Delhi Journalists Association

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24/05/2024
29/11/2023

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25/06/2023

#आपातकाल

एनयूजेआई स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन व दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन द्वारा 'आपातकाल और प्रेस' विषय पर आयोजित संगोष...
25/06/2023

एनयूजेआई स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन व दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन द्वारा 'आपातकाल और प्रेस' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने किए कई खुलासे

नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार, लेखक तथा हिन्दुस्थान समाचार के प्रधान संपादक रामबहादुर राय ने एनयूजेआई स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन तथा दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन द्वारा आपातकाल और प्रेस विषय पर आयोजित संगोष्ठी में खुलासा किया कि कांग्रेस के नेता व कार्यकर्ता आपातकाल के दौरान पुलिस के मुखबिर बन गए थे। आपातकाल के दौरान 16 महीने जेल में बंद रहे श्री राय ने बताया कि कांग्रेस के नेताओं के दबाव में तमाम लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाला गया था। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि आचार्य विनोवा भावे ने कभी नहीं कहा था कि आपातकाल अनुशासन पर्व है। कांग्रेसी नेता निर्मला देशपांडे द्वारा फैलाए गए झूठ का विनोबा भावे आपातकाल में व्याप्त भय के कारण विरोध नहीं कर पाए थे।
दिल्ली में आयोजित संगोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार, आईटीवी के संपादकीय निदेशक डॉ.आलोक मेहता, पांचजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर समेत कई पत्रकारों ने अपने विचार व्यक्त किए। संगोष्ठी की अध्यक्षता नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के अध्यक्ष श्री रास बिहारी ने की।
श्री राय ने संगोष्ठी में बताया कि आपातकाल का केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने ही जमकर विरोध किया था। इंदिरा गांधी के खिलाफ आंदोलन के अगुआ जयप्रकाश नारायण गिरफ्तारी के बाद छाये सन्नाटे से हताश हो गए थे। जेपी को उम्मीद थी कि उनकी गिरफ्तारी के बाद पटना समेत देशभर में भारी विरोध होगा। पर देश में पूरी तरह सन्नाटा छा गया। उन्होंने बताया कि जेपी ने जेल में एक महीने बाद अपनी डायरी लिखना शुरू किया था। आपातलकाल के पहले पांच महीने में इंदिरा सरकार के अत्याचारों के कारण देश हिल गया था। इसके बाद भय को मिटाने के लिए संघ के स्वयंसेवकों ने भूमिगत होकर आपातकाल के विरोध में कार्य किया। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि क्रांतिकारी माओवादी नेता और कार्यकर्ताओं ने भी आपातकाल में सरकार और पुलिस के मुखबिरों की भूमिका निभाई थी। जेल में बंद माओवादी नेता गिरफ्तार नेताओं की जासूसी करते थे।
जेपी आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाने वाले रामबहादुर राय ने कहा कि इंदिरा गांधी के विरोध में जेपी आंदोलन में सत्ता बदलने का दम नहीं था। उन्होंने कहा कि जेलों में ऐसा माहौल था कि आपातकाल कभी समाप्त नहीं होगा और परिवार के लोगों से इस जन्म में भेंट नहीं होगी।
श्री राय ने कहा कि इंदिरा गांधी ने यह सोचकर जनवरी 1977 में लोकसभा चुनाव की घोषणा की थी कि आपातकाल में जनता उनके निर्णय पर मोहर लगा देगी। उन्होंने बताया कि इंदिरा गांधी ने दार्शनिक जे कृष्णमूर्ति, कांग्रेस नेता ओम मेहता और कई अन्य लोगों की राय पर चुनाव कराए थे। इंदिरा गांधी की सोच थी कि आपातकाल में चुनाव करा कर, वह फिर जीत जाएंगी, लेकिन जनता ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया।’
श्री राय ने कहा कि इंदिरा गांधी ने केवल प्रधानमंत्री बने रहने के लिए ही आपातकाल घोषित किया था। इंदिरा गांधी को अगर सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल जाती तो आपातकाल भी नहीं थोंपा जाता। इसके लिए इंदिरा गांधी ने सभी लोकतांत्रिक अधिकारों को हनन किया।
मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र हैं: आलोक मेहता
आईटीवी के संपादकीय निदेशक पद्मश्री डॉ आलोक मेहता ने कहा इस समय पत्रकारों के बीच यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि देश में आपातकाल जैसी स्थिति है। उन्होंने कहा कि आज भी मीडिया को पूरी स्वतंत्रता है कि वह तथ्यों के आधार पर समाचारों का प्रकाशन करें। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी कहा करती थी कि हमें जयप्रकाश के आंदोलन से उतना खतरा नहीं है जितना अखबारों से है।
श्री मेहता ने कहा कि आपातकाल के दौरान झुग्गी हटाने, श्रमिकों को बोनस का भुगतान न होने और गोदावरी जल संकट तक की खबरें लिखने पर भी पाबंदी थी। सरकारी अधिकारी और दरबारी राजा से बढ़ कर वफाद़ार बन गए थे।
आपातकाल के दौरान हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी में संवाददाता रहे श्री मेहता ने अपने कई अनुभव इस अवसर पर साझा किए।
श्री मेहता ने कहा कि आपातकाल के दौरान लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए पत्रकारों ने बड़ी भूमिका निभाई थी। इसी कारण तमाम पत्रकारों को इंदिरा सरकार की नाराजगी झेलनी पड़ी। इंदिरा सरकार ने प्रेस को कुचलने के लिए सेंसरशिप का पूरी तरह दुरुपयोग किया। सरकारी अधिकारी और दरबारी राजा से बढ़ कर वफाद़ार बन गए थे। आपातकाल ने एक बड़ा सबक यह दिया है कि अब कोई भी सरकार इस बारे में सोच भी नहीं सकती है। इंदिरा ने ब्रांड बनने के लिए देश का बैंड बजाया: हितेश शंकर
पांचजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर ने कहा कि महत्वपूर्ण यह है कि आपातकाल को देखने की मीडिया की दृष्टि क्या है?” उन्होंने कहा कि आपातकाल की घोषणा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 12 जून 1975 को इंदिरा गांधी को छह वर्ष के लिए अयोग्य ठहराने के निर्णय निर्णय के बाद की गई। इसके बीज 1967 में ही पड़ गए थे, जबकि प्रसिद्ध गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार मामले में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि व्यक्तियों के मूलभूत अधिकारों पर अंकुश नहीं लगा सकती।
श्री हितेश शंकर ने कहा कि श्रीमती गांधी के सत्ता में आने के बाद बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स की समाप्ति, तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वरा प्रतिबद्ध न्यायपालिका और नौकरशाही की जरूरत पर जोर दिया जाना तत्कालीन शासकों की मानसिकता दर्शाता था। उन्होंने कहा कि केशवानंद भारती मामले में पुन: न्यायालय की इस व्यवस्था से किस संविधान के मूल ढांचे में बदलाव नहीं किया जा सकता। उसके बाद संविधान को शासकों की मर्जी के अनुसार ढालने का प्रयास तेज हो गया। जो परिवार के आगे नहीं झुक रहे थे, उन्हें झुकाने की कोशिशें की गयी।
श्री हितेश शंकर ने कहा कि आपातकाल के दौरान दो सौ से ज्यादा पत्रकारों को गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया था। उन्होंने कहा कि आपातकाल के बाद हुए आम चुनावों ने यह तय कर दिया था कि यह देश सत्ता की सनक से नहीं बल्कि संविधान से चलाया जाता है।आपातकाल में प्रेस पर पाबंदी के खिलाफ एनयूजे ने निभाई थी बड़ी भूमिका- रास बिहारी
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए एनयूजेआई के अध्यक्ष रास बिहारी ने कहा कि आपातकाल में एनयूजेआई के नेताओं ने प्रेस पर पाबंदी के खिलाफ बड़ी भूमिका निभाई थी। कई नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। बड़ी संख्या में सदस्यों की मान्यता रद्द कर दी गई। कई पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया।
रासबिहारी ने देश में मीडिया पर अघोषित आपातकाल को भ्रम फैलाने की साजिश बताते हुए कहा कि मीडिया के सामने हर समय चुनौती रहेंगी। मीडिया संस्थानों में मालिकों की मनमानी हावी है और आज सम्पादक मैनेजर हो गए है। जिस मीडिया प्रतिष्ठान को दिल्ली में भाजपा का समर्थक कहा जाता है, उसे पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भोंपू बताया जाता है। सत्ता के बारे में तथ्यों के आधार पर समाचार लिखने वालों को परेशानी उठानी पड़ सकती है पर उन्हें चुप नहीं कराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार हो या बिहार की नीतीश कुमार सरकार, उनकी आलोचना करने पर विज्ञापन बंद कर दिए जाते हैं। ऐसा हाल कई राज्यों में है। उन्होंने कहा कि मालिकों द्वारा समाचार छापने या न छापने के कारण ही अघोषित आपातकाल का भ्रम फैलाया जाता है।
एनयूजेआई स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन के अध्यक्ष अनिल पांडे ने संगोष्ठी के वक्ताओं का परिचय कराते हुए मीडिया की स्वतंत्रता में उनके योगदान के बारे में बताया। एनयूजेआई स्कूल के सचिव के पी मलिक ने संगोष्ठी में पधारे अतिथियों का स्वागत किया।
दिल्ली पत्रकार संघ के संयोजक राकेश थपलियाल ने संगोष्ठी का संचालन करते हुए मीडिया से जुड़े मुद्दो को उठाया। एनयूजेआई के सचिव अमलेश राजू ने धन्यवाद ज्ञापन में कहा कि मीडिया के एकजुट होकर काम करने की आवश्यकता है। संगोष्ठी में संसद टीवी के वरिष्ठ एंकर मनोज वर्मा, अमरेंद्र गुप्ता, यूनीवार्ता के ब्यूरो प्रमुख मनोहर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार उषा पाहवा, प्रतिभा शुक्ल, ज्ञानेंद्र सिंह, विवेक शुक्ल, दीपक उपाध्याय आदि ने भी विचार रखे। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में पत्रकारों ने हिस्सा लिया

--पत्रकार सुरक्षा कानून, मीडिया काउंसिल व मीडिया कमीशन पर एनयूजे आंदोलन चलाएगानई दिल्ली, 11 जनवरी। एनयूजे पत्रकार सुरक्ष...
11/01/2023

--पत्रकार सुरक्षा कानून, मीडिया काउंसिल व मीडिया कमीशन पर एनयूजे आंदोलन चलाएगा
नई दिल्ली, 11 जनवरी। एनयूजे पत्रकार सुरक्षा कानून, मीडिया काउंसिल व मीडिया कमीशन आदि पत्रकारों से संबंधित विषयों पर पूरे देशभर में आंदोलन चलाएगा। एनयूजे के 51वें स्थापना दिवस पर इसी महीने मुख्यालय में आयोजित होने वाले एक बड़े सम्मेलन में इन विषयों पर आंदोलन की रुपरेखा बनाने के साथ विभिन्न राज्यों में पत्रकारों की पेंशन और बीमे को लेकर राज्य सरकार से मांग के साथ ही पत्रकारों के उत्पीड़न के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जाएगा।
बुधवार को जंतर मंतर पर एनयूजे-डीजेए मुख्यालय में पत्रकार सुरक्षा कानून, मीडिया काउंसिल व मीडिया कमीशन के गठन को लेकर चलाए जा रहे अभियान की तैयारी और नेशनल यूनियल आफ जर्नलिस्टस इंडिया (एनयूजे) और दिल्ली पत्रकार संघ (डीजेए) चुनाव पर भी विचार विमर्श किया गया। पत्रकारों की विभिन्न समस्याओं के बाबत आयोजित इस बैठक की अध्यक्षता करते हुए एनयूजे अध्यक्ष रास बिहारी ने कहा कि देशभर में पत्रकारों की पहचान को लेकर संकट खड़ा होता जा रहा है। जगह जगह फर्जी पत्रकारों की बढती संख्या के कारण हिंसक घटनाएं भी सामने आ रही है। इसलिए पत्रकारों की परिभाषा तय करना आवश्यक हो गया है।
एनयूजे के वरिष्ठ नेता मनोज मिश्र ने बतौर मुख्य वक्ता कहा कि आज पत्रकारिता में कई प्रकार के संकट खड़े हैं। राज्यों में अलग अलग समस्याएं है और राजधानी दिल्ली में अलग प्रकार की। ऐसे में पत्रकार संगठन की भूमिका बढ़ गई है। एनयूजे और डीजेए इस भूमिका को राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के स्तर पर उठाए और सरकार को इस दिशा में आवश्यक कार्रवाई करने के लिए बाध्य करे। मिश्र ने कहा कि पत्रकारों को कई राज्यों में पेंशन और बीमे की सुविधा मिल रही है। कई राज्यों में इन सुविधाओं के लिए सरकार से बातचीत करने के लिए संगठन को आगे आना होगा।
कार्यक्रम में एनयूजे-डीजेए के वरिष्ठ नेताओं में मनोज वर्मा, राकेश थपिलयाल, अमलेश राजू, राजेंद्र स्वामी, प्रतिभा शुक्ला, संतोष सूर्यवंशी, फाजिया अफजल, प्रियरंजन, जगदंबा सिंह, नासिर खान, जमुना राम कुंदन, विजय कुमार ठाकुर, अमित गांधी सहित अनेक लोगों ने अपने अपने विचार रखे।
कार्यक्रम में एनयूजे के मुख्य चुनाव अधिकारी अशोक किंकर ने चुनाव से संबंधित दिशा निर्देश के बारे में जानकारी दी। बुधवार की बैठक में स्थापना दिवस समारोह को संपन्न कराने को लेकर विभिन्न कमेटियों का गठन किया गया और कई सब-कमेटी बनाकर उन्हें इसकी जिम्मेवारी सौंपी गई।

Headlineअगर पुलिस सुधार नहीं हुआ तो देश में लोकतंत्र नहीं बचेगा- प्रकाश सिंह (पूर्व डीजीपी, उत्तर प्रदेश)पुलिस सुधारों क...
30/05/2021

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अगर पुलिस सुधार नहीं हुआ तो देश में लोकतंत्र नहीं बचेगा- प्रकाश सिंह (पूर्व डीजीपी, उत्तर प्रदेश)

पुलिस सुधारों की मांग देश में लंबे समय से होती रही है।1977 में पुलिस सुधारों पर बने धर्मवीर की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय पुलिस आयोग से लेकर 2006 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश तक कई आयोग और पुलिस अधिकारियों की रिपोर्टों पर देश में पुलिस व्यवस्था में सुधार की मांग समय-समय पर उठती ही है।
2006 में सुप्रीम कोर्ट का आदेश सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण माना जाता है। सर्वौच्च अदालत ने 7 मुख्य डायरेक्टिव्स के आधार पर पूरे देश में पुलिस सुधारों को लागू करने का आदेश दिया था।
यह आदेश उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह बादल की पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया था लेकिन 15 साल से भी ज्यादा वक्त हो जाने बीत जाने के बाद भी अधिकतर राज्यों ने आंशिक ही इन सुधारों को लागू किया है,
हाल ही महाराष्ट्र में पुलीस के द्वारा अवैध वसूली, बंगाल में पुलिस का राजनीतिकरण , केरल में पुलिस की यूनियन बाज़ी की घटनाओं ने एक बार फिर पुलिस सुधारों की ज़रूरत को महसूस किया।
इसी विषय को लेकर एक वेबीनार का आयोजन हाल ही में किया गया, जिसे राजेंद्र पुनेठा मेमोरियल फाउंडेशन ने पुलिस के प्रतिष्ठित थिंक टैंक इंडियन पुलिस फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित किया।

इस सेमिनार में पुलिस सुधारों का झंडा उठाते रहे श्री प्रकाश सिंह स्वयं मौजूद थे। इसके अलावा पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर और पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सत्यपाल सिंह , उत्तर प्रदेश पुलिस के एडीजी श्री राजीव कृष्ण और पूर्व डीएसपी केके गौतम भी मौजूद थे ।
सभी ने एक सुर में पुलिस सुधारों को तुरंत लागू किए जाने की मांग की।

इस अवसर पर प्रकाश सिंह ने लोगो को चेताते हुए कहा की यदि पुलिस सुधारों को पूरी तरह से अमल में नहीं लाया गया तो भविष्य में देश में लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है। क्योंकि तमाम सरकारें अपने अपने हिसाब से पुलिस का इस्तेमाल करती हैं और यह किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
श्री सिंह के मुताबिक देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनेतिक तरक्की के लिए ज़रूरी है कि पुलिस सुधार हों, उन्होने ज़ोर देकर कहा कि आधुनिक भारत के लिए जरूरी है कि पुलिस भी आधुनिक हो।

पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सतपाल सिंह ने कहा कि पुलिस सुधार लोकतंत्र का मूल है। उन्होने महत्वपूर्ण बात कही कि देश में पुलिस सुधार में सबसे बड़ा रोड़ा आइएएस लॉबी है जो नहीं चाहती कि पुलिस आधुनिक हो।
सत्यपाल सिंह ने पुलिस की छवि और सम्मान को लौटाए जाने की वकालत की और कहा कि जब तक राजनेता और प्रशासनिक तंत्र पुलिस को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेगा तब तक सुधार संभव नहीं है।
सत्यपाल सिंह के मुताबिक पुलिस जब गरीबों को न्याय दिलाने की मानसिकता में आएगी तभी सही मायने में पुलिस के कहलाएगी।

एडीजी श्री राजीव कृष्ण ने पुलिस की जांच और कानून व्यवस्था को अलग-अलग करने की वकालत करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 2020 से ही इस को अमल में लाने की शुरुआत कर दी है। उत्तर प्रदेश राज्य सरकार ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए 1400 सब इंस्पेक्टरों की भर्ती किए जाने को सिद्धांतिक मंजूरी दे दी है। उन्होने माना कि कुछ चुनौतियां हैं लेकिन यही एक रास्ता पुलिस की बेहतरी का है।

श्री केके गौतम ने पुलिस विभाग के कनिष्ठ अधिकारियों की हालत के लिए वरिष्ठ अधिकारियों से सहयोग की अपील की। उन्होंने कहा कि जब तक उच्च अधिकारियों और कनिष्ठ अधिकारियों के बीच में तालमेल नहीं होगा, पुलिस बेहतर तरीके से काम नहीं कर सकती है ।
इस सेमिनार का आयोजन उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व अधिकारी रहे श्री राजेंद्र पुनेठा की स्मृति में बने फाउंडेशन के तत्वाधान में किया गया , जिसे इंडियन पुलिस फाउंडेशन ने अपना सहयोग दिया । कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार श्री दिनेश गौतम ने किया। जबकि आभार लोकसभा टीवी के वरिष्ठ एंकर अनुराग पुनेठा ने व्यक्त किया।

07/11/2020

अत्यंत दुखद सूचना
हमारे वरिष्ठ साथी हेमंत विश्नोई जी का आज तड़के निधन हो गया।
भावभीनी श्रद्धांजलि।

अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी के विरोध में पत्रकारों का प्रदर्शननयी दिल्ली 04 नवंबर । वरिष्ठ टीवी पत्रकार अर्नब गोस्वामी क...
04/11/2020

अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी के विरोध में पत्रकारों का प्रदर्शन

नयी दिल्ली 04 नवंबर । वरिष्ठ टीवी पत्रकार अर्नब गोस्वामी की मुंबई पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के विरोध में देश के तमाम पत्रकार संगठनों ने आज यहां संसद भवन के समक्ष प्रदर्शन किया और महाराष्ट्र सरकार से श्री गोस्वामी को तुरंत रिहा करने की मांग की। नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स इंडिया, दिल्ली पत्रकार संघ, वर्किंग जर्नलिस्ट्स ऑफ इंडिया , मीडिया एसोसिएशन फार सोशल सर्विस सहित अनेक संगठनों के सदस्य पत्रकारों के अलावा प्रमुख मीडिया संस्थानों के पत्रकार भी इस मौके पर मौजूद थे।
वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव, मनोज वर्मा , हर्षवर्धन त्रिपाठी, स्मिता मिश्रा , संतोष कुमार, शिशिर सोनी, उमेश चतुर्वेदी, राकेश आर्य, संजय सिंह, अनुराग पुनैठा, के पी मलिक, अतुल गंगवार, परिजात कौल, नरेंद्र भंडारी समेत लगभग डेढ़ सौ पत्रकारों ने भारतीय प्रेस क्लब से लेकर संसद भवन के समीप तक मार्च निकाला। मार्च को संबोधित करते हुए पत्रकारों ने कहा कि कोई श्री गोस्वामी की गिरफ्तारी प्रेस पर सीधा सीधा हमला है अभिव्यक्ति की आजादी को महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र पुलिस ने दबाने का षड्यंत्र रचा है। अर्नब की गिरफ्तारी ने आपातकाल की याद ताजा कर दी है और ऐसा लगता है मुंबई में आपातकाल लगा है। सुशांत सिंह राजपूत केस, फर्जी टीआरपी केस में महाराष्ट्र सरकार को जब श्री गोस्वामी से 12 -12 घंटे पूछताछ के बाद भी कुछ नहीं मिला तो राज्य के गृह मंत्री के आदेश पर पुलिस ने मार्च 2018 में बंद हो चुके एक केस को दोबारा खोल कर अचानक बिना नोटिस घर से बलपूर्वक गिरफ्तार किया। सभी पत्रकारों ने एक सुर में कहा कि अगर इसका आज विरोध नहीं किया गया तो एक दिन कोई भी सरकार कभी भी किसी सही या गलत केस में किसी को फंसाने में संकोच नहीं करेगी। पत्रकारों ने प्रेस क्लब के पर धरना भी दिया।

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