17/01/2024
. "कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में,
कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।" - बहादुर शाह ज़फ़र
मंगलवार, 7 नवंबर, 1862 को रंगून (अब यांगून) में आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र का सांसारिक सफर समाप्त हो गया। वो इसी मुल्क की ज़मीन पर ज़िंदगी के आखिरी साल बिता रहे थे, जिन्हें 1857 के विफल भारतीय विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने उन्हें ज़ब्त कर निर्वासित कर दिया था।
बहादुर शाह ज़फ़र एक बहुआयामी शख्सियत थे। उन्हें एक विद्वान शायर और कला-प्रेमी राजा के तौर पर याद किया जाता है। 1837 में जब वो गद्दी पर बैठे, तब मुगल साम्राज्य पहले ही ब्रिटिश प्रभाव के नीचे कमज़ोर हो चुका था। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़ते प्रभुत्व और मुगल सत्ता के क्षरण को देखा।
1857 के भारतीय विद्रोह ने कुछ समय के लिए मुगल साम्राज्य के पुनरुद्धार की उम्मीद जगाई थी। हालांकि, विद्रोह अंततः अंग्रेज़ों द्वारा कुचल दिया गया, और बहादुर शाह ज़फ़र को पकड़कर रंगून निर्वासित कर दिया गया।
उनके अंतिम वर्ष दुख और अलगाव से भरे थे। 87 साल की उम्र में वो दुनिया से विदा हुए, एक टूटे हुए शख्स के रूप में, जिन्हें उनके राज्य से छीन लिया गया था और अपने प्रियजनों से दूर कर दिया गया था।
बहादुर शाह ज़फ़र की विरासत कई पहलुओं वाली है। उन्हें खोए हुए वैभव और सांस्कृतिक समृद्धि के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है, लेकिन एक दुखद शख्सियत के रूप में भी, जिन्होंने अपने वंश के पतन को देखा। उनकी शायरी, जो देशभक्ति और बीते जमाने की तड़प से ओतप्रोत है, आज भी भारत और उससे आगे कई लोगों के दिलों को छू लेती है।
उनकी मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं है, लेकिन माना जाता है कि वो बुढ़ापे और खराब स्वास्थ्य के कारण दुनिया से चले गए। उनका मकबरा यांगून, म्यांमार में स्थित है, और कई भारतीयों के लिए तीर्थस्थल बन गया है। उनकी पुण्यतिथि 7 नवंबर को भारत में याउम-ए-वफात के रूप में मनाई जाती है, एक दिन उनके जीवन और योगदान को याद करने के लिए।
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