08/07/2026
“मुशायरों में जो शा’इरी बशीर बद्र सुनाते थे वो कोई ख़राब या कमज़ोर शा’इरी क़त्तई न थी। उसमें अपने सामे से जुड़ने की ताक़त थी, लेकिन मुशायरा के भी अपने तक़ाज़े होते हैं जिसको इग्नोर कर पाना नामुमकिन होता है। ये आपको अपने रंग में रंग ही लेता है। बशीर बद्र भी इससे अछूते न रहे।”
-महेंद्र कुमार सानी
• ‘हंस’ जुलाई 2026 अंक में प्रकाशित
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