21/04/2026
आर्काइव | प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में संघ के कई सपने साकार हुए हैं, चाहे वह बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाने का सपना हो या अनुच्छेद 370 को ख़त्म कर जम्मू और कश्मीर को हासिल विशेष दर्जा छीनने का. संघ की उपरोक्त जीतों में न्यायपालिका की भूमिका भी अहम रही है. इसीलिए एबीएपी को समझना बहुत ज़रूरी हो जाता है.
अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (एबीएपी) की स्थापना 1992 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वकीलों की शाखा के रूप में की गई थी. आज एबीएपी भारत में वकीलों का शायद सबसे बड़ा संगठन है. अध्ययन मंडलियों, रणनीतिक मुकदमेबाज़ी और निजी रिश्तों के लगातार बढ़ते नेटवर्क के ज़रिए, समाज के बढ़े हिस्से के साथ-साथ देश भर के हज़ारों जिला और ट्रायल कोर्टों में एबीएपी फैल चुका है.
एबीएपी आज एक ऐसे संगठन के रूप में उपस्थित है जो इस देश की ज़्यादातर अदालतों को प्रभावित करने की ताक़त रखता है. इसके के सदस्य बार एसोसिएशनों का नेतृत्व करते हैं, इसके संरक्षक बेंचों पर बैठते हैं और उनके बच्चे सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की अगुआई करते हैं, और यहां तक कि हमारे वक़्त के न्यायिक मामलों पर टिप्पणी करते हैं.
इसके सदस्य अब संसद और यहां तक कि केंद्रीय मंत्रिमंडल तक पहुंच चुके हैं. इनमें महेश जेठमलानी, सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज आदर्श कुमार गोयल, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव और बीजेपी और विपक्ष शासित राज्यों के महाधिवक्ता शामिल हैं. इस रिपोर्टिंग के दो सालों में, मैं अलग-अलग तरह के वकीलों से मिला. इनमें से कुछ पैसे से और कुछ सत्ता से लेकिन अमूमन सभी कानून की विकृत कल्पना से आकर्षित हैं जो अति-राष्ट्रवादी से प्रेरित है. वे निचली अदालतों में युवा वकीलों और भारत के विधि विद्यालयों में युवा छात्रों के आदर्शों और महत्वाकांक्षाओं को आकार देते हैं. वे न केवल हमारे समय की हिंदू कट्टरपंथी वास्तविकता का मसौदा तैयार कर रहे हैं, दलील दे रहे हैं और बहस कर रहे हैं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों को चुनौती देने के लिए एक गहरे आंदोलन की ज़मीन तैयार कर रहे हैं.
पढ़ें एबीएपी पर सुशोवन पटनायक का लिखा यह पूरा लेख. लिंक कमेन्ट बॉक्स में.