11/12/2025
संगीत में स्त्रियों की भूमिका जितनी व्यापक और प्रभावशाली आज दिखाई देती है, वह किसी सरल यात्रा का परिणाम नहीं है। यह सदियों के उन अनदेखे संघर्षों का इतिहास है, जिनमें स्त्रियों ने सामाजिक पूर्वाग्रहों, पितृसत्तात्मक दबावों और सांस्कृतिक अवरोधों से जूझते हुए अपने लिए सम्मानजनक स्थान बनाया। इन्हीं पहलुओं पर विचार-विमर्श और स्मरण के उद्देश्य से यहाँ प्रथम रामेश्वरी नेहरू स्मारक व्याख्यान का आयोजन सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का विषय था—‘संगीत में स्त्री सशक्तीकरण’, जिसके माध्यम से स्त्रियों के कलात्मक योगदान और संघर्ष-यात्रा पर समग्र दृष्टि डालने का प्रयास किया गया।
मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात कवि, लेखक और संस्कृति-चिंतक अशोक वाजपेयी उपस्थित थे। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि संगीत जगत में स्त्रियों की उपस्थिति सदैव प्रेरक रही है, परंतु लंबे समय तक उनके योगदान को उचित सम्मान नहीं मिला। पितृसत्ता की जकड़नों ने उन्हें मंचीय स्वतंत्रता, सामाजिक प्रतिष्ठा और कलात्मक पहचान प्राप्त करने से अक्सर रोका। इसके बावजूद स्त्रियों ने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति से संगीत की विविध विधाओं—शास्त्रीय, अर्धशास्त्रीय, लोक, ठुमरी, दादरा, कजरी, ग़ज़ल—में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी। वाजपेयी ने स्पष्ट कहा कि कई क्षेत्रों में स्त्रियाँ पुरुष कलाकारों को पीछे छोड़ते हुए नई परंपराएँ रचने में अग्रणी रही हैं। यह स्थिति बताती है कि कला की दुनिया में स्त्रियाँ केवल अनुकरणकर्ता नहीं, बल्कि नवाचार और संवेदना की वाहक रही हैं।
कार्यक्रम के दौरान बनारस घराने की ख्यात गायिका मीनाक्षी प्रसाद ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने ‘तवायफ़’ शब्द के ऐतिहासिक उपयोग पर गंभीर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि इस शब्द का इस्तेमाल अक्सर नकारात्मक अर्थों में किया गया, जिससे इतिहास में इन प्रतिभाशाली महिलाओं की छवि विकृत हुई। उन्होंने कहा कि तथाकथित ‘तवायफ़’ दरअसल अपने समय की सर्वाधिक शिक्षित, refined और कला-संरक्षक महिलाएँ थीं, जिन्होंने संगीत, नृत्य, भाषा, अदब और सामाजिक संस्कारों को संरक्षित और विकसित किया। वे संगीत की संरक्षिका थीं, परंतु समाज ने उन्हें गलत नाम देकर हाशिये पर धकेल दिया। प्रसाद ने आग्रह किया कि इतिहास को नए सिरे से पढ़ने और ऐसी गायिकाओं के वास्तविक योगदान को स्वीकार करने का समय आ चुका है।
कार्यक्रम का अत्यंत आकर्षक और प्रभावपूर्ण पक्ष वरिष्ठ कवि विमल कुमार की चर्चित पुस्तक ‘तवायफ़नामा’ पर आधारित डांस-ड्रामा था, जिसका निर्देशन सोमा बनर्जी ने किया। इस प्रस्तुति में 33 भूली-बिसरी महान शास्त्रीय गायिकाओं—जैसे गौहर जान, रसूलन बाई, बिब्बो, अख्तरी बाई, तथा कई अन्य—की जीवन-यात्राओं को मंच पर जीवन्त रूप में प्रस्तुत किया गया। नाटक ने एक बार फिर यह उजागर किया कि इन कलाकारों ने न केवल संगीत को नई ऊँचाइयाँ दीं, बल्कि सामाजिक मानसिकताओं को चुनौती देने का भी साहस दिखाया। वे रिकॉर्डिंग के आरंभिक इतिहास की अग्रणी हस्तियाँ थीं और कई संगीत-शैलियों को लोकप्रिय बनाने में उनकी निर्णायक भूमिका रही। प्रस्तुति ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय संगीत का इतिहास इन महिलाओं के बिना अपूर्ण है।
समारोह में एक अत्यंत महत्वपूर्ण साहित्यिक क्षण तब आया जब स्वतंत्रता सेनानी, रंगकर्मी और आलोचक बीरेंद्र नारायण की बहुप्रतीक्षित पुस्तक Hindi Theatre and Stage का लोकार्पण किया गया। यह पुस्तक लगभग चालीस वर्ष पहले विख्यात आलोचक डॉ. नागेंद्र के अनुरोध पर लिखी गई थी। उस समय अंग्रेज़ी भाषा में हिंदी रंगमंच पर कोई समग्र पुस्तक उपलब्ध नहीं थी, इसलिए यह कृति ऐतिहासिक और संदर्भात्मक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान मानी जाती है। पुस्तक में हिंदी रंगमंच की परंपरा, उसके विकास, प्रमुख नाटककारों, रंगकर्मियों, मंचीय प्रयोगों और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों का विस्तृत विवरण है। वक्ताओं ने कहा कि यह पुस्तक न केवल शोधार्थियों के लिए उपयोगी है, बल्कि रंगमंच प्रेमियों और छात्रों को भी हिंदी थिएटर की जड़ों को समझने में मदद करेगी।
इसके अतिरिक्त दो महत्वपूर्ण पुस्तकों का भी विमोचन किया गया। इनमें पहली है वरिष्ठ हिंदी कवयित्रियों के कविता-संग्रह ‘खिलूंगी यहीं कहीं’, जिसका संपादन अनुराधा ओस ने किया है। यह संग्रह स्त्री-चेतना, अनुभव-संसार और रचनात्मक विस्तार को नए काव्य-परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है। दूसरी पुस्तक है महिला ग़ज़लकारों की कृति ‘बज़्मे-शायरात’, जिसे संजू शब्दिता ने संपादित किया है। इसमें दस प्रमुख महिला ग़ज़लकारों की रचनाएँ संकलित हैं, जो यह प्रमाणित करती हैं कि ग़ज़ल जैसी विधा में भी स्त्रियों ने अपनी अर्थगर्भी उपस्थिति दर्ज कराई है। दोनों पुस्तकों का विमोचन साहित्य में स्त्रियों की बढ़ती सक्रियता और सृजनात्मकता का सबूत है।
कार्यक्रम का आरंभ तीन महान सांस्कृतिक विभूतियों को स्मरण करते हुए हुआ। इस अवसर पर रामेश्वरी नेहरू की 140वीं जयंती, आधुनिक हिंदी कविता के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि रघुवीर सहाय की 96वीं जयंती तथा जनपदीय चेतना और साधारण मनुष्य की आवाज़ माने जाने वाले कवि मंगलेश डबराल की पुण्यतिथि पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। इन तीनों को याद करना इस आयोजन की सांस्कृतिक दृष्टि को और भी व्यापक बनाता है—जहाँ महिला आंदोलन, लोकतांत्रिक कविता और जनपक्षधर साहित्य—तीनों ध्रुवों को एक साथ स्मरण किया गया।
इस प्रकार प्रथम रामेश्वरी नेहरू स्मारक व्याख्यान केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह स्त्रियों की कलात्मक साधना, उनके संघर्ष और उनकी ऐतिहासिक भूमिका को नए सम्मान के साथ प्रतिष्ठित करने का मंच बना। यह कार्यक्रम स्मरण दिलाता है कि कला, विशेषकर संगीत, केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है। और इस परिवर्तन के केंद्र में स्त्रियों का योगदान न केवल अनिवार्य है, बल्कि प्रेरक भी है। उनकी यात्रा—पाबंदियों से मुक्ति, प्रतिभा का विकास, और सांस्कृतिक पहचानों की रक्षा—आज भी समाज को नई दिशा दे रही है।