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पहली फिल्म लिखने का ख्याल आते ही पहला सवाल यही होता है- शुरुआत कहाँ से करें? आइडिया को कहानी में कैसे बदला जाए, कहानी को...
09/09/2026

पहली फिल्म लिखने का ख्याल आते ही पहला सवाल यही होता है- शुरुआत कहाँ से करें? आइडिया को कहानी में कैसे बदला जाए, कहानी को screenplay में कैसे उतारा जाए और उस पहले draft तक कैसे पहुँचा जाए, जहाँ से आपकी फिल्म वास्तव में आकार लेना शुरू करती है?

इस बार Craft & Crew में इसी सफर पर होगी एक खास बातचीत- एक ऐसे लेखक के साथ, जिन्होंने 12 feature films लिखी हैं और FTII, Pune से प्रशिक्षित हैं।

Meet Shirish Sharma
Craft & Crew | TCOTF September Chapter 🎬

टॉक सिनेमा ऑन द फ़्लोर में एंट्री फ्री है, लेकिन सीटें सीमित हैं।
इसलिए रजिस्टर अभी कर लें, लिंक ये है- https://forms.gle/2PsJCgd19jCGXxuu9

Shirish Sharma Sri Aurobindo Centre For Arts And Creativity

सिनेमा, संस्कृति और स्वाभिमान: महबूब खान और 'मदर इंडिया': भारतीय सिनेमा जब अपनी जड़ों की बात करता है, तो महबूब खान का ना...
09/09/2026

सिनेमा, संस्कृति और स्वाभिमान: महबूब खान और 'मदर इंडिया':

भारतीय सिनेमा जब अपनी जड़ों की बात करता है, तो महबूब खान का नाम एक ऐसे स्तंभ के रूप में सामने आता है जिन्होंने हमारी लोक-संस्कृति को कैनवास का विस्तार दिया। 1957 में बनाई उनकी महान फिल्म 'मदर इंडिया' सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के नैतिक साहस, आत्मबल और सांस्कृतिक अस्मिता की पहचान है।
आज पुण्यतिथि के मौके पर मेहबूब खान को याद करते हुए इस फिल्म को भी नहीं भूलना चाहिए..., क्योंकि-

-ये 1958 में 'बेस्ट फॉरन लैंग्वेज फिल्म' श्रेणी में ऑस्कर पुरस्कारों के लिए नामांकित होने वाली पहली भारतीय फिल्म बनी।
-इसके लिए कार्लोवी वारी (Karlovy Vary) अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में नरगिस को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला।
-ये नेशनल फिल्म अवॉर्ड और फिल्मफेयर की श्रेणियों में छा जाने वाली यह फिल्म '1001 मूवीज यू मस्ट सी बिफोर यू डाई' की वैश्विक सूची में शामिल की गई है।

आज जब सोशल मीडिया और ओटीटी के दौर में Women Empowerment और 'मजबूत महिला किरदारों' की तलाश में सिनेमा नई-नई दिशाओं में भटक रहा है.... तब 'मदर इंडिया' की 'राधा' हमें याद दिलाती है कि भारतीय सिनेमा ने दशकों पहले एक ऐसी माँ और महिला को गढ़ा था जो सिर्फ त्याग की मूरत नहीं, बल्कि धर्म, न्याय और स्वाभिमान के लिए अपने बेटे तक को सज़ा देने की हिम्मत रखती है।

जहाँ आज कंटेंट क्रिएशन अक्सर तात्कालिक ट्रेंड्स में उलझ जाता है, महबूब खान का विज़न सिखाता है कि लोकल कहानियाँ ही सही मायनों में ग्लोबल बनती हैं।

आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों और युवा कंटेंट क्रिएटर्स के लिए महबूब खान का सिनेमा एक खुली किताब है- कि कैसे अपनी मिट्टी की खुशबू, लोक-कला और जीवन-दर्शन को बिना किसी समझौते के दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक पहुँचाया जाता है।

भारतीय सिनेमा के इस कालजयी मास्टरपीस और इसके महान रचयिता महबूब खान को नमन।

07/09/2026

Meet the Singer who turned into 'Babbita'...
Bodh Music ... the internet sensation
at

TCOTF gets a new rhythm. 🎵
Music meets the cinema community.
Introducing the 15-Minute Music Chapter at TCOTF.
Dont miss.
Entry free.
Link to register is in Bio.
White Bird Digital

मुख्यधारा के चकाचौंध भरे सिनेमाई विमर्श के बीच संथाली फिल्म ‘आंगेन’ (Invisible) को मिला राष्ट्रीय सम्मान महज एक पुरस्कार...
07/09/2026

मुख्यधारा के चकाचौंध भरे सिनेमाई विमर्श के बीच संथाली फिल्म ‘आंगेन’ (Invisible) को मिला राष्ट्रीय सम्मान महज एक पुरस्कार नहीं, बल्कि हाशिये की लोक-संवेदनाओं की राष्ट्रीय फलक पर ऐतिहासिक दस्तक है। निर्देशक रवि राज मुर्मू ने सीमित संसाधनों के बावजूद जिस ईमानदारी से अपनी मिट्टी, भाषा और समाज के अंतर्द्वंद्वों को परदे पर उतारा है, वह भारतीय सिनेमा में सच्चे यथार्थवाद की पुनर्स्थापना करता है।
हम यहां साझा कर रहे हैं इस फिल्म और फिल्मकार पर लिखा जानी मानी सिनेविद् और लेखिका डॉ विजय शर्मा का आलेख। यह लेख सिर्फ एक फिल्म की सफलता की कहानी नहीं कहता, बल्कि यह रेखांकित करता है कि जब अपनी जड़ों से उपजी कहानियां बिना किसी कृत्रिम मेलोड्रामा के कही जाती हैं, तो वे भाषाई सीमाओं को लांघकर सीधे मानवीय चेतना से संवाद करती हैं। ये आलेख आदिवासी और क्षेत्रीय सिनेमा के बदलते तेवर को समझने के लिए एक विचारोत्तेजक और जरूरी दस्तावेज है।
पूरा लेख: https://ndff.in/santhali-film-angen-invisible-by-ravi-raj-murmu/

(टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के सितंबर चैप्टर में रवि राज मुर्मू दर्शकों से सीधे संवाद करेंगे। 12 सितंबर को दोपहर 12 बजे से 2 बजे तक, सकैक दिल्ली में)

रजिस्टर करें (FREE): https://forms.gle/kkEtVcc4UbV8qmhb6

Vijay Sharma

कुछ फिल्में सिर्फ अपनी कहानी नहीं कहतीं...  वो अपने साथ एक पूरी संस्कृति, एक भाषा और एक नई आवाज़ को भी सामने लाती हैं। ‘...
06/09/2026

कुछ फिल्में सिर्फ अपनी कहानी नहीं कहतीं... वो अपने साथ एक पूरी संस्कृति, एक भाषा और एक नई आवाज़ को भी सामने लाती हैं।

‘Angen’ ऐसी ही एक फिल्म है।
संथाली भाषा में बनी इस फिल्म ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है और इस साल 72वें National Film Awards में Best Debut Film of a Director का सम्मान हासिल किया है।
यह सिर्फ एक फिल्म की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस सिनेमा की भी पहचान है जो भारत के अलग-अलग हिस्सों, भाषाओं और संस्कृतियों से निकलकर हमारे सामने आता है।

इसी सोच के साथ 𝐍𝐞𝐰 𝐃𝐞𝐥𝐡𝐢 𝐅𝐢𝐥𝐦 𝐅𝐨𝐮𝐧𝐝𝐚𝐭𝐢𝐨𝐧 का ‘𝐂𝐢𝐧𝐞𝐦𝐚 𝐨𝐟 𝐈𝐧𝐝𝐢𝐚: भारत का सिनेमा’ अभियान देश के अलग-अलग क्षेत्रों के सिनेमा, कहानियों और फिल्मकारों को जानने-समझने और उनके साथ संवाद बनाने की कोशिश करता है।

𝐓𝐚𝐥𝐤 𝐂𝐢𝐧𝐞𝐦𝐚 𝐎𝐧 𝐓𝐡𝐞 𝐅𝐥𝐨𝐨𝐫 (TCOTF)- September Chapter में इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए हम Spotlight में मिलेंगे 𝐀𝐧𝐠𝐞𝐧 के निर्देशक से, जो Ranchi से हमसे LIVE जुड़ेंगे।

बात होगी Angen के सफर की, Santhali cinema की, अपनी मिट्टी और भाषा से कहानी कहने की, और एक युवा फिल्मकार की filmmaking journey की।

शामिल होने के लिए इस लिंक पर रजिस्टर करें- https://forms.gle/HpRYufR4bCNFxKSy9

Meet our Spotlight Guest…
🎬 𝐑𝐀𝐕𝐈 𝐑𝐀𝐉 𝐌𝐔𝐑𝐌𝐔
Director, Angen
National Film Award Winner

12 September | Saturday | 12–2 PM
SACAC, Delhi

𝐂𝐢𝐧𝐞𝐦𝐚 𝐨𝐟 𝐈𝐧𝐝𝐢𝐚.
Cinema of many languages, cultures and voices.

𝐓𝐚𝐥𝐤 𝐂𝐢𝐧𝐞𝐦𝐚 𝐎𝐧 𝐓𝐡𝐞 𝐅𝐥𝐨𝐨𝐫
by 𝐍𝐞𝐰 𝐃𝐞𝐥𝐡𝐢 𝐅𝐢𝐥𝐦 𝐅𝐨𝐮𝐧𝐝𝐚𝐭𝐢𝐨𝐧

#भारत_का_सिनेमा Sri Aurobindo Centre For Arts And Creativity Ravi Raj Murmu

सलिल चौधरी: लोक, सिम्फनी और प्रगतिशील सिनेमा का अप्रतिम सुर:आज महान संगीतकार सलिल चौधरी की पुण्यतिथि है, और यह अवसर इसलि...
05/09/2026

सलिल चौधरी: लोक, सिम्फनी और प्रगतिशील सिनेमा का अप्रतिम सुर:

आज महान संगीतकार सलिल चौधरी की पुण्यतिथि है, और यह अवसर इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह उनका जन्मशताब्दी वर्ष भी है। भारतीय सिनेमा के इतिहास में सलिल दा केवल कर्णप्रिय धुनें रचने वाले संगीतकार नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे विरले संगीत-शिल्पकार थे जिनकी रगों में इप्टा (IPTA) का जन-आंदोलन, लोक-गीतों की सोंधी महक और वेस्टर्न क्लासिकल सिम्फनी की जटिल समझ एक साथ बहती थी।

सिनेमा को लेकर उनकी समझ हमेशा प्रगतिशील विचारों और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रही। बिमल रॉय के साथ उनकी जुगलबंदी ने भारतीय सिनेमा को अमर संगीत दिया। 'दो बीघा ज़मीन' (1953) में 'धरती कहे पुकार के' जैसी धुन हो, जिसने किसान और ज़मीन के दर्द को आवाज़ दी, या फिर 'मधुमती' (1958) का जादू, जहां 'आजा रे परदेसी' और 'सुहाना सफर' जैसे गीतों में लोकधुनों और ऑर्केस्ट्रेशन का नायाब संतुलन देखने को मिला।

यही प्रगतिशील चेतना उन्हें सत्तर के दशक में बासु चटर्जी जैसे 'मिडिल-ऑफ-द-रोड' और न्यू वेव सिनेमा के अग्रदूतों के साथ जोड़ती है। बासु दा की फिल्मों- 'रजनीगंधा' ('रजनीगंधा फूल तुम्हारे'), 'छोटी सी बात' ('जानेमन जानेमन') और 'चितचोर' के दौर में सलिल दा ने साबित किया कि बिना किसी तड़क-भड़क के, बेहद सादगी और संवेदनशीलता के साथ आम इंसान के रोज़मर्रा के जीवन और प्रेम को संगीत कैसे दिया जाता है। इसके अलावा मृणाल सेन की 'भुवन शोम' जैसी न्यू वेव की शुरुआती मील के पत्थर वाली फिल्म में भी उनका बैकग्राउंड स्कोर उनकी वैचारिक और कलात्मक स्वतंत्रता का जीवंत उदाहरण था।

ऋषिकेश मुखर्जी की कालजयी फिल्म 'आनंद' (1971) में सलिल दा ने ज़िंदगी और मौत के फलसफे को जिस तरह धुनों में ढाला, वह अविस्मरणीय है- चाहे 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' की उदासी हो या 'ज़िंदगी कैसी है पहेली' की दार्शनिक मस्ती। इसी तरह 'परख' का अमर गीत 'ओ सजना बरखा बहार आई' और 'जागते रहो' का 'जिंदगी ख्वाब है' साबित करते हैं कि उनकी धुनों में कितनी विविधता और गहराई थी।

सलिल दा का काम केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय समाज और संगीत की चेतना को समृद्ध करने वाली धरोहर है। जन्मशताब्दी वर्ष में इस महान संगीतकार, कवि और सरोकारी रचनाकार को विनम्र श्रद्धांजलि।

'महानायक' उत्तम कुमार: बांग्ला सिनेमा और जनमानस की अमर धड़कनबांग्ला सिनेमा में उत्तम कुमार सिर्फ एक स्टार नहीं, बल्कि बं...
03/09/2026

'महानायक' उत्तम कुमार: बांग्ला सिनेमा और जनमानस की अमर धड़कन

बांग्ला सिनेमा में उत्तम कुमार सिर्फ एक स्टार नहीं, बल्कि बंगाल के जनमानस, उसकी सांस्कृतिक अस्मिता और भद्रलोक की धड़कन रहे हैं। उनकी लोकप्रियता सिर्फ उनकी सम्मोहक मुस्कान या स्क्रीन प्रेजेंस तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने आज़ादी के बाद के बंगाल में मध्यम वर्गीय सपनों, द्वंद्वों और सामाजिक यथार्थ को परदे पर सबसे स्वाभाविक और गरिमामयी पहचान दी। आज उनकी जन्मशती (Centenary) के अवसर पर जाने-माने लेखक-फिल्म समीक्षक शांतनु रे चौधरी के 3 विशेष लेखों की श्रृंखला का पहला भाग हम आपके साथ साझा कर रहे हैं। इस पहले लेख में अभिनेता उत्तम कुमार से परे उस 'महानायक' की पड़ताल की गई है, जिसने निर्देशक (कल तुमि आलेया, बनपलाशीर पदावली), दूरदर्शी निर्माता और संगीतकार के रूप में बांग्ला सिनेमा के व्याकरण को गढ़ा।

अंग्रेजी में लिखा यह विशेष आलेख यहाँ पढ़ें:
-> https://ndff.in/uttam-kumar-the-many-lives-of-a-mahanayak-1/


सितंबर जो हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़े का महीना होता है.... उसकी पहली तारीख ही बहुत मक़बूल है।सितंबर की पहली तारीख होती है ...
01/09/2026

सितंबर जो हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़े का महीना होता है.... उसकी पहली तारीख ही बहुत मक़बूल है।

सितंबर की पहली तारीख होती है दुष्यंत कुमार, राही मासूम रज़ा, हबीब तनवीर और विजयदान देथा... चार दिग्गजों की यौमे पैदाइश की। इनमें से हरेक ने हिंदी के ज़रिए देश, दुनिया, समाज को पढ़ने, समझने, देखने, जानने को एक नया नज़रिया दिया, एक नया विस्तार दिया। इत्तिफ़ाक ये कि इनके प्रभाव से हिंदी सिनेमा भी अछूता नहीं रहा। हिंदी सिनेमा में सबसे गहरा गोता इनमें से राही मासूम रज़ा साहब ने लगाया और उसमें डूब कर हिंदी सिनेमा को कई बेशकीमती रत्न दिए।
राही साहब के ऊपर हाल ही में जाने-माने पत्रकार-फिल्म समीक्षक अमिताभ श्रीवास्तव ने एक बहुत सार्थक आयोजन किया था, जिसका लिंक यहां कमेंट सेक्शन में दिया है। आज राही साहब की सालगिरह के मौके पर इसे देखना शायद उन्हे याद करने का सबसे बढ़िया तरीका हो सकता है। इसके अलावा राही साहब को जानने, समझने और याद करने का जो एक और शानदार तरीका है... उसके लिए थोड़ा इंतज़ार करना पड़ सकता है। वो तरीका है जाने-माने पत्रकार-एंकर-लेखक-रंगकर्मी और दास्तानगो दारैन शाहिद की लिखी दास्तान-ए-राही को देखना। महमूद फ़ारूकी के निर्देशन में इस दास्तानगोई का पहला शो उन्होने साथी दास्तानगो राजेश कुमार के साथ 23 अगस्त को इंडिया हैबिटेट सेंटर में पेश किया... जिसका अदब की दुनिया में खूब चर्चा रहा।

उम्मीद है दिल्लीवालों को जल्द ही इसे एक बार फिर देखने का मौका मिलेगा।

Poster courtesy: Pankaj Diksh*t
Amitaabh Srivastava Dastangoi Collective

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