28/08/2016
उस बंद दरवाज़े की दरारों से,
वह रोज़ अपने ख़्वाबों को फिसलते देखा करती है।
इन्हीं दरारों के ज़रिये,
रौशनी अंदर आती है
और उसके सुन्सान कमरे में,
सुस्त लेट जाती है।
रात की मद्धम हवा की वजह से,
अध्खुले उस दरवाज़े से,
वह अक्सर अंधेरे को बुलंद होते देखा करती है।
भोर होते ही जब सूरज दरवाज़े पर दस्तक देता है,
अंदर घुट रहा अंधेरा उन दरारों के रास्ते फ़रार होने को तड़पता है।
उन्हीं दरारों से वह सूरज की किरनों कोे आंगन में फैलते देखती है।
ठीक वैसे ही जैसे कोई सुनहरी धान की गठरियाँ।
जिन तख़्तों को कील-हथौड़े से जोड़कर,
कभी वह दरवाज़ा खड़ा किया गया था,
उसके एक अकेले मुक्के से
वे तख़्त धड़ाम से मुँह के बल गिर जाते हैं।
वह हैरान रह जाती है।
सोचने लगती है,
कौन ज़्यादा कमज़ोर था?
वह बंद दरवाज़ा या उसकी ख़्वाइश?
In photographs-- Kritika Sharad
Photographs taken by-- Aayushi Sawarn
Poem originally written in Sadri by-- Jacinta Kerketta, a tribal woman from Jharkhand whose powerful poems deal with issues of displacement, violence against tribal women, hunger and apathy of governance.
The poem is available online in English by the title-Closed door
Translated in Hindi by-- Kritika Sharad