16/12/2025
संसद में उठी दार्जिलिंग,तराई–डुवर्स के स्थायी समाधान की मांग ||
न्यूज़4एशिया संवाददाता, सिलीगुड़ी :: संसद में आज “Repealing and Amending Bill, 2025” के समर्थन में बोलते हुए दार्जिलिंग के सांसद एवं भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री राजू बिष्ट ने कहा कि यह विधेयक भारत की विधि पुस्तिका को स्वच्छ, सुसंगत, आधुनिक और नागरिकों के लिए सरल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विधेयक के माध्यम से कोई नया कानून नहीं बनाया जा रहा है, बल्कि उन अधिनियमों को निरस्त या संशोधित किया जा रहा है, जो समय के साथ अप्रचलित और निरर्थक हो चुके हैं।
अपने संबोधन में श्री बिष्ट ने वर्ष 1954 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा लागू किए गए Absorbed Areas (Law) Act, 1954 का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस कानून के तहत दार्जिलिंग पहाड़, तराई और डुआर्स क्षेत्रों में पश्चिम बंगाल राज्य के कानून लागू किए गए। इससे पूर्व ये क्षेत्र Non-Regulated Areas, Scheduled Districts तथा Partially Excluded Areas जैसी विशेष प्रशासनिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत आते थे।
उन्होंने कहा कि यद्यपि इस अधिनियम के माध्यम से इन क्षेत्रों को औपचारिक रूप से पश्चिम बंगाल के कानूनी ढांचे में शामिल किया गया, लेकिन आज भी यहां के लोग न्याय, समानता और सम्मान से वंचित हैं।
श्री बिष्ट ने संसद को अवगत कराया कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार, गरिमा और न्याय की गारंटी देता है। उन्होंने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में “न्याय” की यह संवैधानिक भावना देश के सबसे उपेक्षित क्षेत्रों तक पहुँची है, जो “सबका साथ, सबका विकास” के संकल्प को दर्शाती है।
इसके बावजूद दार्जिलिंग पहाड़, तराई और डुआर्स के लोग आज भी अपनी पहचान, आकांक्षाओं और संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप न्यायपूर्ण समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार ने इन क्षेत्रों की दीर्घकालिक समस्याओं के समाधान के लिए गंभीर और ईमानदार प्रयास किए हैं। इसके प्रमाण स्वरूप सरकार द्वारा संवादकर्ता (इंटरलोक्यूटर) की नियुक्ति की गई है, जो संवाद और शांतिपूर्ण समाधान के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
श्री बिष्ट ने अपने संबोधन में क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियों को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि सीमा पार से अवैध घुसपैठ के कारण तेजी से जनसांख्यिकीय परिवर्तन हो रहा है, जिससे स्वदेशी समुदाय अपनी ही भूमि पर अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं। इसके साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन, विकास और संपर्क की कमी, आर्थिक पिछड़ापन तथा युवाओं के लिए रोजगार और आजीविका के अवसरों का अभाव गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है।
अंत में उन्होंने कहा कि DGHC और GTA जैसी अस्थायी व्यवस्थाएँ इन मूलभूत समस्याओं का समाधान करने में विफल रही हैं। उन्होंने दोहराया कि संविधान के अंतर्गत दार्जिलिंग पहाड़, तराई और डुआर्स के लिए एक स्थायी, न्यायपूर्ण और सम्मानजनक समाधान ही आगे का एकमात्र मार्ग है, और इसे समयबद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए।