20/08/2026
पत्रकारिता का धर्म एफआईआर का इंतजार नहीं बल्कि सच को सामने लाना है । पत्रकारिता किसी डिग्री या एफआईआर की मोहताज भी नहीं, यह जनसरोकार का धर्म है। पढ़िए दिल को झकझोर कर रख देने वाला एक लेख जो आपको सोचने पर मजबूर करती है।
आजकल सोशल मीडिया और बौद्धिक गलियारों में कुछ कुंठित और संकीर्ण मानसिकता वाले लोग यह बेतुका तर्क देते नजर आते हैं कि पत्रकारिता केवल उन्हीं की बपौती है जिन्होंने मास कम्युनिकेशन की डिग्री ले रखी है या जो पहले किसी बड़े टीवी चैनल व अखबार के दफ्तर में नौकरी कर चुके हैं। ऐसे लोगों को इतिहास का बुनियादी ज्ञान तक नहीं है। भारत में पत्रकारिता शिक्षा का पहला औपचारिक कोर्स 1941 में पंजाब विश्वविद्यालय में शुरू हुआ था। सवाल यह है कि 1941 से पहले क्या इस मुल्क में पत्रकारिता नहीं होती थी? क्या देश की आजादी की लड़ाई और समाज सुधार बिना पत्रकारिता के संभव हुआ था?
इतिहास गवाह है कि बिना डिग्री के सत्ता और हुकूमत हिलाने वाले महानायक
भारत में पत्रकारिता के सबसे सुनहरे और साहसी पन्ने उन लोगों ने लिखे जिन्होंने कभी किसी जर्नलिज्म इंस्टीट्यूट का मुंह नहीं देखा था । एक नज़र कुछ ऐसे लोगों की बेमिसाल पत्रकारिता पर डालिए जिन्होंने न तो पहले पत्रकारिता की थी और न ही किसी टीवी चैनल या अख़बार में पहले काम किया था।
राजा राममोहन राय: मिरात-उल-अखबार और संवाद कौमुदी के जरिए सती प्रथा जैसी अमानवीय कुरीतियों के खिलाफ जंग छेड़ी और कानून बनवाकर ही दम लिया।
बाल गंगाधर तिलक: केसरी और मराठा के जरिए ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दीं और जेल गए।
महात्मा गांधी: यंग इंडिया और हरिजन के जरिए बिना किसी विज्ञापन के जन-आंदोलन का सबसे बड़ा हथियार पत्रकारिता को बनाया।
गणेश शंकर विद्यार्थी: प्रताप अखबार से किसानों और मजलूमों की आवाज बने और पत्रकारिता के लिए अपना बलिदान दिया।
बाबूराव विष्णु पराड़कर: आज अखबार के जरिए हिंदी पत्रकारिता की भाषा और मर्यादा को गढ़ा।
रामानंद चट्टोपाध्याय: द मॉडर्न रिव्यू के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय अधिकारों की पैरवी की।
रामनाथ गोयनका: द इंडियन एक्सप्रेस के संस्थापक, जिन्होंने 1975 की इमरजेंसी के दौरान सत्ता के आगे झुकने से इनकार कर संपादकीय पन्ना खाली छोड़ दिया था।
अरुण शौरी: सीमेंट घोटाले से लेकर भागलपुर आंखफोड़वा कांड जैसे खोजी खुलासे कर मुख्यमंत्रियों की कुर्सियां हिला दीं।
खुशवंत सिंह: द इलस्ट्रेटेड वीकली में अपनी बेबाक और निर्भीक लेखनी से पत्रकारिता का दायरा बदला।
प्रभाष जोशी: जनसत्ता के जरिए ठेठ देसी और निर्भीक भाषा में सत्ता के गलियारों के भ्रष्टाचार को जनता के सामने बेनकाब किया।
कुलदीप नायर, सुरेंद्र प्रताप सिंह (एसपी सिंह) और विनोद मेहता, इन्होंने बिना किसी पत्रकारिता डिग्री के आउटलुक, रविवार और टीवी पर खोजी पत्रकारिता को एक नई धार दी और बड़े-बड़े रक्षा घोटालों को उजागर किया।
'फेसबुकिया' या 'यूट्यूबर' कहकर कमतर आंकने की कोशिश करते हैं, असल में वही आज जमीन पर सबसे बड़ा काम कर रहे हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने न तो कभी किसी मीडिया कॉलेज में कदम रखा और न ही किसी टीवी चैनल या अखबार में कभी नौकरी की जैसे कुछ मिसालें नीचें देख लें।
गांव कनेक्शन और ग्रामीण पत्रकारिता: इतिहास की पृष्ठभूमि से आए नीलेश मिसरा जैसे लोगों ने 'गांव कनेक्शन' का ऐसा मॉडल खड़ा किया, जहां बिना किसी टीवी स्टूडियो के अनुभव वाले ग्रामीण युवाओं ने दूर-दराज के गांवों, जल संकट और खेती-किसानी की बदहाली को सीधे राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना दिया।
मोहम्मद ज़ुबैर (Alt News): टेलीकॉम इंजीनियरिंग से आए ज़ुबैर ने बिना किसी मीडिया हाउस के अनुभव के देश का सबसे धारदार फैक्ट-चेकिंग नेटवर्क बनाया और फेक न्यूज व हेट स्पीच की पोल खोलकर बड़े-बड़े चैनलों को बैकफुट पर ला दिया।
जमीनी डिजिटल रिपोर्टर्स (जैसे The Lallantop के फील्ड रिपोर्टर्स अभिनव राजपूत आदि): साहित्य और गैर-पत्रकारिता बैकग्राउंड से सीधे जमीन पर उतरे इन युवाओं ने पारंपरिक टीवी स्टूडियो के भारी-भरकम कैमरों को दरकिनार कर एक मोबाइल और माइक से ठेठ देसी और निर्भीक अंदाज में चुनाव और जनमुद्दों को कवर करके पत्रकारिता का पूरा मुहावरा ही बदल दिया।
स्थानीय स्वतंत्र यूट्यूबर्स और फेसबुक रिपोर्टर्स (अभिषेक तिवारी, ज्ञान जरूरत है आदि): उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान के कस्बों में दर्जनों ऐसे युवा इंजीनियर और ग्रेजुएट्स हैं, जिन्होंने किसी चैनल में नौकरी का इंतजार नहीं किया। उन्होंने सीधे फेसबुक/यूट्यूब पर लाइव आकर सड़क निर्माण में कमीशनखोरी, जर्जर पुलों, राशन की कालाबाजारी और सरकारी दफ्तरों के भ्रष्टाचार को ऑन-कैमरा नाप-जोख कर बेनकाब किया।
ध्रुव राठी: इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से आकर बिना किसी मीडिया ट्रेनिंग के, सिर्फ मजबूत रिसर्च, डेटा और फैक्ट्स के दम पर मुख्यधारा के बड़े-बड़े टीवी चैनलों से कहीं अधिक दर्शकों का भरोसा जीता और नीतियों की जवाबदेही तय की।
सच्चाई यह है कि आज एयर-कंडीशंड स्टूडियो में बैठने वाले एंकरों और बड़े अखबारों को ग्राउंड की असली खबरें इन्हीं सोशल मीडिया रिपोर्टरों से मिलती हैं। देश के किसी दूरदराज कोने में होने वाली हेट स्पीच, हेट क्राइम, मॉब लिंचिंग और प्रशासनिक बदहाली की पहली फुटेज या इनपुट यही स्वतंत्र डिजिटल रिपोर्टर अपनी जान जोखिम में डालकर लाते हैं। इसके बाद बड़े चैनल उसी वीडियो को चलाकर टीआरपी और मुनाफा पीटते हैं। पत्रकारिता के लिए डिग्री नहीं, बल्कि अच्छा लिखना-बोलना, समाज की गहरी समझ और निडरता चाहिए।
कुछ स्वयंभू जानकारों का एक और खोखला तर्क यह होता है कि "जब मामले में कोई पुलिस केस या एफआईआर ही दर्ज नहीं है, तो उस पर स्टोरी कैसे हो सकती है?" ऐसे लोगों को पत्रकारिता के बुनियादी धर्म का भी भान नहीं है।
भारत में 99% मामलों में आम जनता ,गरीब, मजदूर और छात्र थाने जाने और केस दर्ज कराने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। केस दर्ज कराने के लिए पैसा, वकील, वक्त और रसूख चाहिए, जो हर किसी के पास नहीं होता। लोग व्यवस्था के डर से मन मारकर बैठ जाते हैं। लेकिन पत्रकारिता की कोई ऐसी मजबूरी नहीं होती। पत्रकार का काम पुलिस की चार्जशीट पर मुहर लगाना नहीं, बल्कि उस दर्द को सामने लाना है जिसे कोई दर्ज नहीं कर रहा।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण राजस्थान के कोटा का कोचिंग तंत्र है। लंबे समय तक वहां पढ़ाई के तनाव और सिस्टम की मार से बच्चे आत्महत्याएं करते रहे। चूंकि कोई औपचारिक आपराधिक मामला दर्ज नहीं होता था, इसलिए इसे बच्चों का 'निजी फैसला' मानकर दबा दिया जाता था। लेकिन जब खोजी और संवेदनशील पत्रकारों ने एफआईआर का इंतजार किए बिना हॉस्टलों की बदहाल स्थिति, बिना खिड़की के छोटे-छोटे कमरों, 16-16 घंटे के अमानवीय स्टडी रूटीन और कोचिंग संस्थानों की मुनाफाखोरी पर इन-डेप्थ रिपोर्ट्स कीं, तब जाकर पूरे देश की आंखें खुलीं और सरकार को सख्त कोचिंग गाइडलाइंस तय करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
पत्रकारिता कोई पुलिसिया डायरी नहीं है जो एफआईआर के बाद शुरू हो। यह समाज की उस चीख को आवाज देने का नाम है, जो किसी थाने की चौखट तक नहीं पहुंच पाती। पत्रकारिता किसी डिग्री, सर्टिफिकेट या किसी खास गिरोह के नियमों की जागीर नहीं है; यह जनहित, साहस और सच को बिना डरे सामने लाने का पत्रकारिता धर्म है।