19/08/2020
वानप्रस्थ और संन्यास।आप क्यों नहीं ???
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विश्व में जीवन की आश्रम व्यवस्था भारत में स्पष्ट रूप से मिलती है। जीवन को चार भागों में विभक्त कर ब्रह्मचर्य, गृहस्थ,वानप्रस्थ और संन्यास में बांट दिया गया । 100 वर्ष के जीवन में 25-25 वर्ष चारों के लिए।
ब्रह्मचर्य और गृहस्थ तो आप जी लिए ,उत्तरदायित्व भी निभा लिए लेकिन अब 50 की उम्र के ऊपर तो गृहस्थ ही रहोगे या वानप्रस्थ में जाओगे ? 50-75 मतलब था कि घर और समाज के काम साथ साथ करें । घर भी और बाहर भी ।दोनों जीवन । आप से परिवार को भी मिले और समाज को भी।
फिर 75 के बाद संन्यास ।घर से बाहर केवल समाज ,और जगत के कार्य । यह सोचा गया था कि इस दुनिया से जाने के पहले आप परिवार के साथ दुनिया को भी कुछ दे कर जाएं।
अब एक नया अध्याय जुड़ गया है 60 वर्ष का अवकाश (रिटायर्ड) का। सरकारें और प्राइवेट संस्थान इस उम्र के बाद आगे कुछ और समय देकर आपको सेवा मुक्त कर देते हैं।
लेकिन वाह रे मनुष्य तेरी तो इच्छा मरती ही नहीं । तू तो घर छोड़ना दूर और कस कर ,चिपक कर घर को पकड़ता हैं। शरीर को बोझ बना कर परिवार में काबिज । बच्चे कब तक देख भाल करें । अपने ही अपने माता पिता की कितनी देखभाल की थी ? लेकिन दोष आप देंगे नई पीढ़ी को ही । अपनी कहानियां जो भी बता दें आपके बच्चे असलियत जानते ही नहीं।
यह घर घर की कहानी है। आप वानप्रस्थ और संन्यास के फर्ज तो भूल गए ,नई पीढ़ी को उनके कर्तव्य जरूर बताएंगे । अभी समय है ।परमात्मा ने आपको या उस परमपिता ने आपको केवल परिवार के ही काम करने के लिए नहीं भेजा था । केवल परिवार के लिए जीवन तो पशु जीवन है ।फिर आप मनुष्य कैसे हुए ? पशु से श्रेष्ठ कैसे ?
अभी देर नहीं हुई निकलिए घर से ,चलिए समाज के बीच और कुछ यादें छोड़ जाइए मानवता के लिए । क्षेत्र,समाज,जगत के लिए । ताकि आपकी अंतिम यात्रा खुशनुमा बने । लोग आपके जीवन के कसीदे पढ़ें । आप का जाना पूरे समाज को रुला भी दे और इस बात के लिए हंसा दे,गुदगुदा दे कि आप अपना योगदान समाज को दे कर जा रहे हैं ।
आयें बौद्धिक आश्रम ,इसमें अपने जीवन में झाकें और अभी भी समय है निकालें अंदर से मोती। आप ब्रह्म हो,असीम ऊर्जा है। आप निरीह नहीं है । उठिए,चलिए,दौड़िए मेरे साथ कि शरीर और जमाना साथ है।
आचार्य श्री होरी
#आचार्यश्रीहोरी