New Delhi Film Foundation

New Delhi Film Foundation New Delhi Film Foundation is a nonprofit organization registered under Societies Registration Act XX

सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि जागरूकता, संवेदनशीलता और संवाद का भी सशक्त माध्यम है।पिछले साल ALT EFF (ऑल्टरन...
05/06/2026

सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि जागरूकता, संवेदनशीलता और संवाद का भी सशक्त माध्यम है।

पिछले साल ALT EFF (ऑल्टरनेटिव एनवायरनमेंट फ़िल्म फ़ेस्टिवल) के माध्यम से NDFF ने पर्यावरण, प्रकृति, जलवायु परिवर्तन और सतत भविष्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर आधारित कुछ अहम फिल्मों को दर्शकों तक पहुँचाने का प्रयास किया।

हमारा विश्वास है कि कला और सिनेमा समाज के सामने उन सवालों को भी रख सकते हैं, जिन पर विचार करना समय की आवश्यकता है। इसी सोच के साथ NDFF सार्थक सिनेमा, सामाजिक सरोकारों और रचनात्मक अभिव्यक्ति को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।

क्योंकि बेहतर भविष्य की शुरुआत अक्सर एक अच्छी कहानी से होती है।

उस फेस्टिवल की पूरी रिपोर्ट एक बार फिर यहां पढ़ सकते हैं: https://ndff.in/alt-eff-delhi-2025-by-sacac-and-ndff/


#सार्थकसिनेमा #पर्यावरण #जलवायुपरिवर्तन #सिनेमाऔरसमाज

विश्व पर्यावरण दिवस विशेष | कान 2026 से पर्यावरण और सिनेमा की पुकार सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, आने वाले कल का आईना भी है...
05/06/2026

विश्व पर्यावरण दिवस विशेष | कान 2026 से पर्यावरण और सिनेमा की पुकार

सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, आने वाले कल का आईना भी है। कान 2026 में शामिल हुई कुछ फिल्में बताती हैं कि पर्यावरण का मुद्दा जंगल, पानी और इंसान — तीनों से जुड़ा है। कान 2026 के निर्देशक थिएरी फ्रेमो (Thierry Fremaux) ने भी कहा कि इस साल कई फिल्में वैश्विक तनाव से बचने के लिए “कोमलता, गीतों और प्रकृति” पर केंद्रित हैं, जबकि कुछ अन्य फिल्में _“इतिहास को वर्तमान में ले आती हैं”
ये फिल्में सिनेमा की दुनिया में कंटेंट और सोच को लेकर सामयिक और सार्थक बदलाव हैं.. ज़रूरत हैं। हमें अपनी सोच में, सिनेमा में प्रकृति, पर्यावरण, सहअस्तित्व के मुद्दों को शामिल करना ही होगा, ये आज की ज़रूरत है।

ऊपर मेंशन हुई कान की ये 3 फिल्में हैं-

1. 𝐒𝐩𝐢𝐫𝐢𝐭 𝐎𝐟 𝐓𝐡𝐞 𝐖𝐢𝐥𝐝𝐟𝐥𝐨𝐰𝐞𝐫 — भारत

ये मध्य प्रदेश के जंगलों में बसी यह डॉक्यूमेंट्री दो आदिवासी भाई-बहनों की कहानी है। वे देश की पहली कानूनी तौर पर वैध महुआ डिस्टिलरी चलाते हैं — जहाँ जंगल को बचाकर ही रोज़ी-रोटी मिलती है, और पारंपरिक रास्ता ही विकास की राह बन जाता है।

2. 𝐄𝐥𝐞𝐩𝐡𝐚𝐧𝐭𝐬 𝐢𝐧 𝐭𝐡𝐞 𝐅𝐨𝐠 — नेपाल

ये जंगल के किनारे रहने वाले किन्नर समुदाय और जंगली हाथियों के सह-अस्तित्व की कहानी है। अन सर्टेन रिगार्ड में ज्यूरी प्राइज़ विजेता यह फिल्म सवाल करती है — क्या हम उन लोगों को भूल सकते हैं जो पर्यावरण की रक्षा की पहली पंक्ति में खड़े हैं.... यानी आदिवासी, पारंपरिक वनवासी और जंगलों से सटे इलाकों में रहने वाले लोग।

3. 𝐄𝐥 𝐫𝐚𝐬𝐭𝐫𝐞 𝐝𝐞𝐥 𝐥𝐥𝐨𝐩 / 𝐓𝐡𝐞 𝐓𝐫𝐚𝐢𝐥 𝐨𝐟 𝐭𝐡𝐞 𝐖𝐨𝐥𝐟— कैटालोनिया

ये फिल्म भाई की मौत के बाद अपने गाँव लौटी एक लड़की की कहानी है, जहां उसके पिता एक फासीवादी शासन की वैक्सीन से मर रहे हैं, जो बड़े परिवारों को निशाना बनाती थी। इधर गाँव सूख रहा है, उधर पिता की साँसें। पानी की कमी और सत्ता के ज़हर के बीच वह इलाज ढूँढती है — एक ऐसी दुनिया में जहाँ पर्यावरण और राजनीति, दोनों जानलेवा हैं। रानीतिक और डिस्टोपियन लगती ये फिल्म समाज, राजनीति और पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों और सवालों से जूझती है।

कमोबेश ये तीनों फिल्में एक ही सच दिखाती हैं:
दरअसल पर्यावरण का संकट अकेला नहीं आता। वह आदिवासी की ज़मीन छीनता है, हाशिए के समुदाय को सबसे पहले डुबोता है, और सत्ता को इंसानों पर प्रयोग करने का मौका देता है। उड़ीसा का नियमगिरि हो, छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य हो या फिर दिल्ली-गुड़गांव-हरियाणा से सटी अरावली.... खबरों के ज़रिए इस खतरनाक प्रवृत्ति के हम सब चश्मदीद बनते रहे हैं।

इस पर, सिनेमा हमें याद दिलाता है — धरती को बचाना मतलब इंसाफ को बचाना है।

सुप्रसिद्ध ईरानी-फ्रांसीसी ग्राफिक उपन्यासकार, कलाकार और बेबाक फिल्म निर्देशक मार्जाने सत्रापी (Marjane Satrapi) का 56 व...
04/06/2026

सुप्रसिद्ध ईरानी-फ्रांसीसी ग्राफिक उपन्यासकार, कलाकार और बेबाक फिल्म निर्देशक मार्जाने सत्रापी (Marjane Satrapi) का 56 वर्ष की आयु में आज असामयिक निधन हो गया। यदि आप उनके नाम या काम से अनजान हैं, तो आपको बता दें कि मार्जाने विश्व सिनेमा और समकालीन साहित्य का एक ऐसा चमकीला सितारा थीं, जिन्होंने तानाशाही और बंदिशों के खिलाफ हमेशा अपनी कला को सबसे बड़ा हथियार बनाया। उन्हें उनके सुप्रसिद्ध आत्मकथात्मक ग्राफिक उपन्यास "परसेपोलिस" (Persepolis) के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, जिसमें उन्होंने 1979 की ईरानी इस्लामिक क्रांति के दौरान और उसके बाद के अपने बचपन, निर्वासन और संघर्ष की कहानी को बेहद सादगी से बयां किया था। बाद में जब उन्होंने खुद इस किताब को एक एनिमेटेड फिल्म के रूप में पर्दे पर उतारा, तो उसे कान फिल्म फेस्टिवल में 'जूरी प्राइज' से नवाजा गया और वह ऑस्कर के लिए भी नामांकित हुई।

गंभीर राजनैतिक मुद्दों को गहरे व्यंग्य (डार्क ह्यूमर) और सादे ब्लैक-एंड-व्हाइट विजुअल्स के साथ पेश करना उनकी अपनी एक अनोखी सिनेमाई पहचान थी। उन्होंने आगे चलकर 'चिकन विद प्लम्स', 'द वॉयस' और प्रसिद्ध वैज्ञानिक मैरी क्यूरी के जीवन पर आधारित फिल्म 'रेडियोएक्टिव' जैसी कई बेहतरीन फिल्मों का निर्देशन भी किया।

सिनेमा से इतर, उनकी अद्भुत कलात्मकता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने पेरिस 2024 ओलंपिक के लिए एक भव्य 9-मीटर लंबा ट्रिप्टिक (तीन पैनलों वाली विशाल कलाकृति) भी डिजाइन किया था। वे केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि तानाशाही के खिलाफ, निर्वासन के दर्द और महिलाओं की आज़ादी पर पूरी दुनिया में एक बेहद मुखर और निडर आवाज़ थीं। अपनी इसी बेबाकी और सिद्धांतों के कारण साल 2025 में उन्होंने फ्रांस के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'लीजन ऑफ ऑनर' को भी ठुकरा दिया था, क्योंकि वे ईरान के प्रति फ्रांसीसी सरकार के दोहरे और पाखंडी रवैये से बेहद खफा थीं।
फ्रांस के राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, अपनी कला से पूरी दुनिया को स्वतंत्रता का सार्वभौमिक संदेश देने वाली इस महान कलाकार ने अपने पति और स्वीडिश अभिनेता मथियास रीपा के निधन के करीब एक साल बाद, अत्यधिक "गहरे दुःख और उदासी" के कारण इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
NDFF कला और अभिव्यक्ति की इस अडिग मशाल को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है—आपकी कहानियां हमेशा आज़ादी का रास्ता दिखाती रहेंगी।

4 जून दो दिग्गज कलाकारों की जयंती का दिन होता है। नूतन और एस पी बालासुब्रह्मण्यम। दोनों बेहतरीन कलाकार। नूतन एक बेहद प्र...
04/06/2026

4 जून दो दिग्गज कलाकारों की जयंती का दिन होता है।
नूतन और एस पी बालासुब्रह्मण्यम।
दोनों बेहतरीन कलाकार।
नूतन एक बेहद प्रतिभाशाली, खूबसूरत अभिनेत्री जिन्होने हर उम्र में तरह-तरह के किरदार निभाकर अभिनय प्रतिभा और उसकी रेंज का लोहा मनवाया।
वहीं एस पी बालासुब्रह्मण्यम ने अपनी भरे गले और दिल से निकलती लगने वाली आवाज़ में एक से एक बेहतरीन गाने गाए... यो यादगार बने, ज़माने, फिल्मों, नायकों की पहचान बने।
नूतन पर अंग्रेजी में लिखा शांतनु रॉय चौधरी का एक बेहतरीन लेख हमने पिछले साल प्रकाशित किया था, अगर आपने न पढ़ा हो तो ज़रूर पढ़ें... एक बार फिर उसका लिंक शेयर किया जा रहा है।

लिंक: https://ndff.in/nutan-the-quintessential-actress-of-hindi-cinema/ by

वैसे आज महान फिल्मकार बासु चटर्जी की पुण्यतिथि भी होती है। बासु दा ने अपनी पहली फिल्म 'सारा आकाश' से ही हिंदी सिनेमा में प्रचलित परिपाटी को तोड़ा था और 70 के दशक में हिंदी सिनेमा में रियलिज़्म (जिसे न्यू वेव या समानांतर सिनेमा कहा गया) के पथ प्रदर्शक बने थे। बाद में उन्होने गंभीरता और लोकप्रिय चलताऊ मनोरंजन के बीच के एक गंभीर लेकिन पारिवारिक और मनोरंजनक सिनेमा की धारा को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई, जिसे मिडल ऑफ द रोड या मिडिल क्लास का सिनेमा कहा गया।

आज ये सभी महान कलाकार हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन इनका काम हमेशा देखा, समझा और सराहा जाता रहेगा। सिनेमा के इन सभी धुरंधरों के सलाम।

Veteran filmmaker and distributor   is no more... A prominent figure in the Indian film industry, Pahlaj ji produced sev...
04/06/2026

Veteran filmmaker and distributor is no more... A prominent figure in the Indian film industry, Pahlaj ji produced several noteworthy films during his illustrious career and played a pivotal role in shaping the careers of numerous actors, directors, and film personalities.

Pahlaj ji was also among the industry's leading distributors, having distributed several major films over the years... In addition, he was one of the most vocal and influential voices in the production sector... Later, he served as the Chairman of the Central Board of Film Certification [ ].
(Info courtesy: Taran Adarsh)

Heartfelt condolences to his family... Om Shanti 🙏🙏🙏.

"सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, समाज को बदलने का माध्यम है"—इसी सिद्धांत को अपनी आखिरी सांस तक जीने वाले जन-सिनेमा के पुरोधा...
01/06/2026

"सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, समाज को बदलने का माध्यम है"—इसी सिद्धांत को अपनी आखिरी सांस तक जीने वाले जन-सिनेमा के पुरोधा ख्वाजा अहमद अब्बास का आज स्मृति दिवस है। सिनेमा की भाषा बदलने वाले और अपनी बेबाक कलम से समाज को आइना दिखाने वाले महान फिल्मकार व पत्रकार के.ए. अब्बास को उनके स्मृति दिवस पर विनम्र श्रद्धांजलि। राज कपूर के सिनेमाई शिल्प के पीछे छिपी प्रगतिशील वैचारिक चेतना को समझने के लिए पढ़िए लेखक ज़ाहिद खान Zahid Khan का यह विशेष आलेख..

https://ndff.in/khwaja-ahmad-abbas-cinema-legacy/

प्रसिद्ध गायिका सुमन कल्याणपुर नहीं रहीं। भारतीय संगीत जगत की दिग्गज गायिका सुमन कल्याणपुर का रविवार, 31 मई को 89 वर्ष क...
01/06/2026

प्रसिद्ध गायिका सुमन कल्याणपुर नहीं रहीं।

भारतीय संगीत जगत की दिग्गज गायिका सुमन कल्याणपुर का रविवार, 31 मई को 89 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हो गया।

'ना ना करते प्यार', 'आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे', 'तुमने पुकारा और हम चले आए', 'शराबी शराबी ये सावन का मौसम' जैसे सदाबहार गीतों से उन्होंने पीढ़ियों का दिल जीता।
1954 में 'मंगू' से शुरू हुआ सफर 60-70 के दशक में बुलंदियों पर पहुंचा। लता जी से आवाज़ की समानता के बावजूद उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।
हिंदी, मराठी, बंगाली, कन्नड़ समेत कई भाषाओं में गाया। 2023 में पद्म भूषण से सम्मानित हुईं।

उनका जाना संगीत के एक सुनहरे युग का अंत है।
विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

जन-सिनेमा के अमर विद्रोही जॉन अब्राहम को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमनकेरल के सिनेमाई पुनर्जागरण (Cinematic Renaissance) के...
31/05/2026

जन-सिनेमा के अमर विद्रोही जॉन अब्राहम को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन

केरल के सिनेमाई पुनर्जागरण (Cinematic Renaissance) के अगुआ और अपनी बेबाक फिल्मों से रूढ़ियों पर चोट करने वाले इस महान फिल्मकार को याद करने के लिए आज का दिन बेहद खास है। जॉन अब्राहम ने न केवल फिल्मों की भाषा बदली, बल्कि जनता के सहयोग से 'पीपुल्स फिल्म' बनाने की एक नई और क्रांतिकारी मिसाल भी कायम की। उनकी इस शानदार विरासत की प्रासंगिकता आज भी वैश्विक स्तर पर बरकरार है, जिसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि इसी महीने हुए प्रतिष्ठित 'कान फिल्म फेस्टिवल' (Cannes Film Festival) के रीस्टोर्ड क्लासिक्स खंड में उनकी अंतिम कालजयी कृति 'अम्मा अरियन' (Report To Mother) की सम्मानजनक स्क्रीनिंग आयोजित की गई। 1970 के दशक के नक्सली आंदोलन की पृष्ठभूमि पर बनी 'अम्मा अरियन' महज़ एक फिल्म नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, विस्थापन और सामाजिक यथार्थ का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।
आज के इस खास मौके पर जन-सरोकारों से जुड़े इस महान सिनेमाई विद्रोही के सफर और उनके विचारों पर प्रस्तुत है मशहूर फिल्म स्कॉलर वी.के. चेरियन का यह विशेष आलेख: https://ndff.in/john-abraham-the-rebel-malyalam-filmmaker/

VK Cherian

76वें कान फिल्म फेस्टिवल (Cannes Film Festival) में जॉन अब्राहम की अंतिम फिल्म 'अम्मा अरियन' की विशेष स्क्रीनिंग आयोजित की गई। भार...

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए...ये लिखते हुए बेहद दुख हो रहा है कि उर्द...
28/05/2026

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए...

ये लिखते हुए बेहद दुख हो रहा है कि उर्दू अदब और भारतीय साहित्य, सिनेमा के शिखर पुरुष, पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र साहब का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। बशीर बद्र साहब ने अपनी लिखी इस नज़्म की तरह ही, चलते-चलते अपनी शायरी का, यादों का कभी न बुझने वाला उजाला हमारे दिलों में छोड़ दिया है।

वह केवल एक शायर नहीं थे, बल्कि वे आम बोलचाल की जुबान में सबसे गहरी मानवीय संवेदनाओं को पिरोने वाले जादूगर थे। उन्होंने मुश्किल शब्दों के बंद कमरों से शायरी को आज़ाद कर उसे आम आदमी की धड़कन बना दिया। उनके शेरों की सादगी में जो बेमिसाल ताक़त और रूहानी खूबसूरती थी, उसने हर पीढ़ी के दिलों को छुआ। जब वे लिखते हैं—

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

या

यूँही बे-सबब न फिरा करो
कोई शाम घर में रहा करो
... तो वो महज़ शब्द नहीं रह जाते, बल्कि हमारे रोज़मर्रा के सुख-दुख और फलसफे की आवाज़ बन जाते हैं। इस तरह के उनके तमाम शेर हैं जो एक लंबे अरसे से हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बेहद सहजता से घुलेमिले हैं या सुने-सुनाए जाते रहे हैं, बगैर हमारे जाने कि ये बेहतरीन लाइनें उन्ही की कलम से निकली हैं... और यही एक रचनाकार की सबसे बड़ी मकबूलियत है।

बशीर बद्र साहब का रिश्ता सिनेमा और संगीत से बेहद करीबी रहा। उनके लिखे अमर गीतों और ग़ज़लों को जब ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह, पंकज उधास और तलत अज़ीज़ जैसे उस्तादों ने अपनी आवाज़ दी, तो वो संगीत के इतिहास का अमूल्य हिस्सा बन गए।

अदब और सिनेमा के इस महान रचनाकार को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि। बशीर बद्र साहब, आज भले हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़लें, खामोशियाँ और उनके रचे ये शब्द आने वाली सदियों तक प्रेम-तन्हाई और धूप-छांव भरे ज़िंदगी के रास्तों को रौशन करते रहेंगे।
उन्ही के लफ्ज़ों में...

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी...

अनिक दत्ता नहीं रहेकोलकाता से आई एक खबर आज सिनेमा की दुनिया और कलाप्रेमियों के लिए सदमे के तौर पर आई। बांग्ला फिल्मों के...
27/05/2026

अनिक दत्ता नहीं रहे

कोलकाता से आई एक खबर आज सिनेमा की दुनिया और कलाप्रेमियों के लिए सदमे के तौर पर आई। बांग्ला फिल्मों के जाने-माने लेखक-निर्देशक अनिक दत्ता का एक हादसे में 64 साल की उम्र में निधन हो गया।
2022 में आई उनकी फिल्म 'अपराजितो' ने सिनेप्रेमियों के सामने 1950 के दौर का वो माहौल ज़िंदा कर दिया था, जिसमें सत्यजित राय पथेर पांचाली बनाने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे। सत्यजित राय के उस बाहरी और भीतरी संघर्ष को समेटने वाली ये फिल्म फिल्म-इतिहास के एक जीवंत दस्तावेज़ के तौर पर दर्ज हुई और खूब सराही गई। सत्यजीत राय के लिए पथेर पांचाली बनाना कितना मुश्किल था, उस दौर की जद्दोजहद, जुनून, सब कुछ अनिक दत्ता ने इतनी कलात्मकता से पर्दे पर रखा कि दर्शकों को लगा जैसे वो खुद 1950 के सेट पर मौजूद हैं। राय की अपु त्रयी में एक के नाम से (अपराजितो) फिल्म बनाकर उन्हे श्रद्धांजलि देना आसान नहीं था, पर उन्होंने कमाल कर दिया। इस एक फिल्म ने अनिक दत्ता को बतौर निर्देशक और गंभीरता से स्थापित कर दिया। हालांकि इसके काफी पहले वो अपनी कला का लोहा मनवा चुके थे।
2019 में 'बोरुनबाबुर बोंधु' आई थी। कहा जाता है कि सौमित्र चटर्जी (निधन 2020) आखिरी बार इतने बेहतरीन रोल में दिखे। एक अकेले बूढ़े आदमी की चुप्पी, उसकी यादें, उसका अकेलापन — फिल्म दिल को छू गई। बहुत सराही गई।
इससे भी काफी पहले 2012 में उनकी बिलकुल अलग अंदाज़ की फिल्म (उनकी पहली फिल्म) 'भूतेर भविष्यत' एक यादगार फिल्म रही। परमब्रत चटर्जी समेत शानदार कास्ट, और भूतों का हाउसफुल दरबार! सिस्टम पर तंज, हंसी के बीच चुभते डायलॉग वाली ये फिल्म बंगाली सिनेमा में हॉरर-कॉमेडी का कल्ट बन गई।

तीनों फिल्में अलग, पर अनिक दत्ता की आवाज़ एक। व्यंग्य में भी अर्थ था, गहराई थी। NDFF की तरफ से उनके परिवार और सिनेमा प्रेमियों को गहरी संवेदनाएं।
आपकी फिल्में, आपकी किस्सागोई हमेशा ज़िंदा रहेंगी। ओम शांति 🙏

साभार: Jai Narayan Prasad

Address

Delhi

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when New Delhi Film Foundation posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to New Delhi Film Foundation:

Share