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03/08/2021

02/08/2021


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22/03/2016

केंद्र और राज्य सरकारों को एक कानून के तहत हर छह महीने पर बताना चाहिए कि किस विभाग में, किस श्रेणी में कितनी नौकरियां निकाली गई हैं और कितने लोगों की छंटनी की गई है और कितनी नौकरियों की संख्या पहले की तुलना में कम की गई है। ज़रूरी है कि हम संवैधानिक रूप से जान सकें कि नौकरियों की संख्या क्या है। नेताओं और मंत्रियों की गप्पबाज़ी बहुत हो चुकी है। अच्छा होता कि वे भी इन सूचनाओं को नियमित रूप से ट्वीट करते और लोगों को बताते कि यह संख्या है। तभी हम जान सकेंगे कि सरकारों के पास नौकरियों का कितना बड़ा बाज़ार है। उसमें कितनी सीटें आरक्षण से भरी गई हैं और कितनी खाली रह गई हैं। प्राइवेट कंपनियों की नौकरियों का अंदाज़ा अगर मुश्किल है, तो सरकारी नौकरियों की गिनती बहुत आसान है। अव्वल तो प्राइवेट नौकरियों की गिनती भी आसानी से हो सकती है, लेकिन सरकारी नौकरियों की गिनती का काम तो इसी वक्त और कम से कम हफ्ते भर की मेहनत में हो सकता है।

यह पता होना ज़रूरी है कि सरकारें विभिन्न स्तरों पर कितने रोज़गार पैदा करती हैं। स्थायी और अस्थायी नौकरियों को लेकर उनकी नीतियां क्या हैं। कानून के तहत यह भी बताया जाना चाहिए कि अस्थायी प्रकृति की नौकरियों का प्रतिशत स्थायी किस्म की नौकरियों की तुलना में कितना है। प्रोफेसर विवेक कुमार का कहना है कि आमतौर पर अस्थायी नौकरियों में आरक्षण नहीं होता है और अब सरकारी महकमों में ज़्यादातर काम इसी तरह से लिए जाते हैं। अगर यह सही है तो इसकी भी गिनती होनी चाहिए कि उन अस्थायी नौकरियों में अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के कितनों लोगों को जगह मिली है।

अव्वल तो अस्थायी नौकरियों की दशा भी कम भयावह नहीं है। आरक्षित हो या अनारक्षित, इस तरह की नौकरियों में सब पिस रहे हैं। आप किसी भी राज्य में चले जाइए। ठेके पर काम कर रहे शिक्षकों की हालत बहुत ख़राब है। अगर ज़रूरत है और हमारे नेता शिक्षा-शिक्षा कर इतना झूठ बोलते ही हैं तो शिक्षकों की नियुक्तियों को पारदर्शी और बेहतर क्यों नहीं करते। क्यों नहीं शिक्षक बनने की प्रक्रिया को योग्यता-आधारित और बेहतर बनाया जाता। कई विभाग अपने काम को आउटसोर्स कराने लगे हैं, जिससे सरकारी क्षेत्र में नौकरियां कम पैदा हो रही हैं। सवाल आरक्षण के रहने का तो है ही, यह भी तो पता चले कि सरकार के पास नौकरियां हैं भी या चली गईं, या उनकी प्रकृति बदलकर आरक्षण को समाप्त कर दिया गया।

प्रधानमंत्री बार-बार कह रहे हैं कि आरक्षण को कोई हाथ नहीं लगा सकता। आरक्षण अधिकार है, लेकिन इस बहस की शुरुआत विपक्ष ने शुरू की या आरएसएस ने...? आरएसएस ने आरक्षण को लेकर कई तरह के बयान दिए, जिनमें समीक्षा से लेकर आरक्षण तब तक रहने की बात है, जब तक समाज से भेदभाव नहीं मिट जाता। बीजेपी को समर्थन देने वाला नौजवानों का एक बड़ा तबका आरक्षण-विरोधी है। इधर-उधर की बातों से उसके भीतर उम्मीद जगाए रखने का प्रयास होता रहता है कि आरक्षण को लेकर कुछ हो रहा है या चर्चा की शुरुआत हो रही है। उम्मीद है, अब ऐसे लोगों को बीजेपी और संघ की तरफ से जवाब मिल गया होगा कि आरक्षण कोई नहीं हटा सकता। आरक्षण को लेकर उनके विरोध में भी एक किस्म का जातिवाद तो है ही। समीक्षा के नाम पर संघ की तरफ से ऐसी बातें होती हैं, जिन्हें लेकर एक बड़े वर्ग में तरह-तरह की आशंकाएं फैलती हैं।

जो लोग आरक्षण समर्थक हैं, उन्हें पता करना चाहिए कि राज्य से लेकर केंद्र के स्तर तक नौकरियों और आरक्षण की क्या हालत है। जो आरक्षण-विरोधी हैं, वे भी पता करें कि नौकरियां निकल रही हैं या नहीं। नौकरियों को आरक्षण नहीं खा जाता है, सरकार नौकरियां खा जाती हैं। जब नौकरियां होंगी ही नहीं, तो उनका लाभ न आरक्षण समर्थकों को मिलेगा, न विरोधियों को। इतनी सिम्पल बात नहीं समझ पाते तो आरक्षण की बहस को लेकर पन्ने भरने से कुछ नहीं होने वाला। वही दलीलें आज भी दी जा रही हैं, जो पहले दी जा रही थीं। लोगों को तमाम सरकारों को मजबूर करना चाहिए कि वे अपने यहां नौकरियों की संभावना पर बोलें, नीति स्पष्ट करें और गिनती भी बताएं। अगर इसी तरह अंधेरे में रहकर भावुकता से बहस करनी है, तो वह आपकी मर्ज़ी।

प्रधानमंत्री ने आरक्षण को लेकर अपनी तरफ से अंतिम बात कह दी है। उम्मीद है, उनकी पार्टी और संघ के भीतर की शाखाओं ने साफ-साफ सुन लिया है। अब चूंकि वे संघ का नाम लेकर खारिज नहीं कर सकते थे, तो विपक्ष का नाम ले लिया। राजनीति में इतना चलता है। विपक्ष ने तो अपनी प्रतिक्रिया दे दी होगी, लेकिन आरएसएस ने चुप रहकर सुना या सुनने के बाद चुप रहकर अपनी प्रतिक्रिया दे दी है। यह उन लोगों की बड़ी जीत है, जिन्हें लग रहा था कि आरक्षण के हक के लिए सड़क पर उतरने की ज़रूरत पड़ सकती है। मामूली बहस में ही वे यह लड़ाई फिर जीत गए। इससे ज्यादा पसीना तो आरक्षण विरोधियों ने ट्विटर और फेसबुक पर बहा दिया। लेकिन इसी के साथ यह भी हो रहा है कि तरह-तरह वर्गों की नई दावेदारियों के जरिये आरक्षण को चुनौती देने वाली बहस और राजनीति को हवा दी जा रही है। इन मांगों के जरिये भ्रामक असहमतियां पैदा की जा रही हैं।

आपने केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का आरक्षण पर एक बयान सुना होगा। यह बयान सिर्फ आरक्षण के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसे दलित-आदिवासी वर्ग की बेचैनियों के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। पासवान अभी तक नरेंद्र मोदी सरकार के भीतर चुप ही रहे हैं। रोहित वेमुला की खुदकुशी की घटना के बाद उनकी पार्टी ने सक्रियता दिखाई थी, मगर पासवान और उनकी पार्टी केंद्र सरकार के साथ ही खड़े नज़र आए। पासवान ने कहा कि आदिवासियों की ज़मीन छीनी जा रही है। उन्हें विस्थापित कर उनकी ज़मीन से सोना निकाला जा रहा है। उन्हें नौकरियां नहीं मिलेंगी तो वे नक्सलवादी बनेंगे।

इन दिनों पासवान की सरकार के पाले के समर्थकों की तरफ से नक्सलवादियों को देशद्रोही बताने और देशद्रोही को नक्सलवादी बताने का चलन हो गया है। उस पाले में पासवान पहले नेता है, जिन्होंने पहली बार हिम्मत कर यह बताने का काम किया है कि नक्सलवाद कैसे पैदा होता है। सरकार की नीतियों से पैदा हो रहा है। क्या पासवान यह भी कह रहे हैं कि उनकी सरकार ने जिन नीतियों के तहत आदिवासी इलाकों में खनन के लाइसेंस बांटे हैं, उनसे भी यह प्रक्रिया और तेज़ हुई है, लेकिन उनका यह बयान उन तमाम सरकारों की नीतियों पर एक टिप्पणी तो है ही।

प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि आरक्षण का अधिकार कोई नहीं ले सकता। वह कोई नई बात नहीं कह रहे हैं। नई बात रामविलास पासवान कह रहे हैं। दरअसल प्राइवेट कंपनियों में आरक्षण की बात भी नई नहीं है, लेकिन इस सरकार में यह सवाल उठाने का साहस पासवान ने ही किया है। खासकर तब, जब इस सरकार के सहयोगी या मातृ-संगठनों के लोग आरक्षण की समीक्षा के बहाने उस तबके को सपना दिखा रहे थे, जो मानता है कि बीजेपी आरक्षण विरोधी है। बीजेपी के दलित सांसद भी आमतौर पर संघ के बयान के बाद चुप ही रहे। क्या प्रधानमंत्री या उनकी सरकार के बाकी मंत्री पासवान की बात पर कुछ बोलेंगे। इसलिए पासवान इस बहस को फिर से आगे ले जा रहे हैं, जबकि प्रधानमंत्री यथास्थिति पर टिके रहना चाहते हैं।

नक्सलवाद का समाधान आरक्षण हो सकता है, पासवान ने एक दिलचस्प बात कह दी है। अगर प्रधानमंत्री यह कह रहे हैं कि आरक्षण अधिकार है, तो क्या इस अधिकार का विस्तार निजी क्षेत्र की कंपनियों तक होगा...? सरकारी ठेकों में अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यकों को प्राथमिकता देकर नौकरी का विकल्प नहीं पैदा किया जा सकता है, लेकिन उसका लाभ तो होता ही है।

क्या यह कोई नई खींचतान की स्थिति पैदा कर सकती है...? क्या बीजेपी के दलित सांसद और विधायक पासवान के इस प्रस्ताव का समर्थन करेंगे या पार्टी लाइन पर ही चलेंगे। यह बात मायावती भी कहती हैं, मगर चुप रह जाती हैं। मीरा कुमार ने भी काफी प्रयास किया था, बल्कि ठोस प्रयास मीरा कुमार ने केंद्रीय मंत्री रहते किया था। पासवान ने ऐसी बात क्यों कही, जो आरक्षण पर अपनी लाइन को दुरुस्त करने में लगी बीजेपी या मोदी सरकार को फिर से परेशानी में डाल सकती है। क्या व्यक्तिगत उपेक्षा के कारण या वाकई इसे लेकर वह आगे बढ़ने जा रहे हैं।

पासवान हाजीपुर से सात बार जीते हैं। उन्होंने हाजीपुर से सबसे अधिक मतों से जीतने का रिकॉर्ड बनाया था। रेलमंत्री भी रहे और विपक्ष में रहते हुए किसी भी रेल बजट पर उनकी प्रतिक्रिया तो होती ही थी। हाल ही में प्रधानमंत्री का एक कार्यक्रम हुआ हाजीपुर में। मंच पर हाजीपुर का यह सांसद मौजूद था, लेकिन बोलने का मौका नहीं मिला। जिस हाजीपुर में पासवान ने हज़ारों तकरीरें की हों, उस हाजीपुर में रेल से संबंधित एक कार्यक्रम में अपने ही प्रधानमंत्री के स्वागत और शान में दो शब्द नहीं कह पाए। राजनीति में जिस वक्त आप शेर होते हैं, उसी वक्त आप कुछ नहीं होते। मगर नेता वक्त का शेर होता है। पासवान वहां तो चुप हो गए, मगर कहीं और बोल कर अपनी दहाड़ सुना दी। इतनी बार जीतने और मंत्री बनने का क्या लाभ कि आप किसी सभा में दो शब्द बोलने के लिए न बुलाए जाएं। वह भी तब, जब आप उसी जगह से सांसद भी हों, मंत्री भी।

प्राइवेट कंपनियों में आरक्षण की वकालत और सरकारी नीतियों की वजह से आदिवासियों का नक्सलवाद की तरफ जाने का बयान पासवान को नए सिरे से कोई बड़ा दलित नेता तो अब नहीं बना सकेगा, लेकिन उन्होंने जोखिम तो लिया है। हो सकता है, इसके बाद वह मोदी सरकार के भीतर किनारे कर दिए जाएं, मगर पासवान ने अपनी जमापूंजी के आधार पर दांव तो लगा ही दिया है। अगर उन्होंने अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिए भी संकेत दिया है, तो भी सरकार को समझना चाहिए कि आरक्षण का मुद्दा उसके भीतर नई चुनौती खड़ी करने वाला है। हर नेता अपने आप में एक स्वायत्त प्राणी होता है। उस स्वायत्तता को गंवाकर वह बहुत दिन तक मंत्रिपद का सुख नहीं भोग सकता। हालांकि पासवान और अजित सिंह मंत्री बनने के मामले में भारत के सबसे व्यावहारिक नेताओं में से रहे हैं। जो भी है, आरक्षण की बहस अभी खत्म नहीं हुई है, और इस मसले पर अभी और टकराव होना है, जो बीजेपी ही नहीं, बाकी दलों का भी इम्तिहान लेगा।

14/03/2016

दिल्ली आने से पहले हाफ पैंट का इतना सामाजिक चलन नहीं देखा था। नब्बे के दशक में दिल्ली में एंट्री मारते ही लगा कि लोग सड़कों पर फ़ुल पैंट पहनते हैं मगर छतों पर हाफ पैंट का क़ब्ज़ा हो चुका है। गोविंदपुरी की छतों पर आने वाले मर्द हाफ पैंट और औरतें मैक्सी में ही नज़र आती थीं। कूलर और एसी को विकल्प के तौर पर उदारवादी अर्थव्यवस्था की प्रथम संतानों ने हाफ पैंट और मैक्सी का ही इस्तमाल किया। नाइसिल पाउडर और कोक पेप्सी के बाद गर्मी से लड़ने के लिए हाफ पैंट और मैक्सी ने दिल्ली की मानव सभ्यता का बहुत साथ दिया। हाफ पैंट का इस्तेमाल हम बिहारी लोग करते थे, दिल्ली वाले नेकर, निक्कर या निकर बोलते थे। थे क्या, आज भी बोलते हैं।

मैंने नब्बे के दशक की दिल्ली देखी है इसलिए अगर नेकर और मैक्सी का आगमन पहले हो चुका होगा तो 'बाइनरी' के इतिहासकार मुझे माफ करेंगे। ऐसा नहीं था कि नेकर और मैक्सी का प्रतिरोध नहीं हो रहा था। दिल्ली आकर हम किरायेदार भी सफेद पजामे की जगह हाफ पैंट की शरण में आ गए थे। जितनी तेज़ी से हाफ पैंट को स्वीकार किया वो संकेत था कि हम उदारवादी व्यवस्था के लिए बिल्कुल तैयार हैं। इसके बाद भी दिल्ली वाले ख़्याल रखते थे कि हाफ पैंट पहनने वाले मर्द बाहरी हैं या घर के। गोविंदपुरी के मकान मालिक शर्मा जी ने मेरे उदारवादी पहनावे को लेकर आपत्ति जताई कि आप रात को छत पर चटाई बिछाकर क्यों सोते हैं। हमने कहा कि एस्बेस्टस का कमरा काफी गरम हो जाता है। शर्मा जी ने फ़रमान के लहज़े में कह दिया कि घर में औरतें हैं। आप हाफ पैंट में बाहर मत निकलिये। शर्मा जी ख़ुद हाफ पैंट में थे।

धीरे धीरे नेकर को लेकर बचा खुचा सांस्कृतिक प्रतिरोध कमज़ोर पड़ने लगा और जनपथ पर बिकने वाला नेकर लोकप्रिय हो गया। दिल्ली के जनपथ का टी शर्ट और नेकर के प्रसार में बहुत योगदान है। पच्चीस पच्चीस चीख़ चीख़कर वहां के विक्रेताओं ने पूरे भारत में टी शर्ट और नेकर का विस्तार किया है। उसके बाद सरोजिनी मार्केट का स्थान आता है। जनपथ के टीशर्ट की एक अजब ख़ूबी हुआ करती थी। मैंने पहली बार देखा कि आदमी के बड़ा होने से पहले ही कपड़ा सिकुड़कर छोटा हो जाता है। नेकर की सिलाई बहुत कमज़ोर होती थी। लगता था कि सिलने से ज़्यादा बेचने की जल्दी है। कब कहां से सिलाई खुल जाये पता नहीं होता था। फिटिंग ऐसी होती थी कि कमर बायें की तरफ लचकती थी तो हाफ पैंट का घेरा दायीं तरफ लचक जाता था। ये विज्ञान के किस नियम के तहत होता था आज तक पता नहीं कर सका।

इसके बाद अच्छी सिलाई और फिटिंग वाले हाफ पैंट का चलन आया। इन्हें शाट्स कहा जाने लगा। इनका रंग भी ख़ाकी का ही होता था पर किसी को देखकर नहीं लगा कि ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेकर है। बल्कि ऐसे ख़ाकी शाट्स हमने सबसे पहले लेफ़्ट के विद्वानों को ही पहने देखा! बड़े बड़े ब्रांड वाले स्टोर में शाट्स को जगह मिलने लगी। लोग शाट्स पहनकर यहां वहां नजर आने लगे।

छुट्टी के दिनों में शाट्स और फ़्लोटर पहनकर लोगों ने खुशी खुशी जता दिया कि वे भारत की अतीत वाली तमाम अर्थव्यवस्थाओं से संबंध विच्छेद करने में संकोच नहीं करते। बड़ी संख्या में लोग शाट्स पहनकर हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन पर नज़र आने लगे। कुछ लोगों ने गोवा को शाट्स की राजधानी समझा और गोवा जाने से पहले शाट्स की ख़रीदारी जरूर की। पटना जाने वाली ट्रेन में भी लोग टी शर्ट और शाट्स में नज़र आने लगे मगर बाकी सवारी उन्हें हाईब्रिड (मिश्रित) नागरिक के रूप में देखते थे। शाट्स में देखते लगता था कि बोध गया जाने वाला कोई विदेशी तो नहीं मगर शक्ल से बिहारी जानकर सदमा लग जाता था। पुरातनपंथी सोचने लगते थे कि एकदम से ख़त्म हो गया है का।

नब्बे के दशक में हम जिस बिहार से आए थे वहां लोग नीचे हाफ पैंट नहीं पहनते थे। आज भी यही स्थिति है। लोग नीचे से नहीं ऊपर से हाफ या साफ हो जाते हैं। गर्मी के दिनों में हमारे प्रदेश (बंगाल और पूर्वी उत्तरप्रदेश भी) के लोग ऊपर कम ही पहनना पसंद करते हैं। गर्मी के दिनों में लगता है कि सारी क़मीज़ें कहां चली जाती होंगी। घर आते ही क़मीज़ और पतलून को उतारा नहीं जाता है बल्कि फेंका जाता है। लोग लुंगी का घेरा कसते हुए मोहल्ले के बीच में आ जाते थे। जैसे दफ्तर जाना पतलून पहनने की सज़ा काटना होता हो। जल्दी से लोग बनियान में आ जाते थे।

गर्मी के दिनों में बंगाल और बिहार के लोग बनियान जिसे हम अंग्रजी में गंजी कहते हैं खूब पहनते हैं। हर कोई अपनी गंजी को पहले दिन के जैसा सफेद रखना चाहता है। गंजी को सफेद रख पाने की नाकामी या सदमा नहीं झेल पाते हैं तो नील से नीला करने लगते हैं। मैं इसका भी वैज्ञानिक कारण नहीं पता लगा सका कि लोगों को नीले में सफेद कैसे नज़र आता है। अंत में जब हर बनियान को नीला ही होना है तो नीला बनियान ही क्यों नहीं बिकता। सबसे ज़्यादा सफेद क्यों बिकता है।

मुझे हाफ पैंट के मां-बाप यानी मूल का पता नहीं लेकिन लगता है कि भारत में यह बरतानिया हुकूमत के दौर में पतलून और हाफ पतलून बनकर आया। ब्रिटिश अफसर और सिपाही दोनों हाफ पैंट पहनते थे। हमारे देश में हाफ पैंट बच्चों के स्कूल यूनिफॉर्म से प्रचलित हुआ है। ज्यादातर हाफ पैंट फ़ुल पैंट से ही पैदा होते थे। फ़ुल पैंट छोटा होते ही घर परिवार में किसी के लिए हाफ पैंट बन जाता था। ओरजिनल हाफ पैंट की सिलाई कम होती थी इसलिए बेहतरीन हाफ पैंट सिलने वाले कम ही हुए हैं। संस्कृति के हिसाब से धोती और लुंगी भारतीय टाइप लगती है। अमीर और मध्यमवर्गीय तबके में इन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। वहां लोग अब ट्रैक पैंट पहनने लगे हैं!

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने खाकी हाफ पैंट को बदलकर अब फुल कर दिया है, जो भूरे रंग का होगा। एक ऐसे समय में जब नेकर/ शाट्स ज़्यादा प्रचलित है और कूल है ठीक उसी समय संघ ने अपने इस मूल वस्त्र को बदल दिया है। जबतक कोई बच्चों के अलावा नेकर नहीं पहनता था तब तक संघ वाले पहनते रहे। अब जब सब पहनने लगे हैं तो उन्हें क्यों लाज आ रही है! क्या इसलिए कि लोग मज़ाक़ उड़ाने लगे हैं? मज़ाक़ तो पहले भी उड़ता होगा।

ट्वीटर पर मैंने देखा कि कई लोग नेकर को लेकर तरह तरह की तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं। संघ का विरोध तो समझ आता है लेकिन विरोध में सनकना मुझे कूल नहीं लगता। क्या ये लोग सारे हाफ पैंट के बारे में वही राय रखते हैं जो संघ के नेकर के बारे में रखते हैं? संघ के सारे विरोधी सस्ते में छूट जाना चाहते हैं। कुछ प्रतिकात्मक मसलों पर विरोध जताकर मौज करने लगते हैं। संघ का विरोध करना है तो उसके बारे में जानिये, समय निकाल कर पढ़िये। उतनी मेहनत कीजिये जितनी मेहनत संघ अपने प्रसार के लिए करता है। संघ का संगठन या उसकी विचारधारा हाफ पैंट में नहीं हैं।

अर्ध- पतलून ( हाफ पैंट अंग्रेजी है, पतलून?) का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं या उसकी खराब फिटिंग का? मुझे नहीं पता कि संघ के कार्यकर्ताओं को मुख्यालय से हाफ पैंट की सप्लाई होती है या वे जहां तहां से सिलवा लेते हैं। जैसा कि मैंने कहा कि मूल रूप से हाफ पैंट सिलने वाले दर्ज़ी कम होते हैं इसलिए फिटिंग की ऐसी तैसी हो गई है। इस कमी को आसानी से दूर किया जा सकता है। संघ खादी से सीख सकता है। खादी के कपड़ों की ख़राब फिटिंग की समस्या दूर कर फ़ैशनेबल बनाया गया है।

मेरी राय में हाफ पैंट और उसका रंग बदलने का फ़ैसला संघ की हार है। उसकी प्रतिबद्धता की हार है। भले ही नेकर उसकी विचारधारा का प्रतीक नहीं है लेकिन प्रतिबद्धता का तो है ही। आखिर संघ उन लोगों को क्या जवाब देगा जो वर्षों से उसी बदरंग और खराब फिटिंग वाले निकर में शाखा लगाते रहे। क्या संघ उनके शारीरिक बेडौलपन को भी लेकर शर्मिंदा होने लगेगा? क्या 'साइज़ ज़ीरो संघी' को ही शाखा के लिए योग्य माना जाएगा?

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