12/06/2026
साल 1564 में मुगल सेना ने गोंडवाना पर आक्रमण किया। दुश्मन की सेना बड़ी थी, लेकिन रानी दुर्गावती ने हार मानने से इनकार कर दिया। अपने घोड़े पर सवार होकर उन्होंने स्वयं युद्ध का नेतृत्व किया।
युद्ध के दौरान रानी गंभीर रूप से घायल हो गईं। उनके सैनिकों ने उन्हें सुरक्षित स्थान पर चलने को कहा, लेकिन रानी ने कहा, "स्वाभिमान के साथ जीना और मरना ही सच्ची वीरता है।"
24 जून 1564 को उन्होंने आत्मसमर्पण करने के बजाय वीरगति को चुना। उनका बलिदान साहस, स्वाभिमान और मातृभूमि-प्रेम का अमर प्रतीक बन गया।
आज भी रानी दुर्गावती का नाम भारत की महान वीरांगनाओं में सम्मान से लिया जाता है।
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