13/11/2021
उत्तराखंड: इगास पर्व का यह त्योहार माधो सिंह भंडारी की वीरता से जुड़ा है, पढ़ें इसका इतिहास क्यों खास है यह त्योहार, इसलिए मनाते हैं इगास, राजशाही दौर में इगास पर्व मनाए जाने की हमारे उत्तराखंड की अलग ही कहानी जुड़ी है। कहा जाता है कि 17वीं सदी में जब वीर भड़ माधो सिंह भंडारी तिब्बत की लड़ाई लड़ने गए थे, असल कहानी यही मानी जाती है कि महाराजा महिपत शाह को तिब्बतियों से वीर भड़ बर्थवाल बंधुओं की हत्या की जानकारी मिली थी, जिससे राजा बहुत गुस्से में थे। उन्होंने तुरंत इसकी सूचना माधो सिंह भंडारी को दी और तिब्बत पर आक्रमण का आदेश दे दिया। वीर भड़ माधो सिंह ने टिहरी, उत्तरकाशी, जौनसार और श्रीनगर समेत अन्य क्षेत्रों से योद्धाओं को बुलाकर सेना तैयार की और तिब्बत पर हमला बोल दिया। माधो सिंह के दीपावली के त्योहार पर भी वापस नहीं लौटने के कारण लोगों ने दीपावली का त्योहार नहीं मनाया। दीपावली के ठीक 11वें दिन जब माधो सिंह वापस जीत का परचम लहराकर लौटे, उस दिन लोगों ने दीपावली का त्योहार मनाया। इगास का मतलब 11 दिनों से है। तभी इस त्योहार का नाम इगास पड़ गया। तब लोगों ने दीपावली नहीं मनाई थी। लेकिन जब वह रण जीतकर लौटे, तो दीयों से पूरे क्षेत्र को रोशन कर इगास का पर्व दीपावली के रूप में मनाया गया। तभी से इगास धूमधाम से मनाई जाती है। उत्तराखंड के पौड़ी जिले में विकासखंड कीर्तिनगर का मलेथा गांव वीर भड़ माधो सिंह भंडारी की त्याग, तपस्या और बलिदान की कहानी से जुड़ा है। वो लाइनें हैं…बारह ए गैनी बग्वाली मेरो माधो नि आई, सोलह ऐनी श्राद्ध मेरो माधो नी आई।