जिसका लेखन सामाजिक विज्ञान व संस्कृति के अध्येता श्री चन्द्रशेखर तिवारी ने किया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि श्री तिवारी का मूल विषय भूगोल होने के कारण उन्होंने इस पुस्तक के माध्यम से उत्तराखण्ड के प्राकृतिक भौगोलिक परिवेश को सामाजिक संदर्भ में गहराई से रेखांकित किया है।
पुस्तक में कुल आठ अध्याय शामिल हैं। प्रथम अध्याय में उत्तराखण्ड का सामान्य परिचय दिया गया है। द्वितीय अध्याय भौगोलिक प्रदेश में इसके प्राकृतिक भागों तथा विशेष स्थलाकृतियों की व्यापक जानकारी वर्णित है। तृतीय अध्याय जल प्रवाह पर आधारित है। इसमें प्रदेश की नदियों के जल प्रवाह, जल प्रवाह प्रणाली, भूमिगत जल, हिमनद, प्राकृतिक झीलों व गर्मजल के सोतों का वर्णन किया गया है। जलवायु से सम्बन्धित विवरण चतुर्थ अध्याय में शामिल है। इस अध्याय में जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक, जलवायु वर्गीकरण, उत्तराखण्ड की जलवायुगत विशेषताएं और स्थानीय वर्षा व तापमान के स्थानीय परिदृश्य को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। पंचम अध्याय में प्राकृतिक वनस्पतियों के अन्र्तगत उत्तराखण्ड के वनावरण, वर्गीकरण, वनस्पति प्रजातियों व उसके सामाजिक उपयोगिता आदि की जानकारी शामिल है। छठा अध्याय वन्य जीवों पर आधारित है। इसमें उत्तराखण्ड के वन्य जीव क्षेत्र, प्रमुख वन्य जीव, वन्य जीवों की दहशत, वन्य जीवों पर संकट तथा संरक्षित वन्य जीव विहार तथा पर्यटन विकास का वर्णन किया हुआ है। मृदा एवं खनिज विषय की जानकारी सप्तम अध्याय में दी गई है। इसमें मृदा के प्रकार व उनका वितरण, खनिज सम्पदा व उनका वितरण क्षेत्र, खनिज सम्पदा का उपयोग व विकास का वर्णन किया हुआ है। अन्तिम आंठवें अध्याय में उत्तराखण्ड में प्रकृति आधारित विविध परम्परागत उद्योगों की तब और अब की स्थिति के साथ ही उनके सामाजिक व सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करने का प्रयास किया है।
कुल मिलाकर इस पुस्तक में उत्तराखण्ड प्रदेश के भौगोलिक स्वरूप और उसमें विद्यमान प्राकृतिक व सामाजिक विशेषताओं को उजागर करने का प्रयास किया गया है। महत्वपूर्ण तालिकाओं, रेखाचित्रों, मानचित्रों और छायाचित्रों को शामिल कर पुस्तक को आकर्षक व उपयोगी बनाने की कोशिश की है। पुस्तक के अंत में परिशिष्ट के तौर पर सन्दर्भ ग्रन्थ सूची,प्रमुख भौगोलिक शब्दों के स्थानीय नाम तथा स्थानीय भौगोलिक स्थलाकृति व अन्य विशेषताओं के आधार पर जगहों के नामकरण की सूची भी दी गयी है। मानचित्रों, भौगोलिक सूचनाओं व तथ्यों को प्रमाणिक व सार्थक बनाने के उद्देश्य से स्थान-स्थान पर विविध सन्दर्भ स्रोतों का उल्लेख भी किया गया है।