05/06/2026
“उर्दू की बदौलत लखनऊ का प्रगतिशील साहित्य आंदोलन अधिक साफ़-सुथरा और पैना था और उसमें नागर तत्त्वों का प्रवेश गहराई से हो चुका था। मैं उसी परिवेश में प्रशिक्षित हुआ।”
-रघुवीर सहाय
• पुस्तक ‘अभी दिल्ली दूर है’ से