Anil Rajora

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"जाने कितने चढ़े थे फांसी पर, कितनो ने गोली खाई थी, क्यों झूंठ बोलते हो साहब की चरखे से आजादी आई थी।"भारतवर्ष के इतिहास ...
21/07/2026

"जाने कितने चढ़े थे फांसी पर, कितनो ने गोली खाई थी, क्यों झूंठ बोलते हो साहब की चरखे से आजादी आई थी।"

भारतवर्ष के इतिहास में दिल्ली में बैठी सरकारें पिछले 700 सालों से बहरी, गूंगी और संवेदनशील ही रही हैं, मुगल काल, ब्रिटिश राज, आजाद भारत और अब विकसित भारत तक के सफर में भारतीय जनता को हमेशा इस लोकतंत्र के घिनौने चेहरे का सामना करना पड़ा है जब लोकतंत्र के प्रहरी उन्हीं पर हँसे हैं जिनके लिए उन्होंने शपथ ली थी।

देखो तो जरा ये मंजर क्या है ? भीड़ का ये समंदर क्या है ?
कोई कह रहा था भाड़े कि भीड़ है ये, देखूं तो जरा माजरा क्या है ?

ना, 500 रूपये और आलू पूड़ी के पैकेट में ना आयेगा कोई उमस भरी गर्मी में लठ खाने, ये तो वही है जो आज इस देश के भविष्य के लिए लड़ रहे हैं, और जो इनका विरोध कर रहे हैं वो वैसी ही भूमिका निभा रहे हैं जैसी ब्रिटिश राज में कुछ भारतीय उनके तलवे चाटकर निभाते थे।

सोचो, खूब सोचो, बारम्बार सोचो और अपने हृदय से अवश्य पूछना कि क्या ये बच्चे वास्तव में गलत थे ?

ये सब जानते हैं कि कौन गलत है कौन सही है लेकिन हमारी गलती नहीं है, करीब 700 साल गुलामी करने की वजह से हमें हर उस सत्ता की गुलामी करने की आदत बन गई है जो दिल्ली में बैठी होती है, चाहे मुगल भारत में हो, गुलाम भारत में हो, आजाद भारत में या विकसित भारत में।

ये मेरे देश का दुर्भाग्य ही है कि आज भी अपनी बात दिल्ली तक पहुंचाने के लिए हमें आंदोलन, हड़तालों और सत्ता विरोधी प्रदर्शनों का सहारा लेना पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट भी मौन है, सरकार भी मौन है, आखिर युवा जाए तो जाए कहां उसका भगवान भी मौन है।

धन्यवाद  #मोदीजी उत्तराखंड के चौमुखी विकास के लिए, अगर आपकी सरकार ना होती तो शायद चार धाम यात्रा इतनी सुगम कभी नहीं होती...
22/05/2026

धन्यवाद #मोदीजी उत्तराखंड के चौमुखी विकास के लिए, अगर आपकी सरकार ना होती तो शायद चार धाम यात्रा इतनी सुगम कभी नहीं होती और ना ही इतने धर्मप्रेमी कभी बाबा भोलेनाथ के सर्वोच्च दरबार ना जा पाते।
अब समझ आया कि ये विकास कांग्रेस ने इतना धीमा क्यों रख रखा था क्योंकि पिछली सरकारें बाबली थीं, उन्हें पता था कि पहाड़ों पर अत्यधिक विकास पहाड़ो के लिए कितना घातक होगा, और शायद वो ईश्वर के वास्तविक करीब थी क्योंकि शायद उन्हें ये भी पता था कि जो #भोले बाबा स्वयं जानबूझकर इतनी दूर, दुर्गम इलाकों में, शांति में, ठंडे और प्राकृतिक वातावरण में जाकर बैठे हैं, उनके आस पास के वातावरण में ज्यादा विकास विघ्न ही डालेगा, और उनका पावन वातावरण दूषित हो जाएगा।
#केदारनाथ यात्रा एक यात्रा नहीं जीवन का एक अनुभव है जिसे जीवन में एक बार जीना ही स्वर्ग के रास्ते पर जीने के समान है।
विकास की इस भयावह और डरावनी तस्वीर के लिए #मोदी जी का कोटि कोटि धन्यवाद।

22/04/2026

मोहल्ले का मैदान – असली समझदारी कौन?

एक मोहल्ले में दो बच्चे थे – “नरेंद्र” और “राहुल”।
दोनों की सोच अलग थी, और पूरा मोहल्ला धीरे-धीरे उनकी बातों से प्रभावित होने लगा।

नरेंद्र बहुत आत्मविश्वास से बातें करता था।
वो रोज नए-नए वादे करता –
“मैं मैदान को स्टेडियम बना दूँगा”,
“हर बच्चे को नई साइकिल दिलवाऊँगा”,
“हमारा मोहल्ला सबसे आगे होगा!”

मोहल्ले के बच्चे उसकी बातों में जोश महसूस करते थे।
तालियाँ बजती थीं, और हर दिन नए सपने दिखाए जाते थे।

लेकिन राहुल थोड़ा अलग था।
वो कहता,
“जो कहा जा रहा है, वो कैसे होगा? पैसे कहाँ से आएंगे? सबको बराबर फायदा मिलेगा या नहीं?”

शुरू में बच्चों को राहुल की बातें भारी लगती थीं।
उन्हें लगा ये तो बस सवाल करता है, मज़ा खराब करता है।

धीरे-धीरे समय बीता…

मैदान का काम शुरू तो हुआ, लेकिन अधूरा रह गया।
कुछ जगह सफाई हुई, कुछ जगह गंदगी जस की तस रही।
साइकिल का वादा आया, पर बहुत कम बच्चों तक पहुँचा।
और हर बार नए वादों से पुराने सवाल दबा दिए गए।

तब कुछ बच्चों ने ध्यान देना शुरू किया—
“जो बातें हो रही थीं, वो पूरी क्यों नहीं हो रहीं?”
“हर बार नई बात, लेकिन पुरानी अधूरी क्यों?”

अब राहुल की बातों का मतलब समझ आने लगा।
वो सिर्फ सवाल नहीं कर रहा था,
बल्कि ये सुनिश्चित करना चाहता था कि जो भी हो – सही तरीके से, सबके लिए हो।

धीरे-धीरे मोहल्ले में बदलाव आया।
अब बच्चे सिर्फ जोश में नहीं, समझदारी से सुनने लगे।
वादों के साथ-साथ सवाल भी जरूरी समझने लगे।

सीख:
केवल बड़ी-बड़ी बातें करना आसान है,
लेकिन सही सवाल पूछना और जवाबदेही तय करना ही असली समझदारी है।

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#सोच_समझकर_चुनें
#जवाबदेही_जरूरी_है
#सवाल_पूछना_सीखें
#विकास_और_जिम्मेदारी
#समझदार_मतदाता
#जागरूक_समाज
#विचार_की_ताकत
#संतुलित_सोच
#लोकतंत्र


16/02/2026

#विकास हो रहा है या #मजाक

जितना वासी परेशान है ये केवल वो ही जानता है, उनका दर्द ना तो कोई सुनने वाला है और ना कोई समझने वाला।
योजना में बदइंतजामी इस कदर हावी है कि ऐसा लगता है मानो आम जनता की किसी को कोई फिक्र ही नहीं है, ना कोई #नियम है ना #कायदे जिसका जैसा मन कर रहा है वो वैसे खुदाई कर रहा है, ऐसा लग रहा है ये #विकास नहीं #विनाश हो रहा है।

इस देश में वास्तव में किसी की जान, किसी की परेशानी, या किसी की जिम्मेदारी की किसी को कोई परवाह नहीं है, बस मेज पर रखे हुए उठाओ, जैसे टेंडर की #नुमाइश हो रही हो, और बिना तैयारी या बिना योग्यता के #काम पर लग जाओ।

Its highly

10/02/2026


Narendra Modi Donald J. Trump

08/02/2026

सरकारी और प्राइवेट मुजरिम में अंतर क्यों ?

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