19/09/2026
शाम के चार बज रहे थे। सूरज धीरे-धीरे ढलने लगा था। तीसरी मंजिल की छत पर अंजली खड़ी थी। क्रीम रंग की फूलदार साड़ी और बैंगनी ब्लाउज में। बाल ऊपर बाँधे हुए, माथे पर बिंदी, हाथों में लाल चूड़ियाँ।
वह कपड़े सुखा रही थी। बाएँ हाथ से क्लिप पकड़ी, दाएँ हाथ से ग्रे टी-शर्ट लटका रही थी। टोकरी में अभी और कपड़े पड़े थे।
नीचे वाली छत से अचानक आवाज़ आई।
“भाभी… इतनी देर से कपड़े सुखा रही हो?”
अंजली मुड़ी। नीचे वाला लड़का राहुल था। 23 साल का। कॉलेज वाला। हमेशा छत पर आता रहता था।
अंजली मुस्कुराई, लेकिन नज़रें झुका लीं।
“क्या करूँ… घर में कोई मदद करने वाला नहीं। तुम्हारे भैया तो महीने भर से बाहर हैं।”
राहुल ऊपर चढ़ आया। अंजली की साड़ी का पल्लू हवा में उड़ रहा था। कमर थोड़ी दिख रही थी। राहुल की नज़र वहीं अटक गई, फिर जल्दी से हटा ली।
“मैं मदद कर दूँ?” उसने पूछा।
अंजली ने सिर हिलाया। “नहीं… तुम जाओ। लोग देख लेंगे।”
राहुल फिर भी खड़ा रहा। अंजली ने एक काला कुर्ता लटकाया। हाथ ऊपर उठाने से ब्लाउज थोड़ा ऊपर खिसक गया।
राहुल ने धीरे से कहा, “भाभी… आप अकेली बहुत परेशान लगती हो।”
अंजली ने कपड़ा पकड़े-पकड़े उसे देखा। आँखों में थोड़ी नमी थी, लेकिन मुस्कान वही थी।
“परेशान नहीं… बस आदत हो गई है अकेले रहने की।”
राहुल ने एक कदम और बढ़ाया।
“अगर कभी मदद चाहिए तो बोल देना। मैं रोज़ छत पर आता हूँ।”
अंजली ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ साड़ी का पल्लू ठीक किया और फिर कपड़े सुखाने लगी। लेकिन उसके होठों पर हल्की सी मुस्कान रह गई।
सूरज और नीचे आ गया। छत की हवा में दो साँसें थोड़ी तेज़ चल रही थीं।