Gạo 235

Gạo 235 जौनसार बावर का साप्ताहिक समाचारपत्र |

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जौनसार बावर क्षेत्र के लोगों ने महाराज को किया सम्मानितदेहरादून। कालसी जौनसार बावर क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से आगे बढ...
16/09/2021

जौनसार बावर क्षेत्र के लोगों ने महाराज को किया सम्मानित

देहरादून। कालसी जौनसार बावर क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से आगे बढ़ाने, महासू देवता के धार्मिक पौराणिक महत्व को जनसामान्य तक पहुंचाने और उसके प्रचार प्रसार के लिए कालसी जौनसार बावर क्षेत्र के लोगों ने प्रदेश के पर्यटन, धर्मस्व एवं संस्कृति मंत्री श्री सतपाल महाराज को सम्मानित किया।

कालसी, जौनसार बावर क्षेत्र लोगों ने महासू देवता सहित तमाम धार्मिक स्थलों के पौराणिक भक्तों को जनसामान्य तक पहुंचाने के साथ-साथ उसके प्रचार प्रसार के लिए प्रदेश के पर्यटन, धर्मस्व एवं संस्कृति मंत्री श्री सतपाल महाराज का सुभाष रोड़ स्थित कैंप कार्यालय में पहुंचकर सम्मान किया।

कालसी जौनसार बावर क्षेत्र के लोगों ने श्री महाराज का स्वागत करते हुए कहा कि आज उनके प्रयासों से जौनसार बावर क्षेत्र के धार्मिक एवं पौराणिक महत्व के स्थलों को एक विशिष्ट पहचान मिली है।

चारों महासू देवता बासिक महासू, पबासिक महासू, बोठिया महासू और चालदा महासू के साथ-साथ मैन्द्रथ मंदिर, ठढियार मंदिर, मोहना मंदिर, हनोल मंदिर, समाल्टा मंदिर, दसऊ मंदिर, थैना मंदिर, बिसोई मंदिर, लखवाड़ मंदिर एवं लखस्यार मंदिर को पर्यटन विभाग द्वारा प्रचारित एवं प्रसारित करने पर उन्होने प्रसन्नता जाहिर की।

उन्होने कहा कि श्री महाराज जी के प्रयासों से तमाम मंदिरों के धार्मिक एवं पौराणिक महत्व के इन स्थलों को पर्यटन एवं तीर्थाटन की दृष्टि से विकसित करने से क्षेत्र के लोगों में अपार उत्साह एवं प्रसन्नता है।

इस मौके पर क्षेत्र पंचायत सदस्य नरेश चौहान, दलीप बिष्ट, रणवीर, कांति राणा, आनंद तोमर, जयवीर चौहान, दिनेश शर्मा, सोहनवीर, सुनील, अमित, कुंदन आदि अनेक लोग मौजूद थे।

03/05/2020

*देश की स्वतंत्रता के लिए 3 मई 1945 को शहीद हुए थे केसरी चन्द*

देश गुलामी की जंजीरों से जकड़ा हुआ था ऐसे समय में जौनसार बावर का नवयुवक देश को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से सुभाष चंद्र बोस की सेना में शामिल होया, जिसका ब्रिटिश सरकार विरोध करती है, परिणाम स्वरूप 24 वर्ष 6 माह की आयु में इस वीर सपूत को 3 मई 1945 को फांसी पर लटका दिया गया।
जौनसार बावर के क्यावा गांव में केसरी चंद का जन्म 1 नवंबर 1920 को हुआ, पिता का नाम पंडित शिवदत्त एवं माता का नाम रायबरेली था केसरी चंद सबसे छोटे पुत्र थे इनकी माता का स्वर्गवास जन्म के 6 माह पश्चात ही हो गया था परिणाम स्वरूप पिता ने हीं केशरीचंद को बड़े लाड प्यार से पढ़ाया। प्रारंभिक शिक्षा विकास नगर में हुई ।तत्पश्चात डीएवी कालेज देहरादून में अध्यनरत रहे, खेल में प्रारंभ से ही अच्छी रुचि थी ।
10 अप्रैल 1941 को रॉयल इंडिया आर्मी सर्विस कोर में भर्ती हो गए 1941 को फिरोजपुर में वायसराय कमीशन ऑफिस का कोर्स किया 19 अक्टूबर 1941 को इन्हें मलाया के युद्ध के मोर्चे में भेज दिया गया, 27 दिसंबर 1941 को इस साहासी नवयुवक को सूबेदार के पद पर पदोन्नत कर दिया गया ।
15 फरवरी सन 1942 को जापानी फौज द्वारा इन्हें बंदी बना लिया गया आजाद हिंद फौज की ओर से लड़ते हुए इंफाल के मोर्चे पर इन्हें ब्रिटिश फौज ने पकड़ लिया और दिल्ली के जिला जेल में रखा गया इन्हें आर्मी एक्ट की धारा 41 के अंतर्गत भारतीय दंड संहिता की धारा 121 की व्यवस्था के विरुद्ध ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध करने के आरोप में दिनांक 12 दिसंबर 1944 व 10 जनवरी 1945 को लाल किले में जनरल कोर्ट मार्शल में ट्रायल किया गया, 3 फरवरी 1945 को जनरल सी .जे. आचिनलेक ने इनको मृत्युदंड की सजा देने की पुष्टि की।
24 वर्ष 6 माह की आयु में इस महान देशभक्त को 3 मई 1945 को प्रातः दिल्ली के जिला जेल में फांसी के तख्ते पर लटका दिया गया और देश के स्वतंत्र संग्राम में जौनसार बावर उत्तराखंड का नाम अमर कर दिया।
चकराता के समीप राम ताल गार्डन में प्रत्येक वर्ष 3 मई को इस शहीद की स्मृति में एक मेले का आयोजन किया जाता है जहा हजारों लोग शहीद की प्रतिमा के सम्मुख अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं ।
इस बार संपूर्ण विश्व में कोरोना वायरस की महामारी के कारण शहीद केसरी चंद मेले का आयोजन नहीं किया जा रहा है 1986 में प्रारंभ हुआ यह मेला इतिहास में पहली बार 1920 में नहीं होगा जब केसरी चंद के जन्म का शताब्दी वर्ष भी है। ऐसे महान सपूत को कोटि-कोटि नमन🙏
भारत माता की जय

*साभार - जौनसार बावर की दिवंगत विभूतियां - लेखक भारत चौहान, डॉ. राजकुमारी चौहान*

बैराट गढ़ पर्वत जौनसार की पहचान है      खत कोरु का मुकुट बैराट गढ़ पर्वत अपने अंदर अनेक ऐतिहासिक घटनाओं को छुपाए हुए हैं...
02/05/2020

बैराट गढ़ पर्वत जौनसार की पहचान है

खत कोरु का मुकुट बैराट गढ़ पर्वत अपने अंदर अनेक ऐतिहासिक घटनाओं को छुपाए हुए हैं, यह केवल कथा- कहानियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके प्रमाण के अवशेष इस पर्वत पर आज भी विद्यमान है ।
संपूर्ण गढ़वाल में 52 गढ़ है संभवत गढो के इस देश का नाम गढ़वाल पड़ा होगा,जौनसार बावर में एकमात्र इस गढ़ का बहुत प्राचीन इतिहास है। ऐसी मान्यता है कि अत्याचारी राजा सामुशाह जो मनुष्य का दूध पीकर अत्याचार का पर्याय बन गया था वह इसी पर्वत पर रहता था। महासू देवता के थैना में प्रकट होने से इस क्रूर दैत्य का अंत हुआ। राजा बैराट और पांडवों के अज्ञातवास से संबंधित भी अनेक कहानियां इस पर्वत अथवा किले से जुड़ी हुई है ।
आज भी बैराट गढ पर्वत पर यहां के वैभव संपन्नता के एवं किले होने के अनेक प्रमाण स्पष्ट दिखाई देते हैं। पर्वत के बीच में एक वृत्ताकार कुआं है जिसकी माप 16 गुणा 11 गुणा 4 सेंटीमीटर है और इसके निर्माण में संभवत छठी - सातवीं शताब्दी की ईटो का प्रयोग हुआ है । कहते हैं कि यह कुआ नहीं सुरंग है जो यमुना तट तक जाती है और इससे किले के लिए पानी की आपूर्ति की जाती थी ।
ऐसी भी मान्यता है जब लाखामंडल में लाक्षागृह को जलाकर राख कर दिया गया था तब पांडव इसी सुरंग के माध्यम से राजा विराट के यहां पहुंचे थे।
किले की दीवारें पत्थरो की ढेर में परिवर्तित हो चुकी है किले के चारों ओर गहरी खाई है जो इस पर्वत पर किले होने के प्रमाण प्रस्तुत करती है। अलौकिक सुंदरता की दृष्टि से यह ऐसा स्थान है जहां से खड़े होकर यमुना नदी और हिमालय के एक साथ दर्शन होते हैं । शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओ से लेकर देव वन की ऊंची ऊंची पहाड़ियां बैराट गढ़ किले से स्पष्ट दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि अपने सर्वोच्च शिखर का अभिमान लिए हुए यह पर्वत आसपास के सभी पर्वतों का राजा होगा ।
मसूरी चकराता मोटर मार्ग पर मसूरी से पश्चिम की ओर 50 किलोमीटर और चकराता से पूरब की ओर 23 किलोमीटर की दूरी पर बैराटरखाई नामक स्थान पर बैराट गढ़ का किला स्थित है ।मुख्य मोटर मार्ग से 1 किलोमीटर की पैदल दूरी पर स्थित है ।जिसकी ऊंचाई समुद्र तल से ऊंचाई 2250 मीटर है ।
भारत औरच चीन 1962 के युद्ध पर आधारित 72 - HOURS (जिसके हीरो राइफलमैन जसवंत सिंह है) पिक्चर फिल्म की अधिकांश शूटिंग इसी पर्वत पर हुई है l और वर्ष 2005 से जौनसार बावर का एकमात्र साप्ताहिक समाचार पत्र *गढ़ बैराट* का प्रकाशन भी इसी पर्वत के नाम से कियाहै ।

भारत चौहान

30/04/2020

कैसे पहुंचा खत कोरु का चौन्तरु लखवाड ?

कल हमने खत कोरु के सदर स्याणाओ के इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त की और आज खत के इतिहास के संबंध में कुछ और जानकारी साझा करेंगे -
सर्वविदित है कि जिन खतो के स्याणा शक्तिमान, विद्वान, न्याय प्रिय एवं ब्रिटिश सरकार के करीबी होते थे उन्हें ही ब्रिटिश सरकार द्वारा चौन्तरु की उपाधि दी जाती थी । इसलिए संपूर्ण जौनसार बावर में चार ही खतों के प्रमुख स्याणाओ को चौन्तरु की उपाधि दी गई थी यह बात अलग है कि चौन्तरु की पदवी को लेकर विवाद रहा है।
इसी श्रृंखला में खत कोरु के सदर स्याणा रामदास को चौन्तरु की उपाधि 1884 ईस्वी में दी गई थी जो खत कोरु मे 1943 तक खत के स्याणा शराण परिवार के पास विद्यमान रही । परंतु शेर सिंह स्याणा के स्वर्गवास के पश्चात खत के स्याणा शराण परिवार में नाबालिग होने के कारण यह उपाधि स्वर्गीय शेर सिंह स्याणा की बहन जो लखवाड़ में ब्याई हुई थी उसने इस उपाधि को अपने नाम करवाने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार मे मेरठ आयुक्त के पास दावा प्रस्तुत किया और कहा कि स्वर्गीय श्री शेरसिंह स्याना के निधन के पश्चात उनकी नाबालिक संतान अभी इस योग्य नहीं है अतः शेर सिंह की बहीन होने की वजह से यह उपाधि उन्हे दी जाए।
उन्होंने चौन्तरु की उपाधि के लिए अपने पुत्र का नाम प्रस्तुत किया उनका नाम भी शेर सिंह ही था और उस समय खत लखवाड़ के स्याना भी थे । ब्रिटिश सरकार के मेरठ आयुक्त ने चौन्तरु की उपाधि शेर सिंह स्याणा लखवाड़ को जीवित रहने तक घोषित कर दी । वह पहले व अंतिम ऐसे जौनसारी थे जिन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा राय साहब की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
खत कोरु का चौन्तरु अब हमेशा के लिए लखवाड के तत्कालीन स्याणा शेर सिंह को प्राप्त हो गया था 1952 मे लखवाड के स्याणा शेर सिंह का निधन हो गया । आजादी के पश्चात ब्रिटिश सरकार स्वतः ही समाप्त हो गई थी चौन्तरु पद अथवा उपाधि , पदवी जी हमेशा के लिए इतिहास की कड़ी बनकर रह गई।
भारत चौहान

कोरना वायरस को भगाना जरुरी है। इसलिये कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां।
25/03/2020

कोरना वायरस को भगाना जरुरी है। इसलिये कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां।

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