21/07/2026
"जाने कितने चढ़े थे फांसी पर, कितनो ने गोली खाई थी, क्यों झूंठ बोलते हो साहब की चरखे से आजादी आई थी।"
भारतवर्ष के इतिहास में दिल्ली में बैठी सरकारें पिछले 700 सालों से बहरी, गूंगी और संवेदनशील ही रही हैं, मुगल काल, ब्रिटिश राज, आजाद भारत और अब विकसित भारत तक के सफर में भारतीय जनता को हमेशा इस लोकतंत्र के घिनौने चेहरे का सामना करना पड़ा है जब लोकतंत्र के प्रहरी उन्हीं पर हँसे हैं जिनके लिए उन्होंने शपथ ली थी।
देखो तो जरा ये मंजर क्या है ? भीड़ का ये समंदर क्या है ?
कोई कह रहा था भाड़े कि भीड़ है ये, देखूं तो जरा माजरा क्या है ?
ना, 500 रूपये और आलू पूड़ी के पैकेट में ना आयेगा कोई उमस भरी गर्मी में लठ खाने, ये तो वही है जो आज इस देश के भविष्य के लिए लड़ रहे हैं, और जो इनका विरोध कर रहे हैं वो वैसी ही भूमिका निभा रहे हैं जैसी ब्रिटिश राज में कुछ भारतीय उनके तलवे चाटकर निभाते थे।
सोचो, खूब सोचो, बारम्बार सोचो और अपने हृदय से अवश्य पूछना कि क्या ये बच्चे वास्तव में गलत थे ?
ये सब जानते हैं कि कौन गलत है कौन सही है लेकिन हमारी गलती नहीं है, करीब 700 साल गुलामी करने की वजह से हमें हर उस सत्ता की गुलामी करने की आदत बन गई है जो दिल्ली में बैठी होती है, चाहे मुगल भारत में हो, गुलाम भारत में हो, आजाद भारत में या विकसित भारत में।
ये मेरे देश का दुर्भाग्य ही है कि आज भी अपनी बात दिल्ली तक पहुंचाने के लिए हमें आंदोलन, हड़तालों और सत्ता विरोधी प्रदर्शनों का सहारा लेना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट भी मौन है, सरकार भी मौन है, आखिर युवा जाए तो जाए कहां उसका भगवान भी मौन है।