23/07/2026
#सावन मास में होने वाली कांवड़ यात्रा सनातन धर्म की सबसे कठिन, पवित्र और भव्य तीर्थयात्राओं में से एक है। इस यात्रा में भगवान शिव के भक्त (जिन्हें कांवड़िए कहा जाता है) पवित्र नदियों से जल भरकर मीलों पैदल चलते हैं और अपने स्थानीय या प्रमुख शिवालयों में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।
इस वर्ष (2026) की कांवड़ यात्रा
1. मुख्य तारीखें और समय (Year 2026)
उत्तर भारत (जहां कांवड़ यात्रा सबसे बड़े पैमाने पर होती है) के पंचांग के अनुसार:
कांवड़ यात्रा की शुरुआत: #30जुलाई2026 (सावन महीने का पहला दिन)。
यात्रा का समापन व मुख्य जलाभिषेक (सावन शिवरात्रि): #11अगस्त2026। इस दिन सबसे अधिक भीड़ होती है
सावन के सोमवार (2026): इस बार सावन में चार सोमवार पड़ रहे हैं— 3 अगस्त, 10 अगस्त, 17 अगस्त और 24 अगस्त。
. #भारत के प्रमुख कांवड़ यात्रा रूट्स ( )
कांवड़ यात्रा देश के अलग-अलग हिस्सों में कई मार्गों पर निकाली जाती है, जिनमें से तीन सबसे प्रमुख हैं:
#हरिद्वार / #गौमुख से #नीलकंठ व #पश्चिमी उत्तर प्रदेश/दिल्ली-NCR:
यह सबसे बड़ा रूट है। लाखों श्रद्धालु उत्तराखंड के हरिद्वार (हर की पौड़ी) या गौमुख से पवित्र गंगाजल उठाते हैं और पैदल चलकर ऋषिकेश के नीलकंठ महादेव, मेरठ के औघड़नाथ मंदिर, या अपने-अपने गृह राज्यों के शिवालयों में जल चढ़ाते हैं।
सुल्तानगंज से #बाबाबैद्यनाथ धाम (देवघर):
पूर्वी भारत की यह सबसे प्रसिद्ध यात्रा है। श्रद्धालु बिहार के सुल्तानगंज में उत्तरवाहिनी गंगा से जल लेते हैं और लगभग 105 किलोमीटर की बेहद कठिन पैदल यात्रा करके झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग पर जल अर्पित करते हैं।
#काशीविश्वनाथयात्रा:
श्रद्धालु प्रयागराज या आसपास के घाटों से गंगाजल लेकर वाराणसी के बाबा काशी विश्वनाथ का जलाभिषेक करने जाते हैं。
कांवड़ के प्रकार ( )
सामान्य कांवड़ ( Kanwar): इसमें भक्त आराम से, रुकते-रुकते पैदल चलते हैं। मार्ग में बने शिविरों (Camps) में वे आराम करते हैं और खाना खाते हैं।
#डाककांवड़ (Dak Kanwar): यह सबसे कठिन रूप है। इसमें एक बार जल उठाने के बाद, भक्त को बिना रुके लगातार दौड़ते या तेज चलते हुए गंतव्य तक पहुंचना होता है। जल को कहीं भी ठहराया नहीं जाता। जब एक धावक थकता है, तो उसकी टीम का दूसरा सदस्य कांवड़ थाम लेता है। 2026 में डाक कांवड़ का मुख्य समय 9 से 11 अगस्त के बीच रहेगा।
खड़ी कांवड़ (Khadi Kanwar): इसमें श्रद्धालु कांवड़ को कभी जमीन पर या स्टैंड पर नहीं रखते। यदि वे आराम भी करते हैं, तो कोई दूसरा साथी कांवड़ को अपने कंधे पर लेकर खड़ा रहता है।
#धार्मिक नियम और #पाबंदियां
कांवड़ यात्रा सिर्फ एक शारीरिक यात्रा नहीं, बल्कि एक कठिन तपस्या है, जिसके नियम बेहद सख्त होते हैं:
#भूमि स्पर्श वर्जित: गंगाजल से भरी कांवड़ को कभी भी जमीन पर नहीं रखा जाता। यदि कहीं रुकना हो, तो इसे पेड़ों पर या विशेष स्टैंड पर लटकाया जाता है।
#पूर्णसात्विकता: यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार का नशा (मदिरा, धूम्रपान आदि) और तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस) पूरी तरह वर्जित होता है।
पैदल यात्रा: सामान्य और खड़ी कांवड़ में वाहन का प्रयोग पूरी तरह मना होता है। श्रद्धालु नंगे पैर चलते हैं।
#पवित्रता: बिना स्नान किए या अशुद्ध हाथों से कांवड़ को छूना मना है। पूरी यात्रा में भक्त "बम-बम भोले" और "हर-हर महादेव" का जयघोष करते हैं।
#पौराणिक मान्यता
कांवड़ यात्रा की शुरुआत के पीछे दो मुख्य कथाएं प्रचलित हैं:
समुद्र मंथन और रावण: माना जाता है कि समुद्र मंथन के समय जब भगवान शिव ने विष का पान किया था, तो उनके गले में अत्यधिक जलन होने लगी। तब शिव के परम भक्त रावण ने पवित्र गंगाजल लाकर पुरमहादेव (बागपत) में शिव जी का जलाभिषेक किया था, जिससे विष का प्रभाव कम हुआ। तभी से सावन में जल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।
भगवान परशुराम: एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान परशुराम ने सबसे पहली कांवड़ यात्रा की थी। उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर बागपत के पास 'पुरा महादेव' का अभिषेक किया था।
विशेष सूचना (2026): इस वर्ष प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के लिए कुछ कड़े नियम बनाए हैं, जैसे कांवड़ यात्रियों के पास एक वैध पहचान पत्र (ID Card) होना अनिवार्य है। साथ ही, यात्रा के दौरान #दिल्ली- #देहरादून #एक्सप्रेसवे पर कांवड़ियों के चलने पर पूरी तरह रोक रहेगी, ताकि यातायात व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके।