13/08/2026
22 अगस्त वर्ष 1907, में जर्मनी के स्टुटगार्ट में दूसरी 'इंटरनेशनल 'सोशलिस्ट कांग्रेस'का आयोजन हो रहा था,उस कांग्रेस में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों के देशों के झंडे फहराए गए थे और भारत के लिए ब्रिटेन का झंडा था, उसको नकारते हुए एक महिला ने भारत का एक झंडा बनाया और वहां फहराया। ये थीं 46 साल की पारसी महिला भीकाजी कामा।
भीकाजी कामा के इस कृत्य ने एक इतिहास रच दिया, विदेश की भूमि पर पहली बार भारत का ध्वज! ये भारत के आज के तिरंगे झंडे से अलग, आज़ादी की लड़ाई के दौरान बनाए गए कई अनौपचारिक झंडों में से एक था। भीकाजी ने न केवल भारत के स्वाधीनता संग्राम को वैश्विक पटल पर पहचान दिलाई, वहां के बौद्धिक वर्ग को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उनकी लूट, शोषण और दमनकारी नीतियों से अवगत कराया, अपितु यह भी प्रमाणित कर दिया नारी केवल चूल्हे चौके तक सीमित नहीं है, वो राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा करने में भी सक्षम है।
दो वर्ष पूर्व 1905 में भारत में बंगाल प्रांत का विभाजन हुआ था, जिससे देश में राष्ट्रवाद की लहर दौड़ गई थी। महात्मा गांधी अभी दक्षिण अफ़्रीका में ही थे, लेकिन बंटवारे से उमड़े गुस्से में बंगाली हिंदुओं ने 'स्वदेशी' को अपनाते हुए विदेशी कपड़ों का बहिष्कार शुरू कर दिया था।
उपन्यासकार, लेखक बंकिम चंद्र चैटर्जी की ऐतिहासिक पुस्तक 'आनंदमठ' से निकला गीत 'वंदे मातरम्' राष्ट्रवादी आंदोलनकारियों में लोकप्रिय हो गया था।
भीकाजी कामा द्वारा फहराए झंडे पर भी 'वंदे मातरम्' लिखा था।
इसके बाद मैडम कामा ने जेनिवा से 'वंदे मातरम्' नाम का 'क्रांतिकारी' जर्नल छापना शुरू किया। इसके मास्टरहैड पर नाम के साथ उसी झंडे की छवि छापी जाती रही, जिसे मैडम कामा ने फहराया था।
भीकाजी कामा का जन्म मुम्बई के एक समृद्ध पारसी परिवार में 24 सितम्बर, 1861 को हुआ। 1885 में उनकी शादी जाने माने व्यापारी रुस्तमजी कामा से हुई। ब्रिटिश शासन को लेकर दोनों के विचार बहुत अलग थे। रुस्तमजी कामा ब्रिटिश सरकार के हिमायती थे और भीकाजी एक मुखर राष्ट्रवादी। मैडम भीकाजी कामा दिसंबर 1885 में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की संस्थापक सदस्या बनीं। उन्होंने जाति-पाति, ऊँच नीच, धर्म आदि के भेदभाव से ऊपर उठकर सभी वर्गों की महिलाओं को एक मंच पर लाने का कार्य किया। उनके देशप्रेम के कारण उन्हें परिवार वालों का विरोध सहना पड़ा। 1896 में बॉम्बे में प्लेग की बीमारी फैली और वहां सेवा कार्य करते-करते भीकाजी कामा खुद बीमार पड़ गईं। इलाज के लिए वो 1902 में लंदन गईं और उसी दौरान क्रांतिकारी नेता श्यामजी कृष्ण वर्मा से मिलीं। भीकाजी उनसे बहुत प्रभावित हुईं और स्वस्थ होने के बाद भारत वापस आने का विचार छोड़ वहीं पर अन्य क्रांतिकारियों के साथ भारत की आज़ादी के लिए
अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाने के काम में जुट गईं।
ब्रिटिश सरकार की उन पर पैनी नज़र रहती थी। लॉर्ड कर्ज़न की हत्या के बाद मैडम कामा साल 1909 में पेरिस चली गईं जहां से उन्होंने 'होम रूल लीग' की शुरूआत की।
उनका लोकप्रिय नारा था, "भारत आज़ाद होना चाहिए; भारत एक गणतंत्र होना चाहिए; भारत में एकता होनी चाहिए."
तीस साल से ज़्यादा तक भीकाजी कामा ने यूरोप और अमरीका में भाषणों और क्रांतिकारी लेखों के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता के अधिकार की मांग बुलंद किया।
मैडम कामा ने इस दौर में उन्होंने वी.डी. सावरकर, एमपीटी आचार्य और हरदयाल समेत कई क्रांतिकारियों के साथ काम किया।
पहले विश्व युद्ध के दौरान वो दो बार हिरासत में ली गईं और उनके लिए भारत लौटने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।
राष्ट्रवादी काम छोड़ने की शर्त पर आखिरकार 1935 में उन्हें वतन लौटने की इजाज़त मिली।
राष्ट्र के प्रति समर्पण के चलते अपने स्वास्थ्य पर ध्यान न देने के कारण वह बहुत बीमार हो चुकी थीं, और बिगड़ते स्वास्थ्य के चलते 13 अगस्त 1936 में उनकी मृत्यु हो गई।
1962 में भारत के पोस्ट एवं टेलीग्राफ़ विभाग ने गणतंत्र दिवस के दिन मैडम भीकाजी कामा की याद में एक डाक टिकट जारी किया
देश में उनके नाम पर कई मार्ग और भवन तो हैं पर स्वाधीनता संग्राम में उनके योगदान के बारे में जानकारी कम ही लोगों को है। भारतीय तटरक्षक सेना में जहाजों का नाम भी उनके नाम पर रखा गया था। आइए ऐसी कहानियों को याद कर महिलाओं में राष्ट्र प्रेम की अलख जगाएं, यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें शत शत् नमन, और विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।🙏