06/03/2026
इमामों और औलिया की मुहब्बत इस्लाम की रूह मानी जाती है। दुनिया भर के मुसलमान अहले-बैत से गहरी अकीदत रखते हैं और उनकी याद में अपनी ज़िंदगी को संवारने की कोशिश करते हैं। इसी मुहब्बत और अकीदत की एक बड़ी मिसाल यह है कि बहुत से लोग यह तमन्ना रखते हैं कि उनका आख़िरी ठिकाना भी किसी मुक़द्दस और बरकत वाली जगह के करीब हो। इमाम अली रज़ा (अ.स.) का रौज़ा भी ऐसी ही एक पाक और रूहानी जगह है, जहाँ हर साल लाखों ज़ायरिन हाज़िरी देने के लिए पहुँचते हैं और दुआएँ माँगते हैं।
यह मुक़द्दस जगह सिर्फ एक मक़बरा नहीं बल्कि ईमान, सब्र, इल्म और इंसाफ़ की याद दिलाने वाली एक रूहानी निशानी है। यहाँ आने वाला हर शख़्स अपने दिल में सुकून, मोहब्बत और अल्लाह से क़रीबी महसूस करता है। मुसलमानों के दिलों में अहले-बैत की मोहब्बत इतनी गहरी है कि वे उनके क़रीब रहना अपने लिए बड़ी नेमत समझते हैं।
इमाम अली रज़ा (अ.स.) का दरबार सदियों से इंसानियत, रहमत और हिदायत का पैग़ाम देता आया है। यहाँ की फिज़ा इबादत, दुआ और रूहानी सुकून से भरी रहती है। यही वजह है कि इस मुक़द्दस जगह का ज़िक्र आते ही हर मोमिन का दिल अदब और अकीदत से झुक जाता है