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क्लियोपेट्रा 17 साल की उम्र में सिंहासन पर बैठी और 39 साल की उम्र में उसकी मृत्यु हो गई। वह 9 भाषाएँ बोलती थी।  वह प्राच...
02/02/2024

क्लियोपेट्रा 17 साल की उम्र में सिंहासन पर बैठी और 39 साल की उम्र में उसकी मृत्यु हो गई। वह 9 भाषाएँ बोलती थी। वह प्राचीन मिस्र की भाषा जानती थी और उसने चित्रलिपि पढ़ना सीखा था, जो उसके राजवंश में एक अनोखा मामला था। इसके अलावा, वह ग्रीक और इब्रानियों, मेडोस, ट्रोग्लोडाइट्स, सीरियाई, इथियोपियाई और अरब की भाषाओं को जानती थी।
इस ज्ञान के साथ, दुनिया की कोई भी किताब उसके लिए खुली थी। भाषाओं के अलावा, उन्होंने भूगोल, इतिहास, खगोल विज्ञान, अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति, गणित, कीमिया, चिकित्सा, प्राणीशास्त्र, अर्थशास्त्र और अन्य विषयों का अध्ययन किया। उसने अपने समय के सभी ज्ञान तक पहुँचने का प्रयास किया।
क्लियोपेट्रा ने एक प्रकार की प्राचीन प्रयोगशाला में बहुत समय बिताया। जड़ी-बूटियों और सौंदर्य प्रसाधनों से संबंधित कुछ रचनाएँ लिखीं। दुर्भाग्य से, उनकी सभी पुस्तकें वर्ष 391 ई. में अलेक्जेंड्रिया की महान लाइब्रेरी की आग में नष्ट हो गईं। सी. प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी गैलेनो ने उनके काम का अध्ययन किया, और क्लियोपेट्रा द्वारा तैयार किए गए कुछ व्यंजनों को लिपिबद्ध करने में सक्षम थे।
इन उपचारों में से एक, जिसे गैलेनो ने भी अपने रोगियों को सुझाया था, एक विशेष क्रीम थी जो गंजे पुरुषों को अपने बाल वापस पाने में मदद कर सकती थी। क्लियोपेट्रा की किताबों में ब्यूटी हैक्स भी शामिल थे, लेकिन उनमें से कोई भी अब तक हमारे सामने नहीं आया है।
मिस्र की रानी को भी हर्बल उपचार में रुचि थी, और भाषाओं के अपने ज्ञान के कारण उनकी कई पपीयर्स तक पहुंच थी जो आज तक लुप्त हैं। विज्ञान और चिकित्सा पर उनका प्रभाव ईसाई धर्म की पहली शताब्दियों में सर्वविदित था... निश्चित रूप से मानव इतिहास में एक अद्वितीय व्यक्ति।
#यूरोपीय #सभ्यता #मिश्र #भारत

छत्रपति शिवाजी महाराज  के समय में कभी भी  किसी औरत का नाच गाना  नहीं  हुआ l महिलाओं का  हमेशा सम्मान किया जाता था चाहे व...
31/01/2024

छत्रपति शिवाजी महाराज के समय में कभी भी किसी औरत का नाच गाना नहीं हुआ l महिलाओं का हमेशा सम्मान किया जाता था चाहे वह दुश्मन की पत्नी भी क्यों ना हो सभी को अपनी माता और बहन के समान समझा जाता था l महिलाओं की गरिमा हमेशा बनाए रखनी चाहिए। बेशक वह महिला किसी भी जाति या धर्म से हो क्यों ना हो !!"

*28 फरवरी 1678 में, सुकुजी नामक सरदार ने बेलवाड़ी किले की घेराबंदी की। इस किले की किलेदार एक स्त्री थी।

*उसका नाम सावित्रीबाई देसाई था। इस बहादुर महिला ने 27 दिनों तक किले के लिए लड़ाई लड़ी। लेकिन अंत में, सुकुजी ने किले को जीत लिया और सावित्रीबाई से बदला लेने के लिए उसका अपमान किया l
जब राजे ने यह समाचार सुना, तो वह क्रोधित हो गए ।
राजे के आदेशानुसार सुकुजी की आंखें फोड कर उसे आजीवन कैद कर दिया गया l

*24 अक्टूबर 1657 को छत्रपति शिवाजी महाराज के आदेश पर सोने देव ने जब कल्याण के किले पर घेराबंदी की और उसको जीत लिया l उस समय मौलाना अहमद की पुत्रवधू यानी औरंगजेब की बहन और शाहजहां की बेटी रोशनआरा जो एक अभूतपूर्व सुंदरी थी l जिसको किले में कैद कर लिया गया उसके बाद सैनिकों ने उस रोशना आरा को जब छत्रपति शिवाजी महाराज के सामने पेश किया तो छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने सैनिकों को यह कहा था की यह तुम्हारी पहली और आखरी गलती है l उसके बाद अगर ऐसा अपमानित करने का कार्य किसी भी जाति और धर्म की औरत के साथ किया तो इसकी सजा मौत होगी l और एक पालकी सजा कर रोशनआरा को उसके कहने पर उसके महल में भेज दिया गया l इसी प्रकार से शाइस्ता खान ने सन 1663 ईस्वी में कोंकण को जीतने के लिए अपने सेनापति दिलेर खान के साथ एक ब्राह्मण उदित राज देशमुख की पत्नी राय बाघिन( शेरनी) को भेजा तो छत्रपति शिवाजी महाराज ने राय बाघिन और मुगल दिलेरखान को रात में कोल्हापुर में ही घेर लिया और दिलेरखान अपनी जान बचा कर भाग गया l उस समय राय बाघिन को एक सजी हुई पालकी में बैठा कर वापसी उसके घर भेज दिया था l

#क्योंकि_शिवराय_जी_कि_यह_भूमिका_थी_कि_महिलाओं_की_गरिमा_हमेशा_बनाए_रखनी_चाहिए। #बेशक_वह_किसी_भी_जाति_या_धर्म_से_क्यों_ना_हो !!"

*अगर किसी दुश्मन की पत्नी भी चाहे वह किसी भी धर्म या जाति से हो लड़ाई में फंस जाती है, तो उसे परेशानी नहीं होना चाहिए l महाराज के इस तरह के आदेश पत्थर की लकीर होते थे.....

और उन पर अमल भी शत प्रतिशत होता था l

वीर क्रांतिकारी बलिदानी अमर हुतात्मा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज की जय ❗

मांस का मूल्यमगध सम्राट बिंन्दुसार ने एक बार अपनी सभा मे पूछा : देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क...
12/01/2024

मांस का मूल्य

मगध सम्राट बिंन्दुसार ने एक बार अपनी सभा मे पूछा :

देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए

सबसे सस्ती वस्तु क्या है ?

मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये ! चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि तो बहुत श्रम के बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो, ऎसी हालत में अन्न तो सस्ता हो ही नहीं सकता !

तब शिकार का शौक पालने वाले एक सामंत ने कहा :
राजन,

सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है,

इसे पाने मे मेहनत कम लगती है और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है । सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन प्रधान मंत्री चाणक्य चुप थे ।

तब सम्राट ने उनसे पूछा :
आपका इस बारे में क्या मत है ?

चाणक्य ने कहा : मैं अपने विचार कल आपके समक्ष रखूंगा !

रात होने पर प्रधानमंत्री उस सामंत के महल पहुंचे, सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर घबरा गया ।

प्रधानमंत्री ने कहा :
शाम को महाराज एकाएक बीमार हो गये हैं, राजवैद्य ने कहा है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाए तो राजा के प्राण बच सकते हैं, इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय 💓 का सिर्फ दो तोला मांस लेने आया हूं । इसके लिए आप एक लाख स्वर्ण मुद्रायें ले लें ।

यह सुनते ही सामंत के चेहरे का रंग उड़ गया, उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी मांगी और

उल्टे एक लाख स्वर्ण मुद्रायें देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें ।

प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामंतों, सेनाधिकारियों के यहां पहुंचे और

सभी से उनके हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ, उल्टे सभी ने अपने बचाव के लिये प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख, पांच लाख तक स्वर्ण मुद्रायें दीं ।

इस प्रकार करीब दो करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले वापस अपने महल पहुंचे और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्रायें रख
दीं ।

सम्राट ने पूछा :
यह सब क्या है ?
तब प्रधानमंत्री ने बताया कि दो तोला मांस खरिदने के लिए

इतनी धनराशि इकट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला ।

राजन ! अब आप स्वयं विचार करें कि मांस कितना सस्ता है ?

जीवन अमूल्य है, हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी है, उसी तरह सभी जीवों को भी अपनी जान उतनी ही प्यारी है। लेकिन वो अपना जान बचाने मे असमर्थ है।

और मनुष्य अपने प्राण बचाने हेतु हर सम्भव प्रयास कर सकता है । बोलकर, रिझाकर, डराकर, रिश्वत देकर आदि आदि ।

पशु न तो बोल सकते हैं, न ही अपनी व्यथा बता सकते हैं ।

तो क्या बस इसी कारण उनसे जीने का अधिकार छीन लिया जाय ।

शुद्ध आहार, शाकाहार !
मानव आहार, शाकाहार !

अगर ये लेख आपको अच्छा लगे तो हर व्यक्ति तक जरुर भेजे।🙏🇮🇳🙏

 #नारी सशक्तिकरण का ये कैसा रुप39 साल की सूचना सेठ... एक AI कंपनी में CEO.. इनका एक चार साल का बच्चा...!पति से अनबन और ल...
10/01/2024

#नारी सशक्तिकरण का ये कैसा रुप

39 साल की सूचना सेठ... एक AI कंपनी में CEO.. इनका एक चार साल का बच्चा...!
पति से अनबन और लड़ाई झगड़े.. परिणाम 2022 में तलाक.. बेटे की कस्टडी के संबंध में कोर्ट ने फैसला दिया कि बच्चे का पिता उसे हफ्ते के रविवार के दिन को उससे मिल सकता है।
इस फैसले से सूचना सेठ नाराज़ थी.. नहीं चाहती थी कि इसका पति बेटे से मिले... इसके लिए सूचना ने बेटे का ही कत्ल कर दिया ताकि कभी मिलने जैसी नौबत न आये। शव को बैग में पैक करके के ठिकाने लगाने निकली थी कि पकड़ा गई।

मतलब इसे क्या कह सकते है अब... इतनी पढ़ी-लिखी और हाई फाई प्रोफ़ाइल और अपने पति के चलते अपने ही बेटे की हत्या ??
उफ़्फ़फ़फ़....!

शायद यही नारी सशक्तिकरण का नेक्स्ट लेवल है.. क्योंकि अब तक तलाक को इसका सबसे बढ़िया उदाहरण दिया जाता था.. कि सक्षम है तो क्यों किसी की सुनना.. सिंगल रह लेंगे.. बाल बच्चा पोस लेंगे.. लेकिन अब शायद ऐसा हो कि तुमसे रिश्ता खत्म तो तुसमे रिलेटेड बच्चा भी नहीं मंगता.. शरीर में जवानी है तो दूसर बच्चा पैदा कर लेंगे...!

अभिनेता श्रेयस तलपड़े को पड़ा दिल का दौरा, अस्पताल में भर्ती▶️ अभिनेता श्रेयस तलपड़े को दिल का दौरा पड़ा जिसके बाद उन्हे...
15/12/2023

अभिनेता श्रेयस तलपड़े को पड़ा दिल का दौरा, अस्पताल में भर्ती

▶️ अभिनेता श्रेयस तलपड़े को दिल का दौरा पड़ा जिसके बाद उन्हें मुंबई के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी एंजियोप्लास्टी की गई. फिलहाल उनकी हालत स्थिर है.

चीटियां अनाज और बीजों को जमा करने के बाद !उनको जमीन में ले जाने और उन्हें जमीन के अंदर अपने बिलों में रखने से पहले दो हि...
10/12/2023

चीटियां अनाज और बीजों को जमा करने के बाद !
उनको जमीन में ले जाने और उन्हें जमीन के अंदर अपने बिलों में रखने से पहले दो हिस्सों में तोड़ देती हैं

क्योंकि अगर आनाज वा बीज दो हिस्सों में ना किया जाए तो वह जमीन के अंदर ही फूट जाता है, और एक पौधा बन जाता है

उन्होंने हैरत से कहा कि चीटियां धनिया के बीज को चार हिस्सों में करती हैं क्योंकि एक धनिया का बीज ही है जो दो हिस्सों में होने के बाद भी फूट सकता है

इसलिए चीटियां इस को चार हिस्सों में काटकर रखती हैं फिर अपने बिलों के अंदर जमा करके रखती हैं

सोचने की बात इन सब को यह किसने सिखाया ??

ईश्वर की माया आपार है जिसको कोई नही समझ सकता..

छत्रपति शिवाजी महाराज के समय में कभी भी  किसी औरत का नाच गाना नहीं हुआ। महिलाओं का हमेशा सम्मान किया जाता था चाहे वह दुश...
05/12/2023

छत्रपति शिवाजी महाराज के समय में कभी भी किसी औरत का नाच गाना नहीं हुआ। महिलाओं का हमेशा सम्मान किया जाता था चाहे वह दुश्मन की पत्नी भी क्यों ना हो सभी को अपनी माता और बहन के समान समझा जाता था।

उनका साफ कहना था महिलाओं की गरिमा हमेशा बनाए रखनी चाहिए। बेशक वह महिला किसी भी जाति या धर्म से हो क्यों ना हो!!

28 फरवरी 1678 में, सुकुजी नामक सरदार ने बेलवाड़ी किले की घेराबंदी की। इस किले की किलेदार एक स्त्री थी।

उसका नाम सावित्रीबाई देसाई था। इस बहादुर महिला ने 27 दिनों तक किले के लिए लड़ाई लड़ी। लेकिन अंत में, सुकुजी ने किले को जीत लिया और सावित्रीबाई से बदला लेने के लिए उसका अपमान किया।

जब राजे ने यह समाचार सुना, तो वह क्रोधित हो गए। राजे के आदेशानुसार सुकुजी की आंखें फोड कर उसे आजीवन कैद कर दिया गया।
24 अक्टूबर 1657 को छत्रपति शिवाजी महाराज के आदेश पर सोनेदेव ने जब कल्याण के किले पर घेराबंदी की और उसको जीत लिया। उस समय मौलाना अहमद की पुत्रवधू यानी औरंगजेब की बहन और शाहजहां की बेटी रोशनआरा जो एक अभूतपूर्व सुंदरी थी। जिसको किले में कैद कर लिया गया उसके बाद सैनिकों ने उस रोशनाआरा को जब छत्रपति शिवाजी महाराज के सामने पेश किया तो छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने सैनिकों को यह कहा की यह तुम्हारी पहली और आखरी गलती है। उसके बाद अगर ऐसा अपमानित करने का कार्य किसी भी जाति और धर्म की औरत के साथ किया तो इसकी सजा मौत होगी। फिर एक पालकी सजा कर रोशनआरा को उसके कहने पर उसके महल में भेज दिया गया। इसी प्रकार से शाइस्ता खान ने सन 1663 ईस्वी में कोंकण को जीतने के लिए अपने सेनापति दिलेर खान के साथ एक ब्राह्मण उदित राज देशमुख की पत्नी राय बाघिन (शेरनी) को भेजा तो छत्रपति शिवाजी महाराज ने राय बाघिन और मुगल दिलेरखान को रात में कोल्हापुर में ही घेर लिया और दिलेरखान अपनी जान बचा कर भाग गया। उस समय राय बाघिन को एक सजी हुई पालकी में बैठा कर वापसी उसके घर भेज दिया था।
शिवराय जी कि यह भूमिका थी कि "महिलाओं की गरिमा हमेशा बनाए रखनी चाहिए। बेशक वह किसी भी जाति या धर्म से क्यों ना हो!!"

अगर किसी दुश्मन की पत्नी भी चाहे वह किसी भी धर्म या जाति से हो, लड़ाई में फंस जाती है, तो उसे परेशानी नहीं होना चाहिए। महाराज के इस तरह के आदेश पत्थर की लकीर होते थे... और उन पर अमल भी शत प्रतिशत होता था।

एक्टर रणदीप हुडा ने पार्टनर लिन लैशराम से शादी रचा ली है. रणदीप की शादी इम्फाल में हुई. दोनों 29 नवंबर को पारंपरिक मैतेई...
29/11/2023

एक्टर रणदीप हुडा ने पार्टनर लिन लैशराम से शादी रचा ली है. रणदीप की शादी इम्फाल में हुई. दोनों 29 नवंबर को पारंपरिक मैतेई रस्मों-रिवाज के साथ शादी के बंधन में बंध गए.

तू जो चाहे पर्वत पहाडों को फोड देतू जो चाहे नदियों के मुख को भी मोड देतू जो चाहे माटी से अमृत निचोड देतू जो चाहे धरती को...
28/11/2023

तू जो चाहे पर्वत पहाडों को फोड दे
तू जो चाहे नदियों के मुख को भी मोड दे
तू जो चाहे माटी से अमृत निचोड दे
तू जो चाहे धरती को अम्बर से जोड दे
अमर तेरे प्राण....
अमर तेरे प्राण, मिला तुझको वरदान,
तेरी आत्मा में स्वयं भगवान है रे
मनुष्य तू बड़ा महान है..
भूल मत, मनुष्य तू बड़ा महान है..

इतिहास के झरोखे में भाग 1 शुद्धि समाचार और स्वामी चिदानंद के कारावास का विस्मृत इतिहासस्वामी श्रद्धानन्द जी के नेतृत्व म...
28/11/2023

इतिहास के झरोखे में

भाग 1

शुद्धि समाचार और स्वामी चिदानंद के कारावास का विस्मृत इतिहास

स्वामी श्रद्धानन्द जी के नेतृत्व में हिन्दू संगठन और दलितोद्धार के रूप में दो आंदोलन सन 1920 के दशक में चलाये गए। हिन्दुओं को संगठित करने और हिन्दुओं को तेजी से कम हो रही जनसंख्या को रोकने के लिए विधर्मी हो चुके हिन्दुओं की शुद्धि आवश्यक थी। स्वामी जी ने शुद्धि आंदोलन के रूप में देश व्यापी आंदोलन आरम्भ किया। देश में ऐसे अनेक स्थान थे जहाँ हिन्दू धर्म त्याग चुकें लाखों लोग रहते थे, जिनकी जीवन पद्यति मिश्रित थी। उनके पूर्वजों को कभी बलात अथवा प्रलोभन से मुस्लिम बना दिया गया था। आगरा-मथुरा के निकट रहने वाले ऐसे लोगों को मलकाना कहा जाता था। अनेक मलकाना तो अपने सर पर चोटी तक रखते थे। स्वामी श्रद्धानन्द और आर्यसमाज के प्रयासों से मलकानों की बड़ी संख्या में शुद्धि हुई। इस्लामिक प्रेस, तबलीग और उसके प्रचारक स्वामी जी और शुद्धि आंदोलन के विरुद्ध दुष्प्रचार करने लगे। तब स्वामी जी को शुद्धि आंदोलन सम्बंधित जानकारी एवं भ्रम निवारण के लिए 'शुद्धि समाचार' के नाम से मुख पत्र आरम्भ करना पड़ा। यह लखनऊ से आरम्भ हुआ था और बाद में मार्च 1926 से दिल्ली आ गया। अल्पकाल में ही शुद्धि समाचार का कुशल संपादन स्वामी चिदानंद जी के नेतृत्व में होने लगा। स्वामी चिदानंद जी भारतवर्षीय साधु महामण्डल के मंत्री पद पर कार्य करते थे। 1923 में आप शुद्धि सभा से जुड़कर कन्नौज क्षेत्र में शुद्धि कार्य करने लगे। आपने एक दो मास के भीतर ही ऐसी उत्तमता से शुद्धि कार्य किया कि आपके क्षेत्र का विस्तार बढ़ाकर फरुखाबाद, मैनपुरी और शाजहांपुर कर दिया गया। 1925 में भारतीय शुद्धि सभा क सर्व साधारण सम्मेलन में आप शुद्धि सभा के मंत्री नियुक्त हुए और शुद्धि समाचार के सम्पादक बन गए। दिसम्बर 1926 में स्वामी जी के बलिदान के पश्चात चिदानंद जी पर शुद्धि सभा के कार्य का सारा भार स्वामी जी के कन्धों पर आ गया। जनवरी1927 में आप सभा के प्रधान मंत्री निर्वाचित हुए। आपके कार्यकाल में शुद्धि सभा ने व्यापक प्रगति की और उसका कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण भारत में फैल गया। शुद्धि समाचार हज़ारों की संख्या में प्रकाशित होने लगा और देश भर में शुद्धि अभियान के समाचार प्रकाशित होने लगे। सन् 1928 में अप्रैल में शुद्धि समाचार में धारावाहिक रूप में 'इस्लामी सिद्धांतों की समालोचना' के नाम से लेखमाला का प्रकाशन आरम्भ हुआ। दिसम्बर तक इस लेखमाला के 7 भाग प्रकाशित हुए। इसके लेखक श्रीयुत जगदीश चंद्र जी वाचस्पति थे। आप शास्त्रार्थ महारथी और इस्लामिक मामलों के प्रबुद्ध विद्वान थे। जैसे जैसे लेखमाला प्रकाशित होती गई वैसे वैसे इस्लामिक जगत का आक्रोश बढ़ता गया। उस दौर की इस्लामिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दू धर्म की मान्यताओं और सिद्धांतों पर निरंतर आक्षेप होते रहते थे। शुद्धि समाचार के कार्यालय को धमकी भरे पत्र आने लगे। इस बीच नौजवान भारत सभा और मिलाप लाहौर ने शुद्धि सभा के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया। उनके नोट का सहारा लेकर मुसलमानों ने शुद्धि समाचार के संपादक को गिरफ्तार करने का अभियान चलाना आरम्भ कर दिया। अंततः 27 दिसम्बर 1928 को स्वामी चिदानंद जी को कलकत्ता से धारा 153ए एवं 295 के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। स्वामी जी को गिरफ्तार कर 29 दिसंबर को दिल्ली लाया गया। स्वामी जी की गाड़ी दोपहर पौने दो बजे दिल्ली पहुंची। गाड़ी के पहुंचने से पहले ही स्टेशन पर उनके स्वागत के लिए भारी भीड़ थी। गाड़ी रुकते ही स्वामी श्रद्धानन्द की जय, शुद्धि की जय आदि शब्दों का जयघोष हुआ। उपस्थित जनसमूह में प्रमुख श्री महात्मा नारायण स्वामी जी महाराज, श्री लाला ज्ञानचंद जी, श्री लाला लक्ष्मीचंद जी, श्री शिवचरण दास, जी श्री लाला जमनादास जी आदि महानुभावों के नाम उल्लेखनीय हैं। स्वामी जी को मोटर में बैठकर शुद्धि कार्यालय, श्रद्धानन्द बाजार में लाया गया। उनकी गिरफ़्तारी की सुचना से हिन्दू जनता में रोष फैल गया। यह कार्यवाही शुद्धि आंदोलन को रोकने के लिए थी। स्वामी जी पर मुकदमा आरम्भ हो गया जो छ: महीने तक चला। स्वामी जी ने अपना बचाव पक्ष अदालत में प्रस्तुत किया। 22 जुलाई 1929 को स्वामी जी को छ: महीने की सजा और 300 रुपये का जुर्माना की सजा हुई। स्वामी जी ने इस केस को आगे लड़ने से इंकार कर दिया और जेल चले गए। स्वामी जी ने अपील की कि मेरी सजा कम कराने या मुझे बरी कराने के लिए सेशन अथवा हाई-कोर्ट में किसी प्रकार की अपील न की जावे और न मेरी जमानत के लिए आवेदन किया जावे। क्योंकि न्याय का ढोंग रचकर सच्चाई को कुचलने वाली अदालतों से विशेष न्याय की आशा रखना वैसा ही है कि जैसा बालू कणों से तेल निकालना या बबुल के वृक्ष से मधुर आम चखने की आशा रखना। अंग्रेजों की अदालत में जो न्याय नाटक खेला गया है। वह अंग्रेजी न्याय के लिए पर्याप्त है। अंग्रेजी न्यायालय में माथा रगड़-2 कर गिड़गिड़ाने और व्यर्थ में धन का दुरुपयोग करने का कोई लाभ नहीं है। भविष्य में निर्भयतापूर्वक खुल्लम खुल्ला, सर्वसाधारण में इस सच्चाई का पाठ पढ़ाने के लिये मजबूत बनकर जेलखाने में ( जीवित रहने की अवस्था में) बाहर निकलूं। मेरे ऊपर अभियोग चलवाने वालों की यह इच्छा कि चिदानंद को जेल खाने में डलवा देने से शुद्धि सभा का कार्य बंद हो जायेगा उनकी यह दूषित इच्छा किसी अंश में भी पूरी न हो।

चिदानंद जी की स्वामी श्रद्धानन्द जी में अपूर्व श्रद्धा थी। आपको शुद्धि सभा में लाने के लिए स्वामी जी ने यह पत्र लिखा था-

"आपका पत्र मिला। मुझे बड़ा हर्ष होगा जब में आपको शुद्धि क्षेत्र में सलंग्न देखूँगा। मेरी तो हार्दिक इच्छा है कि एक दो नहीं, बावन लाख साधु सन्यासी हिन्दू जाति के उत्थान के लिए शुद्धि कार्य में लग जाय। और अपने प्यारे धर्म, जाति और देश पर जीवन तक न्योछावर करें।
आपका मंगलाभिलाषी

श्रद्धानन्द सन्यासी"
स्वामी जी की गिरफ़्तारी कोलकाता से हुई थी। उनके दिल्ली गिरफ्तार कर लाये जाने पर कोलकाता निवासियों ने बंगाल, असम प्रान्तीय हिन्दू शुद्धि सभा की ओर से स्वामी जी के सेवा में अभिनन्दन पत्र भेजा। इस पत्र में उन्होंने स्वामी जी की अनुशंसा में लिखा-

'आज हमको सहसा वह विकट समय याद आ जाता है जब कि आपने रात दिन मृत्यु की धमकियाँ पाते हुए, जीवन को खतरे में डालकर भी उस महान कार्य को अपने कन्धों पर उठा लिया था। जिसके लिए रुग्ण शय्या पर लेटे हुये भारत के महान पुरुष, आर्य जाति के प्राण, हिन्दू समाज के सर्वस्व शुद्धि संगठन के प्रवर्तक अमर स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज का एक धर्मोन्मत मुसलमान ने कायरतापूर्वक वध कर दिया था। निश्चय ही आप इस समय किसी मठ या मंदिर के महंत बन कर फूलों के गदेलों पर लेटे हुए सुख के दिन बिता रहे होते। पर, अपने देश व समाज की दुर्दशा को गहरी चोट आप के चित्त पर लगी और आपने उस ऐश्वर्य पूर्ण सुख-सामग्री पर लात मार कर काँटों से भरे हुए मार्ग पर ही चलना स्वीकार किया। इसी श्रद्धा से प्रेरित हो कर हमारा सीस सहज में आपके सम्मुख विनीत भाव से झुक जाता है। हिन्दू समाज को जागृत और संगठित करने का जो पुण्य कार्य आपने स्वीकार किया है, उससे हम लोगों की पूर्ण सहानुभूति है और यथासम्भव हम लोग उस कार्य में तन, मन, धन से आपके साथ हैं। "


जेल में स्वामी जी ने चिकित्सा विभाग में कार्य किया। उनके शुद्धि आंदोलन को दिए गए योगदान की चर्चा पीछे से आनंद भिक्षु जी के संपादन में छपती रही। दिसम्बर 1929 को स्वामी जी की जेल से मुक्ति हुई। जेल से मुक्त होकर स्वामी जी पुन: शुद्धि सभा के कार्य में लग गए। इस मुक़दमे से सम्बंधित सभी लेख और इसकी कार्यवाही शुद्धि समाचार के 1928 और 1929 के अंकों में प्रकाशित हुई थी। 1930 के अंक हमें प्राप्त नहीं हुए है। संभवत उनमें आगे पर प्रकाश डाला गया होगा।

पाठकों को यह विस्मृत इतिहास बताना मैं अपन दायित्व समझता हूँ क्योंकि हमारे पूर्वजों ने कैसा महान तप अपने धर्म की रक्षा के लिए किया था। यह आज की पीढ़ी को जानना अति आवश्यक है।

[ 1928 के शुद्धि समाचार के सभी 12 अंक मुझे स्वर्गीय स्वामी जगदीश्वरानन्द जी के निजी पुस्तकालय से मिले और 1929 के शुद्धि समाचार के सभी अंक अमर स्वामी प्रकाशन, गाज़ियाबाद के श्री लाजपत राय अग्रवाल जी के सहयोग से प्राप्त हुए। मैं दोनों पुण्यात्माओं का आभारी हूँ।

गुरुकुल में क्या पढ़ाया जाता था ??यह जान लेना अति आवश्यक है।◆ अग्नि विद्या ( metallergy )◆ वायु विद्या ( flight ) ◆ जल व...
21/11/2023

गुरुकुल में क्या पढ़ाया जाता था ??
यह जान लेना अति आवश्यक है।

◆ अग्नि विद्या ( metallergy )

◆ वायु विद्या ( flight )

◆ जल विद्या ( navigation )

◆ अंतरिक्ष विद्या ( space science )

◆ पृथ्वी विद्या ( environment )

◆ सूर्य विद्या ( solar study )

◆ चन्द्र व लोक विद्या ( lunar study )

◆ मेघ विद्या ( weather forecast )

◆ पदार्थ विद्युत विद्या ( battery )

◆ सौर ऊर्जा विद्या ( solar energy )

◆ दिन रात्रि विद्या ( day - night studies )

◆ सृष्टि विद्या ( space research )

◆ खगोल विद्या ( astronomy)

◆ भूगोल विद्या (geography )

◆ काल विद्या ( time )

◆ भूगर्भ विद्या (geology and mining )

◆ रत्न व धातु विद्या ( gems and metals )

◆ आकर्षण विद्या ( gravity )

◆ प्रकाश विद्या ( solar energy )

◆ तार विद्या ( communication )

◆ विमान विद्या ( plane )

◆ जलयान विद्या ( water vessels )

◆ अग्नेय अस्त्र विद्या ( arms and amunition )

◆ जीव जंतु विज्ञान विद्या ( zoology botany )

◆ यज्ञ विद्या ( material Sc)

● वैदिक विज्ञान ( Vedic Science )

◆ वाणिज्य ( commerce )

◆ कृषि (Agriculture )

◆ पशुपालन ( animal husbandry )

◆ पक्षिपालन ( bird keeping )

◆ पशु प्रशिक्षण ( animal training )

◆ यान यन्त्रकार ( mechanics)

◆ रथकार ( vehicle designing )

◆ रतन्कार ( gems )

◆ सुवर्णकार ( jewellery designing )

◆ वस्त्रकार ( textile)

◆ कुम्भकार ( pottery)

◆ लोहकार ( metallergy )

◆ तक्षक ( guarding )

◆ रंगसाज ( dying )

◆ आयुर्वेद ( Ayurveda )

◆ रज्जुकर ( logistics )

◆ वास्तुकार ( architect)

◆ पाकविद्या ( cooking )

◆ सारथ्य ( driving )

◆ नदी प्रबन्धक ( water management )

◆ सुचिकार ( data entry )

◆ गोशाला प्रबन्धक ( animal husbandry )

◆ उद्यान पाल ( horticulture )

◆ वन पाल ( horticulture )

◆ नापित ( paramedical )

इस प्रकार की विद्या गुरुकुल में दी जाती थीं।

इंग्लैंड में पहला स्कूल 1811 में खुला
उस समय भारत में 732000 गुरुकुल थे।
खोजिए हमारे गुरुकुल कैसे बन्द हुए ?

और मंथन जरूर करें वेद ज्ञान विज्ञान को चमत्कार छूमंतर व मनघड़ंत कहानियों में कैसे बदला या बदलवाया गया। वेदों के नाम पर वेद विरुद्ध हिंदी रूपांतरण करके मिलावट की ।

अपरा विधा- भेाैतिक विज्ञान को व अपरा विधा आध्यात्मिक विज्ञान को कहा गया है। इन दोनों में १६ कलाओं का ज्ञान होता है।

तैत्तिरीयोपनिषद , भ्रगुवाल्ली अनुवादक ,५, मंत्र १, में ऋषि भ्रगु ने बताया है कि-

विज्ञान॑ ब्रहोति व्यजानात्। विज्ञानाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन जातानि जीवन्ति। विज्ञान॑ प्रयन्त्यभिस॑विशन्तीति।

अर्थ- तप के अनातर उन्होंने ( ऋषि ने) जाना कि वास्तव मैं विज्ञान से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं। उत्पत्ति के बाद विज्ञान से ही जीवन जीते हैं। अंत में प्रायान करते हुए विज्ञान में ही प्रविष्ठ हो जाते हैं।

तैत्तिरीयोपनिषद ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवादक ८, मंत्र ९ में लिखा है कि-

विज्ञान॑ यज्ञ॑ तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च। विज्ञान॑ देवा: सर्वे। ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते। विज्ञान॑ ब्रह्म चेद्वेद।

अर्थ- विज्ञान ही यज्ञों व कर्मों की वृद्धि करता है। सम्पूर्ण देवगण विज्ञान को ही श्रेष्ठ ब्रह्म के रूप में उपासना करते हैं। जो विज्ञान को ब्रह्म स्वरूप में जानते हैं, उसी प्रकार से चिंतन में रत्त रहते हैं, तो वे इसी शरीर से पापों से मुक्त होकर सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि प्राप्त करते हैं। उस विज्ञान मय देव के अंदर ही वह आत्मा ब्रह्म रूप है। उस विज्ञान मय आत्मा से भिन्न उसके अन्तर्गत वह आत्मा ही ब्रह्म स्वरूप है।

( संसार के सभी जीव शिल्प विज्ञान के द्वारा ही जीवन यापन करते हैं।)

★ वेद ज्ञान है शिल्प विज्ञान है

त्रिनो॑ अश्विना दि॒व्यानि॑ भेष॒जा त्रिः पार्थि॑वानि॒ त्रिरु॑ दत्तम॒द्भ्यः।
आ॒मान॑ श॒योर्ममि॑काय सू॒नवे त्रि॒धातु॒ शर्म॑ वहतं शुभस्पती॥

ऋग्वेद (1.34.6)

हे (शुभस्पती) कल्याणकारक मनुष्यों के कर्मों की पालना करने और (अश्विना) विद्या की ज्योति को बढ़ानेवाले शिल्पि लोगो ! आप दोनों (नः) हम लोगों के लिये (अद्भ्यः) जलों से (दिव्यानि) विद्यादि उत्तम गुण प्रकाश करनेवाले (भेषजा) रसमय सोमादि ओषधियों को (त्रिः) तीनताप निवारणार्थ (दत्तम्) दीजिये (उ) और (पर्थिवानि) पृथिवी के विकार युक्त ओषधी (त्रिः) तीन प्रकार से दीजिये और (ममकाय) मेरे (सूनवे) औरस अथवा विद्यापुत्र के लिये (शंयोः) सुख तथा (ओमानम्) विद्या में प्रवेश और क्रिया के बोध करानेवाले रक्षणीय व्यवहार को (त्रिः) तीन बार कीजिये और (त्रिधातु) लोहा ताँबा पीतल इन तीन धातुओं के सहित भूजल और अन्तरिक्ष में जानेवाले (शर्म) गृहस्वरूप यान को मेरे पुत्र के लिये (त्रिः) तीन बार (वहतम्) पहुंचाइये ॥

भावार्थ- मनुष्यों को चाहिये कि जो जल और पृथिवी में उत्पन्न हुई रोग नष्ट करनेवाली औषधी हैं उनका एक दिन में तीन बार भोजन किया करें और अनेक धातुओं से युक्त काष्ठमय घर के समान यान को बना उसमें उत्तम २ जव आदि औषधी स्थापन कर देश देशांतरों में आना जाना करें।

विश्वकर्मा कुल श्रेष्ठो धर्मज्ञो वेद पारगः।
सामुद्र गणितानां च ज्योतिः शास्त्रस्त्र चैबहि।।
लोह पाषाण काष्ठानां इष्टकानां च संकले।
सूत्र प्रास्त्र क्रिया प्राज्ञो वास्तुविद्यादि पारगः।।
सुधानां चित्रकानां च विद्या चोषिठि ममगः।
वेदकर्मा सादचारः गुणवान सत्य वाचकः।।

(शिल्प शास्त्र) अर्थववेद

भावार्थ – विश्वकर्मा वंश श्रेष्ठ हैं विश्वकर्मा वंशी धर्मज्ञ है, उन्हें वेदों का ज्ञान है। सामुद्र शास्त्र, गणित शास्त्र, ज्योतिष और भूगोल एवं खगोल शास्त्र में ये पारंगत है। एक शिल्पी लोह, पत्थर, काष्ठ, चान्दी, स्वर्ण आदि धातुओं से चित्र विचित्र वस्तुओं सुख साधनों की रचना करता है। वैदिक कर्मो में उन की आस्था है, सदाचार और सत्यभाषण उस की विशेषता है।

यजुर्वेद के अध्याय २९ के मंत्र 58 के ऋषि जमदाग्नि है इसमे बार्हस्पत्य शिल्पो वैश्वदेव लिखा है। वैश्वदेव में सभी देव समाहित है।

भारत की महान वीरांगना और स्वाभिमान की प्रतीक रानी लक्ष्मीबाई जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन। उनकी वीरता के किस्से हमेशा दे...
19/11/2023

भारत की महान वीरांगना और स्वाभिमान की प्रतीक रानी लक्ष्मीबाई जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन। उनकी वीरता के किस्से हमेशा देशवासियों के लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।

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