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मुंबई  और सोने का बहुत पुराना रिश्ता रहा है। कई फ़िल्मों में मुंबई मी सोने के स्मगलिंग के क़िस्से को दिखाया गया है। वो स...
17/01/2024

मुंबई और सोने का बहुत पुराना रिश्ता रहा है। कई फ़िल्मों में मुंबई मी सोने के स्मगलिंग के क़िस्से को दिखाया गया है। वो सब तो क़िस्सा था, लेकिन हम आपको मुंबई के पुराने सोनारों के एक समूह को दिखा रहे हैं जिनकी तस्वीर 1880 में खैंची गई थी।
िहास #इतिहास

. "कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में,कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए दो गज़ ज...
17/01/2024

. "कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में,
कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।" - बहादुर शाह ज़फ़र

मंगलवार, 7 नवंबर, 1862 को रंगून (अब यांगून) में आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र का सांसारिक सफर समाप्त हो गया। वो इसी मुल्क की ज़मीन पर ज़िंदगी के आखिरी साल बिता रहे थे, जिन्हें 1857 के विफल भारतीय विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने उन्हें ज़ब्त कर निर्वासित कर दिया था।

बहादुर शाह ज़फ़र एक बहुआयामी शख्सियत थे। उन्हें एक विद्वान शायर और कला-प्रेमी राजा के तौर पर याद किया जाता है। 1837 में जब वो गद्दी पर बैठे, तब मुगल साम्राज्य पहले ही ब्रिटिश प्रभाव के नीचे कमज़ोर हो चुका था। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़ते प्रभुत्व और मुगल सत्ता के क्षरण को देखा।

1857 के भारतीय विद्रोह ने कुछ समय के लिए मुगल साम्राज्य के पुनरुद्धार की उम्मीद जगाई थी। हालांकि, विद्रोह अंततः अंग्रेज़ों द्वारा कुचल दिया गया, और बहादुर शाह ज़फ़र को पकड़कर रंगून निर्वासित कर दिया गया।

उनके अंतिम वर्ष दुख और अलगाव से भरे थे। 87 साल की उम्र में वो दुनिया से विदा हुए, एक टूटे हुए शख्स के रूप में, जिन्हें उनके राज्य से छीन लिया गया था और अपने प्रियजनों से दूर कर दिया गया था।

बहादुर शाह ज़फ़र की विरासत कई पहलुओं वाली है। उन्हें खोए हुए वैभव और सांस्कृतिक समृद्धि के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है, लेकिन एक दुखद शख्सियत के रूप में भी, जिन्होंने अपने वंश के पतन को देखा। उनकी शायरी, जो देशभक्ति और बीते जमाने की तड़प से ओतप्रोत है, आज भी भारत और उससे आगे कई लोगों के दिलों को छू लेती है।

उनकी मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं है, लेकिन माना जाता है कि वो बुढ़ापे और खराब स्वास्थ्य के कारण दुनिया से चले गए। उनका मकबरा यांगून, म्यांमार में स्थित है, और कई भारतीयों के लिए तीर्थस्थल बन गया है। उनकी पुण्यतिथि 7 नवंबर को भारत में याउम-ए-वफात के रूप में मनाई जाती है, एक दिन उनके जीवन और योगदान को याद करने के लिए।
िहास #इतिहास

चित्तौड़ के युद्ध में अद्भुत शौर्य से इतिहास रचने वाले वीर जयमल जी राठौड़ का जागीरी किला - बदनोर (भीलवाड़ा - मेवाड़)      #इ...
17/01/2024

चित्तौड़ के युद्ध में अद्भुत शौर्य से इतिहास रचने वाले वीर जयमल जी राठौड़ का जागीरी किला - बदनोर (भीलवाड़ा - मेवाड़)

#इतिहास

जंजीरा किला महाराष्ट्र का वो किला है, जिसे छत्रपति शिवाजी महाराज व संभाजी महाराज भी नहीं जीत सके थे। इस किले को जीतने के...
17/01/2024

जंजीरा किला महाराष्ट्र का वो किला है, जिसे छत्रपति शिवाजी महाराज व संभाजी महाराज भी नहीं जीत सके थे। इस किले को जीतने के प्रयास में कई मराठे वीरगति को प्राप्त हुए थे।

#इतिहास

मेवाड़ के महाराणा सांगा राजपूताने केे अंतिम नेतृत्वकर्ता थे। कई ज़ख्मों की वजह से इनको "मानवों का खण्डहर" कहा जाता है।कर्न...
25/12/2023

मेवाड़ के महाराणा सांगा राजपूताने केे अंतिम नेतृत्वकर्ता थे। कई ज़ख्मों की वजह से इनको "मानवों का खण्डहर" कहा जाता है।

कर्नल जेम्स टॉड ने महाराणा सांगा को "सैनिकों का भग्नावेश" व "सिपाही का अंश" कहा। महाराणा सांगा ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को परास्त करने के बाद "हिन्दुपत" की उपाधि धारण की।

#इतिहास

झीलों की नगरी उदयपुर का शानदार नजारा            #इतिहास
25/12/2023

झीलों की नगरी उदयपुर का शानदार नजारा

#इतिहास

गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के चित्तौड़ आक्रमण के समय राजमाता कर्णावती ने अपने पुत्र उदयसिंह को माता पन्नाधाय को सौंपते ह...
25/12/2023

गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के चित्तौड़ आक्रमण के समय राजमाता कर्णावती ने अपने पुत्र उदयसिंह को माता पन्नाधाय को सौंपते हुए उनकी रक्षा का वचन मांगा। तब माता पन्नाधाय ने राजमाता से कहा कि "समय आने पर मैं अपने प्राण गंवाकर भी मेवाड़ के कुँवर की रक्षा करूंगी"

हे माता पन्नाधाय, आपने तो अपने प्राणों से अधिक प्रिय पुत्र चंदन को अपनी आंखों के सामने गंवाकर कुँवर उदयसिंह की रक्षा की, शत शत नमन है आपको

#इतिहास

"बूंदी राव सुरतन सिंह हाड़ा से संबंधित एक ऐतिहासिक भ्रम"इन्हें राव सुल्तान सिंह हाड़ा के नाम से भी जाना जाता है।भारत का ...
25/12/2023

"बूंदी राव सुरतन सिंह हाड़ा से संबंधित एक ऐतिहासिक भ्रम"

इन्हें राव सुल्तान सिंह हाड़ा के नाम से भी जाना जाता है।
भारत का वीर पुत्र महाराणा प्रताप धारावाहिक में बूंदी के राव सुरतन सिंह हाड़ा को बेहद खराब तरह से दर्शाया गया था। अब जानते हैं वास्तविकता....

1554 ई. में राव सुरतन ने किसी कुसूर पर नाराज़ होकर अपने सामंत सहसमल हाड़ा व सांतल की आँखें फुड़वा दीं। इस कुकृत्य की ख़बर जब मेवाड़ नरेश को लगी, तो महाराणा उदयसिंह जी ने फ़ौरन राव सुरतन हाड़ा को बूंदी की राजगद्दी से खारिज कर राव सुर्जन हाड़ा को बूंदी का राज दिलाया।

राव सुर्जन हाड़ा वीर अर्जुन हाडा (चित्तौड़ के दूसरे साके में वीरगति पाने वाले) के पुत्र थे।

सगारथ झल्लन के हित सोध, बढ्यो मरुमाल महीप विरोध।
पदच्युत बुन्दियतें सुल्तान, दियो नृप सुर्जन को वह थान।।

कुछ वर्षों बाद राव सुरतन हाड़ा मेवाड़ आए और अपनी पुत्री शाहमति बाई हाड़ा का विवाह कुँवर प्रताप से करवाकर महाराणा उदयसिंह जी से अपने अपराधों की क्षमा मांगी, पर ऐसा करने के बाद भी उन्हें बूंदी का राज नहीं मिला। इन्हीं रानी शाहमति बाई हाड़ा से महाराणा प्रताप के पुत्र पुरणमल हुए, जिनके वंशज पुरावत कहलाते हैं।

(फोटो बूंदी के तारागढ़ दुर्ग का है)

पोस्ट लेखक :- तनवीर सिंह सारंगदेवोत

#इतिहास

जब महारानी अजबदे कंवर जी ने वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप को वन में जीवन यापन करते हुए अकबर से संघर्ष करने की सलाह दी, तो म...
25/12/2023

जब महारानी अजबदे कंवर जी ने वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप को वन में जीवन यापन करते हुए अकबर से संघर्ष करने की सलाह दी, तो महाराणा को अपनी प्रिय रानी पर बड़ा गर्व हुआ।

लेकिन फिर महाराणा प्रताप को चिंतित देखकर महारानी अजबदे बाई जी समझ गईं और उन्होंने महाराणा से कहा कि "आप हमारी चिंता न करें। हम सहर्ष इस पथ पर आपके साथ उसी प्रकार रहेंगे, जिस तरह भगवान राम के साथ माता सीता ने बनवास काटा था"

#इतिहास

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