05/09/2026
सलिल चौधरी: लोक, सिम्फनी और प्रगतिशील सिनेमा का अप्रतिम सुर:
आज महान संगीतकार सलिल चौधरी की पुण्यतिथि है, और यह अवसर इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह उनका जन्मशताब्दी वर्ष भी है। भारतीय सिनेमा के इतिहास में सलिल दा केवल कर्णप्रिय धुनें रचने वाले संगीतकार नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे विरले संगीत-शिल्पकार थे जिनकी रगों में इप्टा (IPTA) का जन-आंदोलन, लोक-गीतों की सोंधी महक और वेस्टर्न क्लासिकल सिम्फनी की जटिल समझ एक साथ बहती थी।
सिनेमा को लेकर उनकी समझ हमेशा प्रगतिशील विचारों और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रही। बिमल रॉय के साथ उनकी जुगलबंदी ने भारतीय सिनेमा को अमर संगीत दिया। 'दो बीघा ज़मीन' (1953) में 'धरती कहे पुकार के' जैसी धुन हो, जिसने किसान और ज़मीन के दर्द को आवाज़ दी, या फिर 'मधुमती' (1958) का जादू, जहां 'आजा रे परदेसी' और 'सुहाना सफर' जैसे गीतों में लोकधुनों और ऑर्केस्ट्रेशन का नायाब संतुलन देखने को मिला।
यही प्रगतिशील चेतना उन्हें सत्तर के दशक में बासु चटर्जी जैसे 'मिडिल-ऑफ-द-रोड' और न्यू वेव सिनेमा के अग्रदूतों के साथ जोड़ती है। बासु दा की फिल्मों- 'रजनीगंधा' ('रजनीगंधा फूल तुम्हारे'), 'छोटी सी बात' ('जानेमन जानेमन') और 'चितचोर' के दौर में सलिल दा ने साबित किया कि बिना किसी तड़क-भड़क के, बेहद सादगी और संवेदनशीलता के साथ आम इंसान के रोज़मर्रा के जीवन और प्रेम को संगीत कैसे दिया जाता है। इसके अलावा मृणाल सेन की 'भुवन शोम' जैसी न्यू वेव की शुरुआती मील के पत्थर वाली फिल्म में भी उनका बैकग्राउंड स्कोर उनकी वैचारिक और कलात्मक स्वतंत्रता का जीवंत उदाहरण था।
ऋषिकेश मुखर्जी की कालजयी फिल्म 'आनंद' (1971) में सलिल दा ने ज़िंदगी और मौत के फलसफे को जिस तरह धुनों में ढाला, वह अविस्मरणीय है- चाहे 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' की उदासी हो या 'ज़िंदगी कैसी है पहेली' की दार्शनिक मस्ती। इसी तरह 'परख' का अमर गीत 'ओ सजना बरखा बहार आई' और 'जागते रहो' का 'जिंदगी ख्वाब है' साबित करते हैं कि उनकी धुनों में कितनी विविधता और गहराई थी।
सलिल दा का काम केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय समाज और संगीत की चेतना को समृद्ध करने वाली धरोहर है। जन्मशताब्दी वर्ष में इस महान संगीतकार, कवि और सरोकारी रचनाकार को विनम्र श्रद्धांजलि।