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नई दिल्ली: देश की राजनीति में एक नया प्रयोग सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने 'इश...
10/06/2026

नई दिल्ली: देश की राजनीति में एक नया प्रयोग सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने 'इश्क करो पार्टी' नाम से नई राजनीतिक पार्टी के गठन की घोषणा की है। पार्टी का नारा 'नफरत छोड़ो, इश्क करो' रखा गया है और इसका उद्देश्य समाज में बढ़ती वैमनस्यता, ध्रुवीकरण और सामाजिक विभाजन के खिलाफ प्रेम, भाईचारे और संवाद की राजनीति को बढ़ावा देना बताया गया है।

जस्टिस काटजू ने कहा कि देश के सामने बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक असमानता और सांप्रदायिक तनाव जैसी गंभीर चुनौतियां हैं, जिन पर मुख्यधारा की राजनीति पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही है। उनका दावा है कि 'इश्क करो पार्टी' इन मुद्दों पर वैकल्पिक राजनीतिक विमर्श खड़ा करने का प्रयास करेगी।

इस नई राजनीतिक पहल के साथ जस्टिस काटजू ने तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा को भी पार्टी से जुड़ने का प्रस्ताव दिया है। पार्टी के गठन की घोषणा के बाद सोशल मीडिया पर इसकी व्यापक चर्चा हो रही है और राजनीतिक हलकों में भी इसे लेकर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

अब देखना होगा कि जस्टिस काटजू की यह नई राजनीतिक पहल केवल प्रतीकात्मक संदेश बनकर रह जाती है या आने वाले समय में एक संगठित राजनीतिक विकल्प का रूप ले पाती है।

बसपा की प्रदेश स्तरीय समीक्षा बैठक आज. संगठन विस्तार पर रहेगा फोकसलखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रदेश स्तरीय समीक्ष...
10/06/2026

बसपा की प्रदेश स्तरीय समीक्षा बैठक आज. संगठन विस्तार पर रहेगा फोकस

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रदेश स्तरीय समीक्षा बैठक आज लखनऊ में आयोजित होगी। बैठक में बसपा सुप्रीमो मायावती, राष्ट्रीय समन्वयक आकाश आनंद और वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्रा समेत पार्टी के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों के शामिल होने की संभावना है।

सूत्रों के अनुसार बैठक में संगठन विस्तार, आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों और बूथ स्तर तक पार्टी को मजबूत बनाने की रणनीति पर चर्चा होगी। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ाने और भाईचारा अभियान को प्रभावी बनाने के मुद्दों पर भी मंथन किया जाएगा।

बताया जा रहा है कि प्रदेश इकाइयों की कार्यप्रणाली, संगठनात्मक गतिविधियों और चुनावी तैयारियों की समीक्षा भी बैठक के एजेंडे में शामिल है। विधानसभा चुनावों से पहले होने वाली इस बैठक को बसपा की राजनीतिक रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत में ‘Gen-Z’ संभव नहीं, भारतीय युवा एक समान नहीं हैं: प्रो. विवेक कुमारनई दिल्ली। प्रख्यात समाजशास्त्री प्रो. विवेक ...
09/06/2026

भारत में ‘Gen-Z’ संभव नहीं, भारतीय युवा एक समान नहीं हैं: प्रो. विवेक कुमार

नई दिल्ली। प्रख्यात समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार ने कहा है कि भारत में पश्चिमी देशों की तरह एक समान “Gen-Z” की अवधारणा लागू नहीं होती, क्योंकि भारतीय युवा सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से एक जैसे नहीं हैं।

उनके अनुसार भारत के युवाओं को मोटे तौर पर छह वर्गों में देखा जा सकता है—ग्रामीण युवा, शहरी युवा, महानगरीय/पश्चिमी प्रभाव वाले युवा, वैश्वीकृत युवा, दलित-आदिवासी एवं अल्पसंख्यक युवा तथा विभिन्न राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों में सक्रिय युवा।

प्रो. कुमार का कहना है कि जाति, वर्ग, क्षेत्र, भाषा और अवसरों की असमानता भारतीय युवाओं के अनुभवों को एक-दूसरे से अलग बनाती है। ऐसे में पूरे देश के युवाओं को एक ही सामाजिक पहचान के दायरे में रखना वास्तविकता से दूर है।

उन्होंने विशेष रूप से दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक युवाओं की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि सम्मान, समान अवसर और सामाजिक न्याय के प्रश्न आज भी उनके जीवन को प्रभावित करते हैं।

प्रो. विवेक कुमार के अनुसार जब तक युवाओं के बीच समानता, न्याय, अवसर और सम्मान की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक भारत में एक समान “Gen-Z” की अवधारणा केवल कल्पना बनी रहेगी।

📌 आप प्रो. विवेक कुमार की इस राय से कितना सहमत हैं? अपनी राय कमेंट में बताएं।





04/06/2026

राहुल गांधी का बड़ा दावा, 'एक साल में मोदी नहीं रहेंगे PM'

'आर्थिक सुनामी' और 'इमरजेंसी जैसे हालात' की आशंका जताते हुए विपक्ष के नेता ने केंद्र सरकार पर साधा निशाना.





Pride Month पर LGBTQ+ समुदाय के समर्थन में उतरी वंचित बहुजन आघाड़ीPride Month के अवसर पर वंचित बहुजन आघाड़ी (VBA) ने LGB...
01/06/2026

Pride Month पर LGBTQ+ समुदाय के समर्थन में उतरी वंचित बहुजन आघाड़ी

Pride Month के अवसर पर वंचित बहुजन आघाड़ी (VBA) ने LGBTQ+ समुदाय के समर्थन में संदेश जारी किया है। पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि Pride केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि समानता, कानूनी मान्यता, गरिमा और आत्मनिर्णय के अधिकार की मांग का प्रतीक है।

VBA ने अपने बयान में कहा कि भारत में कई ट्रांसजेंडर और क्वीयर लोग, विशेष रूप से सामाजिक रूप से वंचित और भेदभाव का सामना करने वाले समुदायों से आने वाले लोग, आज भी सामाजिक बहिष्कार और संस्थागत भेदभाव जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। पार्टी ने ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों, कल्याण और सम्मानजनक जीवन से जुड़े मुद्दों को भी उठाया।

पार्टी ने कहा कि LGBTQ+ समुदाय के लिए समान अवसर, सामाजिक स्वीकृति और सुरक्षा सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक समाज की जिम्मेदारी है। VBA ने Pride Month के अवसर पर समुदाय के साथ एकजुटता व्यक्त करते हुए समानता, न्याय और गरिमा के मूल्यों को मजबूत करने की बात कही।

Pride Month पर कांग्रेस का संदेश, LGBTQ+ समुदाय के साथ एकजुटता जताईकांग्रेस ने Pride Month के अवसर पर LGBTQ+ समुदाय के स...
01/06/2026

Pride Month पर कांग्रेस का संदेश, LGBTQ+ समुदाय के साथ एकजुटता जताई

कांग्रेस ने Pride Month के अवसर पर LGBTQ+ समुदाय के समर्थन में संदेश जारी किया है। पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर कहा कि वह समानता, गरिमा और समावेश के मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराती है तथा LGBTQ+ समुदाय के योगदान और संघर्ष का सम्मान करती है।

कांग्रेस ने अपने संदेश में कहा कि वह LGBTQ+ समुदाय की स्वीकृति, सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार की लड़ाई में उनके साथ खड़ी है। पार्टी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब जून माह दुनिया भर में Pride Month के रूप में मनाया जा रहा है।

Pride Month हर वर्ष जून में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य LGBTQ+ समुदाय के अधिकारों, समानता और सामाजिक स्वीकृति के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यह परंपरा 1969 के स्टोनवॉल आंदोलन की स्मृति से जुड़ी मानी जाती है, जिसे आधुनिक LGBTQ+ अधिकार आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।

Pride Month के अवसर पर जारी इस संदेश में कांग्रेस ने LGBTQ+ समुदाय के प्रति समर्थन जताते हुए समानता, सम्मान और समावेश के मूल्यों को दोहराया है। पार्टी ने अपने संदेश में कहा कि एक लोकतांत्रिक समाज में प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए।

“मैं दलित हूं, इसलिए बंगला खाली नहीं हो रहा” -  मंत्री नंदकिशोर राम के बयान से बिहार की राजनीति में नया विवादराबड़ी देवी...
31/05/2026

“मैं दलित हूं, इसलिए बंगला खाली नहीं हो रहा” - मंत्री नंदकिशोर राम के बयान से बिहार की राजनीति में नया विवाद

राबड़ी देवी के सरकारी आवास विवाद ने लिया जातीय मोड़, मंत्री ने लगाया भेदभाव का आरोप; राजद ने कहा- यह मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश

पटना। बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के सरकारी आवास विवाद ने अब जातीय और राजनीतिक रंग ले लिया है। बिहार सरकार में मंत्री नंदकिशोर राम ने आरोप लगाया है कि उन्हें आवंटित सरकारी आवास इसलिए नहीं मिल पा रहा क्योंकि वह दलित समाज से आते हैं। उनके इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है।

नंदकिशोर राम ने कहा कि 10 सर्कुलर रोड स्थित सरकारी बंगला उन्हें आवंटित किया जा चुका है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी अब तक उसे खाली नहीं कर रही हैं। उन्होंने दावा किया कि यदि वह दलित समाज से नहीं होते तो अब तक आवास खाली करा दिया गया होता। मंत्री का यह बयान सामने आते ही मामला केवल सरकारी आवास के विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जातीय प्रतिनिधित्व और भेदभाव की बहस भी शुरू हो गई।

दरअसल, बिहार सरकार ने 10 सर्कुलर रोड स्थित सरकारी आवास नंदकिशोर राम को आवंटित किया है। वहीं राबड़ी देवी को वैकल्पिक सरकारी आवास उपलब्ध कराया जा चुका है। इसके बावजूद पुराने आवास को खाली न किए जाने को लेकर भवन निर्माण विभाग कई नोटिस जारी कर चुका है।

मंत्री नंदकिशोर राम के बयान के बाद विपक्ष और सत्तापक्ष आमने-सामने आ गए हैं। राजद नेताओं का कहना है कि यह मामला प्रशासनिक प्रक्रिया का है और इसे जातीय रंग देकर मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है। वहीं एनडीए नेताओं का कहना है कि सरकारी नियम सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए और आवंटित आवास संबंधित मंत्री को सौंपा जाना चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में जहां जातीय समीकरण हमेशा राजनीति के केंद्र में रहे हैं, वहां नंदकिशोर राम का यह बयान आने वाले दिनों में और बड़ी राजनीतिक बहस का कारण बन सकता है। खासकर ऐसे समय में जब राज्य में सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और दलित राजनीति से जुड़े मुद्दे लगातार चर्चा में हैं।

फिलहाल विवाद का केंद्र 10 सर्कुलर रोड स्थित सरकारी आवास है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा अब इस बात पर भी हो रही है कि क्या यह सिर्फ आवास का मामला है या फिर बिहार की राजनीति में जाति का सवाल एक बार फिर केंद्र में आ गया है।

दीक्षाभूमि ट्रस्ट विवाद पहुंचा हाई कोर्ट, प्रशासनिक अधिकारों को लेकर सुनवाई शुरूट्रस्ट अध्यक्ष की याचिका पर बॉम्बे हाई क...
31/05/2026

दीक्षाभूमि ट्रस्ट विवाद पहुंचा हाई कोर्ट, प्रशासनिक अधिकारों को लेकर सुनवाई शुरू

ट्रस्ट अध्यक्ष की याचिका पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने सभी पक्षों से मांगा जवाब, 10 जून तक जवाब दाखिल करने के निर्देश

नागपुर स्थित दीक्षाभूमि का संचालन करने वाले डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मेमोरियल कमेटी ट्रस्ट के भीतर प्रशासनिक और कार्यकारी अधिकारों को लेकर चल रहा विवाद अब बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ तक पहुंच गया है। ट्रस्ट अध्यक्ष भंते आर्य नागार्जुन सुरई ससाई द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने संबंधित पक्षों को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

याचिका में ट्रस्ट के प्रशासनिक नियंत्रण और अधिकारों की व्याख्या को लेकर आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ता का दावा है कि ट्रस्ट के संविधान के अनुसार बैठकों का संचालन, प्रशासनिक निर्णय लेने और दैनिक कार्यों की निगरानी का अधिकार अध्यक्ष के पास होना चाहिए। वहीं, अधिकारों की अलग-अलग व्याख्या के कारण ट्रस्ट के कामकाज को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया है।

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए 10 जून तक जवाब दाखिल करने को कहा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित प्राधिकरण कानून के दायरे में अपनी कार्यवाही जारी रख सकते हैं।

दीक्षाभूमि देश के प्रमुख ऐतिहासिक और सामाजिक स्थलों में से एक है। 14 अक्टूबर 1956 को इसी स्थान पर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। इसके बाद से यह स्थल आंबेडकरवादी आंदोलन और नवयान बौद्ध समुदाय का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

इस बीच, दीक्षाभूमि के पुनर्विकास (रीडेवलपमेंट) से जुड़ी परियोजनाएं भी अलग कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण चर्चा में हैं। ऐसे में ट्रस्ट के भीतर उत्पन्न यह विवाद दीक्षाभूमि के प्रशासन और भविष्य की योजनाओं को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अब इस मामले में अगली सुनवाई और पक्षकारों के जवाब पर सभी की नजरें टिकी हैं। अदालत के समक्ष 10 जून को मामले की अगली सुनवाई प्रस्तावित है।





25/05/2026

बहुजन समाज पार्टी (BSP) से जुड़े एक युवा कार्यकर्ता का वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है। वीडियो में कार्यकर्ता के बैग पर “Gen-Z for BSP” लिखा दिखाई दे रहा है, जिसे लोग बहुजन राजनीति में युवाओं की बढ़ती मौजूदगी से जोड़कर देख रहे हैं।

वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे BSP की नई पीढ़ी तक पहुंच बनाने की कोशिश मान रहे हैं, तो कुछ इसे बदलते राजनीतिक ट्रेंड से जोड़कर देख रहे हैं।





भारत में सीवर-सफाई के दौरान हुई मौतों पर फिर सवाल,तीन महीनों में 36 सफाई कर्मचारियों ने गवाई जानदेश में मैनुअल स्कैवेंजि...
25/05/2026

भारत में सीवर-सफाई के दौरान हुई मौतों पर फिर सवाल,
तीन महीनों में 36 सफाई कर्मचारियों ने गवाई जान

देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग और सीवर-सफाई के दौरान होने वाली मौतों को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच (DASAM) ने दावा किया है कि मार्च से मई 2026 के बीच देश के अलग-अलग हिस्सों में सीवर, सेप्टिक टैंक, नालों और सीवेज कक्षों की सफाई के दौरान कम से कम 36 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई है।

नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों ने कहा कि हाथ से मैला उठाने और बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर-सफाई की प्रथा अब भी जारी है। DASAM के मुताबिक इन मौतों के पीछे सबसे बड़ी वजह सुरक्षा मानकों की अनदेखी, मशीनों की कमी और ठेका व्यवस्था में लापरवाही है।

संगठन का कहना है कि देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग पर कानूनी प्रतिबंध होने के बावजूद सफाई कर्मचारियों को आज भी जहरीली गैसों और खतरनाक परिस्थितियों में सीवरों में उतरने के लिए मजबूर किया जा रहा है। कई मामलों में मजदूरों के पास ना ऑक्सीजन उपकरण होते हैं और ना ही पर्याप्त सुरक्षा किट।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि सीवर-सफाई के दौरान होने वाली मौतों के मामलों में अक्सर प्रशासन और स्थानीय निकाय जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं। कई पीड़ित परिवारों को समय पर मुआवजा और न्याय भी नहीं मिल पाता।

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की कि:

•सीवर-सफाई में पूरी तरह मशीनों का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाए

•दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर आपराधिक कार्रवाई हो

•मृतक सफाई कर्मचारियों के परिवारों को उचित मुआवजा और सरकारी नौकरी दी जाए

•मैनुअल स्कैवेंजिंग कानून का सख्ती से पालन कराया जाए

देश में सफाई कर्मचारियों की मौतों का मुद्दा लंबे समय से मानवाधिकार और सामाजिक न्याय से जुड़ा बड़ा सवाल बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट भी पहले कई बार सीवर और सेप्टिक टैंक सफाई के दौरान होने वाली मौतों पर चिंता जता चुका है।





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