23/01/2026
23/01/2026
#बसंत पंचमी विशेष
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
*बसंत पंचमी: ऋतुराज का आगमन और चेतना का उत्सव*
बसंत पंचमी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि प्रकृति, ज्ञान और चेतना के मिलन का एक महापर्व है।
भारतीय कालगणना में इस दिन का विशेष स्थान है। यह जड़ता के अंत और नव-चेतना के संचार का प्रतीक है। इसे 'श्रीपंचमी' भी कहा जाता है, जो सौंदर्य, विद्या और शक्ति के संतुलित स्वरूप को अभिव्यक्त करती है।
शास्त्रों के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में जब ब्रह्मा जी ने जीव-जंतुओं और मनुष्यों की रचना की, तब उन्हें सब कुछ नीरस और मौन लगा। 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' (प्रकृति खंड) के अनुसार, इस मौन को तोड़ने के लिए भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे आदि-शक्ति का 'सरस्वती' स्वरूप प्रकट हुआ। उनके एक हाथ में वीणा (नाद और संगीत), दूसरे में पुस्तक (तर्क और ज्ञान), तीसरे में अक्षमाला (अध्यात्म और ध्यान) और चतुर्थ हाथ में वर मुद्रा थी। उनके प्रकट होते ही संपूर्ण सृष्टि में 'वाणी' का संचार हुआ।
बसंत पंचमी से ही 'ऋतुराज बसंत' का आधिकारिक आरंभ होता है। इसे 'मधुमास' भी कहते हैं क्योंकि यह मिठास और माधुर्य का समय है।
इस समय धरती सुनहरी सरसों के फूलों से ढक जाती है। पीला रंग (पीत वर्ण) सात्विकता, शुद्धता और ऊर्जा का प्रतीक है। यह रंग भगवान विष्णु और सूर्य की आभा का प्रतिनिधित्व करता है, जो जीवन में सकारात्मकता लाता है।
श्रीमद्भागवत में वसंत को ईश्वर की विभूति कहा गया है। प्राचीन काल में इसे 'मदनोत्सव' के रूप में मनाया जाता था, जहाँ प्रेम के देवता कामदेव और देवी रति की पूजा की जाती थी, ताकि वैवाहिक जीवन और संबंधों में प्रेम का संचार बना रहे।
ज्योतिष शास्त्र में बसंत पंचमी को 'स्वयं सिद्ध मुहूर्त' माना गया है।
छोटे बच्चों को अक्षर ज्ञान कराने (विद्यारंभम) के लिए यह वर्ष का सर्वश्रेष्ठ दिन है।
साधकों के लिए यह दिन अपनी सुप्त शक्तियों को जागृत करने और नवीन संकल्प लेने का होता है। विशेषकर 'वाक्-सिद्धि' (वाणी की शक्ति) प्राप्त करने के लिए सरस्वती साधना इसी दिन की जाती है।
भारतीय ऋषियों का दृष्टिकोण अत्यंत वैज्ञानिक था। बसंत पंचमी से ठीक 40 दिन बाद होली मनाई जाती है।
तर्क: आयुर्वेद के अनुसार, किसी भी ऋतु के पूर्ण प्रभाव को स्थापित होने में 'एक मंडल' यानी 40 दिन का समय लगता है। आज बोया गया 'आनंद का बीज' (बसंत) 40 दिनों बाद 'उल्लास' (होली) बनकर खिलता है। इसी कारण आज के दिन कई क्षेत्रों में 'होली का डंडा' गाड़ा जाता है।
बसंत पंचमी हमें सिखाती है कि जीवन में ज्ञान (सरस्वती) और आनंद (कामदेव) का संतुलन आवश्यक है। जैसे प्रकृति पुराने पत्तों को त्याग कर नए पल्लवों को धारण करती है, वैसे ही मनुष्य को भी अज्ञान और निराशा त्याग कर विवेक के प्रकाश की ओर बढ़ना चाहिए।
असतो मां सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
" जय मां शारदे "
(विद्या और बुद्धि के लिए):
मंत्र: सरस्वती महाभागे विद्या कमल लोचनी। विद्या रूपे विशालाक्षी विद्यां देहि नमोस्तुते॥
अर्थ: हे महान सरस्वती, हे कमल नयन वाली, हे विशाल नेत्रों वाली देवी, मुझे विद्या प्रदान करें।
(अज्ञानता दूर करने के लिए):
मंत्र: या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
अर्थ: जो कुंद फूल, चंद्रमा और ओस के समान उज्ज्वल हैं, जो सफेद वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथों में वीणा और श्वेत कमल है, वह सरस्वती देवी मेरी सारी अज्ञानता को दूर करें।
(अध्ययन आरंभ करने के लिए):
मंत्र: सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणी।
विद्यारंभं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥
अर्थ: हे वरदान देने वाली, इच्छा पूरी करने वाली सरस्वती देवी, मैं अपनी पढ़ाई शुरू कर रहा हूँ, मुझे हमेशा सफलता मिले।
माँ सरस्वती के उपासना पर्व बसंत पंचमी के पावन अवसर पर,
आप और आपके पुरे परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएँ।
यह शुभ दिवस सभी के जीवन में सुख, समृद्धि एवं कल्याण लेकर आए तथा माँ सरस्वती सभी को सद्ज्ञान और विद्या का आशीर्वाद प्रदान करें।
🙏🙏🙏 जय मां सरस्वती 🙏🙏🙏